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मंगलवार, 18 अगस्त 2026

Bihar : चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

 


चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

चुनाव के दौरान जनता राजा बन जाती है और उम्मीदवार रंक। लेकिन जैसे ही नतीजे आते हैं, तस्वीर पलट जाती है—रंक राजा बन जाता है और जनता फिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि के दरबार में खड़ी दिखाई देती है। लोकतंत्र की असली चुनौती इसी उलटफेर को रोकने की है।

लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि चुनाव के दौरान जिस जनता के दरवाजे पर नेता सिर झुकाकर पहुंचते हैं, वही जनता चुनाव परिणाम के बाद अक्सर अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती नजर आती है। वोट मांगते समय जनता सर्वोपरि होती है, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत बढ़ जाती है।

यही सवाल आज बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक के रूप में शपथ लेना उनके राजनीतिक सफर का नया अध्याय है। राजनीति और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर बैठकर विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे।

रणनीतिकार से ‘माननीय’ बनने का यह सफर केवल पद परिवर्तन नहीं है। इसके साथ संवैधानिक अधिकार, संसदीय जिम्मेदारी और जनता के प्रति जवाबदेही भी जुड़ जाती है।

चुनाव जीतना अंत नहीं, शुरुआत है

किसी भी उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जिम्मेदारी का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत होता है।

जनता ने किसी प्रतिनिधि को विधानसभा इसलिए नहीं भेजा कि वह केवल सदन की कार्यवाही में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। उससे अपेक्षा होती है कि वह क्षेत्र की समस्याओं को विधानसभा में उठाए, सरकार से सवाल पूछे, नीतियों पर बहस करे और जनता की आवाज को सत्ता तक पहुंचाए।

विधायक बनने के बाद प्रशांत किशोर के सामने भी यही कसौटी होगी।

बांकीपुर के मतदाताओं ने उन्हें जो जनादेश दिया है, वह अब उनके लिए राजनीतिक पूंजी से ज्यादा जिम्मेदारी है। सड़क, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, शहरी सुविधाएं और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों के विषय नहीं रहेंगे। इन पर काम और जवाब दोनों देना होगा।

विधायक के पास अधिकार हैं, लेकिन जनता के ऊपर नहीं

विधायक को सदन में जनता के मुद्दे उठाने, प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने और कानून निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार मिलता है। राज्य के बजट और वित्तीय प्रस्तावों पर विधानसभा की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका होती है।

विधायक का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के विधायक भी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं और विपक्ष के विधायक भी।

सदन में मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकार प्रतिनिधि को जनता से ऊपर रखने के लिए नहीं होते। उनका उद्देश्य यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना अनुचित दबाव या भय के अपने विचार रख सकें और सार्वजनिक हित के मुद्दे उठा सकें।

यानी अधिकार जितने बड़े हैं, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

क्या चुनाव के बाद भी जनता राजा रहती है?

यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—क्या चुनाव जीतने के बाद भी जनता राजा बनी रहती है?

संवैधानिक दृष्टि से जवाब स्पष्ट है—हाँ।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम स्रोत जनता है। विधायक जनता द्वारा चुना जाता है और उसका कार्यकाल सीमित होता है। वह स्थायी शासक नहीं है। अगले चुनाव में वही जनता उसके काम का मूल्यांकन कर सकती है।

लेकिन राजनीतिक व्यवहार में तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है।

चुनाव के दौरान उम्मीदवार घर-घर जाते हैं। मतदाताओं के सामने अपनी योजनाएं रखते हैं। हाथ जोड़ते हैं, समर्थन मांगते हैं और कहते हैं कि वे जनता की सेवा करने आए हैं।

परिणाम आने के बाद वही नागरिक किसी प्रमाणपत्र, सड़क, नाली, पेंशन, रोजगार, अस्पताल या सरकारी योजना से जुड़ी समस्या लेकर जनप्रतिनिधि के कार्यालय के चक्कर लगाता है।

यह बदलाव लोकतंत्र की भावना के लिए गंभीर सवाल है।

जनता से दूरी लोकतंत्र को कमजोर करती है

जनप्रतिनिधि और जनता के बीच दूरी बढ़ने का मतलब केवल राजनीतिक दूरी नहीं है। इससे लोकतंत्र की जवाबदेही कमजोर होती है।

यदि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि से मिलने में कठिनाई हो, यदि शिकायतों का जवाब न मिले, यदि चुनाव के दौरान किए गए वादों की समीक्षा न हो और यदि पांच साल तक संवाद केवल चुनावी मौसम में हो, तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व केवल मतदान तक सीमित हो जाता है।

इसलिए जरूरी है कि विधायक अपने क्षेत्र में नियमित जनसंवाद की व्यवस्था बनाए रखें। जनता से मिलने का समय तय हो, शिकायतों की निगरानी हो और विकास कार्यों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।

जनता को भी केवल चुनाव के दिन जागरूक मतदाता बनने के बजाय पूरे कार्यकाल में सक्रिय नागरिक बने रहना होगा।

प्रशांत किशोर के सामने अलग चुनौती

प्रशांत किशोर के मामले में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजनीति में व्यवस्था परिवर्तन, जनभागीदारी और जनता की भूमिका जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है।

अब उनके पास भाषण और राजनीतिक रणनीति से आगे बढ़कर संस्थागत काम करने का अवसर है।

विधानसभा में उनकी भूमिका यह तय करेगी कि वे अपने राजनीतिक विचारों को कानून, नीति और जनहित के ठोस मुद्दों में कितनी प्रभावी ढंग से बदल पाते हैं।

जनता उनसे यह भी पूछ सकती है कि जिन समस्याओं को उन्होंने चुनावी राजनीति में उठाया, उनके समाधान के लिए सदन में उन्होंने क्या किया।

यही वह बिंदु होगा जहां चुनावी वादा और संवैधानिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी होगी।

असली राजा कौन?

लोकतंत्र में ‘राजा’ शब्द प्रतीकात्मक है। वास्तविक व्यवस्था में न तो जनता राजा है और न विधायक। संविधान सर्वोच्च है और निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान के अधीन काम करते हैं।

फिर भी यदि लोकतंत्र की भाषा में सवाल पूछा जाए कि सत्ता का मालिक कौन है, तो जवाब जनता ही होगी।

विधायक को सत्ता जनता से मिलती है। पद जनता देती है। जनादेश जनता देती है और अगले चुनाव में फैसला भी जनता ही करती है।

इसलिए चुनाव जीतने के बाद किसी जनप्रतिनिधि को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता का शासक नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।

बांकीपुर की जनता ने प्रशांत किशोर को अवसर दिया है। अब बारी उनकी है कि वे इस जनादेश को विधानसभा की कार्यवाही, सवालों, नीतियों और जमीन पर दिखाई देने वाले काम में बदलें।

चुनाव में जनता ने उन्हें प्रतिनिधि बनाया है; अब उन्हें साबित करना होगा कि वे जनता को सत्ता से दूर करने नहीं, बल्कि जनता की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने आए हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, जीत के बाद जनता के प्रति जवाबदेह बने रहने में है।

क्योंकि चुनाव के दिन जनता पांच साल के लिए अपना प्रतिनिधि चुनती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी निगरानी और सवाल पूछने का अधिकार पांच साल के लिए समाप्त नहीं होता।

चुनाव में राजा जनता होती है। नतीजे के बाद भी राजा जनता ही रहनी चाहिए—और विधायक को यह याद रखना चाहिए कि वह दरबार का राजा नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।


आलोक कुमार

Bihar : कोसी का कहर

 

कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म

छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं।

18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई।

सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा?

छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट

कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। आयोग की प्रारंभिक अवधि मार्च 2010 तक निर्धारित थी। इसके बाद अवधि बढ़ाई गई और चौथा विस्तार 31 मार्च 2012 तक हुआ।

इसके बावजूद रिपोर्ट तत्काल सामने नहीं आई। करीब छह वर्ष बाद, 1 अगस्त 2014 को आयोग की रिपोर्ट बिहार विधानसभा में रखी गई।

यहीं पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है—जिस त्रासदी के कारणों की जांच जल्द पूरी करने की जरूरत थी, उसकी रिपोर्ट सामने आने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

रिपोर्ट में निगरानी व्यवस्था की कमियों, बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका, चेतावनी व्यवस्था और कटाव निरोधक कार्यों की मॉनिटरिंग जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए गए। अभियंताओं की क्षमता और तैनाती तथा पूर्व में कराए गए कटाव निरोधक कार्यों की जांच की जरूरत का भी उल्लेख किया गया।

लेकिन रिपोर्ट के बाद कार्रवाई कितनी हुई? किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? कितनों पर विभागीय या कानूनी कार्रवाई हुई? जनता को इसका स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब कितना मिला?

यही वह अंतर है जहां जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई के बीच की दूरी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है।

18 साल बाद भी बाढ़ के पुराने जख्म

कोसी की त्रासदी केवल 2008 की घटना नहीं है। इसके निशान आज भी बुनियादी ढांचे और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देते हैं।

मधेपुरा के चौसा प्रखंड में धनेशपुर चौक से मोरसंडा गोठ बस्ती की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलों की समस्या लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी का कारण रही है। मरम्मत के बाद भी बाढ़ में संरचनाओं के क्षतिग्रस्त होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पुल टूटता है, कहीं डायवर्सन बनता है और फिर अगली बाढ़ पुराने संकट को वापस ले आती है।

सवाल यह नहीं कि कोसी में बाढ़ क्यों आती है। सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में हर वर्ष बाढ़ का खतरा रहता है, वहां स्थायी और टिकाऊ बुनियादी ढांचा क्यों नहीं तैयार किया जाता?

बाढ़ के समय नाव लोगों की मजबूरी बन जाती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना कठिन हो जाता है। किसानों की फसल और बाजार तक पहुंच दोनों प्रभावित होते हैं।

पुनर्वास की अधूरी कहानी

आपदा के बाद राहत तत्काल जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन स्थायी पुनर्वास ही प्रभावित परिवारों को सामान्य जीवन में लौटाता है। यही वजह है कि पुनर्वास योजनाओं की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण सवालों में शामिल होनी चाहिए।

मधेपुरा में 2 लाख 36 हजार 632 घरों के प्रभावित होने और करीब एक लाख घरों के निर्माण की योजना से जुड़ी जानकारी सामने आई थी। लेकिन योजना बंद होने तक लगभग एक चौथाई घर ही बन पाने की बात कही गई। यदि उपलब्ध आंकड़े सही हैं, तो यह पुनर्वास की गति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

आपदा के बाद वर्षों तक यदि परिवार पक्के घर की प्रतीक्षा करता रहे तो राहत का अर्थ अधूरा रह जाता है। पुनर्वास सिर्फ मकान बनाने की योजना नहीं है। इसमें सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए।

मुआवजे के आंकड़े भी पूछते हैं सवाल

मृतकों के परिजनों को सहायता देने के लिए सरकार ने विभिन्न मदों में मुआवजे और अनुदान की व्यवस्था की थी। लेकिन मधेपुरा से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में आधिकारिक तौर पर 272 मौतें दर्ज होने और 181 मृतकों के परिवारों को सरकारी अनुदान मिलने की बात सामने आती है।

यदि ये आंकड़े सही हैं तो सवाल बेहद सीधा है—बाकी परिवारों को सहायता क्यों नहीं मिली?

आपदा में मृतकों की संख्या केवल सरकारी आंकड़ा नहीं होती। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, एक घर और कई अधूरे सपने होते हैं। इसलिए मुआवजे की सूची, भुगतान की स्थिति और लंबित मामलों का सार्वजनिक विवरण होना चाहिए।

यदि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों या लाभुकों की संख्या अलग है, तो प्रशासन को उन आंकड़ों का मिलान भी सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।

आपदा सिर्फ पानी से नहीं बनती

कोसी ने यह भी सिखाया कि आपदा का प्रभाव केवल प्राकृतिक कारणों से तय नहीं होता। कमजोर निगरानी, लचर प्रशासन, निर्णय में देरी, खराब निर्माण, अधूरी योजनाएं और जवाबदेही की कमी किसी प्राकृतिक संकट को लंबे सामाजिक संकट में बदल सकती हैं।

18 अगस्त 2008 को पानी आया और बहुत कुछ बहा ले गया। लेकिन पानी उतरने के बाद भी हजारों परिवारों का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कहीं सड़क नहीं बनी, कहीं पुल का स्थायी समाधान नहीं हुआ, कहीं पुनर्वास अधूरा रहा और कहीं मुआवजे का सवाल लंबित रहा।

अब श्रद्धांजलि नहीं, सार्वजनिक हिसाब चाहिए

18 वर्ष बाद कोसी को केवल त्रासदी की बरसी पर याद करना पर्याप्त नहीं है। अब पुराने वादों और योजनाओं का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।

सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए—

  • 2008 की त्रासदी के कारणों पर जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या कार्रवाई हुई?

  • कितने अधिकारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हुई?

  • पुनर्वास के लिए कितने घर स्वीकृत हुए और कितने वास्तव में बने?

  • कितने परिवारों को मुआवजा मिला और कितने मामले अभी लंबित हैं?

  • टूटे और जर्जर पुलों की स्थायी मरम्मत के लिए क्या समयबद्ध योजना है?

  • भविष्य की बाढ़ से निपटने के लिए चेतावनी और निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत हुई है?

कोसी के लोगों को फिर केवल आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें योजनाओं की स्थिति, खर्च हुए धन और लंबित काम का सार्वजनिक हिसाब चाहिए।

क्योंकि आपदा का पानी उतर जाता है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी नहीं उतरती।

18 अगस्त 2008 की त्रासदी को 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब समय है कि कोसी के पुराने जख्मों पर सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि ठोस काम दिखाई दे।

कोसी का पानी भले उतर गया हो, लेकिन कोसी के सवाल आज भी ऊंचे हैं।


आलोक कुमार

सोमवार, 17 अगस्त 2026

India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?


क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है?

20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा।

यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है?

लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे

लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक्रिया पर पड़ा।

सबसे चिंताजनक आंकड़ा प्रश्नकाल को लेकर सामने आता है। PRS के अनुसार लोकसभा में प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय का केवल लगभग 1 प्रतिशत ही चल पाया। राज्यसभा में भी प्रश्नकाल करीब 12 प्रतिशत समय तक ही चल सका।

प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और इन सवाल-जवाबों के माध्यम से सरकारी नीतियों और योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

यदि प्रश्नकाल ही लगातार बाधित होता रहे, तो सरकार से जवाब मांगने का यह संवैधानिक-लोकतांत्रिक मंच कमजोर पड़ता है।

राज्यसभा ने अपेक्षाकृत अधिक काम किया, लेकिन तस्वीर फिर भी चिंताजनक

राज्यसभा ने लोकसभा की तुलना में अधिक समय काम किया। उसने करीब 37.4 घंटे काम किया, जो निर्धारित समय का लगभग 33 प्रतिशत था। फिर भी इसका अर्थ है कि निर्धारित समय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाया।

सरकार की ओर से उत्पादकता के अलग आंकड़े भी सामने आए हैं—लोकसभा के लिए करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा के लिए लगभग 39 प्रतिशत। अलग-अलग गणना पद्धतियों के कारण इन आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।

लेकिन आंकड़ा चाहे 15 प्रतिशत हो या 19 प्रतिशत, 33 प्रतिशत हो या 39 प्रतिशत—बड़ी तस्वीर एक ही है: संसद के पास उपलब्ध समय का बहुत बड़ा हिस्सा सार्थक कामकाज में नहीं बदल पाया।

फिर 12 विधेयक कैसे पारित हुए?

यहीं इस सत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

सत्र की शुरुआत में 30 विधेयक लंबित थे। सत्र के दौरान 13 नए विधेयक पेश किए गए और 12 विधेयक पारित हुए। इसके बावजूद सत्र के अंत में 31 विधेयक लंबित रह गए।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—जब संसद के पास बहस के लिए सीमित समय था, तब विधायी काम इतनी तेजी से कैसे हुआ?

यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

कानून बनाना जरूरी है, लेकिन कानून की गुणवत्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संसद में किसी विधेयक पर चर्चा का उद्देश्य केवल सांसदों को बोलने का अवसर देना नहीं होता। चर्चा के दौरान विधेयक की कमियां सामने आती हैं, संभावित प्रभावों पर विचार होता है, संशोधन सुझाए जाते हैं और सरकार को अपने प्रस्ताव का पक्ष स्पष्ट करना पड़ता है।

कानून बनाना और कानून पर बहस करना अलग बातें हैं

संसद कोई ऐसी मशीन नहीं है जहां विधेयक आए और मतदान के बाद कानून बन जाए।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधेयक पर विचार, बहस, संशोधन और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। कई बार विपक्ष की आपत्ति सरकार को किसी प्रावधान को बेहतर बनाने के लिए मजबूर कर सकती है। संसदीय समितियां भी विधेयकों की विस्तृत जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

यदि चर्चा का समय कम हो जाए, तो कानून की कमियां सदन के रिकॉर्ड पर आने की संभावना भी घटती है।

यही कारण है कि किसी विधेयक का पारित हो जाना अपने आप में संसदीय लोकतंत्र की पूरी सफलता नहीं माना जा सकता।

सवाल यह है कि कानून बनने से पहले उस पर कितनी गंभीरता से विचार हुआ?

व्यवधान की राजनीति किसका नुकसान करती है?

संसद में हंगामे को लेकर सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराता है। विपक्ष दूसरी ओर आरोप लगाता है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है।

दोनों पक्षों के अपने राजनीतिक तर्क हो सकते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है—संसद का समय जनता का समय है।

संसद की कार्यवाही बाधित होने का मतलब केवल कुछ घंटे कम काम होना नहीं है। इसका असर प्रश्नकाल, विधायी चर्चा, निजी सदस्य कार्य, शून्यकाल और अन्य संसदीय गतिविधियों पर पड़ता है।

संसद चलाने की लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। यदि प्रति मिनट खर्च का अनुमान लगाया जाए, तो व्यवधान की आर्थिक कीमत भी बड़ी हो सकती है। लेकिन संसद के समय का सबसे बड़ा नुकसान केवल पैसे में नहीं मापा जा सकता।

लोकतंत्र में खोया हुआ बहस का समय वापस नहीं आता।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है

संसद के व्यवधान के लिए केवल विपक्ष को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं है।

सरकार के पास बहुमत है, उसके पास विधायी एजेंडा है और संसदीय कार्य संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करे और विपक्ष को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर दे।

यदि सरकार बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कर सकती है, तब भी लोकतांत्रिक वैधता केवल संख्या से नहीं आती। कानून जितना व्यापक प्रभाव डालता है, उस पर चर्चा की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।

दूसरी ओर विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर विरोध का उद्देश्य संसद को अनिश्चितकाल तक रोकना नहीं होना चाहिए।

सरकार को जवाबदेह बनाना और संसद को निष्क्रिय कर देना—दो अलग-अलग रणनीतियां हैं।

विपक्ष को ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें सरकार से कठिन सवाल भी पूछे जाएं और सदन की कार्यवाही भी चलती रहे।

सबसे बड़ा नुकसान जनता का

संसद में प्रश्नकाल नहीं चलता तो उसका असर आम नागरिक तक पहुंचता है।

किसी क्षेत्र में अस्पताल की समस्या हो, सड़क की स्थिति खराब हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो, किसानों की परेशानी हो, शिक्षा व्यवस्था में कमी हो या किसी सरकारी योजना का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा हो—इन मुद्दों को सांसद संसद में उठाते हैं।

जब सदन नहीं चलता, तो ऐसे सवाल रिकॉर्ड पर आने का अवसर भी कम हो जाता है।

इसी तरह जब किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर पर्याप्त बहस नहीं होती, तो जनता यह समझने का अवसर खो देती है कि कानून में क्या बदलाव किए जा रहे हैं और उनका प्रभाव किस पर पड़ेगा।

संसद में शोर केवल टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला राजनीतिक दृश्य नहीं है। उसके पीछे जनता की आवाज और जनता के सवाल भी दब सकते हैं।

अब जरूरी है संसदीय आत्ममंथन

2026 का मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है।

19 बैठकें। लोकसभा का लगभग 17.5 घंटे काम। राज्यसभा का करीब 37.4 घंटे काम। प्रश्नकाल का बेहद सीमित संचालन और इसके बावजूद 12 विधेयकों का पारित होना।

यह आंकड़े संसद की उत्पादकता से आगे जाकर उसकी कार्यशैली पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विधेयक पर्याप्त चर्चा और संसदीय जांच के बाद आगे बढ़ें। विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध का तरीका लोकतांत्रिक संवाद को पूरी तरह बंद न कर दे। संसद अध्यक्षों और सभापति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है कि सदन में व्यवधान कम हो और सदस्यों को नियमों के भीतर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।

क्योंकि संसद केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। वह केवल विपक्ष की भी नहीं है।

संसद जनता की है।

इसलिए सरकार से कठिन सवाल पूछे जाएं। विपक्ष तीखा विरोध करे। विधेयकों पर व्यापक चर्चा हो। असहमति को जगह मिले। लेकिन अंततः संसद चले।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कानून बनने से पहले जनता के प्रतिनिधियों को उस पर बोलने, सवाल करने, संशोधन सुझाने और सरकार को जवाबदेह बनाने का पर्याप्त अवसर मिले।

अगर विधेयक पास होते रहें, लेकिन बहस का समय लगातार घटता जाए, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—विचार-विमर्श—कमजोर पड़ सकती है।

और संसद की असली ताकत केवल उसके पारित कानूनों की संख्या में नहीं, बल्कि उन कानूनों पर हुई गंभीर बहस में दिखाई देती है।


आलोक कुमार

India : धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?

 धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?


क्या किसी राज्य को ‘चर्च-मुक्त’ बनाने की मांग धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से टकराती है?

ओडिशा।भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में धर्म का कोई स्थान नहीं होगा, बल्कि यह है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना आधिकारिक धर्म नहीं मानता और नागरिकों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में जब किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसा नारा सामने आता है, तो यह केवल राजनीतिक बयान नहीं रह जाता। इसके साथ संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ जाते हैं।

भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की नींव संविधान लागू होने के समय से ही मौजूद थी। संविधान की प्रस्तावना में 1976 के 42वें संविधान संशोधन के बाद ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द स्पष्ट रूप से जोड़ा गया। हालांकि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और सभी नागरिकों के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी पहले से ही संविधान का हिस्सा थी।

भारत में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अनेक अन्य धार्मिक समुदाय अपनी-अपनी आस्था और परंपराओं के साथ रहते हैं। यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की विशेष पहचान है। इसलिए किसी धार्मिक समुदाय या उसकी संस्थाओं को राज्य से पूरी तरह बाहर करने की मांग को संविधान की कसौटी पर परखना आवश्यक हो जाता है।

अनुच्छेद 25 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण या निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के साथ-साथ संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन इस अधिकार पर कानून द्वारा उचित सीमाएं लगाई जा सकती हैं।

इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को धर्म मानने की स्वतंत्रता है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी धार्मिक संस्था की गतिविधि कानून का उल्लंघन करती है, तो सरकार जांच और कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

इसी तरह अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है।

यहीं से ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक परीक्षण शुरू होता है।

चर्च की आलोचना और ईसाई समुदाय की स्वतंत्रता अलग विषय

किसी चर्च की संस्था, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, किसी व्यक्ति के आचरण या किसी कथित अवैध गतिविधि की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था में की जा सकती है। कोई भी धार्मिक संस्था कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी संस्था पर कानून तोड़ने, जबरन धर्मांतरण या किसी अन्य अपराध का आरोप है, तो उसके खिलाफ निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए।

लेकिन किसी संस्था की आलोचना और पूरे धार्मिक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाना एक ही बात नहीं है।

यदि ‘चर्च-मुक्त’ का अर्थ यह है कि किसी राज्य में चर्च भवन, ईसाई उपासना या ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियां ही समाप्त कर दी जाएं, तो यह प्रश्न सीधे धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ जाएगा।

दूसरी ओर, यदि नारे का आशय केवल उन गतिविधियों पर रोक लगाने से है जिन्हें कानून अवैध मानता है, तो उसका संवैधानिक मूल्यांकन अलग होगा। इसलिए किसी भी नारे को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ, उद्देश्य और वास्तविक कार्रवाई के प्रस्ताव से समझना जरूरी है।

क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध है?

भारतीय धर्मनिरपेक्षता को धर्म-विरोध के रूप में समझना सही नहीं होगा। भारतीय मॉडल में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता मिलती है और राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करने का संवैधानिक दायित्व निभाता है।

साथ ही, राज्य सामाजिक सुधार, सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक संस्थाओं से संबंधित कुछ गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक संस्थाओं की आलोचना नहीं की जा सकती।

लेकिन यही सिद्धांत सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

यदि किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त’ की मांग को केवल इसलिए स्वीकार्य मान लिया जाए क्योंकि वह एक खास धार्मिक संस्था के खिलाफ है, तो यही कसौटी अन्य धर्मों के मामलों में भी लागू करनी पड़ेगी। कल्पना कीजिए कि कोई ‘मंदिर-मुक्त राज्य’, ‘मस्जिद-मुक्त राज्य’ या ‘गुरुद्वारा-मुक्त राज्य’ बनाने का नारा लगाए। क्या ऐसी मांग को केवल राजनीतिक नारा कहकर छोड़ दिया जाएगा?

धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परीक्षा यही है कि पसंद और नापसंद के आधार पर संवैधानिक सिद्धांत न बदलें।

कानून का शासन सबसे ऊपर

किसी भी धार्मिक संस्था के खिलाफ शिकायत है तो उसका समाधान कानून के माध्यम से होना चाहिए। जांच हो, प्रमाण जुटाए जाएं, दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो और निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए।

यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का रास्ता है।

किसी समुदाय की सामूहिक धार्मिक पहचान को निशाना बनाना और किसी विशिष्ट अपराध या अवैध गतिविधि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना दो अलग-अलग बातें हैं। संविधान व्यक्ति को अधिकार देता है, लेकिन राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह कानून का समान रूप से पालन कराए।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त’ जैसे नारों पर बहस करते समय यह पूछा जाना चाहिए कि वास्तव में मांग किस चीज की है—किसी अवैध गतिविधि पर कार्रवाई की, किसी संस्था की जांच की, या किसी धार्मिक समुदाय की सार्वजनिक और धार्मिक उपस्थिति को समाप्त करने की?

इन सवालों के जवाब के बिना किसी नारे को पूरी तरह संवैधानिक या असंवैधानिक घोषित करना जल्दबाजी होगी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी सीमा है

लोकतंत्र में राजनीतिक नारे और तीखी आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। किसी विचार से असहमति व्यक्त करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन संविधान में एक अधिकार का अस्तित्व दूसरे नागरिकों के अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं करता।

इसीलिए सार्वजनिक बहस में शब्दों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना तथ्य और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए। पूरे समुदाय को अपराधी या राष्ट्रविरोधी बताना न केवल सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है, बल्कि संवैधानिक समानता और गरिमा के सिद्धांतों के सामने भी गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

ओडिशा के संदर्भ में असली सवाल

‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक मूल्यांकन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात इसका वास्तविक आशय है। यदि उद्देश्य किसी विशेष गैरकानूनी गतिविधि को रोकना है, तो सरकार कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है। यदि उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, तो पारदर्शिता और कानूनी जांच की मांग लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकती है।

लेकिन यदि लक्ष्य किसी धार्मिक समुदाय को उसकी आस्था, पूजा या धार्मिक पहचान के कारण राज्य के सार्वजनिक जीवन से बाहर करना है, तो यह संविधान के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सिद्धांतों से गंभीर टकराव पैदा करेगा।

भारत की शक्ति इस बात में नहीं है कि यहां केवल एक प्रकार की आस्था दिखाई दे। भारत की शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग आस्थाओं वाले लोग एक ही संविधान के तहत नागरिक के रूप में समान अधिकारों के साथ रह सकें।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ हो या किसी अन्य धार्मिक समुदाय को हटाने का नारा—उसकी संवैधानिकता का पैमाना एक ही होना चाहिए: क्या मांग कानून के शासन, समानता और नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करती है?

अंततः भारत का संविधान किसी धर्म के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने के बजाय नागरिकों के अधिकारों और कानून के शासन की रक्षा करता है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना हो सकती है, जांच हो सकती है और कानून तोड़ने पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को केवल उसकी पहचान के आधार पर समाप्त करने का विचार भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की मूल भावना से मेल नहीं खाता।

इसलिए बहस ‘चर्च-मुक्त’ या ‘चर्च-समर्थक’ होने की नहीं, बल्कि ‘संविधान-सम्मत’ होने की होनी चाहिए।

भारत का रास्ता किसी धर्म को मिटाने का नहीं, बल्कि कानून के सामने सभी को समान रखने का रास्ता है। यही धर्मनिरपेक्षता की असली कसौटी और भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।


आलोक कुमार

रविवार, 16 अगस्त 2026

India : अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा

 


अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा: असहमति और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

क्या अब बंदूक से नहीं, विचारों से लड़ी जाएगी नक्सलवाद की लड़ाई? और अगर विचारों की लड़ाई होगी, तो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कौन तय करेगा?

15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल ने स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री ने माओवादी और नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद के साथ-साथ ऐसी मानसिकता रखने वालों को भी पहचानना और अलग-थलग करना जरूरी है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।

यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है—क्या किसी हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थन और सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा?

प्रधानमंत्री के बयान को सरकार के नजरिए से देखें तो उसका तर्क समझ में आता है। भारत लंबे समय से माओवादी हिंसा और सशस्त्र उग्रवाद की चुनौती का सामना करता रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हिंसा, हथियारबंद विद्रोह और संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक कमजोर करने का प्रयास गंभीर सुरक्षा चुनौती है। ऐसे मामलों में राज्य का कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है।

लेकिन समस्या उस समय शुरू होती है जब हिंसक नक्सलवाद और शांतिपूर्ण असहमति के बीच की रेखा अस्पष्ट हो जाए।

लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि नागरिक सरकार से सवाल कर सकता है। कोई बेरोजगारी पर सवाल उठा सकता है, महंगाई का विरोध कर सकता है, किसी कानून को गलत बता सकता है, सरकारी योजना की कमियां गिना सकता है या संसद और सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है। पत्रकार सत्ता से कठिन प्रश्न पूछ सकता है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में बहस कर सकते हैं। लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता किसी नीति के खिलाफ अपनी राय रख सकते हैं।

इन गतिविधियों को अपने आप में नक्सली या राष्ट्रविरोधी मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा।

यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसकी परिभाषा क्या है?

प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि इस तरह के राजनीतिक विशेषण सरकार के आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तो व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इससे विवाद और राजनीतिक हो गया।

वहीं सत्ता पक्ष का तर्क अलग है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका संकेत उन लोगों की ओर है जो लोकतंत्र और देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ नक्सली या ‘अर्बन नक्सल’ जैसी विचारधारा फैलाने का प्रयास करते हैं। यानी सरकार का पक्ष यह है कि निशाना सामान्य आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी विचारधारा है जो हिंसा और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का समर्थन करती है।

यहीं से लोकतांत्रिक बहस की असली कसौटी सामने आती है।

किसी विचार से असहमति को उस विचार के हिंसक होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अगर कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है तो पहले यह देखा जाना चाहिए कि वह क्या कह रहा है, किस तरीके से कह रहा है और क्या वह हिंसा का समर्थन करता है। केवल सरकार विरोधी होना किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बना देता। इसी तरह किसी नीति का विरोध करना संविधान-विरोधी गतिविधि नहीं है।

भारत का लोकतंत्र इसी विविधता पर खड़ा है। यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका है। सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है और विपक्ष को सवाल पूछने का। मीडिया को सरकार की उपलब्धियां बताने के साथ उसकी कमियां उजागर करने का भी अधिकार है। विश्वविद्यालयों में विचारों का टकराव होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसलिए रास्ता बेहद स्पष्ट होना चाहिए—विचार का जवाब विचार से और अपराध का जवाब कानून से।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में हिंसा को बढ़ावा देता है, हथियारबंद विद्रोह का समर्थन करता है या संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से समाप्त करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहा है, तो उसे केवल राजनीतिक लेबल देकर अलग-थलग करना लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहीं यह धीरे-धीरे राजनीतिक असहमति का पर्याय न बन जाए।

आज यदि सत्ता पक्ष के आलोचक को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा और कल किसी दूसरी सरकार के विरोधी को कोई दूसरा राजनीतिक लेबल दिया जाएगा, तो सार्वजनिक बहस मुद्दों से हटकर आरोपों और पहचान की राजनीति में बदल सकती है।

स्वतंत्रता दिवस का महत्व यहां और बढ़ जाता है। 15 अगस्त केवल ब्रिटिश शासन से मिली स्वतंत्रता की स्मृति नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक यात्रा की याद भी है जिसमें भारतीय नागरिक ने अपनी आवाज, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी के लिए संघर्ष किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचार रखने की स्वतंत्रता, सवाल पूछने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असहमति की जगह भी है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि लोकतंत्र हिंसा को स्वीकार करे। लोकतंत्र हिंसा और शांतिपूर्ण असहमति के बीच स्पष्ट अंतर करता है। हिंसा कानून का विषय है, जबकि विचार लोकतांत्रिक बहस का।

इसलिए प्रधानमंत्री के बयान को सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक अर्थ में तभी देखा जा सकता है जब ‘दिमागी नक्सल’ से आशय केवल उन लोगों से हो जो वास्तव में हिंसक माओवादी विचारधारा या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करते हैं। लेकिन यदि यह शब्द पत्रकारों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं या आम नागरिकों की शांतिपूर्ण आलोचना के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह गंभीर लोकतांत्रिक चिंता पैदा करेगा।

आज जरूरत किसी नए राजनीतिक लेबल की नहीं, बल्कि स्पष्ट परिभाषा और संवैधानिक मर्यादा की है।

क्योंकि किसी भी सरकार की शक्ति केवल उसके बहुमत में नहीं होती। उसकी वास्तविक लोकतांत्रिक ताकत इस बात में भी दिखाई देती है कि वह अपने आलोचकों को कितना स्थान देती है।

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षा बलों, विकास और कानून के माध्यम से लड़ी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल सहमति से नहीं होती। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता के सामने सवाल पूछने की जगह बनी रहे।

इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द से शुरू हुई बहस का असली प्रश्न यही है—क्या यह हिंसक विचारधारा के खिलाफ चेतावनी बनेगा या असहमति पर नया राजनीतिक लेबल?

इसका उत्तर केवल सरकार या विपक्ष को नहीं देना है। इसका उत्तर पूरे लोकतांत्रिक समाज को देना होगा।

क्योंकि बंदूक का मुकाबला कानून कर सकता है, लेकिन विचारों का मुकाबला केवल विचारों से ही किया जा सकता है। और लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं—लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा है।

Keralam: राजा महाबली के स्वागत का पर्व

 

ओणम: राजा महाबली के स्वागत का पर्व, जहां फूलों की रंगोली से लेकर साद्या तक दिखती है केरल की संस्कृति

 क्या कोई त्योहार ऐसा भी हो सकता है, जिसमें राजा अपने राज्य में नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के दिलों में लौटता हो? केरल का ओणम इसी भावनात्मक और सांस्कृतिक विश्वास का उत्सव है। फूलों से घर-आंगन सजते हैं, पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू फैलती है, नौकाएं पानी पर दौड़ती हैं और लोकगीतों की धुनों के बीच राजा महाबली के स्वागत की तैयारी होती है।

केरल का प्रसिद्ध 10 दिवसीय फसल और सांस्कृतिक उत्सव ओणम 16 अगस्त 2026 को अथम से शुरू हो रहा है और इसका प्रमुख दिन तिरुवोनम 26 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। ओणम केवल फसल और समृद्धि की खुशी का पर्व नहीं है, बल्कि यह समानता, दान, वचन, सद्भाव और प्रजा के प्रति प्रेम की उस कल्पना को भी जीवित रखता है, जिसे राजा महाबली के आदर्श शासन से जोड़ा जाता है।

अथम से शुरू होती है दस दिनों की रंगीन यात्रा

ओणम के पहले दिन अथम से घरों के आंगन में फूलों की रंगोली यानी पूक्कलम बनाने की परंपरा शुरू होती है। जैसे-जैसे उत्सव के दिन आगे बढ़ते हैं, पूक्कलम में नए फूल और नए डिजाइन जुड़ते जाते हैं। तिरुवोनम के दिन यह रंग-बिरंगी सजावट अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है।

इन दस दिनों में केरल का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन उत्सव में बदल जाता है। पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विभिन्न लोककलाएं लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ती हैं। इसी दौरान होने वाली वल्लम कली यानी पारंपरिक नौका दौड़ ओणम की पहचान बन चुकी है।

ओणम का महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें परिवार और समाज को साथ आने का अवसर मिलता है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं, घरों में अतिथियों का स्वागत करते हैं और सामूहिक भोजन के माध्यम से सामाजिक एकता का अनुभव करते हैं।

कौन हैं राजा महाबली?

ओणम की आत्मा को समझने के लिए राजा महाबली की कथा को समझना जरूरी है। महाबली को मावेली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक परंपरा में उन्हें प्रह्लाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र बताया गया है।

कथा के अनुसार महाबली अत्यंत शक्तिशाली, न्यायप्रिय, दानी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके शासन में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। लोककथाओं में उनके राज्य को ऐसे आदर्श समाज के रूप में याद किया जाता है, जहां लोगों के बीच भेदभाव कम था और राजा अपनी प्रजा के कल्याण को प्राथमिकता देता था।

महाबली की लोकप्रियता और शक्ति इतनी बढ़ी कि देवताओं को चिंता होने लगी। पौराणिक कथा के अनुसार तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और महाबली की परीक्षा लेने उनके पास पहुंचे।

तीन पग भूमि और महाबली का महान वचन

कथा के अनुसार महाबली एक यज्ञ कर रहे थे और दान देने के लिए प्रसिद्ध थे। उसी समय वामन एक छोटे कद के ब्राह्मण बालक के रूप में उनके पास पहुंचे और केवल तीन पग भूमि मांग ली।

महाबली के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु हैं। उन्होंने राजा को सावधान किया। लेकिन महाबली अपने वचन से पीछे नहीं हटे।

दान की अनुमति मिलते ही वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश तथा स्वर्ग को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं था।

महाबली ने अपने वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा कदम उनके सिर पर रखा जाए। भगवान विष्णु ने उनके सिर पर तीसरा पग रखा और महाबली पाताल लोक चले गए।

लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। महाबली की दानशीलता, वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रिय प्रजा से मिलने पृथ्वी पर लौट सकेंगे।

लोकमान्यता है कि ओणम के दिनों में राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने केरल लौटते हैं। इसलिए लोग अपने घर सजाते हैं, पूक्कलम बनाते हैं और अपने प्रिय राजा के स्वागत की तैयारी करते हैं।

ओणम साद्या: केले के पत्ते पर सजी केरल की संस्कृति

ओणम का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण ओणम साद्या है। यह पारंपरिक रूप से एक शाकाहारी भोज होता है, जिसे केले के पत्ते पर विशेष तरीके से परोसा जाता है। इसमें कई तरह के व्यंजन शामिल होते हैं और बड़े आयोजनों में व्यंजनों की संख्या काफी अधिक हो सकती है।

साद्या में चोरु यानी चावल मुख्य भोजन होता है। इसके साथ परिप्पु, घी, सांभर और रसम परोसे जाते हैं। सब्जियों और पारंपरिक तैयारियों में अवियल, थोरन, ओलन, कालन, एरिसेरी और कूटू करी जैसे व्यंजन शामिल होते हैं।

इसके अलावा पचड़ी और किचड़ी, इंजीपुली, विभिन्न प्रकार के अचार और पपाडम भी भोजन का हिस्सा होते हैं। मीठे व्यंजनों में प्रथमन या पायसम का विशेष स्थान है। केले से बने पारंपरिक व्यंजन भी साद्या के स्वाद को अलग पहचान देते हैं।

भोजन के अंत में मोरु यानी मसालेदार छाछ भी परोसी जाती है।

साद्या केवल स्वाद का अनुभव नहीं है। केले के पत्ते पर एक साथ सजाए गए अनेक व्यंजन केरल की कृषि, स्थानीय उत्पादों, पाक-कला और सामूहिक जीवन की झलक दिखाते हैं। एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करने की परंपरा सामाजिक समानता और सामूहिकता की भावना को भी मजबूत करती है।

नौका दौड़ और लोककला बनाती है ओणम को खास

ओणम के दौरान केरल के अलग-अलग हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इनमें पारंपरिक नृत्य और लोककलाओं की विशेष भूमिका रहती है।

वल्लम कली, जिसे स्नेक बोट रेस के रूप में भी जाना जाता है, ओणम उत्सव की सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है। लंबी पारंपरिक नावों में सवार नाविक सामूहिक ताल और गीतों के साथ पानी को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन, सहयोग और स्थानीय परंपरा का प्रदर्शन भी है।

इस तरह ओणम खेत से लेकर नदी तक और घर के आंगन से लेकर सामुदायिक आयोजनों तक पूरे केरल को उत्सव के रंग में रंग देता है।

ओणम का संदेश आज भी प्रासंगिक

राजा महाबली की कथा को केवल पौराणिक प्रसंग मानकर छोड़ देना ओणम के व्यापक सामाजिक संदेश को सीमित कर देगा। इस कथा के केंद्र में दान, वचन, विनम्रता, भक्ति और प्रजा के प्रति प्रेम जैसे मूल्य दिखाई देते हैं।

महाबली के पास शक्ति और वैभव था, लेकिन निर्णायक क्षण में उन्होंने अपने वचन को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने अपना राज्य खोया, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। यही कारण है कि लोकस्मृति में उनका स्थान ऐसे राजा के रूप में बना रहा, जिसकी प्रजा आज भी उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है।

ओणम यह संदेश भी देता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि केवल धन से नहीं मापी जाती। जब परिवार एक साथ बैठते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे के सुख में शामिल होते हैं, भोजन साझा किया जाता है और लोकपरंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं, तभी संस्कृति वास्तव में जीवित रहती है।

16 अगस्त से शुरू होकर 26 अगस्त 2026 के तिरुवोनम तक चलने वाला यह उत्सव केवल केरल की पहचान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। इसमें एक राजा की स्मृति फूलों की रंगोली, नौकाओं की गति, लोकनृत्यों, गीतों और केले के पत्ते पर सजे भोजन के माध्यम से आज भी जीवित दिखाई देती है।

और शायद ओणम का सबसे खूबसूरत संदेश यही है—राजा महाबली लौटते हैं या नहीं, लेकिन उनकी प्रजा के सुख, समानता और समृद्धि का सपना हर वर्ष ओणम के साथ जरूर लौटता है।


शनिवार, 15 अगस्त 2026

India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 


असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा?

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की।

ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है।

भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक बदलावों का मूल्यांकन भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या 1947 से 2014 तक की भारत की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को ही कमतर करके 2014 को एक निर्णायक शुरुआत के रूप में पेश किया जाना चाहिए?

यहीं भाजपा के अपने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अटल बिहारी वाजपेयी का दौर।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओं में रहे। वे 1996 में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने और फिर 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। उस समय भी भारत वही लोकतांत्रिक गणराज्य था, जिसकी नींव 1947 की स्वतंत्रता और 1950 के संविधान के बाद मजबूत हुई थी।

तो यदि 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” भारत नहीं था, तो 1998 से 2004 के बीच का भारत क्या था?

क्या उस समय भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था?

क्या देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते थे?

क्या संसद अस्तित्व में नहीं थी?

क्या सरकार जनता के जनादेश से नहीं बनी थी?

और क्या भाजपा स्वयं उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी?

इन सवालों का उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ है—भारत तब भी एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य था। जनता सरकार चुनती थी, सरकारें बदलती थीं और संविधान देश के शासन का आधार था।

वाजपेयी का दौर भाजपा की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और चुनौतियों का सामना किया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। 1999 का कारगिल युद्ध भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। उसी दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और संचार क्षेत्र में विस्तार जैसे मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

इसलिए 2014 को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन मानना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसे भारत की आजादी का दूसरा जन्म बताना ऐतिहासिक दृष्टि से अलग तरह का दावा है।

2014 एक राजनीतिक परिवर्तन का वर्ष है; 1947 एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता का वर्ष।

दोनों घटनाओं का महत्व अलग है।

यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श को स्वस्थ बनाता है। किसी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए देश के पिछले 67 वर्षों को असफल या अधूरा बताना आवश्यक नहीं है। इसी तरह 2014 से पहले की सरकारों की उपलब्धियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि 2014 के बाद हुए बदलावों से असहमति नहीं हो सकती।

भारत की कहानी किसी एक सरकार से शुरू नहीं होती और किसी एक सरकार पर खत्म भी नहीं होती।

कांग्रेस के शासन में देश ने कई संस्थाएं और नीतियां विकसित कीं। जनता पार्टी के दौर में सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक क्षमता सामने आई। भाजपा के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकारों ने आर्थिक नीति, अधिकार आधारित कानूनों और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से अपनी छाप छोड़ी। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी अनेक नीतिगत और राजनीतिक बदलाव हुए।

इन सभी चरणों को जोड़कर ही आधुनिक भारत की तस्वीर बनती है।

देश की आजादी किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है।

15 अगस्त 1947 का महत्व इसलिए नहीं है कि उस दिन कोई एक सरकार सत्ता में आई थी। उसका महत्व इसलिए है कि सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन के बाद भारत ने अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था।

इसी तरह 2014 का महत्व इसलिए है कि उस वर्ष केंद्र में सत्ता का एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ। लेकिन सत्ता परिवर्तन और स्वतंत्रता प्राप्ति को समान अर्थ देना इतिहास और राजनीति के बीच की सीमा को धुंधला कर सकता है।

भाजपा यदि 2014 के बाद की उपलब्धियों पर गर्व करती है, तो उसे पूरा अधिकार है। लेकिन उसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा होने के कारण उसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर पर भी गर्व होना चाहिए।

क्योंकि यदि वाजपेयी का शासन भाजपा की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवपूर्ण अध्याय है, तो यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि 2014 से पहले का भारत गुलाम भारत नहीं था।

वह वही भारत था जिसने संविधान को स्वीकार किया, चुनावों की लंबी परंपरा बनाई, सत्ता परिवर्तन देखे, युद्ध झेले, आर्थिक संकटों से निकला, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान कायम की।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “असली आजादी” किस सरकार के समय मिली।

बहस यह होनी चाहिए कि आजादी मिलने के बाद भारत को और अधिक स्वतंत्र, समान, सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाने के लिए किस सरकार ने क्या किया।

क्योंकि किसी पुराने दौर को छोटा करके किसी नए दौर की उपलब्धि बड़ी नहीं होती।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि हर सरकार अपने काम से इतिहास में जगह बनाए—इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा परिभाषित करके नहीं।


आलोक कुमार