✦ Latest News Loading...

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

India : संसद की गरिमा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी

 

"संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, लोकतंत्र का मंदिर है। यहां विचारों की गरिमा जितनी ऊंची होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।"संसद में बढ़ती व्यक्तिगत बयानबाजी, ऐतिहासिक नेताओं पर टिप्पणियां और जनहित के मुद्दों से भटकती राजनीति पर आधारित यह संपादकीय लोकतांत्रिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी का विश्लेषण करता है।

लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक चेतना, संवाद और जवाबदेही का सर्वोच्च मंच भी है। यहां होने वाली हर बहस, हर टिप्पणी और हर निर्णय देश के करोड़ों नागरिकों के विश्वास से जुड़ा होता है। इसलिए संसद में प्रयुक्त भाषा, व्यवहार और तर्क केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे लोकतांत्रिक संस्कृति की दिशा भी तय करते हैं। संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, बल्कि विचारों का ऐसा मंच है जहां मतभेदों के बीच भी मर्यादा और सम्मान बनाए रखना आवश्यक है।

हाल के वर्षों में संसद के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पहले की तुलना में अधिक तीखे हुए हैं। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि बहस का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत टिप्पणियों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर विवादित बयानबाजी बन जाता है। जब कोई जनप्रतिनिधि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है और दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व को बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के संत या देवता जैसी उपमाएं देता है, तब यह स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श नहीं माना जा सकता। ऐसी भाषा न केवल राजनीतिक संवाद का स्तर गिराती है, बल्कि संसद की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की संपत्ति नहीं होता। देश के निर्माण में विभिन्न नेताओं का अलग-अलग समय पर महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन तथ्यों, नीतियों, उपलब्धियों और कमियों के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र आलोचना का स्वागत करता है, लेकिन आलोचना और अपमान में स्पष्ट अंतर होता है। यदि राजनीतिक बहस तथ्यों के बजाय कटाक्ष और चरित्र-हनन पर आधारित हो जाए, तो उसका लाभ लोकतंत्र को नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण को मिलता है।

भारत की संसदीय परंपरा हमेशा से समृद्ध रही है। अतीत में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी वैचारिक असहमति के बावजूद भाषा की मर्यादा बनाए रखने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों का कठोर विरोध किया, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान को बनाए रखा। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद उसी स्वस्थ परंपरा को फिर से मजबूत करे, जहां तर्क का उत्तर तर्क से दिया जाए, न कि व्यक्तिगत टिप्पणियों से।

जनता सांसदों को संसद में इसलिए नहीं भेजती कि वे विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करें या किसी नेता का गुणगान करें। मतदाता उनसे अपेक्षा करता है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के भविष्य, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करें। संसद का प्रत्येक मिनट जनता के कर से संचालित होता है। इसलिए वहां होने वाली हर बहस का केंद्र जनहित होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रचार।

लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सत्ता पक्ष का दायित्व नीतियां बनाना और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना है, जबकि विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना, कमियों की ओर ध्यान दिलाना और वैकल्पिक सुझाव देना है। यदि कोई सांसद विरोधियों की आलोचना तो करता है, लेकिन सत्ता पक्ष के प्रति अपनी आलोचनात्मक दृष्टि पूरी तरह खो देता है, तो वह लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना को कमजोर करता है। इसी प्रकार यदि विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करे और रचनात्मक सुझाव न दे, तो वह भी लोकतंत्र के उद्देश्य को पूरा नहीं करता।

संसद में प्रयुक्त भाषा का प्रभाव केवल सदन तक सीमित नहीं रहता। आज टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से संसद की कार्यवाही देश के हर नागरिक तक पहुंचती है। युवा पीढ़ी अपने जनप्रतिनिधियों को देखकर राजनीतिक संस्कृति सीखती है। यदि संसद में अपमानजनक भाषा सामान्य बन जाएगी, तो समाज में भी संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होगी। इसके विपरीत यदि सांसद संयम, तथ्य और शालीनता के साथ अपनी बात रखेंगे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को नई मजबूती मिलेगी।

व्यक्तिपूजा भी लोकतंत्र के लिए उतनी ही चुनौती है जितनी व्यक्तिगत अपमान की राजनीति। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं होता और न ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसके योगदान को अपमानजनक भाषा में खारिज कर दिया जाए। हर सरकार की उपलब्धियों का स्वागत होना चाहिए और उसकी कमियों पर सवाल भी उठने चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है। किसी भी नेता को देवत्व प्रदान करना या किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक लाभ के लिए अपमानित करना लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता है।

आज देश अनेक महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। रोजगार के अवसर बढ़ाना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना, किसानों की आय बढ़ाना, तकनीकी विकास, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक समानता और आर्थिक प्रगति जैसे विषय संसद की प्राथमिकता होने चाहिए। यदि बहुमूल्य संसदीय समय व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक कटाक्ष में व्यतीत होगा, तो सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता का होगा, जिसने अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा करके उन्हें संसद तक पहुंचाया है।

लोकतंत्र की शक्ति बहस में होती है, लेकिन बहस तभी सार्थक होती है जब उसमें सम्मान, तथ्य और जिम्मेदारी शामिल हो। संसद का दायित्व किसी व्यक्ति-विशेष का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप जनता के हितों की रक्षा करना है। जनप्रतिनिधियों की वास्तविक पहचान उनके भाषणों की तीखी भाषा से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले कार्यों से होती है।

संसद की गरिमा तभी बनी रहेगी, जब वहां व्यक्तिगत आरोपों, अपमानजनक शब्दों और व्यक्तिपूजा के स्थान पर नीति, विकास, संवैधानिक मूल्यों और जनहित पर गंभीर, तथ्यपरक और जिम्मेदार चर्चा होगी। यही लोकतंत्र की असली पहचान है और यही वह अपेक्षा है जो देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से करती है।

आलोक कुमार

India :विदेशी फंड पाने वाले NGOs पर सरकार की कड़ी निगरानी की तैयारी


विदेशी फंड पर सरकार की सबसे बड़ी सर्जिकल निगरानी! FCRA में प्रस्तावित नए बदलाव क्या NGOs की पारदर्शिता बढ़ाएंगे या उनकी स्वतंत्रता पर नए सवाल खड़े करेंगे? संसद में पेश होने वाला संशोधन विधेयक इसी बहस का केंद्र बनने जा रहा है।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में व्यापक संशोधन करने की तैयारी में है। प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। सरकार का दावा है कि इस विधेयक का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाना, जवाबदेही बढ़ाना और विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना है। वहीं, नागरिक समाज के कई संगठनों का मानना है कि नए प्रावधानों से स्वैच्छिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक कार्यों पर अतिरिक्त प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।

भारत में हजारों गैर-सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं। इनमें से अनेक संस्थाएं विदेशी दान या अनुदान के माध्यम से अपने कार्यक्रम संचालित करती हैं। ऐसे में FCRA कानून इन संस्थाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि विदेशी अंशदान प्राप्त करने और उसके उपयोग का पूरा ढांचा इसी कानून के तहत संचालित होता है।

केंद्रीय प्राधिकरण करेगा संपत्तियों का प्रबंधन

प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि केंद्र सरकार एक नामित केंद्रीय प्राधिकरण का गठन करेगी। यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, समाप्त हो जाता है या नवीनीकृत नहीं होता, तो विदेशी अंशदान से खरीदी गई उसकी संपत्तियों का प्रबंधन यही प्राधिकरण करेगा।

सिर्फ प्रबंधन ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर यह प्राधिकरण उन परिसंपत्तियों को बेचने का अधिकार भी रखेगा। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों का दुरुपयोग रोका जा सकेगा और उनका उपयोग सार्वजनिक हित के अनुरूप सुनिश्चित किया जाएगा।

विदेशी अनुदान के उपयोग की तय होगी समय-सीमा

विधेयक में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि विदेशी फंड के उपयोग के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाएगी। यदि कोई संस्था निर्धारित अवधि के भीतर प्राप्त राशि का उपयोग नहीं कर पाती है, तो सरकार उसके संबंध में आवश्यक कार्रवाई कर सकेगी।

सरकार का मानना है कि कई मामलों में विदेशी धन वर्षों तक बिना उपयोग के पड़ा रहता है, जिससे धन के वास्तविक उद्देश्य पर प्रश्न उठते हैं। नई व्यवस्था के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि प्राप्त राशि समय पर निर्धारित परियोजनाओं में खर्च हो।

नवीनीकरण के समय देनी होगी विस्तृत जानकारी

FCRA लाइसेंस के नवीनीकरण की प्रक्रिया को भी अधिक कठोर और विस्तृत बनाने का प्रस्ताव है। अब संस्थाओं को केवल वित्तीय विवरण ही नहीं, बल्कि विदेशी अनुदान से संचालित परियोजनाओं, खर्च की गई राशि, शेष निधि, खरीदी गई परिसंपत्तियों और उनके उपयोग का विस्तृत ब्यौरा भी देना होगा।

सरकार का कहना है कि इससे जवाबदेही बढ़ेगी और किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या दुरुपयोग की संभावना कम होगी। डिजिटल रिकॉर्ड और दस्तावेजों के माध्यम से निगरानी प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी बनाई जाएगी।

जांच प्रक्रिया में भी प्रस्तावित बदलाव

प्रस्तावित संशोधनों में जांच प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव भी शामिल हैं। किसी संस्था के विरुद्ध औपचारिक जांच शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारियों को केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी।

सरकार का कहना है कि इससे अनावश्यक और मनमानी जांच की संभावना कम होगी तथा जांच प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और जवाबदेह बनेगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जांच प्रक्रिया लंबी भी हो सकती है।

कुछ अपराधों में सजा होगी कम

विधेयक में कुछ अपराधों के लिए अधिकतम सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। सरकार का तर्क है कि सभी प्रकार के उल्लंघन गंभीर आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए दंड व्यवस्था को अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनाया जाना आवश्यक है।

इस बदलाव का उद्देश्य तकनीकी या प्रक्रियागत त्रुटियों और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना बताया जा रहा है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का कहना है कि विदेशी अंशदान का उपयोग पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। सरकार के अनुसार विदेशी धन का उपयोग केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए होना चाहिए जिनके लिए उसे प्राप्त किया गया है। यदि किसी स्तर पर धन के दुरुपयोग, गलत उपयोग या राष्ट्रीय हितों के विपरीत गतिविधियों की आशंका होती है, तो उसके लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।

सरकार का यह भी कहना है कि प्रस्तावित संशोधन ईमानदारी से कार्य करने वाले संगठनों के लिए किसी प्रकार की बाधा नहीं बनेंगे, बल्कि पारदर्शी संस्थाओं की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।

सामाजिक संगठनों की चिंता

दूसरी ओर कई सामाजिक संगठन, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नागरिक समाज से जुड़े समूह इन प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले से ही FCRA के नियम काफी सख्त हैं और नए प्रावधानों से प्रशासनिक नियंत्रण और बढ़ सकता है।

इन संगठनों का तर्क है कि यदि निगरानी और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल हो गई तो छोटे और मध्यम स्तर के NGOs के लिए अपने सामाजिक कार्यक्रमों को संचालित करना कठिन हो सकता है। विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी क्षेत्रों और ग्रामीण विकास में कार्यरत संस्थाओं पर इसका अधिक प्रभाव पड़ सकता है।

संसद में होगी व्यापक बहस

अब सभी की निगाहें संसद पर टिकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल, सामाजिक संगठन और नीति विशेषज्ञ इस बात पर अपने-अपने तर्क रखेंगे कि विदेशी अंशदान के नियमन और नागरिक समाज की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाए।

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो भारत में विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के संचालन, वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। आने वाले दिनों में संसद की बहस यह तय करेगी कि सरकार के प्रस्तावित संशोधन राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच किस प्रकार का संतुलन स्थापित कर पाते हैं।

आलोक कुमार

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

India : जब अजिंक्य रहाणे ने बल्ला टांगा, भारतीय क्रिकेट का एक स्वर्णिम अध्याय हुआ समाप्त

 

"कुछ खिलाड़ी रिकॉर्ड बनाते हैं, कुछ इतिहास लिखते हैं। अजिंक्य रहाणे ने अपने शांत स्वभाव, अडिग धैर्य और ऐतिहासिक जीतों से भारतीय क्रिकेट में ऐसी विरासत छोड़ी, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।"

भारतीय क्रिकेट में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी महानता केवल उनके बनाए रनों या शतकों से नहीं मापी जाती, बल्कि उस भरोसे से मापी जाती है जो पूरी टीम उनके कंधों पर रखती है। ऐसे ही खिलाड़ियों में एक नाम है Ajinkya Rahane का। शांत स्वभाव, संयमित व्यक्तित्व और कठिन परिस्थितियों में टीम के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज रहे रहाणे ने गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और खेल के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर भारतीय क्रिकेट के एक गौरवशाली अध्याय का समापन कर दिया।

38 वर्षीय रहाणे ने सोशल मीडिया पर अपने भावुक संदेश में लिखा कि "हर शुरुआत का एक अंत होता है और अब आगे बढ़ने का यही सही समय है।" यह संदेश केवल संन्यास की औपचारिक घोषणा नहीं था, बल्कि उस खिलाड़ी की भावनाओं का प्रतिबिंब था जिसने अपने पूरे करियर में हमेशा टीम को व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर रखा।

संघर्ष से बनी पहचान

मुंबई की गलियों से निकलकर भारतीय टीम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद रहाणे ने 2011 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया। शुरुआती वर्षों में उन्होंने सीमित ओवरों और टेस्ट क्रिकेट दोनों में अपनी जगह बनाई, लेकिन असली पहचान उन्हें टेस्ट क्रिकेट में मिली।

रहाणे उन बल्लेबाजों में रहे जिन्होंने विदेशी परिस्थितियों में भारतीय बल्लेबाजी को मजबूती दी। जब तेज गेंदबाजों की उछाल और स्विंग के सामने कई बड़े बल्लेबाज संघर्ष करते थे, तब रहाणे धैर्य और तकनीक के दम पर भारत की उम्मीद बनकर खड़े रहते थे।

विदेशी धरती पर चमका बल्ला

रहाणे का करियर विदेशी दौरों की शानदार पारियों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इंग्लैंड के ऐतिहासिक लॉर्ड्स, ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न और दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग जैसी कठिन पिचों पर उनके शतक भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम पलों में शामिल हैं।

उन्होंने भारत के लिए 85 टेस्ट मैचों में 5,077 रन बनाए, जिनमें 12 शतक और 26 अर्धशतक शामिल हैं। इसके अलावा 90 एकदिवसीय और 20 टी-20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जब कप्तान रहाणे ने रचा इतिहास

यदि रहाणे के करियर का सबसे सुनहरा अध्याय चुना जाए तो वह निस्संदेह 2020-21 का ऑस्ट्रेलिया दौरा होगा।

एडिलेड टेस्ट में भारत की 36 रन पर शर्मनाक हार और नियमित कप्तान की अनुपस्थिति के बाद शायद ही किसी ने सोचा था कि भारतीय टीम वापसी कर पाएगी। लेकिन रहाणे ने कप्तानी संभालते हुए न केवल टीम का आत्मविश्वास लौटाया, बल्कि मेलबर्न में शतक जड़कर जीत की नींव रखी।

इसके बाद युवा और चोटों से जूझ रही भारतीय टीम ने Border-Gavaskar Trophy में ऐतिहासिक वापसी करते हुए ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर 32 वर्षों से अजेय ऑस्ट्रेलिया को हराकर 2-1 से श्रृंखला जीत ली। यह जीत भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे महान उपलब्धियों में गिनी जाती है और रहाणे का नाम हमेशा उस ऐतिहासिक विजय के नायक के रूप में याद किया जाएगा।

"अजिंक्य" यानी अजेय

अपने विदाई संदेश में रहाणे ने अपने नाम का विशेष उल्लेख करते हुए लिखा कि "अजिंक्य" का अर्थ होता अजेय, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि करियर में उन्हें कई हार और असफलताओं का सामना करना पड़ा। उन्हीं चुनौतियों ने उन्हें बेहतर खिलाड़ी और बेहतर इंसान बनाया।

यही रहाणे की सबसे बड़ी खूबी रही। उन्होंने कभी विवादों से सुर्खियां नहीं बटोरीं। मैदान पर उनका व्यवहार हमेशा संतुलित रहा। जीत में विनम्रता और हार में धैर्य—यही उनका व्यक्तित्व था।

टीम पहले, खुद बाद में

रहाणे का पूरा करियर इस बात का उदाहरण रहा कि एक खिलाड़ी केवल व्यक्तिगत रिकॉर्ड बनाकर महान नहीं बनता, बल्कि टीम के लिए किए गए योगदान से सम्मान अर्जित करता है।

कई बार उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में बल्लेबाजी करते हुए मैच बचाए, कई बार जीत दिलाई और कई बार अपनी भूमिका बदलकर टीम की जरूरत पूरी की। उनकी स्लिप फील्डिंग भी लंबे समय तक भारतीय टीम की ताकत रही।

आईपीएल में भी छोड़ी अलग छाप

टेस्ट क्रिकेट के विशेषज्ञ माने जाने वाले रहाणे ने समय के साथ अपनी बल्लेबाजी को टी-20 के अनुरूप भी ढाला। हाल के वर्षों में उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग में शानदार वापसी करते हुए अपनी उपयोगिता साबित की। पिछले सीजन में वह Kolkata Knight Riders के कप्तान रहे और टीम का नेतृत्व किया। हालांकि अब उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि खिलाड़ी के रूप में उनकी यात्रा यहीं समाप्त होती है।

क्रिकेट परिवार का जताया आभार

अपने संन्यास संदेश में रहाणे ने Board of Control for Cricket in India, अपने कोचों, कप्तानों, साथियों, सपोर्ट स्टाफ, परिवार और करोड़ों प्रशंसकों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि क्रिकेट ने उन्हें केवल पहचान ही नहीं दी, बल्कि जीवन के अमूल्य सबक भी सिखाए।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि खिलाड़ी के रूप में उनकी भूमिका भले समाप्त हो रही हो, लेकिन क्रिकेट से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं होगा। भविष्य में वह युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करते हुए अपने अनुभव इस खेल को लौटाना चाहते हैं।

सम्मान की अमर विरासत

आज के दौर में जहां आक्रामकता और लोकप्रियता अक्सर चर्चा का केंद्र बन जाती है, वहां अजिंक्य रहाणे ने अपने शांत स्वभाव, अनुशासन और प्रदर्शन से यह साबित किया कि महान बनने के लिए शोर मचाना जरूरी नहीं होता।

उन्होंने सिखाया कि धैर्य भी जीत दिला सकता है, संयम भी नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत हो सकता है और सच्चा खिलाड़ी वही है जो कठिन समय में टीम का सबसे मजबूत सहारा बने।

अजिंक्य रहाणे का बल्ला अब मैदान पर नहीं गूंजेगा, लेकिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान, सादगी, साहस और नेतृत्व की मिसाल के रूप में दर्ज रहेगा। कुछ खिलाड़ी खेल छोड़ देते हैं, लेकिन उनकी विरासत कभी संन्यास नहीं लेती। यही विरासत अजिंक्य रहाणे की सबसे बड़ी जीत है।


आलोक कुमार

India : धार्मिक स्वतंत्रता पर गहराता संकट: क्या सेवा कार्य भी संदेह के घेरे में आ जाएंगे?


 "जब सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानवीय कार्य भी संदेह के घेरे में आने लगें, तब सवाल केवल किसी एक कानून का नहीं, बल्कि लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक भरोसे का बन जाता है।"

भारत की पहचान केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में नहीं, बल्कि विविधताओं को सम्मान देने वाले ऐसे राष्ट्र के रूप में भी रही है जहाँ अलग-अलग धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को न केवल अपनी आस्था रखने, बल्कि उसका पालन और प्रचार करने का भी अधिकार दिया है। यही कारण है कि जब भी किसी कानून या सरकारी नीति से इन मूल अधिकारों पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है, तो उसकी गंभीर समीक्षा आवश्यक हो जाती है।

हाल के वर्षों में देश ने यह भी देखा है कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। जब नागरिक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं, तो सरकारों को भी अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ता है। छात्रों के नेतृत्व में हुए आंदोलनों ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सबसे बड़ी शक्ति होती है। यह लोकतांत्रिक चेतना भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।

इसी बीच विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर अनेक चर्च संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रस्तावित प्रावधानों में प्रयुक्त कुछ शब्द इतने व्यापक और अस्पष्ट हैं कि उनका दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहती है।

सबसे बड़ी चिंता "धर्मांतरण-संबंधित गतिविधियों" की व्याख्या को लेकर है। यदि कानून यह स्पष्ट नहीं करता कि किन गतिविधियों को इस श्रेणी में रखा जाएगा, तो आशंका पैदा होती है कि सामाजिक सेवा और धार्मिक प्रचार के बीच की सीमाएँ प्रशासनिक स्तर पर अलग-अलग ढंग से व्याख्यायित की जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में अनाथालय, अस्पताल, विद्यालय, वृद्धाश्रम या राहत कार्य चलाने वाली संस्थाएँ भी अनिश्चितता के वातावरण में काम करने को मजबूर हो सकती हैं।

ईसाई समुदाय लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। देश के दूर-दराज़ इलाकों में अनेक मिशनरी संस्थाएँ ऐसे लोगों तक पहुँचती हैं जहाँ सरकारी सुविधाएँ सीमित हैं। यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस निलंबित होता है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता, तो केवल संस्था ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि उससे जुड़े हजारों गरीब परिवार, छात्र, मरीज और अनाथ बच्चे भी प्रभावित होते हैं।

यही कारण है कि इस विषय को केवल धार्मिक या राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह प्रश्न उन लाखों लोगों से भी जुड़ा है जो इन संस्थाओं की सेवाओं पर निर्भर हैं। यदि वित्तीय संसाधनों में बाधा आती है, तो उसका असर सबसे पहले समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है।

निश्चित रूप से यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी देश को विदेशी धन के दुरुपयोग, अवैध गतिविधियों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों पर निगरानी रखने का अधिकार है। यदि कहीं कानून का उल्लंघन होता है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई भी आवश्यक है। लेकिन कानून जितना कठोर हो, उतना ही स्पष्ट और पारदर्शी भी होना चाहिए। अस्पष्ट प्रावधान अक्सर ईमानदारी से कार्य करने वाले संगठनों के लिए भी अनिश्चितता और भय का कारण बन जाते हैं।

लोकतंत्र की मजबूती का अर्थ यही है कि सरकार और नागरिक समाज के बीच संवाद बना रहे। यदि किसी कानून को लेकर व्यापक स्तर पर चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं, तो सरकार के लिए यह अवसर है कि वह सभी हितधारकों—धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, विधि विशेषज्ञों और मानवाधिकार समूहों—से संवाद कर आवश्यक स्पष्टीकरण या संशोधन करे। इससे न केवल अनावश्यक विवाद कम होंगे, बल्कि कानून की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान एक ऐसे राष्ट्र की रही है जहाँ विभिन्न धार्मिक समुदायों ने शिक्षा, चिकित्सा और सेवा के क्षेत्र में मिलकर योगदान दिया है। इस छवि को बनाए रखना केवल सरकार या किसी एक समुदाय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; आवश्यकता केवल ऐसे संतुलन की है जिसमें दोनों मूल्यों की समान रूप से रक्षा हो सके।

आज आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण की है। यदि सेवा कार्य करने वाली संस्थाएँ पारदर्शी ढंग से काम कर रही हैं, तो उन्हें अनावश्यक आशंकाओं से मुक्त वातावरण मिलना चाहिए। वहीं यदि कहीं नियमों का उल्लंघन होता है, तो कार्रवाई स्पष्ट कानूनी आधार पर होनी चाहिए, न कि अस्पष्ट व्याख्याओं के आधार पर।

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है। यही संविधान धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और कानून के समक्ष समानता का भरोसा भी देता है। इसलिए किसी भी नए कानून या संशोधन की कसौटी यही होनी चाहिए कि वह इन संवैधानिक मूल्यों को और मजबूत करे, कमजोर नहीं।

आख़िरकार, किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं, कानूनों और सरकारों में नहीं, बल्कि उस भरोसे में होती है जो नागरिक अपने संविधान और न्याय व्यवस्था पर करते हैं। यदि यह भरोसा बना रहता है, तो भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा और मानवीय मूल्यों के साथ आगे बढ़ता रहेगा। यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।

आलोक कुमार

बुधवार, 29 जुलाई 2026

India : भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम अध्याय में दर्ज हो चुका

क्या आप जानते हैं? "शर्मा जी का बेटा" आज विश्व क्रिकेट का ऐसा नाम बन चुका है, जिसके नाम ऐसे रिकॉर्ड दर्ज हैं जिन्हें तोड़ने में शायद आने वाली पीढ़ियों को भी दशकों लग जाएँ। 2007 में एक साधारण युवा बल्लेबाज़ के रूप में शुरू हुआ सफर आज 19 वर्षों बाद भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम अध्याय में दर्ज हो चुका है।

कभी मुंबई की गलियों में क्रिकेट खेलने वाला एक युवा लड़का आज करोड़ों भारतीयों की उम्मीद, भरोसे और गर्व का दूसरा नाम बन चुका है। रोहित शर्मा—जिन्हें दुनिया "हिटमैन" और प्रशंसक प्यार से "शर्मा जी का बेटा" कहते हैं—सिर्फ एक बल्लेबाज़ नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की उस विरासत के प्रतीक हैं जिसने धैर्य, संघर्ष, प्रतिभा और नेतृत्व को एक साथ जीकर दिखाया है।

23 जून 2007 को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करने वाले रोहित शर्मा का शुरुआती सफर उतना आसान नहीं था। प्रतिभा भरपूर थी, लेकिन निरंतरता की कमी के कारण कई बार उनकी जगह पर सवाल उठे। आलोचकों ने कहा कि उनमें क्षमता तो है, लेकिन वह उसे बड़े मंच पर साबित नहीं कर पा रहे। शायद यही वह दौर था जिसने रोहित को भीतर से और मजबूत बनाया।

साल 2013 भारतीय क्रिकेट और रोहित शर्मा दोनों के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। महेंद्र सिंह धोनी ने उन्हें वनडे में ओपनिंग की जिम्मेदारी दी। यही फैसला भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल प्रयोगों में शामिल हो गया। मिडिल ऑर्डर का बल्लेबाज़ अचानक दुनिया का सबसे खतरनाक ओपनर बन गया। इसके बाद रिकॉर्ड बनना जैसे उनकी आदत बन गई।

वनडे क्रिकेट में तीन दोहरे शतक लगाने का कारनामा आज भी केवल रोहित शर्मा के नाम दर्ज है। 209, 264 और 208*—ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आधुनिक क्रिकेट की सबसे अद्भुत बल्लेबाज़ी की मिसाल हैं। विशेषकर 2014 में श्रीलंका के खिलाफ बनाया गया 264 रन का विश्व रिकॉर्ड आज भी वनडे इतिहास का सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर है। इतने वर्षों बाद भी यह रिकॉर्ड अटूट खड़ा है और यही बताता है कि रोहित की बल्लेबाज़ी कितनी असाधारण रही है।

यदि विश्व कप की बात की जाए तो 2019 का वनडे विश्व कप रोहित शर्मा के नाम रहा। पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने पाँच शतक लगाए और विश्व रिकॉर्ड कायम कर दिया। हर बार जब भारत मुश्किल में दिखा, रोहित ने बल्ले से जवाब दिया। बड़े टूर्नामेंटों में बड़े खिलाड़ी की पहचान क्या होती है, यह उन्होंने दुनिया को दिखा दिया।

लेकिन रोहित शर्मा की महानता केवल बल्लेबाज़ी तक सीमित नहीं है। उनकी कप्तानी ने भी भारतीय क्रिकेट को नई ऊँचाइयाँ दीं। वर्ष 2024 भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे वर्षों में गिना जाएगा। बारबाडोस के केंसिंग्टन ओवल में दक्षिण अफ्रीका को हराकर भारत ने टी-20 विश्व कप जीता और 11 वर्षों से चले आ रहे आईसीसी ट्रॉफी के सूखे का अंत हुआ। इस जीत के नायक केवल खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि कप्तान रोहित शर्मा भी थे, जिन्होंने पूरे टूर्नामेंट में निडर नेतृत्व का परिचय दिया।

यह भी रोहित की उपलब्धि है कि वह उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं जिन्होंने 2007 में पहले टी-20 विश्व कप को खिलाड़ी के रूप में जीता और 2024 में उसी ट्रॉफी को कप्तान बनकर देश को दिलाया। यह उपलब्धि उन्हें भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल नेताओं की श्रेणी में स्थापित करती है।

विश्व कप जीतने के तुरंत बाद रोहित शर्मा ने टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेकर यह संदेश दिया कि महान खिलाड़ी अपनी विदाई का समय भी स्वयं तय करते हैं। उन्होंने शिखर पर रहते हुए अलविदा कहा। यही महान खिलाड़ियों की पहचान होती है।

यदि आईपीएल की बात करें तो रोहित शर्मा का नाम सबसे सफल कप्तानों में गिना जाता है। मुंबई इंडियंस को उन्होंने पाँच बार चैंपियन बनाया। 2013, 2015, 2017, 2019 और 2020 की ट्रॉफियाँ केवल मुंबई इंडियंस की सफलता नहीं थीं, बल्कि रोहित शर्मा के रणनीतिक नेतृत्व की मिसाल थीं। उन्होंने यह साबित किया कि शांत स्वभाव वाला कप्तान भी बड़े-बड़े मुकाबले जीत सकता है।

रोहित शर्मा का एक और बड़ा परिचय है—छक्कों का बादशाह। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे अधिक छक्के लगाने वाले बल्लेबाज़ के रूप में उन्होंने क्रिस गेल जैसे विस्फोटक बल्लेबाज़ का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया। उनका पुल शॉट, फ्रंट फुट पर खेला गया शानदार छक्का और बड़े मैचों में आक्रामक बल्लेबाज़ी आज भी क्रिकेट प्रेमियों के लिए रोमांच का विषय है।

टेस्ट क्रिकेट में भी उन्होंने खुद को पुनः स्थापित किया। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि रोहित केवल सीमित ओवरों के बल्लेबाज़ हैं, लेकिन टेस्ट में ओपनर बनने के बाद उन्होंने इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ शानदार पारियाँ खेलकर आलोचकों को शांत कर दिया। तीनों प्रारूपों में शतक लगाने वाले चुनिंदा भारतीय बल्लेबाज़ों में शामिल होना उनकी तकनीकी क्षमता का प्रमाण है।

एशिया कप में भी रोहित शर्मा का योगदान अविस्मरणीय है। उनकी कप्तानी में भारत ने 2018 और 2023 में खिताब जीता। वहीं 2013 की चैंपियंस ट्रॉफी में बतौर ओपनर उनकी भूमिका भारतीय क्रिकेट के नए युग की शुरुआत बनी।

रोहित शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी आक्रामकता और संयम के बीच संतुलन नहीं खोया। मैदान पर उनका बल्ला जितना आक्रामक दिखता है, कप्तानी उतनी ही शांत और संतुलित रहती है। यही कारण है कि साथी खिलाड़ी उन पर भरोसा करते हैं और विरोधी टीम उनकी रणनीति का सम्मान करती है।

आज जब युवा खिलाड़ी तेजी से सफलता चाहते हैं, रोहित शर्मा का 19 वर्षों का सफर उन्हें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—प्रतिभा महत्वपूर्ण है, लेकिन धैर्य उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि 2011 या 2012 में रोहित हार मान लेते, तो शायद दुनिया को "हिटमैन" कभी नहीं मिलता।

आज "शर्मा जी का बेटा" केवल एक लोकप्रिय संबोधन नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की उस प्रेरणादायक कहानी का नाम है जिसने संघर्ष को सफलता में बदला, आलोचना को उपलब्धि में बदला और सपनों को इतिहास में बदल दिया।

19 वर्षों का यह सफर केवल रिकॉर्डों की सूची नहीं है; यह उस खिलाड़ी की कहानी है जिसने भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दी। आने वाली पीढ़ियाँ जब भारतीय क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज़ों और कप्तानों की चर्चा करेंगी, तो रोहित शर्मा का नाम केवल एक खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि एक युग के रूप में लिया जाएगा।

आलोक कुमार

India : दीवारें नहीं, पुल बनाइए: एशिया के लिए FABC का ऐतिहासिक संदेश


जब दुनिया दीवारें ऊंची कर रही है, तब एशिया के कैथोलिक बिशपों का संदेश है—अगर भविष्य सुरक्षित करना है, तो पुल बनाइए, क्योंकि संवाद ही शांति का सबसे मजबूत रास्ता है।

"तुम इससे भी बड़े कार्य देखोगे।" (यूहन्ना 1:50) यही बाइबिल वचन एशिया के कैथोलिक बिशपों के महासंघ (FABC) की 12वीं महासभा का केंद्रीय संदेश बना। 20 से 26 जुलाई 2026 तक इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित इस महासभा ने केवल कलीसिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे एशिया के समाज के लिए एक ऐसी दिशा प्रस्तुत की है, जिसकी प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक है।

आज का एशिया अभूतपूर्व चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युद्ध और हिंसा, धार्मिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट, तेज़ तकनीकी बदलाव, पलायन और लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण समाज को भीतर से प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में FABC ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कलीसिया का मिशन केवल अपने अनुयायियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे "पुल बनाने वाली कलीसिया" बनना होगा।

यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया आज दीवारें खड़ी करने की राजनीति से जूझ रही है। जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति और विचारधारा के नाम पर समाज लगातार बंट रहा है। ऐसे माहौल में FABC का यह कहना कि विश्वास का उद्देश्य दीवारें नहीं, बल्कि पुल बनाना है, केवल धार्मिक उपदेश नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता है।

महासभा ने विशेष रूप से "सिनोडल कलीसिया" की अवधारणा पर बल दिया। इसका अर्थ है—साथ चलना, एक-दूसरे को सुनना, संवाद करना और साझा जिम्मेदारी निभाना। यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया है। यदि समाज और संस्थाएं भी इसी भावना को अपनाएं, तो अनेक संघर्षों का समाधान संवाद के माध्यम से निकल सकता है।

दस्तावेज़ का एक साहसिक पक्ष यह भी है कि उसने कलीसिया के भीतर मौजूद क्लेरिकलिज़्म जैसी चुनौती को स्वीकार किया। यह आत्ममंथन बताता है कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। जब कोई संस्था अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार का संकल्प लेती है, तभी उसका संदेश विश्वसनीय बनता है।

जकार्ता की "टनल ऑफ फ्रेंडशिप", जो कैथोलिक कैथेड्रल और इस्तिकलाल मस्जिद को जोड़ती है, इस महासभा का जीवंत प्रतीक बनी। यह केवल एक सुरंग नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रतीक है कि विभिन्न धर्म और संस्कृतियां संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग और सम्मान के साथ आगे बढ़ सकती हैं। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश के लिए यह संदेश विशेष रूप से प्रेरणादायक है।

महासभा ने गरीबों, वंचितों, युवाओं और पर्यावरण को अपनी प्राथमिकता में रखा है। यह स्वीकार किया गया कि विकास तभी सार्थक होगा जब उसमें मानव गरिमा, सामाजिक न्याय और प्रकृति के संरक्षण का संतुलन बना रहे। आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी मानवता के सामने संकट बनकर खड़ा है, तब "हमारे साझा घर" की रक्षा का यह आह्वान समय की मांग है।

पोप लियो XIV के संदेश का उल्लेख करते हुए महासभा ने स्थानीय कलीसियाओं के बीच अधिक सहभागिता और एकता पर बल दिया। यह केवल धार्मिक नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि हर संस्था के लिए सीख है कि सामूहिक नेतृत्व और सहभागिता ही भविष्य का मार्ग है।

FABC का अंतिम संदेश केवल एशिया के कैथोलिक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए आशा का संदेश है जो शांति, न्याय और मानवीय गरिमा में विश्वास रखते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि विभाजन की राजनीति चाहे जितनी प्रबल हो जाए, अंततः समाज को आगे बढ़ाने का काम संवाद, विश्वास और प्रेम ही करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने-अपने परिवार, समाज, संस्थाओं और राष्ट्र में दीवारें खड़ी करने के बजाय पुल बनाने की संस्कृति विकसित करें। यदि हम दूसरों को सुनना, स्वीकार करना और उनके साथ मिलकर चलना सीख जाएं, तो वास्तव में हम वे "बड़े कार्य" देख सकेंगे जिनका उल्लेख प्रभु यीशु ने किया था।

FABC की 12वीं महासभा का संदेश केवल एक धार्मिक घोषणा नहीं, बल्कि वर्तमान समय के लिए शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवीय एकता का घोषणापत्र है। यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता और सबसे बड़ी शक्ति है।

आलोक कुमार

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

India : क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती


33 साल का इंतजार, हजारों घंटे की मेहनत और आखिरकार टीम इंडिया की टेस्ट कैप—सारांश जैन ने साबित कर दिया कि क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

हर खिलाड़ी 19 या 21 साल की उम्र में टीम इंडिया नहीं पहुंचता। कुछ सपनों को 33 साल तक पसीने, संघर्ष और इंतजार की आग में तपना पड़ता है। सारांश जैन की कहानी यही बताती है कि क्रिकेट में सफलता का कोई तय कैलेंडर नहीं होता। प्रतिभा, धैर्य और निरंतर प्रदर्शन यदि साथ हों, तो मंजिल देर से सही, लेकिन मिलती जरूर है।

भारतीय क्रिकेट में पिछले कुछ वर्षों से कम उम्र के खिलाड़ियों की सफलता सबसे बड़ी चर्चा का विषय रही है। 18-19 साल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखते हैं और उन्हें भविष्य का सुपरस्टार घोषित कर दिया जाता है। यह बदलते दौर की वास्तविकता भी है, क्योंकि आधुनिक क्रिकेट में फिटनेस, आक्रामकता और तेजी से प्रदर्शन करने की अपेक्षा बढ़ गई है। लेकिन इसी माहौल में जब 33 वर्षीय मध्य प्रदेश के ऑलराउंडर सारांश जैन को पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिलती है, तो यह केवल एक खिलाड़ी के चयन की खबर नहीं रहती, बल्कि भारतीय क्रिकेट की सोच और व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करने वाली घटना बन जाती है।

सारांश जैन का चयन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय क्रिकेट में घरेलू प्रदर्शन का मूल्य अब भी कायम है। लंबे समय तक रणजी ट्रॉफी और अन्य घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार शानदार प्रदर्शन करने वाले इस खिलाड़ी ने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। 54 प्रथम श्रेणी मैचों में 188 विकेट और 2,223 रन किसी भी ऑलराउंडर के लिए उत्कृष्ट रिकॉर्ड माना जाएगा। दो शतक और 14 अर्धशतक यह साबित करते हैं कि वे केवल गेंद से ही नहीं, बल्कि बल्ले से भी टीम के लिए संकटमोचक साबित हो सकते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता केवल आंकड़े नहीं, बल्कि निरंतरता रही है। भारतीय घरेलू क्रिकेट में ऐसे कई खिलाड़ी मिल जाएंगे जिन्होंने एक या दो सीजन शानदार खेले, लेकिन लगातार कई वर्षों तक प्रदर्शन बनाए रखना हर किसी के बस की बात नहीं होती। सारांश ने यही किया। हर सीजन खुद को बेहतर बनाया और चयनकर्ताओं के सामने अपनी दावेदारी मजबूत करते रहे।

हाल के श्रीलंका दौरे पर इंडिया-ए टीम के लिए उनका प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ। नाबाद 70 रन और छह विकेट लेकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बड़े मंच पर भी वे दबाव को अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं। वहीं 2025-26 रणजी सीजन में 518 रन और 30 विकेट लेकर उन्होंने यह संदेश दिया कि उनका चयन किसी सहानुभूति का परिणाम नहीं, बल्कि प्रदर्शन का पुरस्कार है।

सारांश जैन की कहानी केवल क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक परिवार का संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास भी जुड़ा हुआ है। उनके पिता सुबोध जैन स्वयं रणजी क्रिकेटर रहे, लेकिन जब सारांश अपने करियर की नींव रख रहे थे, तब पिता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने बेटे का मनोबल टूटने नहीं दिया। दूसरी ओर, उनके बड़े भाई ने अपने क्रिकेट करियर को पीछे छोड़कर सारांश के सपनों को प्राथमिकता दी। किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, इसका यह जीवंत उदाहरण है।

आज के समय में खेलों में त्वरित सफलता की मानसिकता विकसित हो चुकी है। यदि कोई खिलाड़ी दो-तीन वर्षों में राष्ट्रीय टीम तक नहीं पहुंचता, तो उसे लगभग भुला दिया जाता है। सोशल मीडिया और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में सारांश जैन का चयन युवा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक संदेश है कि देर से मिलने वाली सफलता भी उतनी ही मूल्यवान होती है जितनी जल्दी मिलने वाली।


भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू ढांचा रहा है। रणजी ट्रॉफी, दलीप ट्रॉफी, ईरानी कप और इंडिया-ए जैसी प्रतियोगिताएं वर्षों से ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करती रही हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। यदि इन प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को अवसर नहीं मिलेगा, तो घरेलू क्रिकेट का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगेगा। सारांश जैन का चयन इस व्यवस्था में खिलाड़ियों का विश्वास और मजबूत करता है।

यह चयन चयनकर्ताओं की सोच में संतुलन का भी संकेत देता है। भारतीय क्रिकेट में युवा खिलाड़ियों को अवसर देना आवश्यक है, लेकिन अनुभव की उपेक्षा करना भी उचित नहीं। टेस्ट क्रिकेट विशेष रूप से ऐसा प्रारूप है जिसमें तकनीक, धैर्य और मानसिक मजबूती की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। ऐसे में लंबे घरेलू अनुभव वाले खिलाड़ी टीम को संतुलन प्रदान कर सकते हैं।

हालांकि चयन के बाद असली चुनौती अब शुरू होती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट घरेलू क्रिकेट से कहीं अधिक कठिन है। यहां हर गेंद की परीक्षा होती है, हर गलती की कीमत चुकानी पड़ती है और हर प्रदर्शन पूरे देश की निगाहों में होता है। लेकिन जिस खिलाड़ी ने 33 वर्षों तक अपने सपने को जिंदा रखा हो और लगातार मेहनत की हो, उसके लिए दबाव कोई नई बात नहीं होगी। उनका अनुभव और परिपक्वता भारतीय टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

सारांश जैन की कहानी भारतीय युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश छोड़ती है। आज की पीढ़ी अक्सर सफलता में थोड़ी देरी होते ही निराश हो जाती है। लेकिन जीवन और खेल दोनों में हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। किसी को मंजिल जल्दी मिलती है, किसी को देर से; महत्वपूर्ण यह है कि प्रयास कभी बंद न हों। मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास अंततः अपना परिणाम देते हैं।

यह कहानी यह भी याद दिलाती है कि प्रतिभा की पहचान केवल उम्र से नहीं होनी चाहिए। कई बार अनुभव वह परिपक्वता देता है जो युवा जोश से भी अधिक प्रभावी साबित होती है। क्रिकेट जैसे लंबे प्रारूप वाले खेल में यही अनुभव कई बार मैच का परिणाम बदल देता है।

अंततः, 33 वर्ष की उम्र में मिला पहला टेस्ट कॉल केवल सारांश जैन की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह भारतीय घरेलू क्रिकेट की विश्वसनीयता, परिवार के त्याग, वर्षों की मेहनत और अटूट धैर्य की जीत है। जब भी कोई युवा खिलाड़ी अपने सपनों को अधूरा समझकर निराश होगा, उसे सारांश जैन की यह कहानी जरूर याद रखनी चाहिए। क्योंकि सपनों की कोई उम्र नहीं होती—उन्हें पूरा करने का साहस, निरंतर मेहनत और सही समय पर मिलने वाला अवसर ही उनकी असली पहचान बनता है।

आलोक कुमार