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Chhattisgarh :‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की राजनीति भारत के लिए क्यों खतरनाक है?

 


‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की राजनीति भारत के लिए क्यों खतरनाक है?

अरुण पन्नालाल की गिरफ्तारी ने धार्मिक भावनाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन के बीच संतुलन पर फिर खड़े किए सवाल

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि इस विश्वास में है कि देश में कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है। किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगे तो जांच होनी चाहिए, दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए और निर्दोष व्यक्ति को न्याय मिलना चाहिए। यही कानून का शासन है।

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल की गिरफ्तारी ने इसी व्यवस्था से जुड़े कई सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। 7 अगस्त 2026 को रायपुर पुलिस ने उन्हें भगवान शिव से संबंधित कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया टिप्पणी के मामले में गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 196, 299 और 352(2) के तहत मामला दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता भाजपा प्रवक्ता अमित चिमनानी ने पुलिस को कथित पोस्ट और टिप्पणियों के यूआरएल तथा स्क्रीनशॉट उपलब्ध कराए थे।

पुलिस कार्रवाई के बाद पन्नालाल को न्यायिक हिरासत में भेजा गया। 24 अगस्त को रायपुर की अदालत ने उनकी जमानत याचिका भी खारिज कर दी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने आरोपों की गंभीरता, धार्मिक तनाव की संभावना और जारी जांच जैसे पहलुओं पर विचार किया।

यहां सबसे जरूरी बात यह है कि गिरफ्तारी और आरोप को दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता। किसी भी मामले में अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।

धार्मिक भावनाओं की रक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक सीमाओं के तहत कानून कुछ प्रकार की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध की अनुमति देता है।

धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली कथित टिप्पणी भी कानून के दायरे में जांच का विषय बन सकती है। यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर ऐसी सामग्री प्रकाशित की है जो कानून की संबंधित धाराओं का उल्लंघन करती है, तो जांच और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला है।

लेकिन दूसरी ओर यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी टिप्पणी को लेकर उत्पन्न सामाजिक या राजनीतिक दबाव स्वयं न्याय का आधार न बन जाए। किसी व्यक्ति के खिलाफ भीड़ का विरोध अपने आप में उसके अपराध का प्रमाण नहीं हो सकता।

पन्नालाल की गिरफ्तारी के समय उनके आवास के बाहर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और अन्य हिंदू संगठनों के प्रदर्शन की खबरें सामने आई थीं। पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की थी।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन किसी आरोपी के दोष या निर्दोष होने का निर्धारण सड़क पर प्रदर्शन से नहीं, बल्कि जांच और अदालत से होना चाहिए।

मामले में एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न

इस मामले में पन्नालाल की ओर से कथित टिप्पणी की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। Christian Solidarity Worldwide की रिपोर्ट के अनुसार उनके वकीलों ने अदालत में तर्क दिया कि किसी व्यक्ति के नाम से बना फेसबुक अकाउंट अपने आप यह साबित नहीं करता कि संबंधित सामग्री उसी व्यक्ति ने प्रकाशित की थी। बचाव पक्ष ने तकनीकी साक्ष्य, अकाउंट संबंधी जानकारी और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से जुड़े प्रमाणों की आवश्यकता पर जोर दिया।

दूसरी ओर पुलिस की जांच में मोबाइल फोन की जांच के दौरान कथित टिप्पणी मिलने और उसे जब्त किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसका मतलब यह है कि मामले में तथ्य और साक्ष्य न्यायिक जांच के विषय हैं।

इसलिए दो प्रश्नों को अलग-अलग देखना जरूरी है—क्या कथित टिप्पणी कानून का उल्लंघन करती है और क्या वह टिप्पणी वास्तव में आरोपी ने ही की थी? इन दोनों सवालों का अंतिम उत्तर न्यायिक प्रक्रिया से निकलना चाहिए।

पुराने विवादों को वर्तमान मामले से अलग रखना जरूरी

अरुण पन्नालाल पहले भी छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। उनके पूर्व के विवादों और गतिविधियों का उल्लेख वर्तमान मामले के संदर्भ में किया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के पुराने विवाद अपने आप वर्तमान आरोप को साबित नहीं करते।

इसी तरह वर्तमान मामले के आधार पर पूरे ईसाई समुदाय या पूरे हिंदू समाज के बारे में निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति की कथित गलती और पूरे समुदाय की पहचान को अलग रखना सामाजिक शांति के लिए आवश्यक है।

बहुमत की संख्या और कानून की समानता

भारत एक बहुधार्मिक और बहुभाषी देश है। यहां बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों के नागरिक समान संवैधानिक अधिकार रखते हैं।

बहुमत की संख्या लोकतांत्रिक राजनीति में महत्वपूर्ण है, लेकिन कानून की नजर में नागरिक की सुरक्षा केवल उसकी संख्या या सामाजिक शक्ति पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।

यदि किसी ईसाई नागरिक की टिप्पणी कानून का उल्लंघन करती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसी प्रकार किसी हिंदू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, आदिवासी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ भी कानून का उल्लंघन होने पर समान प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

यही कानून के शासन की मूल भावना है।

‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ लोकतंत्र के लिए क्यों खतरनाक है?

‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली सोच का अर्थ है कि जिसके पास अधिक राजनीतिक, सामाजिक या भीड़ की शक्ति है, वही अपनी बात मनवा सकता है। लोकतांत्रिक संविधान ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता।

अगर किसी नागरिक को यह डर हो कि उसके खिलाफ शक्तिशाली समूह खड़ा हो गया तो उसे निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा, तो कानून में उसका भरोसा कमजोर होगा।

इसीलिए पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका की संस्थागत निष्पक्षता महत्वपूर्ण है। किसी आरोपी पर आरोप सही हैं या गलत, इसका निर्णय साक्ष्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए, न कि समर्थकों या विरोधियों की संख्या के आधार पर।

जेल और जमानत से आगे न्याय की कसौटी

पन्नालाल की जमानत 24 अगस्त को खारिज हुई। उनके मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया जारी है। इसलिए अभी किसी भी पक्ष को अंतिम रूप से दोषी या निर्दोष घोषित करना उचित नहीं होगा।

असल कसौटी यह होगी कि जांच कितनी पारदर्शी होती है, उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता कैसे परखी जाती है और अदालत पूरे मामले में कानून तथा साक्ष्यों के आधार पर क्या निष्कर्ष निकालती है।

भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी हो और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा भी।

धर्म के नाम पर अपमानजनक टिप्पणी हो तो कानून अपना काम करे। लेकिन कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान, राजनीतिक विचार या सामाजिक सक्रियता के आधार पर अलग-अलग तरीके से नहीं होना चाहिए।

लोकतंत्र में सत्ता किसी एक समुदाय, संगठन या विचारधारा की स्थायी संपत्ति नहीं होती। आज जो शक्तिशाली है, कल वह विपक्ष में भी हो सकता है। इसलिए हर राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के लिए संविधान की मर्यादा समान होनी चाहिए।

अरुण पन्नालाल का मामला इसी बड़े प्रश्न की ओर ध्यान खींचता है—भारत में धार्मिक संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

इसका उत्तर किसी भीड़, नारे या राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि संविधान, निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया में तलाशना होगा।

कानून की ताकत भीड़ से बड़ी होनी चाहिए और संविधान की मर्यादा राजनीतिक या सामाजिक शक्ति से ऊपर। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।

आलोक कुमार

Bihar: पेंशन पाने की प्रक्रिया में बुजुर्गों की परेशानियां


पेंशन पाने की प्रक्रिया में बुजुर्गों की परेशानियां

 पेंशन बुजुर्गों के लिए आर्थिक सहारा है, लेकिन आवेदन से लेकर बैंक खाते में भुगतान तक की प्रक्रिया कई बार उनके लिए खुद एक बड़ी परेशानी बन जाती है। कागजात, ऑनलाइन आवेदन, आधार सत्यापन, बैंकिंग और तकनीकी अड़चनों के बीच सवाल है—क्या पेंशन व्यवस्था वास्तव में बुजुर्गों के लिए सरल और सुलभ है?

पटना। पेंशन किसी बुजुर्ग के लिए केवल सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता नहीं है। यह जीवन के उस पड़ाव में सहारा है, जब नियमित कमाई के अवसर सीमित हो जाते हैं और दवा, भोजन, कपड़े, बिजली तथा रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च लगातार बना रहता है। इसलिए पेंशन की राशि कितनी है, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि पेंशन समय पर, आसानी से और सम्मानपूर्वक बुजुर्ग तक पहुंचे।

विडंबना यह है कि जिस उम्र में व्यक्ति को सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उसी उम्र में कई बुजुर्गों को पेंशन के लिए आवेदन, दस्तावेज, बैंक और ऑनलाइन प्रक्रिया के बीच दौड़ लगानी पड़ती है।

सबसे पहले जानकारी की समस्या

पेंशन प्रक्रिया में पहली परेशानी अक्सर जानकारी की होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई बुजुर्गों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि वे किस योजना के पात्र हैं, आवेदन कहां किया जा सकता है, कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी हैं और आवेदन की स्थिति कैसे देखी जाएगी।

सरकारी योजनाओं की जानकारी वेबसाइट और ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध होना उपयोगी है, लेकिन डिजिटल माध्यम पर जानकारी उपलब्ध होना और उसका बुजुर्ग व्यक्ति तक आसानी से पहुंचना अलग-अलग बातें हैं।

कई वृद्ध स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं करते। कुछ के पास मोबाइल है, लेकिन इंटरनेट या ऑनलाइन आवेदन की जानकारी नहीं होती। ऐसे में उन्हें किसी रिश्तेदार, पड़ोसी, साइबर कैफे या अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है।

यहीं से निर्भरता की शुरुआत होती है।

दस्तावेजों की छोटी गलती, बड़ी परेशानी

पेंशन आवेदन में आधार, बैंक खाता, मोबाइल नंबर और अन्य आवश्यक विवरणों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन नाम की वर्तनी में अंतर, जन्मतिथि की गलती, बैंक खाते की गलत जानकारी या मोबाइल नंबर अपडेट नहीं होने जैसी छोटी समस्याएं आवेदन को प्रभावित कर सकती हैं।

एक युवा व्यक्ति के लिए दस्तावेज सुधारना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन 70 या 80 वर्ष के बुजुर्ग के लिए अलग-अलग कार्यालयों में जाना कठिन हो सकता है।

कई बार आधार से जुड़ी समस्या के लिए अलग जगह जाना पड़ता है, बैंक खाते में सुधार के लिए बैंक जाना पड़ता है और पेंशन आवेदन की स्थिति जानने के लिए पंचायत या प्रखंड कार्यालय से संपर्क करना पड़ता है।

यदि बुजुर्ग अकेले रहते हैं या उनके बच्चे रोजगार के कारण दूसरे शहरों में रहते हैं, तो यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती है।

डिजिटल व्यवस्था सुविधा भी, चुनौती भी

ऑनलाइन व्यवस्था ने सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और निगरानी की संभावनाएं बढ़ाई हैं। आवेदन की स्थिति ऑनलाइन देखना, डिजिटल रिकॉर्ड रखना और बैंक खाते में DBT के माध्यम से राशि भेजना व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बना सकता है।

लेकिन डिजिटल व्यवस्था का लाभ तभी पूरी तरह मिलेगा जब उसके साथ मानवीय सहायता भी हो।

यह मान लेना व्यावहारिक नहीं है कि हर बुजुर्ग ऑनलाइन आवेदन कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट सुविधा और तकनीकी सहायता समान नहीं है।

इसलिए ऑनलाइन सुविधा के साथ ऑफलाइन सहायता भी जरूरी है। पंचायत या स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा केंद्र हो जहां बुजुर्ग अपना आवेदन, दस्तावेज और भुगतान से जुड़ी समस्या समझा सके तो उनकी परेशानी काफी कम हो सकती है।

बैंक तक पहुंचना भी चुनौती

पेंशन खाते में पहुंचने के बाद उसे निकालना भी कई बुजुर्गों के लिए आसान नहीं होता। उम्र अधिक होने, बीमारी या चलने-फिरने में कठिनाई के कारण बैंक तक जाना मुश्किल हो सकता है।

बैंकिंग प्रतिनिधि या अन्य डिजिटल माध्यमों से भुगतान प्राप्त करने की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद तकनीकी समस्याएं सामने आ सकती हैं। बायोमेट्रिक सत्यापन में अंगूठे का निशान ठीक से दर्ज नहीं होना, नेटवर्क की समस्या या खाते से जुड़ी तकनीकी दिक्कत के कारण बुजुर्ग को दोबारा प्रयास करना पड़ सकता है।

बैंक में भीड़ और लंबी कतार अलग समस्या है। किसी वृद्ध व्यक्ति के लिए लंबे समय तक खड़े रहना या इंतजार करना शारीरिक रूप से कठिन हो सकता है।

इसलिए बैंकिंग सुविधा में बुजुर्गों के लिए प्राथमिकता और सहायता व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

सत्यापन जरूरी, लेकिन प्रक्रिया सरल हो

पेंशन व्यवस्था में सत्यापन इसलिए जरूरी है ताकि लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे और गलत या फर्जी भुगतान को रोका जा सके। लेकिन सत्यापन की प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं होनी चाहिए कि वास्तविक लाभार्थी ही परेशान हो जाए।

कमजोर या बहुत अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए स्थानीय स्तर पर सत्यापन, सहायता शिविर या जरूरत पड़ने पर घर के नजदीक सेवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था अधिक उपयोगी हो सकती है।

सिस्टम की सुरक्षा और लाभार्थी की सुविधा—दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।

आवेदन की स्थिति पता नहीं चलना

एक और बड़ी समस्या आवेदन की स्थिति को लेकर होती है।

बुजुर्ग ने आवेदन कर दिया, लेकिन उसे यह जानकारी नहीं कि आवेदन स्वीकृति के किस चरण में है। यदि दस्तावेज सत्यापन में मामला लंबित है, बैंक खाते में कोई समस्या है या तकनीकी कारण से भुगतान रुका है, तो आवेदक को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।

स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने पर बुजुर्ग बार-बार पंचायत, प्रखंड कार्यालय या अन्य संबंधित स्थानों पर जाता है। इसमें उसका समय और आने-जाने का खर्च दोनों बढ़ते हैं।

एक सरल स्टेटस सिस्टम और शिकायत निवारण व्यवस्था इस परेशानी को काफी कम कर सकती है।

पेंशन में देरी का असर परिवार पर भी

गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों के लिए पेंशन की राशि कई बार दवा और भोजन का महत्वपूर्ण सहारा होती है। भुगतान में देरी होने पर उन्हें परिवार के सदस्यों से पैसा मांगना या उधार लेना पड़ सकता है।

इससे आर्थिक निर्भरता बढ़ती है और कई बुजुर्गों में असहाय होने की भावना पैदा हो सकती है।

इसलिए पेंशन व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों को योजना में शामिल किया गया। यह भी देखना जरूरी है कि पात्र व्यक्ति को समय पर और बिना अनावश्यक परेशानी के भुगतान मिल रहा है या नहीं।

पंचायत स्तर पर सहायता केंद्र जरूरी

समस्या का एक व्यावहारिक समाधान पंचायत स्तर पर वृद्धजन पेंशन सहायता केंद्र हो सकता है।

यहां आवेदन भरने, दस्तावेजों की जांच, आवेदन की स्थिति जानने, बैंकिंग संबंधी मार्गदर्शन और शिकायत दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।

पंचायत, बैंक, डाकघर, सामुदायिक केंद्र और स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से सरल भाषा में जागरूकता अभियान भी चलाया जा सकता है।

जरूरत इस बात की है कि बुजुर्ग को अलग-अलग कार्यालयों में भेजने के बजाय अधिकतम सेवाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई जाएं।

सम्मान भी व्यवस्था का हिस्सा है

पेंशन लेने वाला बुजुर्ग किसी एहसान का पात्र नहीं है। वह सरकार की निर्धारित योजना और अपने अधिकार के तहत मिलने वाले लाभ के लिए आवेदन करता है। इसलिए सरकारी कर्मचारियों और सेवा केंद्रों पर उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार होना व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है।

किसी बुजुर्ग को उसकी उम्र, अशिक्षा या डिजिटल जानकारी की कमी के कारण असहज महसूस नहीं कराया जाना चाहिए।

असली परीक्षा प्रक्रिया की सरलता है

सरकार द्वारा पेंशन योजना चलाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब सबसे कमजोर बुजुर्ग व्यक्ति बिना दलाल, अनावश्यक खर्च और बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाए अपना लाभ प्राप्त कर सके।

वृद्धावस्था सम्मान और सहारे की मांग करती है, कागजी जटिलताओं की नहीं।

पेंशन की राशि बुजुर्ग के बैंक खाते तक पहुंचना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि उस राशि तक पहुंचने का रास्ता सरल, पारदर्शी, सुरक्षित और सम्मानजनक हो।

यही किसी भी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा है—क्या वह बुजुर्ग की जिंदगी आसान बना रही है या लाभ पाने की प्रक्रिया ही उसके लिए नई परेशानी बन रही है?

 बिहार में पेंशन पाने वाले बुजुर्गों को आवेदन, दस्तावेज, डिजिटल सत्यापन, बैंकिंग और भुगतान से जुड़ी किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है? जानिए पेंशन प्रक्रिया को सरल बनाने के उपाय। 

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में वृद्ध लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है?

 


बिहार में वृद्ध लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है?

पेंशन बढ़ी, लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और DBT से भुगतान की व्यवस्था मजबूत हुई। लेकिन महंगाई, दवा और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच सवाल अब भी यही है—क्या ₹1,100 प्रतिमाह की पेंशन वृद्ध व्यक्ति को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा दे सकती है?

पटना। बिहार में बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा का सवाल केवल पेंशन मिलने या नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। यह सम्मानजनक जीवन, भोजन, दवा, इलाज, आवागमन, अकेलेपन और आर्थिक निर्भरता से भी जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाने और भुगतान को सीधे बैंक खाते तक पहुंचाने पर जोर दिया है। लेकिन वृद्धावस्था की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए इस व्यवस्था की पर्याप्तता पर चर्चा जरूरी है।

बिहार सरकार के सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्रबंधन सूचना तंत्र (SSPMIS) के अनुसार मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना में न्यूनतम आयु 60 वर्ष है और इसके तहत ₹1,100 प्रतिमाह पेंशन दी जा रही है। योजना के लिए आधार, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाते से संबंधित प्रक्रियाएं भी जुड़ी हैं।

₹400 से ₹1,100 तक पहुंची पेंशन

बिहार में सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि पहले ₹400 प्रतिमाह थी। राज्य सरकार ने इसे बढ़ाकर ₹1,100 प्रतिमाह किया। सरकारी बयानों में इस बढ़ोतरी को वृद्धजनों, दिव्यांगजनों और विधवा महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में बताया गया है।

राशि बढ़ने से निश्चित रूप से वृद्ध लाभार्थियों को पहले की तुलना में अधिक आर्थिक सहायता मिलती है। लेकिन किसी योजना की उपयोगिता केवल यह देखकर तय नहीं की जा सकती कि राशि कितनी बढ़ी है। यह भी देखना होगा कि उस राशि से आज की परिस्थितियों में वृद्ध व्यक्ति की कितनी जरूरतें पूरी हो पाती हैं।

₹1,100 प्रतिमाह यानी औसतन लगभग ₹36 प्रतिदिन। यदि किसी बुजुर्ग को नियमित दवा खरीदनी हो, अस्पताल जाना हो या वह परिवार से आर्थिक सहायता पाने की स्थिति में न हो, तो यह राशि सीमित पड़ सकती है।

DBT से भुगतान में आया बदलाव

सितंबर 2026 में बिहार सरकार ने बताया कि अगस्त माह की सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में 105.68 लाख लाभार्थियों के बैंक खातों में ₹1,100 की दर से कुल ₹1,233.87 करोड़ DBT के माध्यम से भेजे गए। सरकार ने हर महीने की 10 तारीख को पेंशन भुगतान का लक्ष्य निर्धारित करने की भी जानकारी दी। उसी भुगतान में 98,896 नए लाभार्थियों को जोड़े जाने की बात कही गई।

सीधे बैंक खाते में भुगतान होने से नकद वितरण पर निर्भरता कम होती है और भुगतान की निगरानी आसान हो सकती है। लेकिन बैंक खाते में पैसा पहुंचना और वृद्ध व्यक्ति का उस पैसे तक आसानी से पहुंच पाना दो अलग-अलग बातें हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे बुजुर्ग भी हैं जिन्हें बैंकिंग प्रक्रिया, आधार प्रमाणीकरण, मोबाइल या डिजिटल सेवाओं की जानकारी सीमित हो सकती है। इसलिए DBT के साथ स्थानीय स्तर पर सहायता व्यवस्था भी जरूरी है।

योजना की पहुंच और वास्तविक पहुंच

SSPMIS में लाभार्थियों के आवेदन और उनकी स्थिति ऑनलाइन देखने की सुविधा उपलब्ध है। लाभार्थी आईडी, स्वीकृति संख्या, बैंक खाता, आधार या मोबाइल नंबर के माध्यम से आवेदन की स्थिति खोजी जा सकती है।

लेकिन आवेदन प्रक्रिया में दस्तावेज, सत्यापन और त्रुटि सुधार जैसी अवस्थाएं भी होती हैं। 22 सितंबर 2026 के SSPMIS जिला-वार आंकड़ों में मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना के आवेदन से संबंधित दस्तावेज अपलोड, सत्यापन और त्रुटि सुधार जैसी श्रेणियों में लंबित आवेदन दर्ज हैं।

यही वह बिंदु है जहां योजना की कागजी पहुंच और वास्तविक पहुंच के बीच अंतर दिखाई दे सकता है। जिस बुजुर्ग के पास स्मार्टफोन नहीं है या जो ऑनलाइन प्रक्रिया समझने में सक्षम नहीं है, उसके लिए पंचायत, प्रखंड कार्यालय या परिवार की सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार ने भी सितंबर 2026 में यह निर्देश दिया कि पात्र वृद्धा पेंशन आवेदकों को शीघ्र लाभ मिले और तकनीकी कारणों से कोई पात्र व्यक्ति सरकारी योजना से वंचित न रहे।

क्या ₹1,100 पर्याप्त है?

यही इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है।

वृद्धावस्था में खर्च का स्वरूप बदल जाता है। सामान्य परिवार की तुलना में बुजुर्गों को दवा, जांच, चश्मा, अस्पताल आने-जाने और विशेष भोजन जैसी जरूरतें अधिक हो सकती हैं। कई वृद्ध ऐसे भी होते हैं जो अकेले रहते हैं या परिवार की नियमित आर्थिक सहायता पर निर्भर रहते हैं।

इसलिए पेंशन को केवल नकद सहायता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि वृद्ध व्यक्ति को सस्ती दवा, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा, खाद्य सुरक्षा और स्थानीय सहायता भी उपलब्ध हो, तो ₹1,100 की पेंशन का वास्तविक उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है।

दूसरी ओर, यदि पेंशन के साथ स्वास्थ्य खर्च भी वृद्ध व्यक्ति को स्वयं उठाना पड़े, तो बढ़ी हुई राशि के बावजूद आर्थिक असुरक्षा बनी रह सकती है।

अगला कदम क्या हो सकता है?

बिहार में वृद्धजन सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदमों पर विचार किया जा सकता है।

पहला, पेंशन राशि की समय-समय पर महंगाई और जीवन-यापन की लागत के आधार पर समीक्षा हो।

दूसरा, अकेले रहने वाले, अत्यधिक वृद्ध और गंभीर स्वास्थ्य जरूरत वाले बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था पर विचार किया जाए।

तीसरा, पंचायत स्तर पर वृद्धजन सहायता केंद्र विकसित किए जा सकते हैं, जहां पेंशन, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी एक ही जगह मिले।

चौथा, यदि किसी लाभार्थी की पेंशन तकनीकी या दस्तावेजी कारण से रुकती है तो शिकायत के समाधान की समय-सीमा स्पष्ट होनी चाहिए।

पांचवां, वृद्धजन पेंशन को स्वास्थ्य सेवाओं से बेहतर तरीके से जोड़ना जरूरी है। वृद्ध व्यक्ति के लिए आर्थिक सहायता तभी अधिक उपयोगी होगी जब उसके आसपास दवा, जांच और प्राथमिक इलाज की सुविधाएं भी उपलब्ध हों।

असली सवाल सम्मानजनक जीवन का

बिहार ने वृद्धजन पेंशन को ₹400 से बढ़ाकर ₹1,100 किया है और लाखों लाभार्थियों को DBT के माध्यम से भुगतान किया जा रहा है। सितंबर 2026 में 105.68 लाख लाभार्थियों को भुगतान इसका ताजा उदाहरण है।

लेकिन सामाजिक सुरक्षा की पर्याप्तता का अंतिम पैमाना केवल लाभार्थियों की संख्या या बजट नहीं हो सकता।

एक वृद्ध व्यक्ति के लिए सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है—समय पर पेंशन, पर्याप्त भोजन, जरूरत के समय इलाज, दवा की उपलब्धता, सुरक्षित आवागमन और परिवार पर पूरी तरह निर्भर न रहने की क्षमता।

इस दृष्टि से बिहार की पेंशन व्यवस्था ने एक महत्वपूर्ण आधार जरूर बनाया है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा को और व्यापक बनाने की गुंजाइश बनी हुई है। आगे की चुनौती यह है कि पेंशन को केवल आर्थिक सहायता से आगे बढ़ाकर वृद्ध व्यक्ति के सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन की व्यापक व्यवस्था से जोड़ा जाए।

क्योंकि वृद्धावस्था केवल किसी परिवार की निजी जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है। जिस पीढ़ी ने अपने श्रम और अनुभव से परिवार और समाज को आगे बढ़ाया, उसके जीवन के अंतिम पड़ाव की सुरक्षा भी सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण पैमाना होनी चाहिए।

 बिहार में वृद्धजन पेंशन ₹1,100 प्रतिमाह है। जानिए DBT भुगतान, योजना की पहुंच, आवेदन प्रक्रिया और बढ़ती उम्र की वास्तविक जरूरतों के बीच सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है।

आलोक कुमार

India: महिला क्रिकेट में भारत का स्वर्णिम वार, श्रीलंका को हराकर एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार गोल्ड

 


महिला क्रिकेट में भारत का स्वर्णिम वार, श्रीलंका को हराकर एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार गोल्ड

 भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने एक बार फिर एशियन गेम्स में अपना दबदबा साबित किया है। 2023 में पहली बार स्वर्ण जीतने के बाद भारत ने 2026 में भी श्रीलंका को फाइनल में हराकर लगातार दूसरी बार महिला क्रिकेट का गोल्ड अपने नाम कर लिया। इस बार जीत का अंतर भी बेहद प्रभावशाली रहा—भारत ने श्रीलंका को 147 रन से शिकस्त दी।

नई दिल्ली। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने मंगलवार को एशियन गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए श्रीलंका को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। निस्शिन के कोरोगी स्पोर्ट्स पार्क में खेले गए फाइनल मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 216 रन बनाए और जवाब में श्रीलंका की पूरी टीम को 69 रन पर समेट दिया। इस तरह भारत ने मुकाबला 147 रन से जीतकर लगातार दूसरी बार एशियन गेम्स महिला क्रिकेट का स्वर्ण पदक हासिल किया।

216 रन का विशाल स्कोर

भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। टीम की शुरुआत आक्रामक रही और सलामी बल्लेबाजों ने श्रीलंकाई गेंदबाजों पर शुरू से दबाव बनाया।

स्मृति मंधाना ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 45 गेंदों पर 79 रन बनाए। उनकी पारी में पांच चौके और सात छक्के शामिल रहे। वहीं शेफाली वर्मा ने 29 गेंदों पर 48 रन बनाकर टीम को तेज शुरुआत दी। दोनों ने मिलकर भारत के बड़े स्कोर की नींव रखी।

इसके बाद भारतीय पारी को आगे बढ़ाने में कप्तान हरमनप्रीत कौर और अन्य बल्लेबाजों ने योगदान दिया। अंतिम ओवरों में रिचा घोष ने तेजी से रन बनाते हुए 22 गेंदों पर 49 रन की नाबाद पारी खेली। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी के कारण भारत 20 ओवर में 216/3 के मजबूत स्कोर तक पहुंच गया।

भारत का 216 रन का स्कोर एशियन गेम्स महिला क्रिकेट में एक नया रिकॉर्ड भी बना। इस बड़े लक्ष्य ने श्रीलंका के सामने शुरुआत से ही कठिन चुनौती रख दी।

श्रीलंका की पारी लड़खड़ाई

217 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी श्रीलंका की टीम भारतीय गेंदबाजों के सामने टिक नहीं सकी। भारतीय गेंदबाजों ने लगातार विकेट निकालते हुए श्रीलंकाई बल्लेबाजों पर दबाव बनाए रखा।

श्रीलंका की पूरी टीम 15.4 ओवर में सिर्फ 69 रन पर ऑलआउट हो गई। कप्तान चामरी अटापट्टू 29 रन के साथ अपनी टीम की ओर से सबसे अधिक रन बनाने वाली बल्लेबाज रहीं, लेकिन उन्हें दूसरे छोर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।

भारतीय गेंदबाजी इकाई ने अनुशासन के साथ गेंदबाजी की और श्रीलंका को किसी भी समय लक्ष्य के करीब पहुंचने का अवसर नहीं दिया। भारत ने अंततः 147 रन से बड़ी जीत दर्ज की।

2023 की जीत का दोहराव

इस जीत की खास बात यह भी है कि 2026 का फाइनल 2023 के एशियन गेम्स फाइनल का दोहराव था। 2023 में भी भारत और श्रीलंका के बीच स्वर्ण पदक के लिए मुकाबला हुआ था और भारत ने 19 रन से जीत दर्ज कर अपना पहला एशियन गेम्स क्रिकेट गोल्ड हासिल किया था।

2026 में दोनों टीमें फिर फाइनल में आमने-सामने आईं, लेकिन इस बार भारतीय टीम ने जीत का अंतर काफी बड़ा कर दिया। 147 रन की जीत ने भारत के लगातार दूसरे स्वर्ण को और यादगार बना दिया।

मंधाना की शानदार पारी

फाइनल में स्मृति मंधाना भारतीय बल्लेबाजी की प्रमुख खिलाड़ियों में रहीं। उनकी 79 रन की पारी ने भारत को मजबूत शुरुआत दी। शेफाली वर्मा ने भी तेजी से रन बनाकर स्कोरिंग गति को बनाए रखा।

रिचा घोष की 49 रन की नाबाद पारी ने अंतिम ओवरों में भारत के स्कोर को और बड़ा कर दिया। बल्लेबाजों के सामूहिक प्रदर्शन ने भारत को 216 रन तक पहुंचाया, जिसके बाद गेंदबाजों ने लक्ष्य की रक्षा की जिम्मेदारी संभाली।

महिला क्रिकेट की बढ़ती पहचान

एशियन गेम्स में लगातार दो स्वर्ण पदक भारतीय महिला क्रिकेट की निरंतरता को दिखाते हैं। 2023 में भारत ने पहली बार इस प्रतियोगिता में महिला क्रिकेट का स्वर्ण जीता था और 2026 में टीम ने अपने खिताब का सफलतापूर्वक बचाव किया।

इस जीत से भारत एशियन गेम्स महिला क्रिकेट में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले देशों में शामिल हो गया है। इससे पहले पाकिस्तान ने भी महिला क्रिकेट में दो स्वर्ण पदक जीते हैं।

टीमवर्क ने दिलाया दूसरा गोल्ड

फाइनल की जीत को केवल किसी एक खिलाड़ी के प्रदर्शन से जोड़ना उचित नहीं होगा। भारत की बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण तीनों विभागों ने मिलकर टीम को मजबूत स्थिति में रखा।

बल्लेबाजों ने बड़ा स्कोर खड़ा किया और गेंदबाजों ने उस स्कोर का प्रभावी बचाव किया। इसी सामूहिक प्रदर्शन के कारण श्रीलंका को लगातार दबाव का सामना करना पड़ा और वह लक्ष्य से काफी दूर रह गई।

भारत का पहला गोल्ड भी यहीं से आया

एशियन गेम्स 2026 में महिला क्रिकेट का स्वर्ण भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। यह इस संस्करण में भारत का पहला स्वर्ण पदक भी रहा।

भारतीय महिला टीम की इस जीत ने एशियन गेम्स में देश के अभियान को भी स्वर्णिम शुरुआत दी। फाइनल में 147 रन की जीत के साथ भारत ने यह भी दिखाया कि 2023 की सफलता महज एक बार की उपलब्धि नहीं थी।

लगातार दूसरी बार चैंपियन भारत

श्रीलंका के खिलाफ यह जीत भारतीय महिला क्रिकेट के लिए एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। 2023 में पहली बार एशियन गेम्स का स्वर्ण जीतने के बाद 2026 में खिताब बरकरार रखना टीम की निरंतरता को दर्शाता है।

216 रन का विशाल स्कोर, श्रीलंका को 69 रन पर रोकना और 147 रन की जीत—फाइनल में भारत के प्रदर्शन की पूरी तस्वीर यही आंकड़े बयां करते हैं।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार स्वर्ण पदक जीतकर अपने खाते में एक और यादगार उपलब्धि जोड़ दी है। 2023 की जीत के बाद 2026 में खिताब बचाने वाली टीम ने यह साबित किया कि बड़े मंच पर निरंतर प्रदर्शन कितना महत्वपूर्ण होता है।

श्रीलंका को 147 रन से हराकर भारत ने एशियन गेम्स महिला क्रिकेट में लगातार दूसरी बार गोल्ड जीता और 2023 की अपनी स्वर्णिम सफलता को एक बार फिर दोहरा दिया।

आलोक कुमार


Bihar : किशोरियों की शिक्षा और सुरक्षित परिवहन का सवाल


किशोरियों की शिक्षा और सुरक्षित परिवहन का सवाल

 किसी समाज की प्रगति का वास्तविक पैमाना केवल बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें या नए संस्थान नहीं हैं। असली सवाल यह है कि क्या उसकी बेटियां बिना डर और बाधा के स्कूल-कॉलेज तक सुरक्षित पहुंच पा रही हैं? यदि रास्ते की असुरक्षा, परिवहन की कमी या दूरी किसी किशोरी की पढ़ाई रोक देती है, तो शिक्षा का अधिकार जमीन पर अधूरा रह जाता है।

किशोरियों की शिक्षा केवल एक छात्रा के भविष्य का सवाल नहीं है। इसका असर परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। एक शिक्षित लड़की अपने अधिकारों, स्वास्थ्य, रोजगार, कानून और सामाजिक जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझ सकती है। लेकिन इसके लिए स्कूल या कॉलेज का मौजूद होना ही पर्याप्त नहीं है। वहां तक सुरक्षित पहुंच भी जरूरी है।

स्कूल है, लेकिन पहुंच कितनी सुरक्षित है?

ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालय अक्सर अपेक्षाकृत नजदीक मिल जाते हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए छात्राओं को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ सकता है। यही वह चरण है जब कई लड़कियों की पढ़ाई बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है।

कहीं रास्ता सुनसान होता है, कहीं नियमित बस नहीं मिलती, कहीं सड़क खराब होती है और कहीं सार्वजनिक परिवहन इतना सीमित होता है कि छात्राओं को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। रोज ऑटो, ई-रिक्शा या निजी वाहन का खर्च उठाना भी हर परिवार के लिए आसान नहीं होता।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “बेटी स्कूल क्यों नहीं जा रही?” यह भी पूछा जाना चाहिए कि “बेटी के स्कूल जाने के लिए सुरक्षित और सस्ता रास्ता कितना उपलब्ध है?”

सुरक्षित परिवहन शिक्षा की बुनियादी जरूरत

किशोरियों के लिए सुरक्षित परिवहन को केवल सुविधा मानना उचित नहीं होगा। यह शिक्षा तक पहुंच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

घर से स्कूल जाने और वापस लौटने के दौरान छात्रा को सुरक्षित महसूस होना चाहिए। इसके लिए पर्याप्त सार्वजनिक वाहन, निर्धारित स्टॉप, उचित रोशनी, नियमित निगरानी और शिकायत की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक हो सकती है।

सिर्फ वाहन उपलब्ध होना भी पर्याप्त नहीं है। उसकी नियमितता और समयबद्धता भी महत्वपूर्ण है। यदि स्कूल की छुट्टी के समय वाहन उपलब्ध नहीं है, तो छात्राओं को अकेले या असुरक्षित परिस्थितियों में घर लौटना पड़ सकता है।

इसलिए शिक्षा की चर्चा करते समय स्कूल भवन, शिक्षक और किताबों के साथ सुरक्षित परिवहन को भी महत्व देना जरूरी है।

छेड़छाड़ और भय का असर

रास्ते में छेड़छाड़ और उत्पीड़न का डर किशोरियों की शिक्षा को प्रभावित कर सकता है। हर घटना पुलिस या प्रशासन तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं। कई परिवार सामाजिक दबाव, विवाद या बदनामी की चिंता के कारण शिकायत करने से बचते हैं।

किसी लड़की के साथ अप्रिय घटना होने के बाद परिवार उसकी आवाजाही सीमित कर सकता है। शुरुआत में उसे अकेले स्कूल जाने से रोका जाता है और धीरे-धीरे स्कूल जाना कम हो सकता है। कुछ मामलों में इसका असर उसकी पूरी शिक्षा पर पड़ सकता है।

इसलिए सुरक्षित परिवहन केवल अपराध रोकने की व्यवस्था नहीं, बल्कि शिक्षा को निरंतर बनाए रखने की व्यवस्था भी है।

स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सुरक्षित रास्तों की पहचान, पर्याप्त रोशनी, आवश्यक स्थानों पर निगरानी, पुलिस की मौजूदगी और शिकायत व्यवस्था जैसे उपाय उपयोगी हो सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायत करने वाली छात्रा को ही दोषी न ठहराया जाए।

परिवार की चिंता को भी समझना होगा

किशोरियों की शिक्षा में बाधा के लिए परिवार को ही जिम्मेदार ठहराना समस्या का अधूरा आकलन हो सकता है। बहुत से अभिभावक अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन रास्ते की सुरक्षा को लेकर वास्तविक चिंता रखते हैं।

यदि किसी गांव से कॉलेज काफी दूर है और नियमित सुरक्षित परिवहन उपलब्ध नहीं है, तो परिवार की चिंता को केवल रूढ़िवादिता कहकर खारिज करने के बजाय उसके समाधान पर ध्यान देना चाहिए।

जहां आवश्यकता हो, छात्राओं के लिए निर्धारित बस सेवा, सुरक्षित साझा परिवहन, परिवहन पास या आर्थिक सहायता जैसी व्यवस्थाओं पर विचार किया जा सकता है। स्थानीय निकाय, शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग और विद्यालय प्रशासन मिलकर ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं जहां छात्राओं की संख्या अधिक है लेकिन परिवहन सुविधा कमजोर है।

विद्यालयों की भी जिम्मेदारी

सुरक्षित परिवहन की पूरी जिम्मेदारी केवल परिवार या पुलिस की नहीं है। विद्यालय प्रशासन को भी यह समझने की जरूरत है कि छात्राएं किन क्षेत्रों से आती हैं, उन्हें स्कूल पहुंचने में क्या कठिनाइयां हैं और छुट्टी के समय परिवहन की स्थिति कैसी रहती है।

विद्यालयों में किशोरियों को उनके कानूनी अधिकारों, उपलब्ध सहायता सेवाओं, साइबर सुरक्षा और उत्पीड़न की शिकायत करने की प्रक्रिया की जानकारी दी जानी चाहिए।

शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि कोई छात्रा अचानक स्कूल आना कम कर दे तो इसे केवल पढ़ाई में रुचि की कमी नहीं माना जाना चाहिए। इसके पीछे परिवहन, सुरक्षा, आर्थिक परेशानी या पारिवारिक परिस्थिति भी हो सकती है।

सरकारी योजनाओं का लाभ जमीन तक पहुंचे

बेटियों की शिक्षा के लिए सरकारों द्वारा छात्रवृत्ति, साइकिल, पोशाक, पाठ्य सामग्री और अन्य सहायता उपलब्ध कराई जाती है। ऐसी योजनाओं का उद्देश्य शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना है। लेकिन उनकी सफलता का मूल्यांकन केवल वितरित सामग्री या खर्च की गई राशि से नहीं होना चाहिए।

यह भी देखना जरूरी है कि कितनी किशोरियां माध्यमिक शिक्षा पूरी कर रही हैं, कितनी नियमित रूप से विद्यालय पहुंच रही हैं और किन क्षेत्रों में परिवहन की समस्या के कारण पढ़ाई बाधित हो रही है।

स्कूल और क्षेत्र के स्तर पर वास्तविक समस्याओं की पहचान करके उन इलाकों में परिवहन व्यवस्था मजबूत की जा सकती है जहां छात्राओं को सबसे अधिक कठिनाई होती है।

समाज को भी बदलनी होगी सोच

सुरक्षित परिवहन केवल सरकारी वाहनों या पुलिस व्यवस्था से नहीं बनता। सार्वजनिक स्थानों पर समाज का व्यवहार भी महत्वपूर्ण है।

किसी लड़की को सड़क पर परेशान करना “मजाक” नहीं है। किशोरियों और महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार प्रत्येक नागरिक की सामाजिक जिम्मेदारी है।

हमें अपने सवालों का तरीका भी बदलना होगा। “लड़की अकेले क्यों जा रही थी?” पूछने के बजाय यह पूछना जरूरी है कि “सार्वजनिक स्थान उसके लिए सुरक्षित क्यों नहीं था?”

यह बदलाव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि सामाजिक सोच का बदलाव है।

शिक्षा का रास्ता सुरक्षित होगा तभी भविष्य सुरक्षित होगा

किशोरियों की शिक्षा पर संसाधन खर्च करना और स्कूल तक सुरक्षित पहुंच की व्यवस्था कमजोर छोड़ देना विकास की अधूरी तस्वीर है। शिक्षा का अधिकार तभी वास्तविक रूप लेता है जब बेटी घर से निकलकर विद्यालय और विद्यालय से वापस घर तक सुरक्षित पहुंच सके।

बेटी को पढ़ने के लिए असाधारण साहस दिखाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे सामान्य नागरिक की तरह सुरक्षित सड़क, विश्वसनीय परिवहन और सम्मानजनक वातावरण मिलना चाहिए।

आज किसी किशोरी के स्कूल जाने का रास्ता सुरक्षित बनाना उसके भविष्य के रोजगार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी का रास्ता मजबूत करना है।

इसलिए “बेटी पढ़ाओ” के साथ “बेटी को सुरक्षित पहुंचाओ” पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

क्योंकि स्कूल का दरवाजा तभी सचमुच खुला है, जब घर से स्कूल तक जाने का रास्ता भी खुला, सस्ता और सुरक्षित हो।

 आलोक कुमार


Bihar : स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या को सिर्फ परिवार की गलती क्यों न मानें

 


स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या को सिर्फ परिवार की गलती क्यों न मानें

जब कोई बच्चा स्कूल छोड़ देता है तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि उसके माता-पिता ने उसे पढ़ाया क्यों नहीं। यह भी देखना जरूरी है कि क्या गरीबी, स्कूल की दूरी, घरेलू जिम्मेदारियां, पढ़ाई में पिछड़ना, सामाजिक दबाव या स्कूल का माहौल उसे शिक्षा से दूर करने में कहीं न कहीं जिम्मेदार रहा है।

स्कूल छोड़ने वाला बच्चा केवल एक छात्र नहीं होता, जो पढ़ाई के बीच रास्ते में रुक गया। उसके पीछे परिवार की आर्थिक स्थिति, घर का माहौल, स्कूल की व्यवस्था, सामाजिक परिस्थितियां और कई बार सार्वजनिक व्यवस्था की कमियां भी छिपी होती हैं। ऐसे में हर मामले में माता-पिता को दोषी ठहराना समस्या को समझने के बजाय उसे सरल बनाकर देखने जैसा है।

स्कूल छोड़ना अक्सर अचानक होने वाली घटना नहीं होती। इसके पीछे कई छोटी-बड़ी परेशानियां लंबे समय तक जमा होती रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि बच्चे के स्कूल से बाहर होने की वजह को समझा जाए और परिवार के साथ-साथ स्कूल तथा व्यवस्था की भूमिका पर भी विचार किया जाए।

गरीबी और पढ़ाई के बीच संघर्ष

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बच्चों की पढ़ाई और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों के बीच संघर्ष बना रहता है। भोजन, इलाज, किराया, रोजगार और घरेलू खर्च की चिंता के बीच शिक्षा का खर्च कई परिवारों के लिए चुनौती बन जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में खेती, पशुपालन, मजदूरी या घरेलू कामों में बच्चों की भागीदारी बढ़ सकती है। कई बार बच्चा परिवार की आर्थिक मदद के लिए काम करने लगता है। ऐसी स्थिति में स्कूल छोड़ना केवल माता-पिता की अनिच्छा नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी का परिणाम भी हो सकता है।

यदि परिवार के सामने राशन की जरूरत और बच्चे की पढ़ाई के खर्च के बीच कठिन चुनाव हो, तो केवल परिवार को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी।

स्कूल की दूरी भी बन सकती है बाधा

कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय घर से काफी दूर होते हैं। छोटी उम्र के बच्चों के लिए लंबी दूरी तय करना मुश्किल हो सकता है। लड़कियों के मामले में सुरक्षा और परिवहन की चिंता भी परिवार के निर्णय को प्रभावित कर सकती है।

यदि नजदीक पर्याप्त स्कूल उपलब्ध नहीं है, परिवहन की सुविधा कमजोर है या रास्ता सुरक्षित नहीं है, तो बच्चे की शिक्षा जारी रखने की जिम्मेदारी केवल परिवार पर डालना उचित नहीं होगा। शिक्षा की पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी परिवार की इच्छा।

स्कूल का माहौल भी महत्वपूर्ण है

बच्चा स्कूल में केवल किताब पढ़ने नहीं जाता। वह वहां सम्मान, सुरक्षा और अपनापन भी चाहता है। यदि उसे बार-बार अपमानित किया जाए, उसकी आर्थिक स्थिति का मजाक बनाया जाए या उसकी सामाजिक और भाषाई पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव महसूस हो, तो स्कूल से उसका जुड़ाव कमजोर हो सकता है।

सीखने में पीछे रह जाने वाले बच्चों की समस्या और गंभीर हो सकती है। यदि बच्चा लगातार कक्षा में मौजूद रहे लेकिन विषयों को समझ न पाए, तो पढ़ाई उसके लिए बोझ बन सकती है। ऐसे बच्चों को “पढ़ने में मन नहीं लगता” कहकर छोड़ देने के बजाय अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता देना जरूरी है।

किशोरावस्था में बढ़ती चुनौतियां

कक्षा बढ़ने के साथ बच्चों की जिम्मेदारियां और दबाव भी बढ़ सकते हैं। परीक्षा का डर, पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, साथियों का प्रभाव और भविष्य को लेकर चिंता कई बच्चों को प्रभावित करती है।

लड़कियों के सामने कुछ अतिरिक्त चुनौतियां हो सकती हैं। स्कूल में पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं का अभाव, सुरक्षित शौचालय की कमी, घरेलू काम का बोझ और कम उम्र में विवाह का सामाजिक दबाव उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए स्कूल छोड़ने की समस्या को केवल “परिवार जागरूक नहीं है” कहकर समझना वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।

प्रवासी परिवारों के बच्चों की चुनौती

मजदूरी या रोजगार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने वाले परिवारों के बच्चों के लिए पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखना कठिन हो सकता है। परिवार बिहार से पंजाब, झारखंड से दिल्ली या किसी दूसरे राज्य में चला गया तो बच्चे का पुराना स्कूल छूट सकता है।

नए स्थान पर प्रवेश, दस्तावेज, भाषा और पढ़ाई के स्तर में अंतर जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। कई बार बच्चा कुछ महीनों तक स्कूल से बाहर रहता है और फिर धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।

ऐसे बच्चों के लिए शिक्षा व्यवस्था में ऐसी सुविधाओं की जरूरत है, जिससे परिवार के स्थान बदलने के बावजूद बच्चे की पढ़ाई बाधित न हो।

स्वास्थ्य और विशेष जरूरतों को भी समझना होगा

लंबी बीमारी, दिव्यांगता या सीखने से जुड़ी कठिनाइयां भी बच्चे को स्कूल से दूर कर सकती हैं। यदि स्कूल में आवश्यक सहयोग उपलब्ध नहीं है, तो नियमित उपस्थिति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

ऐसे मामलों में परिवार को दोष देने के बजाय स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष शिक्षण सहायता और स्कूल की जिम्मेदारी पर भी ध्यान देना जरूरी है।

स्कूल छोड़ने से पहले मिलते हैं संकेत

बच्चा अक्सर एक दिन में स्कूल छोड़ने का फैसला नहीं करता। उससे पहले कई संकेत दिखाई दे सकते हैं—लगातार अनुपस्थिति, पढ़ाई में गिरावट, किताब-कॉपी की कमी, कक्षा में चुप रहना, शिक्षकों से दूरी, साथियों से अलगाव या परिवार की आर्थिक समस्या।

यदि स्कूल इन संकेतों को समय रहते पहचान ले, तो बच्चे को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए हस्तक्षेप किया जा सकता है। शिक्षक, प्रधानाध्यापक, अभिभावक, पंचायत और स्थानीय प्रशासन के बीच संवाद इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

परिवार के साथ व्यवस्था की भी जिम्मेदारी

परिवार की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता। माता-पिता को बच्चों की शिक्षा के महत्व को समझना चाहिए और उन्हें नियमित स्कूल भेजने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन परिवार को अकेला छोड़कर पूरी जिम्मेदारी उसी पर डाल देना भी उचित नहीं है।

जरूरतमंद बच्चों की पहचान, छात्रवृत्ति, परिवहन, स्कूल की आधारभूत सुविधाएं, परामर्श, स्वास्थ्य सहायता और पुनःनामांकन जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाना जरूरी है। स्कूलों को भी बच्चों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सीखने योग्य वातावरण तैयार करना होगा।

हर बच्चे की कहानी अलग होती है

स्कूल छोड़ने वाले हर बच्चे की कहानी एक जैसी नहीं होती। कोई आर्थिक परेशानी के कारण बाहर हुआ हो सकता है, कोई परिवार के स्थानांतरण के कारण, कोई पढ़ाई में लगातार पिछड़ने के कारण और कोई घरेलू जिम्मेदारियों या स्कूल के खराब अनुभव के कारण।

इसलिए “बच्चे के माता-पिता दोषी हैं” जैसे एक वाक्य में पूरी समस्या को समेट देना उचित नहीं होगा। हमें यह पूछना चाहिए कि बच्चा स्कूल से क्यों दूर हुआ और उसे वापस शिक्षा से जोड़ने के लिए कौन-कौन से रास्ते उपलब्ध हैं।

शिक्षा केवल बच्चे और परिवार की निजी जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज और व्यवस्था की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। जिस दिन कोई बच्चा स्कूल छोड़ता है, उस दिन केवल उसकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होती, बल्कि उसके भविष्य के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।

इसलिए स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को दोष देने या उनके परिवार को कटघरे में खड़ा करने से पहले उनकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “बच्चे ने स्कूल क्यों छोड़ दिया?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं, जिनमें बच्चा शिक्षा से दूर हो गया?”

यही सवाल समस्या की जड़ तक पहुंचने में मदद करेगा और यहीं से बच्चे को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के वास्तविक प्रयास की शुरुआत हो सकती है।

आलोक कुमार


Jharkhand : झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर बढ़ा विवाद

 झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर बढ़ा विवाद


रांची।
झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान, पारंपरिक पर्व-त्योहार और पूजा-पद्धति को लेकर नया विवाद सामने आया है। केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने चर्चों और गिरजाघरों में पारंपरिक आदिवासी पर्वों को ईसाई धार्मिक पद्धति के अनुरूप मनाए जाने पर आपत्ति जताई है। समिति ने इस संबंध में 16 सितंबर 2026 को रांची के उपायुक्त को लिखित शिकायत देकर मामले की जांच और कथित आयोजनों पर रोक लगाने की मांग की।

मामले को लेकर 18 सितंबर को रांची प्रेस क्लब में केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने संयुक्त प्रेस वार्ता भी की। इसमें संगठनों ने विशेष रूप से करम पर्व और करम देवता से जुड़े आयोजनों का मुद्दा उठाया। समिति का आरोप है कि कुछ चर्च परिसरों में पारंपरिक आदिवासी पर्व को ईसाई धार्मिक तरीके से मनाने की कोशिश की जा रही है।

चर्च परिसरों में करम पर्व मनाने पर आपत्ति

केन्द्रीय सरना समिति की ओर से लगाए गए आरोपों में कहा गया है कि कुछ चर्च या गिरजाघर परिसरों में बालू का टीला बनाकर करम देवता से संबंधित आयोजन किए जा रहे हैं। समिति इसे आदिवासी धार्मिक परंपराओं के स्वरूप में बदलाव और पारंपरिक मान्यताओं के साथ खिलवाड़ के रूप में देखती है।

प्रेस वार्ता में समिति और सहयोगी संगठनों ने कहा कि उन्हें किसी समुदाय के अपने धार्मिक पर्व मनाने पर आपत्ति नहीं है। उनका विरोध उस स्थिति से है, जिसमें उनके अनुसार आदिवासी पर्वों को दूसरे धार्मिक तरीके से मनाया जाता है। समिति ने आदिवासी पर्वों की मूल परंपराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किए जाने की मांग की है।

हालांकि, इन आरोपों के संबंध में संबंधित चर्चों या ईसाई आदिवासी समुदाय का पक्ष इस रिपोर्ट में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए आरोपों को अंतिम तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित संगठनों द्वारा लगाए गए आरोप के रूप में देखना जरूरी है।

आदिवासी समाज में धार्मिक विविधता

झारखंड का आदिवासी समाज धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से एकरूप नहीं है। विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच परंपराओं, आस्थाओं और धार्मिक व्यवहार में अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में आदिवासी पहचान और धार्मिक पहचान के संबंध को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं।

यही कारण है कि इस विवाद को केवल दो धार्मिक समूहों के बीच टकराव के रूप में देखने के बजाय इसके सांस्कृतिक और सामाजिक पक्ष को भी समझना जरूरी है।

करम और सरहुल जैसे पर्व झारखंड की आदिवासी सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दूसरी ओर, ईसाई आदिवासी समुदाय के लिए अपनी धार्मिक आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को किस रूप में जोड़ा जाए, यह भी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़ा प्रश्न हो सकता है।

इसलिए विवाद के किसी भी समाधान के लिए सभी संबंधित पक्षों की बात सुना जाना और वास्तविक आयोजनों की प्रकृति की जांच किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

प्रशासन से जांच की मांग

केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने रांची के उपायुक्त को दिए गए पत्र में मामले की जांच कराने की मांग की है। संगठनों की अपेक्षा है कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि संबंधित धार्मिक स्थलों पर किस प्रकार के आयोजन किए जा रहे हैं और उनकी प्रकृति क्या है।

समिति का कहना है कि आदिवासी धार्मिक प्रतीकों और पर्वों के मूल स्वरूप का सम्मान किया जाना चाहिए। संगठनों ने यह भी कहा है कि ईसाई समुदाय अपने धार्मिक पर्व मनाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उनके अनुसार आदिवासी पर्वों को अलग धार्मिक पद्धति में मनाए जाने पर आपत्ति है।

अब निगाह प्रशासन की ओर है कि शिकायत पर क्या जांच होती है और संबंधित पक्षों से क्या जानकारी ली जाती है।

धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार का सवाल

इस विवाद का एक व्यापक पहलू धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ा है। भारत में विभिन्न समुदायों को अपनी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार जीवन जीने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में किसी भी विवाद में यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित गतिविधि किस प्रकृति की है और उससे किसी समुदाय के अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव पड़ रहा है या नहीं।

साथ ही, आदिवासी समुदायों की पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक विरासत के संरक्षण का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। करम, सरहुल और अन्य पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कई समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हुए हैं।

इसी कारण ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई से पहले तथ्यों की पुष्टि, संबंधित पक्षों की सुनवाई और स्थानीय परिस्थितियों की समझ जरूरी हो जाती है।

विवाद से आगे संवाद की जरूरत

झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान का प्रश्न नया नहीं है। समय-समय पर आदिवासी परंपरा, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर विभिन्न संगठन अपनी मांगें और आपत्तियां सामने रखते रहे हैं। हाल के वर्षों में भी केन्द्रीय सरना समिति ने सरहुल और अन्य आदिवासी धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी मांगें रखी हैं।

मौजूदा विवाद में भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आरोपों की स्वतंत्र जांच हो और सभी संबंधित समुदायों को अपनी बात रखने का अवसर मिले। धार्मिक पहचान जैसे संवेदनशील विषय में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले वास्तविक घटनाओं और उनके संदर्भ को समझना जरूरी है।

केन्द्रीय सरना समिति की ओर से 16 सितंबर को दिए गए ज्ञापन और 18 सितंबर की प्रेस वार्ता के बाद अब प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार है।

यह विवाद झारखंड में आदिवासी धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और सामुदायिक सह-अस्तित्व से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है। इन सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से अधिक संवाद, तथ्य-जांच और सभी पक्षों की संवेदनशील भागीदारी से खोजा जा सकता है।

झारखंड में करम पर्व और आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर विवाद सामने आया है। केंद्रीय सरना समिति ने रांची उपायुक्त से जांच और कार्रवाई की मांग की है।

आलोक कुमार

Chhattisgarh :‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की राजनीति भारत के लिए क्यों खतरनाक है?

  ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की राजनीति भारत के लिए क्यों खतरनाक है? अरुण पन्नालाल की गिरफ्तारी ने धार्मिक भावनाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ...