छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक-2026: एक नए राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की शुरुआत
छत्तीसगढ़ की राजनीति में वर्ष 2023 के बाद एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब 13 दिसंबर 2023 को Vishnu Deo Sai ने राज्य के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वे न केवल भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री भी बने। उनके नेतृत्व में राज्य सरकार ने प्रशासनिक और वैचारिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों को तेज़ी से लागू करना शुरू किया।
इसी क्रम में हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा में “छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक-2026” पारित किया गया, जिसने राज्य की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
विधेयक का उद्देश्य और सरकार का पक्ष
यह विधेयक मुख्य रूप से उन मामलों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया है, जिनमें धर्मांतरण को जबरन, धोखे या प्रलोभन के आधार पर किए जाने का आरोप लगाया जाता है। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता को रोकना नहीं, बल्कि इसके दुरुपयोग को नियंत्रित करना है।
सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रलोभन या दबाव के माध्यम से धर्म परिवर्तन के मामले सामने आते रहे हैं, इसलिए एक सख्त कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी।
सख्त दंड प्रावधान
इस विधेयक की सबसे चर्चित विशेषता इसकी कठोर सजा व्यवस्था है—
अवैध धर्मांतरण के मामलों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और ₹5 लाख तक का जुर्माना
सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से लेकर उम्रकैद तक की सजा और ₹25 लाख तक का जुर्माना
इन प्रावधानों के कारण यह कानून देश के सबसे सख्त धर्मांतरण विरोधी कानूनों में से एक माना जा रहा है।
पूर्व सूचना और प्रशासनिक प्रक्रिया
विधेयक में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला कलेक्टर को सूचना देनी होगी। इसके बाद प्रशासन जांच करेगा कि यह निर्णय पूरी तरह स्वेच्छा से लिया गया है या नहीं।
सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाएगी, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
विवाह और धर्मांतरण पर प्रावधान
विधेयक में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि किसी विवाह के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन किया जाता है, तो उसे अवैध माना जाएगा। इस प्रावधान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ गई है, क्योंकि यह मुद्दा पहले से ही “लव जिहाद” जैसी चर्चाओं से जुड़ा हुआ रहा है।
विधानसभा में पारित होने की प्रक्रिया
इस विधेयक को विधानसभा में Vijay Sharma द्वारा प्रस्तुत किया गया। चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने इस पर तीव्र आपत्ति जताई और इसे अल्पसंख्यक अधिकारों के खिलाफ बताया। विरोध स्वरूप विपक्ष ने सदन से वॉकआउट भी किया।
हालांकि, सरकार के बहुमत के कारण यह विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया।
राज्यपाल की स्वीकृति
विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक को राज्यपाल Ramen Deka के पास भेजा गया, जिन्होंने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इसके बाद यह विधेयक राज्य में प्रभावी हो गया।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस कानून के लागू होने के बाद राज्य में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। रायपुर सहित कई स्थानों पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और अल्पसंख्यक समुदायों ने इसका विरोध किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रभाव डाल सकता है।दूसरी ओर, सरकार और उसके समर्थक इसे सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम बता रहे हैं।
एक व्यापक वैचारिक बहस
यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक बहस का प्रतीक बन गया है। एक ओर यह धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का प्रश्न उठाता है, तो दूसरी ओर यह सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी सामने लाता है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक-2026 यह दर्शाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होते, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच विचारधारात्मक टकराव का परिणाम भी होते हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह कानून व्यवहार में कैसे लागू होता है और इसका राज्य के सामाजिक संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
आलोक कुमार


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