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शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bengal : एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।

 Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद मां Sweta Ancel का सवाल- ‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’


पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 28 मई से 28 अगस्त तक तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अपने बेटे Aadvik Hilarian को खो चुकी मां Sweta Ancel के लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है। बेटे की मौत के तीन महीने पूरे होने पर Sweta Ancel ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा और नाराजगी व्यक्त करते हुए न्याय की मांग दोहराई है।

उनका कहना है कि घटना के बाद समय गुजरता गया, लेकिन उनके परिवार के लिए जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। एक मां ने अपना बच्चा खो दिया, एक परिवार की दुनिया उजड़ गई और अब भी उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर उनके बेटे की मौत की जिम्मेदारी कब तय होगी और उन्हें न्याय कब मिलेगा?

Sweta Ancel की सार्वजनिक अपील ने एक बार फिर इस मामले को बच्चों की सुरक्षा, स्कूल प्रशासन की जवाबदेही और जांच की गति जैसे महत्वपूर्ण सवालों के केंद्र में ला दिया है।

तीन महीने बाद भी मां के सवाल कायम

किसी माता-पिता के लिए बच्चे को खोने का दर्द शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। Sweta Ancel के लिए भी तीन महीने बीत जाना किसी राहत का संकेत नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे घटना के बाद धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया, जबकि उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है।

उनकी पीड़ा का सबसे बड़ा हिस्सा यही है कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता, लेकिन वह चाहती हैं कि उसकी मौत के पीछे यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

स्कूल प्रबंधन पर कथित लापरवाही के आरोप

Aadvik Hilarian की मां ने स्कूल प्रबंधन और घटना के समय स्विमिंग पूल में मौजूद बताए गए शिक्षकों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल Ravi Victor तथा Vikash Gaitano, Alfred Simon और Natal नामक शिक्षकों की भूमिका की जांच और कार्रवाई की मांग की है।

मां का आरोप है कि यदि बच्चे की निगरानी और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सावधानी बरती जाती तो शायद हादसे को रोका जा सकता था।

हालांकि, इन आरोपों को फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी तभी तय हो सकती है जब सक्षम जांच एजेंसी तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच करे।

इस मामले में स्कूल प्रबंधन और संबंधित शिक्षकों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पूरी तस्वीर एकतरफा न रहे।

स्विमिंग पूल में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत और उसके परिवार के दुख तक सीमित नहीं है। यदि किसी स्कूल परिसर में स्विमिंग पूल संचालित किया जाता है तो वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था होना बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषकर बच्चों के मामले में कुछ मिनट भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए ऐसे हादसे के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि घटना कैसे हुई। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि उस समय सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या था, बच्चों की निगरानी कौन कर रहा था, आपात स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और बचाव के लिए उपलब्ध संसाधन पर्याप्त थे या नहीं।

‘सब कुछ फिर सामान्य कैसे हो गया?’

Sweta Ancel की सार्वजनिक पीड़ा में एक सवाल बार-बार सामने आता है—जिस परिवार ने अपना बच्चा खो दिया, उसके लिए सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन बाकी दुनिया फिर सामान्य कैसे हो गई?

उनके अनुसार स्कूल की गतिविधियां सामान्य रूप से चल रही हैं। यही स्थिति उनके दर्द को और गहरा करती है।

एक मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस जगह से उसका बच्चा वापस नहीं लौटा, वहां कुछ समय बाद रोजमर्रा की गतिविधियां फिर शुरू हो जाएं।

हालांकि किसी संस्था की गतिविधियों का जारी रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जांच या कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

पुलिस और प्रशासन से जवाब की उम्मीद

Sweta Ancel ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि तीन महीने बीतने के बाद भी उन्हें वह न्याय नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रही हैं।

उनका मूल सवाल सीधा है—

एक बच्चे की मौत की जिम्मेदारी आखिर कब तय होगी?

ऐसे मामलों में परिवार को केवल जांच की सूचना ही नहीं, बल्कि जांच की प्रगति और कानूनी प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना भी जरूरी है।

निष्पक्ष जांच का अर्थ यह भी है कि सभी पक्षों के बयान लिए जाएं, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच हो और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्य स्थापित किए जाएं।

एक मां की लड़ाई अब बच्चों की सुरक्षा का सवाल

Sweta Ancel ने संकेत दिया है कि वह अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई जारी रखेंगी। उनका संघर्ष अब केवल व्यक्तिगत न्याय की मांग नहीं रह गया है। इससे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्यापक सवाल भी उठते हैं।

क्या स्कूलों में स्विमिंग पूल के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित निगरानीकर्मी होते हैं?

क्या बच्चों की संख्या के अनुपात में निगरानी की व्यवस्था रहती है?

क्या आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध होती है?

क्या कर्मचारियों को बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सुरक्षा नियम केवल कागज पर हैं या वास्तव में उनका पालन भी होता है?

इन सवालों का जवाब केवल इसी मामले के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संस्थानों के लिए जरूरी है जहां बच्चों को खेल, तैराकी या अन्य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है।

न्याय के साथ व्यवस्था में सुधार भी जरूरी

किसी बच्चे की मौत के बाद परिवार के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण मांग होती है। लेकिन ऐसी घटनाओं से व्यवस्था को भी सीख लेनी चाहिए।

यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।

स्कूलों में नियमित सुरक्षा ऑडिट, प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और बच्चों की गतिविधियों की उचित निगरानी जैसे कदम हादसों का जोखिम कम कर सकते हैं।

‘Justice for Aadvik’ की मांग

तीन महीने बाद भी Sweta Ancel की सबसे बड़ी मांग वही है—Justice for Aadvik

एक मां अपने बेटे को वापस नहीं ला सकती। लेकिन वह यह जरूर चाहती है कि उसके बच्चे की मौत को भुला न दिया जाए और यदि किसी की लापरवाही या चूक सामने आती है तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

इस मामले में सबसे जरूरी है कि भावनाओं और आरोपों से अलग निष्पक्ष जांच तथा तथ्यात्मक निष्कर्ष सामने आएं।

आखिर किसी परिवार को न्याय तभी मिलेगा जब यह स्पष्ट हो कि घटना में वास्तव में क्या हुआ, उस समय सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, किसकी क्या जिम्मेदारी थी और जांच में कौन-से तथ्य सामने आए।

निष्कर्ष

Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद उनकी मां का सवाल आज भी वही है—‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’

यह सवाल एक मां के व्यक्तिगत दर्द से निकला है, लेकिन इसके भीतर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा मुद्दा भी छिपा है।

जांच निष्पक्ष हो, सभी पक्षों को सुना जाए, तथ्य सामने आएं और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी साबित होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो—यही इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा है।

एक बच्चे की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। लेकिन उसकी मौत से व्यवस्था यह सुनिश्चित जरूर कर सकती है कि भविष्य में किसी दूसरे माता-पिता को ऐसा सवाल न पूछना पड़े—

“मेरे बच्चे के साथ ऐसा क्यों हुआ और न्याय कब मिलेगा?”

Justice for Aadvik — एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।


आलोक कुमार

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार

Bihar : पंचायतों में विकास का पैसा: गांव तक पहुंचते-पहुंचते क्या बदल जाता है?

 पंचायतों में विकास का पैसा: गांव तक पहुंचते-पहुंचते क्या बदल जाता है?


पटना। भारत में लोकतंत्र की असली तस्वीर केवल संसद और विधानसभा में नहीं दिखाई देती। इसकी सबसे महत्वपूर्ण झलक गांव की चौपाल, पंचायत भवन, ग्रामीण सड़क, नाली, स्कूल और पेयजल व्यवस्था में मिलती है। पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि गांव की समस्याओं की पहचान स्थानीय स्तर पर हो, योजनाएं ग्रामीण जरूरतों के अनुसार बनें और विकास का पैसा वास्तविक जरूरतों पर खर्च हो।

लेकिन वर्षों से एक सवाल ग्रामीण समाज में बना हुआ है—सरकार से पंचायत तक पहुंचने वाला विकास का पैसा गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते-पहुंचते कितना प्रभावी रह जाता है?

यह सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं है। इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही, योजना की गुणवत्ता, प्रशासनिक निगरानी और स्थानीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता भी जुड़ी हुई है।

पैसा आता है, फिर भी विकास अधूरा क्यों?

गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता, सामुदायिक भवन, जल संरक्षण और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग योजनाओं के तहत धन उपलब्ध कराया जाता है। कागज पर किसी योजना की स्वीकृति हो सकती है, निर्माण पूरा दिखाया जा सकता है और भुगतान भी जारी हो सकता है।

लेकिन जमीन पर तस्वीर हमेशा वैसी नहीं होती।

कहीं नई बनी सड़क कुछ महीनों में टूट जाती है, कहीं नाली बनने के बाद भी जलजमाव खत्म नहीं होता और कहीं पेयजल योजना होने के बावजूद ग्रामीणों को पुराने जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यहीं से फाइल और जमीन के बीच का अंतर सामने आता है।

विकास राशि की पूरी प्रक्रिया समझना जरूरी

पंचायत का पैसा सामान्यतः एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरता है। योजना का चयन, स्वीकृति, तकनीकी प्रक्रिया, कार्यादेश, निर्माण, मापी, बिल और भुगतान जैसे कई चरण होते हैं। इस दौरान पंचायत प्रतिनिधियों के साथ अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी और कार्य एजेंसियां भी भूमिका निभाती हैं।

यदि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे तो अनियमितता की गुंजाइश कम हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब ग्रामीणों को यह पता ही नहीं होता कि उनके गांव में किस योजना के लिए कितना पैसा स्वीकृत हुआ है।

एक सामान्य ग्रामीण के लिए यह जानना कठिन हो सकता है कि योजना की लागत कितनी है, काम कब पूरा होना है, किसके माध्यम से कराया जा रहा है और भुगतान की स्थिति क्या है।

जब जनता को जानकारी नहीं मिलेगी तो वह निगरानी कैसे करेगी?

सूचना बोर्ड केवल औपचारिकता न बने

किसी विकास कार्य के स्थल पर योजना की जानकारी देने वाला बोर्ड ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। उसमें योजना का नाम, लागत, काम की अवधि और संबंधित जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।

यदि सड़क निर्माण की लागत लाखों रुपये है तो ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि सड़क कितनी लंबी है और निर्माण का निर्धारित मानक क्या है।

सूचना जितनी सरल और स्पष्ट होगी, जनता की निगरानी उतनी ही मजबूत होगी।

यही कारण है कि पंचायत स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण और जन निगरानी को केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में देखना चाहिए।

खराब गुणवत्ता भी सार्वजनिक नुकसान है

भ्रष्टाचार की चर्चा अक्सर पैसे की हेराफेरी तक सीमित हो जाती है, जबकि घटिया निर्माण भी जनता के लिए बड़ा नुकसान है।

मान लीजिए किसी सड़क का निर्माण पूरा हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में पूरी राशि खर्च हो गई। लेकिन कुछ ही समय बाद सड़क टूटने लगी। ऐसी स्थिति में केवल सड़क की मरम्मत का सवाल नहीं है। दोबारा मरम्मत के लिए फिर सार्वजनिक धन खर्च होगा।

इसलिए किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उस पर पैसा खर्च हुआ या नहीं।

असल सवाल होना चाहिए—उस पैसे से बना काम कितने समय तक ग्रामीणों के लिए उपयोगी रहा?

पंचायत प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी

पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका केवल योजना पारित कराने या उद्घाटन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें ग्रामसभा को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

गांव में यदि पीने के पानी की समस्या गंभीर है तो विकास की प्राथमिकता उसी दिशा में होनी चाहिए। यदि स्कूल तक जाने वाली सड़क खराब है तो पहले उसका समाधान जरूरी हो सकता है।

स्थानीय लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि विकास की प्राथमिकताएं गांव की वास्तविक जरूरतों से तय हों।

ग्रामसभा को मजबूत करना होगा

ग्रामसभा पंचायत व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन यदि ग्रामसभा केवल बैठक, हस्ताक्षर और उपस्थिति तक सीमित रह जाए तो उसका उद्देश्य कमजोर हो जाता है।

ग्रामीणों को योजनाओं के बारे में सवाल पूछने का अधिकार महसूस करना चाहिए।

मसलन—

  • योजना की कुल लागत कितनी है?

  • काम कब शुरू हुआ?

  • पूरा होने की समय-सीमा क्या है?

  • काम किस एजेंसी या व्यक्ति के माध्यम से हो रहा है?

  • गुणवत्ता की जांच किसने की?

  • कितना भुगतान किया गया?

  • काम पूरा होने के बाद उसकी देखरेख कौन करेगा?

ऐसे सवाल पंचायत को कमजोर नहीं करते। बल्कि वे स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

डिजिटल पारदर्शिता का बेहतर इस्तेमाल

आज पंचायतों से जुड़ी योजनाओं और सरकारी खर्च की जानकारी को डिजिटल माध्यमों से अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। योजना की स्वीकृति, लागत, प्रगति, भुगतान और पूर्णता जैसी जानकारी सार्वजनिक होने से ग्रामीणों को निगरानी का अवसर मिलेगा।

हालांकि केवल वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल जानकारी ऐसी भाषा और स्वरूप में होनी चाहिए जिसे सामान्य ग्रामीण भी आसानी से समझ सके।

हर पंचायत भवन में एक 'विकास सूचना पट' बनाया जा सकता है, जहां चल रही और पूरी हो चुकी प्रमुख योजनाओं का विवरण सरल भाषा में प्रदर्शित हो।

भुगतान के साथ गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी तय हो

किसी विकास कार्य का भुगतान हो जाना अपने आप में उसकी सफलता का प्रमाण नहीं होना चाहिए। यदि काम घटिया है तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई।

सिर्फ निर्माण करने वाली एजेंसी या व्यक्ति पर जिम्मेदारी डाल देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित प्रक्रिया में गुणवत्ता की पुष्टि किसने की और भुगतान की अनुमति किस आधार पर दी गई।

जिम्मेदारी जितनी स्पष्ट होगी, व्यवस्था उतनी जवाबदेह होगी।

हर पंचायत को भ्रष्ट मानना भी सही नहीं

पंचायतों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर गंभीरता से जांच होनी चाहिए, लेकिन हर पंचायत प्रतिनिधि या कर्मचारी को भ्रष्ट मान लेना भी उचित नहीं है।

देश के गांवों में ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि और कर्मचारी हैं जो सीमित संसाधनों में ईमानदारी से काम करते हैं। अच्छे काम को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है जितना गलत काम पर कार्रवाई करना।

इससे ईमानदार प्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ेगा और अनियमितता करने वालों पर सामाजिक तथा प्रशासनिक दबाव बनेगा।

ग्रामीण केवल लाभार्थी नहीं, निगरानीकर्ता भी हैं

ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी ताकत स्वयं ग्रामीण जनता हो सकती है। जिस गांव में लोग योजनाओं की जानकारी रखते हैं, ग्रामसभा में भाग लेते हैं और काम की गुणवत्ता पर सवाल पूछते हैं, वहां व्यवस्था अधिक जवाबदेह बन सकती है।

जनता की भूमिका केवल पंचायत चुनाव के समय वोट देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पूरे कार्यकाल में प्रतिनिधियों और प्रशासन के साथ संवाद जरूरी है।

निष्कर्ष

पंचायतों में विकास का पैसा गांव तक पहुंचते-पहुंचते तभी कमजोर पड़ता है जब पारदर्शिता कम हो, जनता की निगरानी कमजोर हो और जिम्मेदारी स्पष्ट न हो। इसके उलट ग्रामसभा सक्रिय हो, योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक हो, गुणवत्ता की जांच मजबूत हो और अनियमितता पर समय रहते कार्रवाई हो तो सरकारी धन का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंच सकता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पंचायत को कितना पैसा मिला।

असली सवाल यह होना चाहिए कि उस पैसे से गांव को कितना स्थायी और उपयोगी विकास मिला।

सरकारी पैसा किसी नेता, अधिकारी या पंचायत का निजी संसाधन नहीं है। यह जनता के संसाधनों से आता है। इसलिए जनता का अपने विकास के पैसे का हिसाब मांगना किसी व्यवस्था के खिलाफ जाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करना है।

गांव की सड़क मजबूत हो, नाली काम करे, पानी मिले, स्कूल बेहतर हों और सार्वजनिक सुविधाएं लंबे समय तक टिकें—यही विकास राशि की वास्तविक सफलता है।




आलोक कुमार

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

India : EPS-95 Pension: ₹1,000 पेंशन बढ़ाने में सरकार की मजबूरी


EPS-95 Pension: ₹1,000 पेंशन बढ़ाने में सरकार की मजबूरी, फिर ₹22 हजार करोड़ के दावे पर ₹6.25 करोड़ का सेटलमेंट क्यों?

पटना। देश में आर्थिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल सामने है। एक तरफ EPS-95 Pension के तहत मिलने वाली न्यूनतम मासिक पेंशन को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 करने की मांग लंबे समय से उठ रही है। दूसरी तरफ Zee Group के संस्थापक और Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency प्रक्रिया में करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के मुकाबले ₹6.25 करोड़ के भुगतान वाली योजना को NCLT ने मंजूरी दी है।

दोनों मामले कानूनी और आर्थिक रूप से अलग हैं। फिर भी इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर एक बड़ा सार्वजनिक सवाल जरूर उठता है—आर्थिक व्यवस्था में आम नागरिक और बड़े वित्तीय दायित्वों से जुड़े मामलों के लिए राहत और समाधान का पैमाना क्या है?

EPS-95 Pensioners की मांग आखिर क्या है?

Employees' Pension Scheme यानी EPS-95 के तहत न्यूनतम पेंशन वर्तमान में ₹1,000 प्रति माह है। पेंशनर्स लंबे समय से इसे बढ़ाकर कम से कम ₹7,500 प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं। अगस्त 2026 में लोकसभा में भी इस मुद्दे पर सवाल उठा था, लेकिन सरकार ने न्यूनतम पेंशन बढ़ाकर ₹7,500 करने की घोषणा नहीं की। सरकार ने पेंशन फंड की स्थिरता और भविष्य की देनदारियों से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया है।

31 मार्च 2026 तक करीब 85.84 लाख पेंशनर EPS के तहत मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे। ऐसे में न्यूनतम पेंशन का सवाल केवल कुछ लोगों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

पेंशनर्स का तर्क है कि महंगाई, दवाइयों, बिजली, किराये और रोजमर्रा की जरूरतों के मौजूदा दौर में ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन पर्याप्त नहीं है। उनका सवाल है कि दशकों तक काम करने के बाद बुढ़ापे में मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा इतनी कम क्यों होनी चाहिए?

सुभाष चंद्रा मामले में कितना बड़ा अंतर?

अब सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत insolvency मामले पर नजर डालिए। NCLT के सामने उनके खिलाफ करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims थे। स्वीकृत repayment plan में creditors के लिए ₹6.25 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित है, जबकि करीब ₹25 लाख insolvency प्रक्रिया की लागत के लिए रखे गए हैं। इस हिसाब से creditors को admitted claims का लगभग 0.03 प्रतिशत ही मिलने वाला है और haircut करीब 99.97 प्रतिशत बैठता है।

लेकिन यहां एक बेहद जरूरी बात समझना आवश्यक है।

इसे सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं होगा कि “₹22 हजार करोड़ का सरकारी कर्ज माफ कर दिया गया।” मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency और उन व्यक्तिगत गारंटियों से जुड़ा है, जो Essel Group से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के संबंध में दी गई थीं। मूल कर्जदार कंपनियों और उनकी संपत्तियों से जुड़े दावे अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय हो सकते हैं।

यानी ₹22,006.57 करोड़ की पूरी राशि को सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिया गया कर्ज मानना भी सही नहीं होगा।

फिर सवाल इतना बड़ा क्यों है?

सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि ₹22,006 करोड़ और ₹6.25 करोड़ के बीच का अंतर असाधारण रूप से बड़ा है।

NCLT के सामने रखी गई योजना को creditors के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला। रिपोर्टों के अनुसार वोटिंग में करीब 80.81 प्रतिशत voting share ने योजना का समर्थन किया, जबकि HDFC Bank और LIC Housing Finance सहित कुछ संस्थानों ने इसका विरोध किया।

यही कारण है कि मामला केवल सोशल मीडिया की बहस तक सीमित नहीं रहा। कुछ वित्तीय संस्थान इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में हैं। HDFC Bank appeal के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि LIC Housing Finance ने भी NCLAT जाने की बात कही है।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अगर कानूनी व्यवस्था किसी insolvency मामले में इतना बड़ा haircut स्वीकार कर सकती है, तो आम नागरिक की आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

आम आदमी की EMI और बड़े कर्ज का फर्क

देश का मध्यमवर्गीय परिवार बैंक से लिया गया छोटा-सा कर्ज भी समय पर चुकाने की कोशिश करता है। EMI में देरी होने पर ब्याज, penalty, recovery calls और credit history पर असर जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

छोटे कारोबारी के लिए बैंक का कर्ज और भी बड़ा जोखिम बन सकता है। कई बार कारोबार में नुकसान होने पर परिवार की बचत और संपत्ति तक खतरे में पड़ जाती है।

ऐसे माहौल में जब आम नागरिक हजारों या लाखों रुपये के कर्ज की किस्तों को लेकर चिंतित रहता है, तब हजारों करोड़ रुपये के admitted claims के मुकाबले कुछ करोड़ रुपये की repayment योजना स्वाभाविक रूप से बहस पैदा करती है।

लेकिन यहां भी तुलना करते समय कानूनी अंतर समझना जरूरी है। Insolvency resolution का उद्देश्य हर स्थिति में पूरी रकम वसूल करना नहीं होता। इसका उद्देश्य उपलब्ध कानूनी ढांचे के भीतर creditors और debtor के बीच समाधान निकालना भी होता है। NCLT का काम भी केवल यह देखना नहीं है कि रकम कितनी बड़ी है, बल्कि यह देखना होता है कि योजना कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।

EPS-95 Pension पर सरकार से स्पष्ट जवाब क्यों जरूरी?

यहीं से EPS-95 Pensioners का सवाल फिर महत्वपूर्ण हो जाता है।

पेंशनर्स की मांग ₹7,500 न्यूनतम पेंशन की है। सरकार ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी है। ऐसे में सरकार को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि फंड की स्थिरता और भविष्य की देनदारियां चुनौती हैं।

जरूरत इस बात की है कि सरकार स्पष्ट आंकड़ों के साथ बताए कि ₹7,500 न्यूनतम पेंशन लागू करने में कितने अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी, वर्तमान EPS फंड की स्थिति क्या है और सरकार किस विकल्प पर विचार कर रही है।

क्योंकि ₹1,000 की पेंशन पाने वाला बुजुर्ग व्यक्ति भी महंगाई का सामना उसी बाजार में करता है, जिसमें बाकी लोग करते हैं।

आर्थिक न्याय का मतलब क्या है?

सुभाष चंद्रा का मामला और EPS-95 Pension एक ही कानूनी श्रेणी के विषय नहीं हैं। इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।

लेकिन लोकतंत्र में नीतिगत सवाल पूछना पूरी तरह उचित है।

एक तरफ insolvency कानून बड़े वित्तीय विवादों को समाधान के रास्ते पर ले जाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ लाखों पेंशनर्स अपनी न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

ऐसे में सरकार और नीति-निर्माताओं से पूछा जाना चाहिए कि देश के बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक न्यूनतम पेंशन सुनिश्चित करने की वास्तविक वित्तीय बाधा क्या है?

साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि insolvency व्यवस्था में creditors के हितों की पर्याप्त सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए, खासकर तब जब admitted claims और वास्तविक recovery के बीच इतना बड़ा अंतर दिखाई दे।

सवाल पेंशन का भी है और व्यवस्था पर भरोसे का भी

EPS-95 Pensioners की मांग केवल ₹7,500 की रकम तक सीमित नहीं है। यह उस भरोसे से जुड़ी है कि नौकरी के वर्षों के बाद बुजुर्गावस्था में उन्हें न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।

वहीं सुभाष चंद्रा का मामला यह सवाल सामने लाता है कि insolvency कानून के तहत creditors के हित और debtor के समाधान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

₹22,006.57 करोड़ और ₹6.25 करोड़ का अंतर निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन इसे सीधे “सरकारी कर्जमाफी” कहना सही नहीं होगा। यह व्यक्तिगत insolvency resolution से जुड़ा मामला है और इसके खिलाफ कुछ creditors कानूनी चुनौती की तैयारी में हैं।

फिर भी इस पूरे घटनाक्रम से एक सवाल जरूर निकलता है—

जब आर्थिक व्यवस्था बड़े वित्तीय विवादों के लिए कानूनी समाधान तलाश सकती है, तो EPS-95 के लाखों पेंशनर्स को ₹1,000 से सम्मानजनक न्यूनतम पेंशन तक पहुंचाने का रास्ता कब निकलेगा?

यही सवाल आज उन बुजुर्गों का है, जिन्होंने अपने कामकाजी जीवन में योगदान दिया और अब अपने बुढ़ापे के लिए सरकार से सिर्फ इतनी उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी पेंशन उनके जीवन की बुनियादी जरूरतों के सामने पूरी तरह बेबस न हो।

आर्थिक न्याय का असली अर्थ केवल बड़े वित्तीय मामलों का समाधान नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्ग को सम्मानजनक सुरक्षा देना भी है।

आलोक कुुमार

Bihar : बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?

 बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?


भारत, खासकर बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरी आज भी युवाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लाखों युवा वर्षों लगा देते हैं। सुबह से रात तक किताबों के बीच समय बिताना, कोचिंग करना, परीक्षा की तारीख का इंतजार करना और फिर परिणाम के लिए महीनों बेचैनी में रहना—यह आज बड़ी संख्या में युवाओं की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

सरकारी नौकरी की चाहत गलत नहीं है। सवाल यह है कि क्या बेरोजगार युवाओं के भविष्य का एकमात्र रास्ता सरकारी नौकरी ही हो सकता है?

सरकारी नौकरी की अपनी अहमियत है। नियमित आय, नौकरी की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और कई तरह की सुविधाएं इसे आकर्षक बनाती हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का माध्यम बन सकती है। यही कारण है कि बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बड़ी बनी हुई है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब एक पूरी युवा पीढ़ी अपने भविष्य को सीमित संख्या में सरकारी पदों से जोड़ देती है।

कुछ हजार पद, लाखों दावेदार

हर साल विभिन्न सरकारी विभागों में रिक्तियां निकलती हैं और लाखों युवा उनके लिए आवेदन करते हैं। एक पद के लिए सैकड़ों या हजारों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है। परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगाने के बावजूद चयन की गारंटी किसी के पास नहीं होती।

इसका सबसे बड़ा असर युवाओं के समय पर पड़ता है। 22 से 25 वर्ष की उम्र ऐसी होती है, जब किसी युवा के पास ऊर्जा, सीखने की क्षमता, रचनात्मकता और जोखिम उठाने का साहस होता है। यदि यही पूरा समय केवल एक या दो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निकल जाए और सफलता न मिले तो युवा के सामने अचानक रोजगार और भविष्य का बड़ा सवाल खड़ा हो सकता है।

यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब बड़ी संख्या में युवा अपनी क्षमता का उपयोग रोजगार या उत्पादन में करने के बजाय वर्षों तक परीक्षा की तैयारी में लगाए रखते हैं, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

बिहार में सामाजिक दबाव भी बड़ी वजह

बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर सामाजिक मानसिकता काफी मजबूत है। कई परिवारों में बेटे या बेटी के लिए सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी नौकरी को माना जाता है। परिवार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वर्षों तक कोचिंग, किराया, किताब और रहने-खाने का खर्च उठाते हैं।

पटना समेत कई शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या इसी उम्मीद के साथ रहती है कि एक दिन सरकारी नौकरी मिलेगी और परिवार की स्थिति बदल जाएगी।

लेकिन वास्तविकता यह है कि हर उम्मीदवार का चयन संभव नहीं है।

ऐसे में जरूरत सरकारी नौकरी की इच्छा खत्म करने की नहीं, बल्कि करियर के विकल्पों का विस्तार करने की है।

रोजगार का मतलब केवल सरकारी नौकरी नहीं

आज रोजगार के अनेक क्षेत्र मौजूद हैं। निजी कंपनियां, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण, कृषि आधारित उद्योग और डिजिटल सेवाएं युवाओं के लिए अवसर पैदा कर रहे हैं।

डिजिटल अर्थव्यवस्था ने तो रोजगार के कई ऐसे रास्ते खोले हैं, जो कुछ वर्ष पहले युवाओं के लिए बहुत सीमित थे। ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, वेब डेवलपमेंट, सोशल मीडिया प्रबंधन, ऑनलाइन शिक्षा और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में कौशल रखने वाला युवा नौकरी के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से काम भी कर सकता है।

हालांकि इसके लिए डिग्री से आगे बढ़कर कौशल की जरूरत है।

डिग्री के साथ कौशल जरूरी

आज सिर्फ स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं देती। कंपनियां और संस्थान ऐसे युवाओं की तलाश करते हैं, जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान और काम करने की क्षमता हो।

इसलिए कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को रोजगार की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। विद्यार्थियों को इंटर्नशिप, कंप्यूटर ज्ञान, संचार कौशल, डिजिटल दक्षता, वित्तीय समझ और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना और डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवा को रोजगार खोजने के साथ-साथ अवसर पैदा करने की क्षमता भी दे।

स्वरोजगार को छोटा समझना बंद करना होगा

सरकारी नौकरी के प्रति सम्मान होना ठीक है, लेकिन छोटे कारोबार या स्वरोजगार को कमतर समझना उचित नहीं है।

मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, मछली पालन, मुर्गी पालन, कृषि आधारित व्यवसाय, कपड़ा कारोबार, परिवहन, सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सेवाएं जैसे काम रोजगार के मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

कई छोटे व्यवसाय समय के साथ बड़े उद्यम में बदलते हैं। फर्क केवल इतना है कि नौकरी में युवा किसी संस्था के लिए काम करता है, जबकि उद्यमिता में वह स्वयं रोजगार पैदा करने की क्षमता विकसित करता है।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी

युवाओं से केवल यह कहना कि सरकारी नौकरी के पीछे मत भागिए और व्यवसाय कीजिए, पर्याप्त नहीं है।

यदि सरकार युवाओं को उद्यमिता की ओर बढ़ाना चाहती है तो उसे आसान ऋण, प्रशिक्षण, बाजार, तकनीकी सहायता और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। बिजली, सड़क, इंटरनेट और सरल प्रशासनिक प्रक्रियाएं छोटे व्यवसायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल कौशल और बाजार के बीच तालमेल का है। यदि किसी युवा को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए जिसकी बाजार में मांग ही नहीं है, तो प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी बेरोजगारी बनी रहेगी।

इसलिए प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। युवाओं को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में किन क्षेत्रों में रोजगार की मांग बढ़ सकती है।

सरकारी नौकरी की जरूरत फिर भी बनी रहेगी

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी नौकरी की आवश्यकता समाप्त हो गई है। सरकारी क्षेत्र में पर्याप्त और समयबद्ध भर्ती जरूरी है। वर्षों तक रिक्त पद पड़े रहना, परीक्षा में देरी होना या परिणाम के लिए लंबा इंतजार युवाओं की उम्र और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करता है।

सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध परीक्षा और परिणाम तथा रिक्तियों की नियमित जानकारी युवाओं को अनिश्चितता से बचा सकती है।

लेकिन सरकारी भर्ती को मजबूत करने के साथ-साथ रोजगार के निजी और स्वरोजगार वाले क्षेत्रों को भी मजबूत करना होगा।

सफलता की परिभाषा बदलनी होगी

समाज की सोच बदलना भी जरूरी है। सरकारी अधिकारी बनना निश्चित रूप से सफलता का एक रास्ता है, लेकिन सफल शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, तकनीशियन, कारोबारी, कलाकार या उद्यमी बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक युवा यदि दस लोगों को रोजगार देता है तो उसका योगदान किसी नौकरी पाने वाले व्यक्ति से कम नहीं है। इसी तरह एक कुशल तकनीशियन, अच्छा शिक्षक या आधुनिक तरीके से खेती करने वाला किसान भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

युवाओं को एक ही दरवाजे पर क्यों खड़ा करें?

असल समस्या सरकारी नौकरी की चाहत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया जाता है।

बिहार के युवाओं में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। जरूरत है कि उनकी मेहनत को एक ही परीक्षा के कमरे तक सीमित न रखा जाए। उन्हें रोजगार, कौशल, उद्यमिता और नई अर्थव्यवस्था के अवसरों से जोड़ना होगा।

सरकारी नौकरी एक सम्मानजनक और जरूरी विकल्प है, लेकिन भविष्य का दरवाजा केवल सरकारी दफ्तर से नहीं खुलता।

युवाओं को एक नौकरी का इंतजार करने वाला नहीं, बल्कि अनेक अवसरों को पहचानने और जरूरत पड़ने पर अवसर पैदा करने वाला बनाना होगा। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है और यही बेरोजगारी की चुनौती से बाहर निकलने का अधिक व्यापक रास्ता हो सकता है।


आलोक कुुमार

Bihar : बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर असली सवाल

 बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर असली सवाल: बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन कितना सीख रहे हैं?


बिहार में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार की ओर से लगातार योजनाएं चलाई जा रही हैं। स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत से लेकर शिक्षकों की नियुक्ति, किताबें, पोशाक, छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन और डिजिटल सुविधाओं तक पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन इन तमाम प्रयासों के बीच एक बुनियादी सवाल आज भी अपनी जगह खड़ा है—क्या बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों को वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने स्कूलों की इमारतें बनीं, कितने बच्चों को किताबें मिलीं या कितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई। असली सवाल यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद बच्चा कितना सीख रहा है, क्या समझ रहा है और उस ज्ञान का इस्तेमाल अपने जीवन में कितना कर पा रहा है।

किसी भी सरकारी स्कूल की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण उसकी कक्षा के भीतर दिखाई देना चाहिए। यदि प्राथमिक कक्षा का बच्चा सामान्य पाठ पढ़ने में कठिनाई महसूस करता है, साधारण जोड़-घटाव या गुणा-भाग में उलझ जाता है, अपनी बात लिखकर व्यक्त नहीं कर पाता या पढ़ी हुई चीज को समझाने में परेशानी महसूस करता है, तो केवल स्कूल की बेहतर इमारत को शिक्षा की सफलता नहीं माना जा सकता।

सरकारी स्कूल गरीब परिवारों की सबसे बड़ी उम्मीद

बिहार के सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है, जिनके परिवार निजी स्कूलों की महंगी फीस, परिवहन और अन्य खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं हैं। उनके लिए सरकारी स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

एक गरीब परिवार अपने बच्चे को सरकारी स्कूल भेजकर यह उम्मीद करता है कि शिक्षा उसके बच्चे को भविष्य में बेहतर रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर देगी। इसलिए सरकारी विद्यालयों की शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होना केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं है। इसका सीधा संबंध गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से भी है।

शिक्षक हैं जरूरी, लेकिन सिर्फ संख्या काफी नहीं

शिक्षा की चर्चा होते ही अक्सर शिक्षकों की संख्या और उनकी उपस्थिति का सवाल सामने आता है। यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन शिक्षक की मौजूदगी और अच्छी शिक्षा—दोनों एक ही बात नहीं हैं।

शिक्षक नियमित रूप से स्कूल में मौजूद हों, कक्षाएं भी चलें, लेकिन यदि बच्चों की अलग-अलग सीखने की क्षमता के अनुसार पढ़ाने की व्यवस्था नहीं है तो अपेक्षित परिणाम हासिल करना मुश्किल होगा। एक ही कक्षा में अलग स्तर के बच्चे होते हैं। किसी बच्चे को पाठ जल्दी समझ में आता है तो किसी को बार-बार अभ्यास की आवश्यकता होती है।

इसलिए शिक्षण व्यवस्था में केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि हर बच्चा वास्तव में कितना समझ पाया।

गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी चुनौती

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर समय-समय पर विभिन्न गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी आती हैं। चुनाव संबंधी कार्य, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्य और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां शिक्षक के समय और ऊर्जा को प्रभावित कर सकती हैं।

शिक्षक का मुख्य दायित्व बच्चों को पढ़ाना और उनकी सीखने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। प्रशासनिक जरूरतें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें शिक्षक का अधिकतम समय कक्षा में बच्चों के साथ बीते।

हालांकि शिक्षकों को हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है। बेहतर शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण, शिक्षण सामग्री और सकारात्मक कार्य वातावरण भी जरूरी है।

डिजिटल शिक्षा से आगे बढ़कर समझ की शिक्षा

आज शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है। केवल किताब पढ़कर और प्रश्नों के उत्तर याद करके बच्चे भविष्य की चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। उन्हें सवाल पूछने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की क्षमता भी चाहिए।

डिजिटल उपकरण और स्मार्ट क्लास उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन तकनीक अपने आप शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ाती। महत्वपूर्ण यह है कि तकनीक का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। गतिविधि आधारित शिक्षण, प्रयोग, स्थानीय उदाहरण और बच्चों की भागीदारी वाली कक्षाएं सीखने को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

इसके लिए शिक्षकों को केवल औपचारिक प्रशिक्षण नहीं, बल्कि नियमित और व्यावहारिक प्रशिक्षण की जरूरत है।

स्कूल से बच्चे क्यों दूर होते हैं?

बच्चों की सीखने की क्षमता पर उनकी नियमित उपस्थिति का भी सीधा असर पड़ता है। गरीब परिवारों में कई बच्चे घरेलू काम, मजदूरी, खेती या दूसरी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंच पाते।

लड़कियों के सामने भी परिवार और समाज से जुड़ी अलग चुनौतियां हो सकती हैं। ऐसे मामलों में केवल अनुपस्थित बच्चों की सूची तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। स्कूल और स्थानीय प्रशासन को यह समझना होगा कि बच्चा स्कूल से क्यों दूर है और उसे वापस शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए क्या किया जा सकता है।

भोजन जरूरी है, लेकिन शिक्षा उससे भी जरूरी

मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं ने बच्चों को स्कूल से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना पहला कदम है। उन्हें स्कूल में बनाए रखना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना उससे बड़ा काम है।

यदि अभिभावकों को भरोसा हो कि सरकारी स्कूल में उनका बच्चा अच्छी तरह पढ़ रहा है, तो सरकारी विद्यालयों के प्रति समाज का विश्वास स्वतः मजबूत होगा। इसके लिए स्कूलों को केवल कल्याणकारी योजनाओं का केंद्र नहीं, बल्कि वास्तविक सीखने का केंद्र बनाना होगा।

अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी जरूरी

स्कूल प्रबंधन समितियां और अभिभावक केवल बैठकों और कागजी कार्यवाही तक सीमित न रहें। उन्हें बच्चों की पढ़ाई, स्कूल में शिक्षण व्यवस्था, शिक्षक की उपलब्धता और सीखने के स्तर पर भी सवाल पूछने का अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

स्थानीय समुदाय की निगरानी शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ा सकती है। अभिभावक यह जान सकें कि उनका बच्चा कक्षा के स्तर के अनुरूप पढ़ और समझ पा रहा है या नहीं।

मूल्यांकन का तरीका बदलना होगा

सरकारी स्कूलों का मूल्यांकन केवल भवन, शौचालय, बिजली, किताब, पोशाक या नामांकन के आंकड़ों से नहीं होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण संकेतक बच्चों की सीखने की क्षमता होनी चाहिए।

कक्षा तीन का बच्चा सामान्य पाठ कितनी सहजता से पढ़ सकता है? कक्षा पांच का विद्यार्थी बुनियादी गणित को कितना समझता है? माध्यमिक स्तर का विद्यार्थी किसी विषय पर अपनी बात कितनी स्पष्टता से लिख और बोल सकता है?

इन सवालों के जवाब ही शिक्षा की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।

जहां बच्चे अपेक्षित स्तर से पीछे हैं, वहां केवल निरीक्षण और कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगी। ऐसे विद्यालयों को शैक्षणिक सहयोग देना होगा। कमजोर बच्चों के लिए अतिरिक्त अभ्यास, भाषा और गणित की बुनियादी शिक्षा तथा व्यक्तिगत सीखने की योजना तैयार करनी होगी।

सवाल बच्चों की क्षमता पर नहीं, व्यवस्था की क्षमता पर होना चाहिए

बिहार का सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा किसी निजी स्कूल के बच्चे से कम प्रतिभाशाली नहीं है। अंतर अक्सर अवसर, संसाधन, मार्गदर्शन और वातावरण का होता है।

इसलिए बिहार की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं। असली सवाल यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद वे कितना सीख रहे हैं।

सरकार यदि बिहार को वास्तव में शैक्षणिक रूप से मजबूत बनाना चाहती है तो उसे स्कूलों की संख्या और भवनों से आगे बढ़कर कक्षा के भीतर की पढ़ाई पर ध्यान देना होगा। शिक्षा पर खर्च बढ़ाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उस खर्च का असर बच्चों की सीखने की क्षमता में दिखाई दे।

सरकारी स्कूल तब सफल माने जाएंगे, जब वहां से निकलने वाला बच्चा केवल प्रमाणपत्र लेकर नहीं, बल्कि ज्ञान, आत्मविश्वास, तर्कशक्ति और अपने भविष्य को बदलने की क्षमता लेकर निकले।

यही बिहार की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा है—और इस परीक्षा का परिणाम किसी सरकारी रिपोर्ट से ज्यादा बच्चे की आंखों, उसकी किताब और उसके जवाब में दिखाई देगा।

आलोक कुुमार

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

Bihar : बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता?

 


बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता? जानिए योजनाओं की जानकारी, दस्तावेज, लाभार्थी चयन, भ्रष्टाचार, डीबीटी, प्रशासनिक निगरानी और पंचायत स्तर की चुनौतियों की पूरी तस्वीर।

बिहार। गरीबों और वंचित परिवारों के जीवन में सुधार लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, बिजली, सड़क, पेयजल और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए हर वर्ष बड़ी राशि खर्च की जाती है। सरकारी आंकड़ों में इन योजनाओं की उपलब्धियां भी दर्ज होती हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है। कहीं पात्र व्यक्ति योजना की जानकारी से वंचित है तो कहीं आवेदन प्रक्रिया में फंस जाता है। कहीं दस्तावेज समस्या बन जाते हैं तो कहीं भुगतान में देरी परेशानी बढ़ाती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार गरीबों के लिए योजनाएं चला रही है या नहीं। सवाल यह है कि सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में इतनी बाधाएं क्यों आती हैं?

जानकारी की कमी सबसे पहली दीवार

किसी भी योजना का लाभ लेने के लिए सबसे पहले उसके बारे में जानकारी होना जरूरी है। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिन्हें यह पता नहीं होता कि वे किस सरकारी योजना के पात्र हैं, आवेदन कहां करना है और कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी हैं।

डिजिटल व्यवस्था के विस्तार के बावजूद इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा हर परिवार तक समान रूप से नहीं पहुंची है। बुजुर्ग, अशिक्षित, दिव्यांग और बेहद गरीब लोगों के लिए ऑनलाइन आवेदन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इसलिए केवल वेबसाइट या मोबाइल एप पर योजना की जानकारी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। पंचायत स्तर पर लोगों को सरल भाषा में जानकारी देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

दस्तावेजों की समस्या से अटकता है लाभ

गरीब परिवारों के लिए दस्तावेजों की प्रक्रिया भी बड़ी चुनौती है। आधार कार्ड, बैंक खाता, राशन कार्ड, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र या अन्य जरूरी दस्तावेजों में किसी तरह की गलती होने पर आवेदन रुक सकता है।

नाम की स्पेलिंग में अंतर, उम्र में गलती या पते में बदलाव जैसी छोटी समस्या कई बार महीनों तक लाभार्थी को परेशान करती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए बार-बार प्रखंड या जिला कार्यालय जाना आसान नहीं होता।

एक मजदूर के लिए सरकारी दफ्तर जाने का अर्थ कई बार एक दिन की मजदूरी गंवाना भी होता है। इसलिए सरकारी प्रक्रिया जितनी सरल होगी, वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच उतनी ही बेहतर होगी।

बिचौलियों की भूमिका क्यों बढ़ती है?

हर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को भ्रष्ट मानना सही नहीं है। लेकिन जहां व्यवस्था जटिल होती है और लाभार्थी को प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती, वहां बिचौलियों की भूमिका बढ़ने की संभावना रहती है।

गरीब व्यक्ति यदि यह नहीं जानता कि आवेदन की वास्तविक फीस क्या है, कौन-सा दस्तावेज जरूरी है और आवेदन की स्थिति कैसे देखी जा सकती है, तो वह दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्रत्येक आवेदन का स्टेटस मोबाइल संदेश, ऑनलाइन पोर्टल या पंचायत स्तर पर उपलब्ध सूचना के माध्यम से बताया जाना चाहिए। इससे लाभार्थी किसी अनावश्यक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा।

लाभार्थियों की सूची में सुधार जरूरी

कई सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों का चयन सूची के आधार पर होता है। अगर सूची पुरानी है या उसमें वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही प्रतिबिंब नहीं है तो जरूरतमंद परिवार योजना से बाहर हो सकते हैं।

गरीबी स्थायी स्थिति नहीं है। किसी परिवार की आय घट सकती है, रोजगार जा सकता है या परिवार में कोई नई जिम्मेदारी आ सकती है। इसलिए पात्रता सूची की समय-समय पर समीक्षा जरूरी है।

पंचायत स्तर पर सूची सार्वजनिक करने और लोगों को आपत्ति दर्ज कराने का अवसर देने से पारदर्शिता बढ़ सकती है। इससे यह भी पता चल सकता है कि वास्तविक जरूरतमंद परिवारों के नाम सूची में हैं या नहीं।

पटना से गांव तक योजना पहुंचाने की चुनौती

राज्य मुख्यालय से योजना की घोषणा करना आसान हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव दूरदराज के गांव तक पहुंचाना प्रशासन के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।

बिहार के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में अधिकारियों और कर्मचारियों पर काम का दबाव, रिक्त पद, भौगोलिक दूरी और विभागों के बीच समन्वय की कमी जैसी समस्याएं योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती हैं।

यही कारण है कि योजना की सफलता का आकलन केवल स्वीकृत राशि या जारी आदेशों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि वास्तविक लाभार्थी तक कितनी जल्दी और कितनी पूरी सहायता पहुंची।

डीबीटी के बावजूद भुगतान की समस्या

सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी के माध्यम से सहायता सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और बिचौलियों की भूमिका कम करने में मदद मिली है।

लेकिन बैंक खाते से जुड़ी तकनीकी समस्या, आधार लिंकिंग, बैंक की दूरी, भुगतान संबंधी त्रुटि या सर्वर की समस्या जैसी परिस्थितियां गरीब परिवार के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं।

पेंशन या छात्रवृत्ति पर निर्भर व्यक्ति के लिए भुगतान में देरी केवल तकनीकी समस्या नहीं है। यह उसके भोजन, इलाज, पढ़ाई या रोजमर्रा के खर्च को प्रभावित कर सकती है।

खर्च नहीं, परिणाम होना चाहिए पैमाना

किसी योजना पर कितना पैसा खर्च हुआ, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि उस खर्च से लोगों की जिंदगी में क्या बदलाव आया।

अगर आवास योजना का घर अधूरा है, नल तो लगा है लेकिन पानी नहीं आता, शौचालय बना है लेकिन इस्तेमाल योग्य नहीं है या छात्रवृत्ति स्वीकृत होने के बाद भी समय पर नहीं मिली, तो केवल कागज पर लक्ष्य पूरा होना पर्याप्त नहीं है।

सरकारी योजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना नागरिक के जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव होना चाहिए।

पंचायतों को बनाना होगा जवाबदेह

गांव के लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके पंचायत क्षेत्र में किस योजना के तहत कितना पैसा आया, कितने लोगों को लाभ मिला और कितना काम पूरा हुआ।

ग्राम सभा को केवल औपचारिक बैठक तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक निगरानी का प्रभावी मंच बनाया जा सकता है। सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को मजबूत करके स्थानीय स्तर पर जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है।

अगर किसी योजना में गड़बड़ी की शिकायत सामने आती है तो उसकी जांच और समाधान की स्पष्ट समयसीमा भी होनी चाहिए।

डिजिटल व्यवस्था के साथ मानवीय सहायता जरूरी

सरकार का डिजिटल होना अच्छी बात है, लेकिन हर गरीब नागरिक डिजिटल विशेषज्ञ नहीं हो सकता। इसलिए ऑनलाइन व्यवस्था के साथ ऑफलाइन सहायता केंद्र भी मजबूत होने चाहिए।

पंचायत भवन, जनसेवा केंद्र, आंगनबाड़ी केंद्र और अन्य स्थानीय संस्थानों के माध्यम से योजनाओं की जानकारी दी जा सकती है। प्रशिक्षित कर्मचारी पात्र लोगों को आवेदन, दस्तावेज और शिकायत प्रक्रिया समझा सकते हैं।

तकनीक का उद्देश्य गरीब को सुविधा देना होना चाहिए, उसे व्यवस्था से और दूर करना नहीं।

गरीब को एहसान नहीं, अधिकार चाहिए

सरकारी योजना का लाभ पाने वाला गरीब व्यक्ति किसी से व्यक्तिगत एहसान नहीं मांग रहा है। वह उस सहायता का हकदार है जिसके लिए सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है।

इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिसमें पात्र व्यक्ति को योजना की जानकारी मिले, आवेदन सरल हो, दस्तावेज की समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर हो और भुगतान समय पर मिले।

बिहार में सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि योजनाओं का लाभ कागज पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे।

बिहार की प्रगति का असली पैमाना बड़े-बड़े आंकड़े नहीं, बल्कि गांव के गरीब परिवार की बदली हुई जिंदगी होनी चाहिए। जब मजदूर को समय पर रोजगार, बुजुर्ग को नियमित पेंशन, बच्चे को छात्रवृत्ति, परिवार को आवास और जरूरतमंद को स्वास्थ्य सुविधा मिलेगी, तभी सरकारी योजनाओं की सफलता मानी जाएगी।

सरकारी योजना की असली मंजिल फाइल नहीं, गरीब का घर है। जब व्यवस्था इस सोच के साथ काम करेगी, तभी बिहार में विकास का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेगा।

आलोक कुमार