कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाओं की जमीनी पड़ताल
पटना। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई भारत में दशकों से जारी है। सरकारें बदलती रहीं, योजनाओं के नाम और स्वरूप बदलते रहे, बजट बढ़ता रहा, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चों की कमजोर काया आज भी व्यवस्था से एक असहज सवाल पूछती है—आखिर सरकारी पोषण योजनाओं का वास्तविक लाभ उन बच्चों तक कितनी दूर पहुंचा, जिनके नाम पर ये योजनाएं बनाई गई हैं?
बिहार जैसे राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वच्छ पेयजल की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच बच्चों के पोषण को प्रभावित करती है। ऐसे में कुपोषण केवल भोजन की कमी का परिणाम नहीं है। यह गरीबी, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मातृ शिक्षा और सरकारी सेवाओं की पहुंच से जुड़ा हुआ व्यापक सामाजिक संकट है।
सरकार ने बच्चों और माताओं के पोषण के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों, पूरक पोषाहार, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं और विभिन्न पोषण अभियानों के माध्यम से बड़ा तंत्र खड़ा किया है। लेकिन असली परीक्षा कागज पर नहीं, गांव के उस आंगनबाड़ी केंद्र में होती है जहां एक मां अपने बच्चे के लिए पोषण और स्वास्थ्य की उम्मीद लेकर पहुंचती है।
योजना बहुत, परिणाम कितना?
कुपोषण से निपटने के लिए सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और छोटे बच्चों को लक्षित कर पोषण सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। बच्चों के वजन और वृद्धि की निगरानी की जाती है। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का प्रावधान है।
लेकिन सवाल यह है कि इन योजनाओं का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाता है?
यदि किसी जिले में हजारों बच्चे योजना के लाभार्थी के रूप में दर्ज हैं, तो क्या यह भी पता किया जाता है कि उनमें से कितने बच्चों का वजन वास्तव में सुधरा? कितने बच्चे कुपोषण की श्रेणी से बाहर आए? कितनी माताओं को नियमित पोषण संबंधी सलाह मिली?
लाभार्थियों की संख्या बढ़ना योजना की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार ही वास्तविक सफलता का पैमाना होना चाहिए।
आंगनबाड़ी केंद्रों की असली तस्वीर
आंगनबाड़ी केंद्र कुपोषण के खिलाफ सरकारी लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यही वह स्थान है जहां छोटे बच्चों को पूरक पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं से जोड़ा जाना है।
लेकिन कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाओं का सवाल अब भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बच्चों के बैठने की व्यवस्था और साफ-सफाई जैसी सुविधाएं किसी भी बाल केंद्र के लिए अनिवार्य हैं।
यदि बच्चा जिस केंद्र में पोषण पाने जाता है, वहां स्वच्छता ही कमजोर हो, तो यह व्यवस्था की विडंबना है।
आंगनबाड़ी सेविका और सहायिका पर भी जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ है। उन्हें बच्चों के रिकॉर्ड से लेकर पोषाहार, माताओं से संपर्क और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सहयोग तक कई काम करने पड़ते हैं। इसलिए सरकार को यह भी देखना होगा कि उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन और मानवीय सहयोग मिल रहा है या नहीं।
भोजन की गुणवत्ता पर सवाल
कुपोषण के खिलाफ सबसे जरूरी हथियार संतुलित और पौष्टिक भोजन है। लेकिन केवल भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं। भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, विविधता और नियमितता भी महत्वपूर्ण है।
बच्चों को उनकी उम्र और जरूरत के अनुरूप पोषण मिलना चाहिए। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी योजनाओं में उचित स्थान मिल सकता है। अंडा, दाल, हरी सब्जियां, दूध या अन्य पौष्टिक विकल्प जहां संभव हों, वहां भोजन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकते हैं।
यह भी जरूरी है कि पोषाहार की गुणवत्ता की निगरानी केवल कागजी जांच तक सीमित न रहे। जिस भोजन को बच्चा खा रहा है, उसकी गुणवत्ता का सामाजिक निरीक्षण भी होना चाहिए।
कुपोषित बच्चे की पहचान के बाद क्या?
कुपोषण की पहचान होना पहला कदम है, अंतिम समाधान नहीं।
किसी बच्चे का वजन कम पाया गया या वह गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आया, तो उसके बाद क्या हुआ? क्या स्वास्थ्यकर्मी ने उसका नियमित फॉलोअप किया? क्या परिवार को आवश्यक सलाह मिली? क्या बच्चे को जरूरत के अनुसार उपचार मिला?
यही वह बिंदु है जहां स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होती है।
एक विभाग द्वारा आंकड़ा तैयार कर देने से बच्चे का स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को विभागीय सीमाओं से बाहर निकालकर संयुक्त अभियान बनाना होगा।
मां का पोषण भी उतना ही जरूरी
बच्चे के कुपोषण की चर्चा करते समय अक्सर मां की स्थिति को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य और पोषण बच्चे के विकास की नींव तैयार करता है।
यदि गर्भवती महिला खुद एनीमिया, भोजन की कमी या स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता से जूझ रही है, तो उसके बच्चे के स्वस्थ जन्म की संभावना भी प्रभावित हो सकती है।
इसलिए पोषण अभियान का केंद्र केवल बच्चा नहीं होना चाहिए। गर्भवती महिला से लेकर धात्री मां और नवजात शिशु तक एक निरंतर पोषण शृंखला बनानी होगी।
स्वच्छता और पेयजल को क्यों भूल जाते हैं?
कुपोषण का संबंध केवल भोजन से नहीं है। दूषित पानी, खराब स्वच्छता और बार-बार होने वाली बीमारियां भी बच्चे के शरीर की पोषण क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
अगर बच्चे को पर्याप्त भोजन मिले लेकिन वह बार-बार संक्रमण से बीमार होता रहे, तो पोषण का लाभ सीमित हो सकता है। इसलिए कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में स्वच्छ पेयजल, शौचालय, साफ-सफाई और स्वास्थ्य जागरूकता को भी बराबर महत्व देना होगा।
आंकड़ों से आगे निकलने का समय
सरकारी योजनाओं की समीक्षा केवल इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि कितने केंद्र खुले, कितने बच्चों का पंजीकरण हुआ और कितने पैकेट पोषाहार बांटे गए। अब समय है कि सरकार परिणाम आधारित निगरानी अपनाए।
हर जिले में यह देखा जाना चाहिए कि कुपोषण की स्थिति क्या है, किन इलाकों में समस्या अधिक है और सरकारी हस्तक्षेप के बाद वास्तविक सुधार कितना हुआ।
पंचायत और समुदाय को निगरानी में शामिल किया जाए। अभिभावकों से फीडबैक लिया जाए। आंगनबाड़ी केंद्रों की सुविधाओं और पोषाहार की गुणवत्ता का सामाजिक ऑडिट कराया जाए। जहां कमी मिले, वहां जिम्मेदारी तय हो।
सवाल अब व्यवस्था से है
कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन योजनाओं की सफलता का दावा तभी सार्थक होगा जब उसका असर गरीब परिवार की रसोई और बच्चे के स्वास्थ्य में दिखाई दे।
सरकार को यह समझना होगा कि कुपोषण किसी आंकड़े की समस्या नहीं, एक बच्चे के भविष्य की समस्या है। जिस बच्चे को जीवन के शुरुआती वर्षों में पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
इसलिए अब केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं, पुरानी योजनाओं की कठोर जमीनी समीक्षा चाहिए। बजट खर्च होने से ज्यादा जरूरी है कि उसका परिणाम दिखाई दे।
बिहार के गांवों में जब कोई मां अपने कमजोर बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र लेकर जाती है, तो वह सरकारी आंकड़ा नहीं होती। वह राज्य की विकास व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होती है।
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई तब जीती जाएगी, जब सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि बच्चों की सेहत में बदलाव दिखाई देगा। यही किसी भी पोषण योजना की असली सफलता और सरकार की सबसे बड़ी जवाबदेही है।
आलोक कुमार