अस्पताल में दवा उपलब्ध होने और मरीज को दवा मिलने के बीच क्या अंतर है?
अस्पताल के स्टोर में दवा मौजूद है, फिर भी मरीज को बाहर से दवा खरीदनी पड़ रही है—तो सवाल दवा की उपलब्धता का नहीं, बल्कि मरीज तक उसकी पहुंच का है।
सरकारी अस्पताल के स्टोर में दवा उपलब्ध होना स्वास्थ्य व्यवस्था की एक जरूरी उपलब्धि है, लेकिन मरीज के लिए असली राहत तब है जब डॉक्टर की पर्ची के अनुसार वही दवा सही समय और पर्याप्त मात्रा में उसके हाथ तक पहुंचे। स्टॉक में दवा होना और मरीज को दवा मिलना—इन दोनों के बीच की दूरी को समझना जरूरी है।
सरकारी अस्पतालों में गरीब और जरूरतमंद मरीजों को निःशुल्क या कम लागत पर दवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था स्वास्थ्य सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार दवाओं की खरीद, भंडारण और वितरण पर संसाधन खर्च करती है। अस्पतालों में दवा का स्टॉक बनाए रखने के लिए भी एक पूरी व्यवस्था काम करती है।
लेकिन किसी दवा का अस्पताल के स्टोर में दर्ज होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि हर मरीज को उसकी जरूरत के समय वह दवा मिल ही गई।
यहीं से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण जमीनी चुनौती सामने आती है।
स्टॉक में दवा है, लेकिन मरीज तक कैसे पहुंचे?
किसी अस्पताल में दवा उपलब्ध होने के बाद भी उसे मरीज तक पहुंचाने के लिए कई चरण पूरे होते हैं। डॉक्टर मरीज की जांच के बाद दवा लिखता है। इसके बाद मरीज या उसका परिजन निर्धारित दवा वितरण केंद्र पर जाता है।
वहां पर्ची की जांच, मरीज की पहचान, उपलब्ध स्टॉक और निर्धारित मात्रा के आधार पर दवा दी जाती है।
यदि इन चरणों में कहीं समस्या आती है तो स्टोर में दवा मौजूद होने के बावजूद मरीज को वह दवा नहीं मिल सकती।
इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितनी दवा खरीदी गई या कितनी दवा स्टोर में बची है। यह देखना भी जरूरी है कि जरूरतमंद मरीज को निर्धारित दवा वास्तव में मिली या नहीं।
मरीज को यह जानकारी भी चाहिए कि दवा कहां मिलेगी
कई मरीज सरकारी अस्पताल की व्यवस्था से परिचित नहीं होते। उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि दवा किस काउंटर से मिलेगी, वितरण का समय क्या है और यदि कोई दवा उपलब्ध नहीं है तो किससे संपर्क करना है।
बुजुर्ग, दिव्यांग और कम पढ़े-लिखे मरीजों के लिए यह परेशानी और बढ़ सकती है।
यदि सूचना स्पष्ट नहीं है तो मरीज एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटक सकता है। इससे उसका समय भी जाता है और कई बार इलाज की प्रक्रिया में देरी भी हो सकती है।
इसलिए दवा की उपलब्धता के साथ सूचना की उपलब्धता भी जरूरी है।
डॉक्टर ने सात दिन की दवा लिखी, मिली तीन दिन की
मान लीजिए डॉक्टर ने सात दिन के इलाज के लिए दवा लिखी, लेकिन अस्पताल में उस समय केवल तीन दिन की मात्रा उपलब्ध है।
मरीज को तीन दिन की दवा मिल गई। वितरण के रिकॉर्ड में दवा वितरित होना दर्ज भी हो सकता है। लेकिन मरीज की सात दिन की उपचार आवश्यकता पूरी नहीं हुई।
अब बाकी दवा के लिए मरीज को दोबारा अस्पताल आना पड़ सकता है या बाहर से खरीदना पड़ सकता है।
गरीब परिवार के लिए यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है। अस्पताल की व्यवस्था में दवा उपलब्ध थी, लेकिन मरीज की पूरी जरूरत के लिए पर्याप्त दवा उपलब्ध नहीं थी।
बाहर से दवा खरीदनी पड़े तो खर्च बढ़ता है
यदि आवश्यक दवा अस्पताल में उपलब्ध नहीं मिलती और मरीज को उसे निजी मेडिकल स्टोर से खरीदना पड़ता है, तो उसके इलाज का जेब खर्च बढ़ सकता है।
एक बार की खरीद छोटी लग सकती है, लेकिन लंबे इलाज में यही राशि काफी बढ़ सकती है।
मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में नियमित दवा की जरूरत होती है। गरीब परिवार के लिए लगातार दवा खरीदना घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
इसलिए दवा की उपलब्धता का मूल्यांकन केवल स्टोर में मौजूद मात्रा से नहीं, बल्कि मरीज की उपचार जरूरत पूरी होने के आधार पर भी होना चाहिए।
वितरण व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है
दवा अस्पताल में पहुंचने के बाद उसका सुरक्षित भंडारण और समय पर वितरण जरूरी है।
यदि दवा वितरण केंद्र पर लंबी कतार हो, वितरण का समय सीमित हो या किसी तकनीकी या प्रशासनिक कारण से मरीज को दवा न मिल पाए, तो स्टॉक में मौजूद दवा का तत्काल लाभ मरीज तक नहीं पहुंचता।
मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टर की पर्ची लेकर वह निर्धारित स्थान पर जाए और उचित प्रक्रिया के बाद उसे जरूरी दवा मिल जाए।
दवा का विकल्प दिया जाए तो जानकारी जरूरी
कई बार किसी दवा के निर्धारित ब्रांड की जगह चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त दूसरा विकल्प उपलब्ध हो सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज या परिजन को स्पष्ट जानकारी देना जरूरी है।
मरीज आम तौर पर दवाओं के तकनीकी नाम और उनके विकल्पों के बारे में विशेषज्ञ जानकारी नहीं रखते। इसलिए बिना समझाए कोई अलग दवा देना या मरीज को सीधे बाहर भेज देना भ्रम पैदा कर सकता है।
दवा वितरण में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है।
गुणवत्ता और भंडारण भी उपलब्धता का हिस्सा
दवा स्टॉक में है, इसका अर्थ यह भी है कि वह सुरक्षित और उपयोग योग्य स्थिति में हो।
दवाओं के सही भंडारण, तापमान, बैच नंबर और एक्सपायरी की निगरानी जरूरी है। विशेष परिस्थितियों में कुछ दवाओं को निर्धारित तापमान पर रखना पड़ सकता है।
इसलिए केवल संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। उपयोग योग्य, सुरक्षित और सही दवा का समय पर उपलब्ध होना ही वास्तविक उपलब्धता है।
रिकॉर्ड और मरीज के अनुभव में अंतर हो तो जांच जरूरी
अस्पताल का स्टॉक रजिस्टर यह बताता है कि कितनी दवा आई, कितनी वितरित हुई और कितनी बची।
लेकिन मरीज का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि रिकॉर्ड में दवा उपलब्ध दिखाई देती है और मरीज बताता है कि उसे दवा नहीं मिली, तो इस अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
जांच होनी चाहिए कि दवा किस काउंटर पर थी, वितरण का समय क्या था, मरीज की पर्ची में कोई समस्या थी या पर्याप्त मात्रा उपलब्ध नहीं थी।
ऐसी जांच से व्यवस्था की वास्तविक कमी सामने आ सकती है।
डिजिटल स्टॉक व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ सकती है
अस्पतालों में डिजिटल स्टॉक प्रबंधन को मजबूत करने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कौन-सी दवा कितनी मात्रा में उपलब्ध है और किस दवा का स्टॉक तेजी से कम हो रहा है।
यदि किसी आवश्यक दवा का स्टॉक निर्धारित न्यूनतम स्तर के करीब पहुंच रहा है तो समय रहते उसकी आपूर्ति की जा सकती है।
जहां संभव हो, अस्पताल के प्रमुख दवा वितरण केंद्र पर उपलब्ध आवश्यक दवाओं की जानकारी भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जा सकती है। इससे मरीज को अनावश्यक रूप से कई जगह भटकना नहीं पड़ेगा।
मरीज को केवल “दवा नहीं है” कह देना पर्याप्त नहीं
यदि कोई दवा वास्तव में उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को केवल इतना कहकर वापस नहीं भेज देना चाहिए कि दवा नहीं है।
उसे यह जानकारी मिलनी चाहिए कि दवा कब उपलब्ध हो सकती है, किस अधिकारी या हेल्प डेस्क से संपर्क करना है और चिकित्सकीय रूप से आवश्यक होने पर आगे क्या प्रक्रिया अपनानी है।
विशेषकर बुजुर्ग और गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए ऐसी सहायता व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है।
असली कसौटी मरीज के हाथ में दवा है
सरकारी अस्पताल की दवा व्यवस्था की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जा सकती कि स्टोर में कितनी दवा मौजूद है।
असली सवाल यह है कि डॉक्टर ने जो दवा लिखी, वह मरीज को सही समय, सही मात्रा और सुरक्षित तरीके से मिली या नहीं।
स्टोर में दवा होना व्यवस्था की उपलब्धता को दिखाता है। दवा का जरूरतमंद मरीज तक पहुंचना व्यवस्था की कार्यक्षमता को दिखाता है।
इन दोनों के बीच यदि अंतर है, तो उस अंतर को कम करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
दवा की खरीद और भंडारण के साथ वितरण व्यवस्था, स्टॉक निगरानी, मरीजों के लिए स्पष्ट सूचना और शिकायत निवारण को भी मजबूत करना होगा।
अस्पताल में दवा का होना तभी सार्थक है, जब जरूरतमंद मरीज के हाथ तक वह दवा पहुंचे। गोदाम की उपलब्धता और मरीज की पहुंच के बीच का अंतर ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा है।
जब डॉक्टर की पर्ची से लेकर मरीज के हाथ तक दवा की पूरी यात्रा पारदर्शी, सरल और जवाबदेह होगी, तभी निःशुल्क दवा की व्यवस्था अपने उद्देश्य को प्रभावी ढंग से पूरा कर पाएगी।
आलोक कुमार