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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

India : क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती


33 साल का इंतजार, हजारों घंटे की मेहनत और आखिरकार टीम इंडिया की टेस्ट कैप—सारांश जैन ने साबित कर दिया कि क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

हर खिलाड़ी 19 या 21 साल की उम्र में टीम इंडिया नहीं पहुंचता। कुछ सपनों को 33 साल तक पसीने, संघर्ष और इंतजार की आग में तपना पड़ता है। सारांश जैन की कहानी यही बताती है कि क्रिकेट में सफलता का कोई तय कैलेंडर नहीं होता। प्रतिभा, धैर्य और निरंतर प्रदर्शन यदि साथ हों, तो मंजिल देर से सही, लेकिन मिलती जरूर है।

भारतीय क्रिकेट में पिछले कुछ वर्षों से कम उम्र के खिलाड़ियों की सफलता सबसे बड़ी चर्चा का विषय रही है। 18-19 साल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखते हैं और उन्हें भविष्य का सुपरस्टार घोषित कर दिया जाता है। यह बदलते दौर की वास्तविकता भी है, क्योंकि आधुनिक क्रिकेट में फिटनेस, आक्रामकता और तेजी से प्रदर्शन करने की अपेक्षा बढ़ गई है। लेकिन इसी माहौल में जब 33 वर्षीय मध्य प्रदेश के ऑलराउंडर सारांश जैन को पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिलती है, तो यह केवल एक खिलाड़ी के चयन की खबर नहीं रहती, बल्कि भारतीय क्रिकेट की सोच और व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करने वाली घटना बन जाती है।

सारांश जैन का चयन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय क्रिकेट में घरेलू प्रदर्शन का मूल्य अब भी कायम है। लंबे समय तक रणजी ट्रॉफी और अन्य घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार शानदार प्रदर्शन करने वाले इस खिलाड़ी ने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। 54 प्रथम श्रेणी मैचों में 188 विकेट और 2,223 रन किसी भी ऑलराउंडर के लिए उत्कृष्ट रिकॉर्ड माना जाएगा। दो शतक और 14 अर्धशतक यह साबित करते हैं कि वे केवल गेंद से ही नहीं, बल्कि बल्ले से भी टीम के लिए संकटमोचक साबित हो सकते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता केवल आंकड़े नहीं, बल्कि निरंतरता रही है। भारतीय घरेलू क्रिकेट में ऐसे कई खिलाड़ी मिल जाएंगे जिन्होंने एक या दो सीजन शानदार खेले, लेकिन लगातार कई वर्षों तक प्रदर्शन बनाए रखना हर किसी के बस की बात नहीं होती। सारांश ने यही किया। हर सीजन खुद को बेहतर बनाया और चयनकर्ताओं के सामने अपनी दावेदारी मजबूत करते रहे।

हाल के श्रीलंका दौरे पर इंडिया-ए टीम के लिए उनका प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ। नाबाद 70 रन और छह विकेट लेकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बड़े मंच पर भी वे दबाव को अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं। वहीं 2025-26 रणजी सीजन में 518 रन और 30 विकेट लेकर उन्होंने यह संदेश दिया कि उनका चयन किसी सहानुभूति का परिणाम नहीं, बल्कि प्रदर्शन का पुरस्कार है।

सारांश जैन की कहानी केवल क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक परिवार का संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास भी जुड़ा हुआ है। उनके पिता सुबोध जैन स्वयं रणजी क्रिकेटर रहे, लेकिन जब सारांश अपने करियर की नींव रख रहे थे, तब पिता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने बेटे का मनोबल टूटने नहीं दिया। दूसरी ओर, उनके बड़े भाई ने अपने क्रिकेट करियर को पीछे छोड़कर सारांश के सपनों को प्राथमिकता दी। किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, इसका यह जीवंत उदाहरण है।

आज के समय में खेलों में त्वरित सफलता की मानसिकता विकसित हो चुकी है। यदि कोई खिलाड़ी दो-तीन वर्षों में राष्ट्रीय टीम तक नहीं पहुंचता, तो उसे लगभग भुला दिया जाता है। सोशल मीडिया और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में सारांश जैन का चयन युवा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक संदेश है कि देर से मिलने वाली सफलता भी उतनी ही मूल्यवान होती है जितनी जल्दी मिलने वाली।


भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू ढांचा रहा है। रणजी ट्रॉफी, दलीप ट्रॉफी, ईरानी कप और इंडिया-ए जैसी प्रतियोगिताएं वर्षों से ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करती रही हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। यदि इन प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को अवसर नहीं मिलेगा, तो घरेलू क्रिकेट का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगेगा। सारांश जैन का चयन इस व्यवस्था में खिलाड़ियों का विश्वास और मजबूत करता है।

यह चयन चयनकर्ताओं की सोच में संतुलन का भी संकेत देता है। भारतीय क्रिकेट में युवा खिलाड़ियों को अवसर देना आवश्यक है, लेकिन अनुभव की उपेक्षा करना भी उचित नहीं। टेस्ट क्रिकेट विशेष रूप से ऐसा प्रारूप है जिसमें तकनीक, धैर्य और मानसिक मजबूती की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। ऐसे में लंबे घरेलू अनुभव वाले खिलाड़ी टीम को संतुलन प्रदान कर सकते हैं।

हालांकि चयन के बाद असली चुनौती अब शुरू होती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट घरेलू क्रिकेट से कहीं अधिक कठिन है। यहां हर गेंद की परीक्षा होती है, हर गलती की कीमत चुकानी पड़ती है और हर प्रदर्शन पूरे देश की निगाहों में होता है। लेकिन जिस खिलाड़ी ने 33 वर्षों तक अपने सपने को जिंदा रखा हो और लगातार मेहनत की हो, उसके लिए दबाव कोई नई बात नहीं होगी। उनका अनुभव और परिपक्वता भारतीय टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

सारांश जैन की कहानी भारतीय युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश छोड़ती है। आज की पीढ़ी अक्सर सफलता में थोड़ी देरी होते ही निराश हो जाती है। लेकिन जीवन और खेल दोनों में हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। किसी को मंजिल जल्दी मिलती है, किसी को देर से; महत्वपूर्ण यह है कि प्रयास कभी बंद न हों। मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास अंततः अपना परिणाम देते हैं।

यह कहानी यह भी याद दिलाती है कि प्रतिभा की पहचान केवल उम्र से नहीं होनी चाहिए। कई बार अनुभव वह परिपक्वता देता है जो युवा जोश से भी अधिक प्रभावी साबित होती है। क्रिकेट जैसे लंबे प्रारूप वाले खेल में यही अनुभव कई बार मैच का परिणाम बदल देता है।

अंततः, 33 वर्ष की उम्र में मिला पहला टेस्ट कॉल केवल सारांश जैन की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह भारतीय घरेलू क्रिकेट की विश्वसनीयता, परिवार के त्याग, वर्षों की मेहनत और अटूट धैर्य की जीत है। जब भी कोई युवा खिलाड़ी अपने सपनों को अधूरा समझकर निराश होगा, उसे सारांश जैन की यह कहानी जरूर याद रखनी चाहिए। क्योंकि सपनों की कोई उम्र नहीं होती—उन्हें पूरा करने का साहस, निरंतर मेहनत और सही समय पर मिलने वाला अवसर ही उनकी असली पहचान बनता है।

आलोक कुमार

India: जंतर-मंतर की गूंज: क्या विपक्षी एकजुटता से बदलेगी देश की राजनीति?

जंतर-मंतर आंदोलन के बाद वाम दलों ने विपक्षी एकजुटता को नई दिशा देने का संकेत दिया है। सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक तालमेल शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों पर देशव्यापी जनआंदोलन का रूप ले पाएगा, या फिर यह केवल बैठकों और बयानों तक सीमित रह जाएगा?

नई दिल्ली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) [CPI(ML)] के शीर्ष नेताओं की बैठक केवल एक औपचारिक राजनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत भी है, जिसमें छात्र-युवा आंदोलन, रोजगार, शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं।

सीपीआई(एमएल) के केंद्रीय कार्यालय चारु भवन में आयोजित इस बैठक में तीनों दलों के नेताओं ने सबसे पहले कॉमरेड चारु मजूमदार की 54वीं शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्षी एकजुटता पर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जंतर-मंतर आंदोलन को मिली ऐतिहासिक सफलता को बताया गया। वाम दलों ने कहा कि छात्र-युवा संगठनों और CJP के नेतृत्व में चले आंदोलन ने जिस साहस, रचनात्मकता और दृढ़ता का परिचय दिया, उसने केंद्र सरकार को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक के लिए मजबूर कर दिया। नेताओं का मानना है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनदबाव की ताकत का उदाहरण है।

तीनों दलों ने सरकार से मांग की कि जंतर-मंतर समझौते का पूरी तरह सम्मान किया जाए और आंदोलन में शामिल छात्रों तथा युवाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई तुरंत बंद की जाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता।

बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि जंतर-मंतर का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ है। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाना, युवाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना तथा भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता सुनिश्चित करना अब आगे की लड़ाई के प्रमुख मुद्दे होंगे।

वाम दलों ने केवल छात्र राजनीति तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ट्रेड यूनियन, किसान, खेत मजदूर और महिला संगठनों के बीच भी व्यापक समन्वय बढ़ाने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, निजीकरण और कॉरपोरेट प्रभाव के कारण आम जनता पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में संगठित जनआंदोलन की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।

बैठक में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग भी दोहराई गई। वाम नेताओं का कहना है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़े बिना लोकतंत्र को पूर्ण रूप से प्रतिनिधिक नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही तीनों दलों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों पर कथित हमलों के विरुद्ध साझा संघर्ष को और तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया।

हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी राजनीतिक बयान या आंदोलन का अंतिम मूल्यांकन जनता करती है। वाम दलों की यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह आने वाले समय में छात्र आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों और चुनावी राजनीति में उनके प्रदर्शन से तय होगा। केवल साझा बयान पर्याप्त नहीं होंगे; जमीनी स्तर पर व्यापक जनसंपर्क, वैकल्पिक नीतियां और सतत आंदोलन ही उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को मजबूत कर सकते हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन ने यह संकेत अवश्य दिया है कि यदि युवाओं के मुद्दे, शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर व्यापक सामाजिक समर्थन बनता है, तो उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब देखना यह है कि यह एकजुटता केवल बैठकों और प्रस्तावों तक सीमित रहती है या वास्तव में देशव्यापी जनआंदोलन का रूप लेती है।

लोकतंत्र में असहमति, संवाद और जनभागीदारी ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि राजनीतिक दल जनता के वास्तविक मुद्दों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ते हैं, तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनकर रह जाता है, तो जनता का विश्वास फिर से जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए आने वाले महीनों में वाम दलों की इस नई रणनीति की असली परीक्षा मैदान में होगी, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं में।

आलोक कुमार

सोमवार, 27 जुलाई 2026

Bihar : NEET आंदोलन पर बिहार सरकार का बड़ा यू-टर्न

 

NEET आंदोलन पर बिहार सरकार का बड़ा यू-टर्न! एफआईआर वापस लेने का ऐलान, लेकिन क्या तेज प्रताप यादव को भी मिलेगा राहत? यही है सबसे बड़ा सवाल

 NEET/UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर बिहार में हुए छात्र आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक फैसला लिया है। गृह विभाग ने 27 जुलाई 2026 को जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में घोषणा की कि आंदोलन से जुड़े मामलों में दर्ज एफआईआर, परिवाद और अन्य दंडात्मक कार्रवाइयों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सरकार के इस फैसले ने जहां आंदोलनकारियों को राहत की उम्मीद दी है, वहीं राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि क्या गांधी मैदान थाना में दर्ज मामले में गिरफ्तार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेज प्रताप यादव को भी इस निर्णय का लाभ मिलेगा।

यही प्रश्न अब कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बहस का केंद्र बन गया है।

गृह विभाग की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, **26 जुलाई 2026 की शाम 6 बजे तक** NEET/UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को लेकर सरकार ने चार महत्वपूर्ण आश्वासन दिए हैं।

पहला, सरकार ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समयसीमा तक आंदोलन में शामिल लोगों के विरुद्ध कोई दंडात्मक, प्रतिशोधात्मक अथवा प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

दूसरा, इस अवधि तक दर्ज सभी एफआईआर, परिवाद और कारण बताओ नोटिस वापस लेने की विधिक प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाएगी।

तीसरा, इस समयसीमा तक दर्ज मामलों में गिरफ्तार अथवा निरुद्ध सभी व्यक्तियों को शीघ्र रिहा करने की दिशा में कार्रवाई की जाएगी।

चौथा, सरकार ने यह भी आश्वासन दिया कि उक्त अवधि तक दर्ज मामलों में नामित व्यक्तियों के विरुद्ध भविष्य में भी कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कार्रवाई नहीं की जाएगी।

सरकार की इस घोषणा के बाद सबसे अधिक चर्चा तेज प्रताप यादव के मामले को लेकर शुरू हो गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गांधी मैदान थाना में दर्ज प्राथमिकी में उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। इनमें धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 191 (दंगा), धारा 190 (गैरकानूनी जमावड़ा), धारा 221 (लोक सेवक के कार्य में बाधा), धारा 324 (सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान), धारा 326 (आगजनी एवं गंभीर क्षति), धारा 132 (लोक सेवक पर हमला) तथा धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) शामिल बताई गई हैं।

इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस ने तेज प्रताप यादव को गिरफ्तार कर ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया था, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेजे जाने की जानकारी सामने आई।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार की नई घोषणा तेज प्रताप यादव पर भी लागू होगी?

इसका स्पष्ट उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं है। गृह विभाग की प्रेस विज्ञप्ति में किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया गया है। सरकार ने केवल यह कहा है कि NEET/UG आंदोलन से संबंधित तथा **26 जुलाई 2026 की शाम 6 बजे तक** दर्ज मामलों में कार्रवाई वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

यदि गांधी मैदान थाना में दर्ज एफआईआर वास्तव में इसी आंदोलन से संबंधित है और निर्धारित समयसीमा के भीतर दर्ज की गई है, तो प्रारंभिक तौर पर यह माना जा सकता है कि उसका मामला भी सरकार के इस निर्णय के दायरे में आ सकता है। हालांकि, यह केवल प्रारंभिक कानूनी संभावना है, अंतिम निष्कर्ष नहीं।

यहीं पर मामला कानूनी रूप से जटिल हो जाता है। तेज प्रताप यादव पर जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज बताया गया है, उनमें हत्या का प्रयास, आगजनी, लोक सेवक पर हमला और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। ऐसे मामलों में केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देने से स्वतः एफआईआर समाप्त नहीं हो जाती। सरकार को विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए अभियोजन पक्ष के माध्यम से संबंधित न्यायालय में मामला वापस लेने का आवेदन देना होगा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी आपराधिक मामले को वापस लेने के लिए अदालत की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। न्यायालय यह देखता है कि अभियोजन वापस लेने का निर्णय न्यायहित, सार्वजनिक हित और कानून के अनुरूप है या नहीं। यदि अदालत को लगता है कि मामला गंभीर प्रकृति का है या उसमें व्यापक जनहित जुड़ा है, तो वह सरकार के आवेदन पर स्वतंत्र रूप से विचार करती है। इसलिए केवल सरकारी घोषणा के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सभी आरोप स्वतः समाप्त हो जाएंगे।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। विपक्ष इसे छात्र आंदोलन की नैतिक जीत और सरकार के दबाव में झुकने का परिणाम बता रहा है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि उसने लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक सौहार्द और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया है, ताकि आंदोलन से जुड़े सामान्य छात्रों और युवाओं पर अनावश्यक कानूनी बोझ न रहे।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि गृह विभाग अपनी घोषणा के अनुरूप एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया कब और कैसे शुरू करता है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि गांधी मैदान थाना में दर्ज चर्चित मामलों, विशेषकर तेज प्रताप यादव से जुड़े प्रकरण, को इस निर्णय के तहत शामिल किया जाएगा या नहीं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सरकार की प्रेस विज्ञप्ति ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। छात्र आंदोलन, कानून और राजनीति—तीनों अब एक-दूसरे से जुड़े दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकार की विधिक कार्रवाई और न्यायालय की भूमिका यह तय करेगी कि यह घोषणा केवल राजनीतिक संदेश बनकर रह जाती है या वास्तव में आंदोलन से जुड़े सभी मामलों में राहत का रास्ता खोलती है।

यानी, सरकार का फैसला महत्वपूर्ण अवश्य है, लेकिन तेज प्रताप यादव सहित सभी मामलों में अंतिम स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब विधिक प्रक्रिया पूरी होगी और संबंधित न्यायालय आवश्यक आदेश पारित करेगा। तब तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी भी आरोपी के विरुद्ध दर्ज मामले स्वतः समाप्त हो गए हैं।


आलोक कुमार

Bihar : बेतिया की 'मदर टेरेसा' सिस्टर मेरी एलिस को सर्वधर्म श्रद्धांजलि


कुछ लोग अपने जीवन से यह साबित कर जाते हैं कि धर्म की सबसे बड़ी पहचान पूजा नहीं, बल्कि पीड़ित इंसान के चेहरे पर लौटती मुस्कान है। बेतिया की 'मदर टेरेसा' कही जाने वाली सिस्टर मेरी एलिस ऐसी ही शख्सियत थीं, जिनकी विदाई पर हर धर्म, हर वर्ग और हर समुदाय एक साथ खड़ा दिखाई दिया।

बेतिया की 'मदर टेरेसा' सिस्टर मेरी एलिस को सर्वधर्म श्रद्धांजलि, मानव सेवा के उनके मिशन को आगे बढ़ाने का लिया संकल्प । समाज में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान किसी पद, पुरस्कार या प्रचार से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में किए गए सकारात्मक बदलाव से बनती है। पश्चिम चंपारण के बेतिया क्षेत्र में सिस्टर मेरी एलिस ऐसा ही एक नाम थीं। गरीबों, असहायों, अनाथ बच्चों, कुष्ठ रोगियों और समाज के वंचित वर्गों की दशकों तक निस्वार्थ सेवा करने वाली सिस्टर मेरी एलिस को रविवार को बानुछापर स्थित "सेव" (SAVE) संस्था के प्रांगण में आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभा में भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। यह केवल एक श्रद्धांजलि समारोह नहीं था, बल्कि मानवता, सामाजिक सद्भाव और सेवा के मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता का सशक्त संदेश भी था।

कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में स्वीकार किया कि सिस्टर मेरी एलिस का जीवन किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे समाज की अमूल्य धरोहर था। यही कारण है कि उन्हें प्रेमपूर्वक 'बेतिया की मदर टेरेसा' कहा जाता था।

मूल रूप से मुजफ्फरपुर धर्मप्रांत के मोरपा पल्ली से जुड़ी सिस्टर मेरी एलिस ने अपना पूरा जीवन पश्चिम चंपारण के लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने कभी जाति, धर्म, भाषा या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। उनके लिए हर जरूरतमंद व्यक्ति ईश्वर का स्वरूप था और उसकी सहायता करना ही सबसे बड़ा धर्म। वर्षों तक उन्होंने उन लोगों के बीच काम किया, जिन्हें समाज अक्सर हाशिए पर छोड़ देता है।

सिस्टर मेरी एलिस केवल धार्मिक दायित्वों तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति को सम्मान और आत्मनिर्भरता दिलाने के लिए अनेक सामाजिक अभियानों का नेतृत्व किया। वे "सेक्रेट हार्ट एक्शन फॉर पीपुल्स एम्पॉवरमेंट (SHAPE)" जैसी संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं और महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता, आजीविका संवर्धन तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके प्रयासों से अनेक गरीब परिवारों को नई उम्मीद मिली, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला और अनाथ बच्चों को सुरक्षित भविष्य की राह मिली।

बानुछापर में आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभा का वातावरण अत्यंत भावुक और गरिमामय रहा। कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक प्रार्थना से हुई। इसके बाद हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई तथा अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने पवित्र ग्रंथों से पाठ कर प्रेम, करुणा, दया, सेवा और भाईचारे का संदेश दिया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि सिस्टर मेरी एलिस ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा धर्म किसी विशेष पहचान में नहीं, बल्कि मानव सेवा में निहित है।

श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कई वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को याद किया। उन्होंने कहा कि सिस्टर मेरी एलिस का जीवन सादगी, विनम्रता और समर्पण की मिसाल था। उन्होंने कभी अपने कार्यों का प्रचार नहीं किया, बल्कि चुपचाप समाज के कमजोर वर्गों के बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास किया। उनके चेहरे की सहज मुस्कान और जरूरतमंदों के प्रति अपनापन ही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

सभा में कई लोगों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। किसी ने बताया कि कठिन आर्थिक परिस्थितियों में सिस्टर मेरी एलिस ने उनके परिवार की सहायता की थी, तो किसी ने याद किया कि उन्होंने बीमार और असहाय लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने और उनके इलाज की व्यवस्था करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाओं ने बताया कि उनके प्रयासों से उन्हें आत्मनिर्भर बनने का आत्मविश्वास मिला, जबकि कई युवाओं ने कहा कि उनकी प्रेरणा ने उन्हें समाजसेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने की दिशा दिखाई।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों ने सिस्टर मेरी एलिस के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और मोमबत्तियां जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। दो मिनट का मौन रखकर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। पूरे परिसर में गहरा भावनात्मक वातावरण था, जहां हर व्यक्ति उनकी स्मृतियों और उनके योगदान को याद कर भावुक दिखाई दिया।

वक्ताओं ने इस अवसर पर कहा कि आज के समय में जब समाज कई प्रकार की सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सिस्टर मेरी एलिस जैसे व्यक्तित्व और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि समाज में वास्तविक परिवर्तन केवल नीतियों से नहीं, बल्कि संवेदनशील और समर्पित व्यक्तियों के सतत प्रयासों से आता है। उन्होंने सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाया और मानवता को सबसे बड़ा धर्म माना।

श्रद्धांजलि सभा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह रहा, जब सभी उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि सिस्टर मेरी एलिस के अधूरे सपनों और सेवा कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा। गरीबों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और समाज के वंचित वर्गों के कल्याण के लिए निरंतर कार्य करने तथा सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाने का संकल्प लिया गया। वक्ताओं ने कहा कि किसी महान व्यक्ति को सच्ची श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर ही दी जा सकती है।

यह सर्वधर्म श्रद्धांजलि सभा इस बात का भी प्रतीक बनी कि प्रेम, करुणा और सेवा की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती। अलग-अलग आस्थाओं से जुड़े लोगों का एक मंच पर एकत्र होकर सिस्टर मेरी एलिस को श्रद्धांजलि देना इस बात का प्रमाण था कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है और सेवा उसका सबसे श्रेष्ठ स्वरूप।

सिस्टर मेरी एलिस आज भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, उनकी सेवा भावना और समाज के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा। बेतिया की धरती पर उन्होंने जो करुणा, विश्वास और मानवता की विरासत छोड़ी है, वह आने वाले वर्षों तक समाज को यह याद दिलाती रहेगी कि किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान उसके सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के प्रति उसके व्यवहार से होती है। उनके दिखाए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आलोक कुमार

रविवार, 26 जुलाई 2026

Patna : दीघा मुसहरी: राजधानी के साये में मौत, बीमारी और उपेक्षा का सच

 दीघा मुसहरी: राजधानी के साये में मौत, बीमारी और उपेक्षा का सच


पटना को बिहार के विकास का चेहरा कहा जाता है। चौड़ी सड़कें, आधुनिक अस्पताल, सरकारी कार्यालय और तेजी से फैलता शहरी विस्तार राजधानी की नई पहचान बन चुके हैं। लेकिन इसी राजधानी की चमक से कुछ ही किलोमीटर दूर एक ऐसी बस्ती भी है, जहां आज भी गरीबी, बीमारी और उपेक्षा लोगों की नियति बनी हुई है। यह है **दीघा मुसहरी**, जहां टीबी, कुपोषण, अशिक्षा और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था वर्षों से लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। सरकारी योजनाओं और विकास के दावों के बीच यह बस्ती आज भी उन सवालों का जवाब मांग रही है, जिनका संबंध सीधे जीवन और सम्मान से है।

खबर बनी बदलाव की वजह

दीघा मुसहरी की त्रासदी कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों पहले इस बस्ती में टीबी से लगातार हो रही मौतों और गंभीर स्वास्थ्य संकट को प्रमुखता से समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री और पटना के जिलाधिकारी को ई-मेल के माध्यम से पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। खबर का असर हुआ। प्रशासन हरकत में आया और दीघा मुसहरी के लिए एक स्वास्थ्य केंद्र की स्वीकृति मिली।

यह पत्रकारिता की सकारात्मक भूमिका का उदाहरण था कि एक रिपोर्ट ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए बाध्य किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल स्वास्थ्य केंद्र की स्वीकृति से समस्या समाप्त हो गई?

आज स्थिति यह है कि दीघा मुसहरी उप स्वास्थ्य केंद्र दीघा चौहट्टा में संचालित हो रहा है, क्योंकि मुसहरी के भीतर पर्याप्त सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। यही हाल आंगनबाड़ी केंद्र और विद्यालय का भी है। योजनाएं दीघा मुसहरी के नाम पर बनीं, लेकिन उनका वास्तविक लाभ उन परिवारों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया, जिनके लिए उन्हें शुरू किया गया था।

 टीबी: केवल बीमारी नहीं, सामाजिक त्रासदी

दीघा मुसहरी में टीबी ने कई परिवारों को हमेशा के लिए बदल दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्षों में दर्जनों लोगों की जान इस बीमारी ने ले ली। रामजी मांझी का परिवार इसका दर्दनाक उदाहरण है। उनकी बहन और जीजा दोनों टीबी की चपेट में आकर दुनिया छोड़ गए। ऐसी अनेक कहानियां इस बस्ती में आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं।

विक्रांत मांझी की कहानी और भी मार्मिक है। उन्हें ग्लैंड टीबी हुई थी। उन्होंने कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल में इलाज कराया और नियमित दवा लेने से पूरी तरह स्वस्थ भी हो गए। लेकिन कुछ समय बाद बीमारी दोबारा हुई तो उन्होंने अस्पताल जाना और दवा लेना बंद कर दिया। परिणाम यह हुआ कि बीमारी ने उनकी जान ले ली।

आज उनके परिवार की स्थिति बेहद दयनीय है। उनकी पत्नी की आंखों की रोशनी जा चुकी है और छोटे-छोटे बच्चों का भविष्य अनिश्चितता के अंधेरे में है। यह घटना स्पष्ट करती है कि टीबी का इलाज बीच में छोड़ देना केवल मरीज ही नहीं, पूरे परिवार को संकट में डाल देता है।

जब स्वास्थ्य सेवा घर-घर पहुंचती थी

बस्ती के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल की टीम नियमित रूप से दीघा मुसहरी पहुंचती थी। स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान करते थे, लोगों को जांच कराने के लिए प्रेरित करते थे और नियमित दवा लेने की सलाह देते थे। टीकाकरण, स्वास्थ्य शिक्षा और पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाते थे।

इन प्रयासों का असर साफ दिखाई दिया था। टीबी के मामलों में कमी आई और लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ी। आज भी अस्पताल में टीबी की जांच और दवा निःशुल्क उपलब्ध है, लेकिन समुदाय स्तर पर पहले जैसी सक्रिय पहुंच नहीं होने के कारण कई मरीज समय पर जांच और इलाज से वंचित रह जाते हैं।

प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन समस्याएं कायम

दीघा मुसहरी ने केवल संघर्ष ही नहीं देखा, बल्कि सामाजिक बदलाव का उदाहरण भी पेश किया। इसी बस्ती की बेटी **छठिया देवी** ने सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को पार करते हुए पटना नगर निगम के वार्ड संख्या-1 से लगातार दो बार वार्ड पार्षद का चुनाव जीतकर इतिहास रचा। यह पूरे महादलित समाज के लिए प्रेरणा का विषय है।

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि अब उनका निवास मुसहरी में नहीं है। ऐसे में लोगों को महसूस होता है कि बस्ती की समस्याओं पर पहले जैसी प्रत्यक्ष निगरानी और संवाद नहीं हो पाता।

दूसरी ओर विकास मित्र **सुधीर मांझी** आज भी मुसहरी में रहकर लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी लाभों की जानकारी लोगों तक पहुंचाते हैं। लेकिन सीमित संसाधनों और प्रशासनिक सहयोग की कमी के कारण उनका प्रयास अकेले पर्याप्त साबित नहीं हो पा रहा।

गरीबी ही बीमारी की सबसे बड़ी वजह

दीघा मुसहरी की समस्या केवल टीबी तक सीमित नहीं है। यहां शिक्षा, पोषण, स्वच्छता, रोजगार और आवास की चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। यदि परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ जाए तो आय तुरंत बंद हो जाती है और इलाज का खर्च उठाना कठिन हो जाता है।

बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। कुपोषण, भीड़भाड़ वाले घर, साफ पानी और स्वच्छ वातावरण की कमी टीबी जैसी संक्रामक बीमारी के फैलाव को और आसान बना देती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ टीबी को केवल चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी मानते हैं।

योजनाओं को कागज से जमीन तक लाना होगा

दीघा मुसहरी की स्थिति बताती है कि केवल भवन निर्माण या योजनाओं की घोषणा से बदलाव नहीं आता। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी और विद्यालय की स्थायी व्यवस्था मुसहरी के भीतर सुनिश्चित की जाए, ताकि लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए दूर न जाना पड़े।

इसके साथ ही नियमित टीबी स्क्रीनिंग, पोषण सहायता, दवा लेने वाले मरीजों की सतत निगरानी, घर-घर जागरूकता अभियान और उपचार पूरा कराने की प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। यदि इलाज बीच में छोड़ने वालों पर समय रहते निगरानी रखी जाए, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है। विकास तभी प्रभावी होगा, जब योजनाओं का केंद्र कागज नहीं, बल्कि जरूरतमंद नागरिक होंगे।

दीघा मुसहरी केवल एक महादलित बस्ती नहीं, बल्कि हमारे विकास मॉडल की वास्तविक परीक्षा है। यह सवाल उठाती है कि क्या राजधानी के निकट रहने वाले नागरिक भी बुनियादी स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित रहेंगे? यह भी साबित करती है कि जब पत्रकारिता, सामाजिक संस्थाएं और प्रशासन मिलकर काम करते हैं तो परिवर्तन संभव है। स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना इसका प्रमाण है।

लेकिन यात्रा अभी अधूरी है। जब तक योजनाओं का वास्तविक लाभ उन्हीं लोगों तक नहीं पहुंचेगा जिनके नाम पर वे बनाई जाती हैं, तब तक विकास के दावे अधूरे रहेंगे।

दीघा मुसहरी आज भी इंतजार कर रही है—नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि ऐसी संवेदनशील व्यवस्था का, जो हर नागरिक को समान अवसर, समान स्वास्थ्य और सम्मान के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित कर सके। राजधानी की रोशनी तभी सार्थक होगी, जब उसकी छाया में बसे आखिरी घर तक विकास की किरण पहुंचे।


आलोक कुमार


Bihar : 14 अगस्त तक बिहार में चलेगा विशेष अभियान

 दो हफ्ते की खांसी को न करें नजरअंदाज, यह टीबी का संकेत हो सकता है; 14 अगस्त तक बिहार में चलेगा विशेष अभियान

 


क्षय रोग (टीबी) आज भी भारत के सामने सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। आधुनिक चिकित्सा और सरकारी प्रयासों के बावजूद हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी पर प्रभावी नियंत्रण का सबसे कारगर तरीका है—समय पर पहचान, नियमित इलाज और समाज में जागरूकता। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत बिहार में 14 अगस्त 2026 तक विशेष सक्रिय टीबी खोज (Active Case Finding) एवं स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का लक्ष्य ऐसे लोगों की पहचान करना है, जो टीबी से संक्रमित होने के बावजूद अब तक जांच और उपचार की प्रक्रिया से बाहर हैं।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अभियान के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान कर रहे हैं। जिन लोगों में टीबी के शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं, उन्हें तुरंत जांच के लिए निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र भेजा जा रहा है। सरकार का मानना है कि जितनी जल्दी मरीज की पहचान होगी, उतनी ही जल्दी उसका इलाज शुरू होगा और संक्रमण के फैलाव को रोका जा सकेगा।

टीबी मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करने वाली संक्रामक बीमारी है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने के दौरान हवा में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि यदि एक मरीज की समय पर पहचान नहीं हो पाती, तो वह अपने परिवार और आसपास के लोगों के लिए भी संक्रमण का कारण बन सकता है। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक रहने वाली खांसी को सामान्य मौसमी बीमारी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

बिहार में चल रहे विशेष अभियान के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों, शहरी बस्तियों, घनी आबादी वाले इलाकों और ऐसे समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अपेक्षाकृत कम है। आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सेविकाएं, एएनएम, जीविका समूह और अन्य स्वास्थ्यकर्मी लोगों से सीधे संपर्क कर टीबी के लक्षणों की जानकारी दे रहे हैं तथा संदिग्ध मरीजों को जांच के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि आर्थिक कारण किसी व्यक्ति के इलाज में बाधा न बनें। राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर टीबी की जांच पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध है। आवश्यकता पड़ने पर बलगम की जांच, छाती का एक्स-रे और आधुनिक मॉलिक्यूलर परीक्षण भी किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति में टीबी की पुष्टि होती है, तो उसे पूरा उपचार और आवश्यक दवाएं भी बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराई जाती हैं।

टीबी के उपचार में दवाओं के साथ पौष्टिक भोजन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत टीबी मरीजों को इलाज की अवधि के दौरान प्रतिमाह 1,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज संतुलित एवं पौष्टिक भोजन ले सके और उपचार के दौरान शारीरिक कमजोरी से उबर सके।

स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक खांसी रहती है, बलगम में खून आता है, सीने में दर्द होता है, बिना कारण वजन तेजी से कम हो रहा है, लगातार बुखार बना रहता है या रात में अत्यधिक पसीना आता है, तो उसे तुरंत निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाकर जांच करानी चाहिए। शुरुआती अवस्था में बीमारी की पहचान होने पर इलाज अधिक प्रभावी होता है और मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी को लेकर समाज में आज भी कई भ्रांतियां मौजूद हैं। कई लोग सामाजिक संकोच या बदनामी के डर से बीमारी छिपाते हैं, जबकि कुछ मरीज बीच में ही दवा लेना बंद कर देते हैं। यह स्थिति न केवल मरीज के लिए खतरनाक होती है, बल्कि संक्रमण के प्रसार और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी विकसित होने का खतरा भी बढ़ा देती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा का पूरा कोर्स पूरा करना अत्यंत आवश्यक है।

प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित स्वास्थ्य आंदोलन है। पंचायत प्रतिनिधि, स्थानीय जनप्रतिनिधि, स्वयंसेवी संस्थाएं, सामाजिक संगठन और आम नागरिक यदि अपने आसपास लंबे समय से खांसी से पीड़ित लोगों को जांच कराने के लिए प्रेरित करें, तो बड़ी संख्या में छिपे हुए मरीजों की पहचान संभव हो सकती है। इससे न केवल मरीजों का जीवन सुरक्षित होगा, बल्कि समुदाय में संक्रमण की श्रृंखला भी टूटेगी।

बिहार में 14 अगस्त तक चलने वाला यह विशेष स्क्रीनिंग अभियान लोगों को एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है—**टीबी छिपाने की नहीं, समय पर इलाज कराने की बीमारी है।** जागरूकता, समय पर जांच, नियमित दवा, पौष्टिक भोजन और समाज के सहयोग से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यदि प्रत्येक नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाए और शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से ले, तो टीबी मुक्त बिहार और टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य निश्चित रूप से अधिक मजबूत आधार प्राप्त करेगा।

आलोक कुमार

शनिवार, 25 जुलाई 2026

India: कॉकरोच से नागरिक तक: जब युवाओं की आवाज़ ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया

  **कॉकरोच से नागरिक तक: जब युवाओं की आवाज़ ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया**


*"लोकतंत्र की असली ताकत चुनावों में नहीं, बल्कि उस क्षमता में होती है जिसके माध्यम से आम नागरिक अपनी आवाज़ सत्ता तक पहुँचा सके। जब यह आवाज़ युवाओं के भविष्य से जुड़ जाए, तो उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।"*

भारतीय लोकतंत्र में छात्र आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है। समय-समय पर युवाओं ने केवल अपने अधिकारों के लिए ही नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर भी संघर्ष किया है। वर्ष 2026 में सामने आया **"कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)"** का आंदोलन इसी परंपरा की एक नई कड़ी बनकर उभरा। जिस नाम को शुरुआत में सोशल मीडिया पर व्यंग्य और मज़ाक का विषय माना गया, वही कुछ ही महीनों में लाखों छात्रों और बेरोजगार युवाओं की पीड़ा का प्रतीक बन गया। यह किसी पारंपरिक राजनीतिक दल का गठन नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध था, जिस पर प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता को बनाए रखने की जिम्मेदारी है।

16 मई 2026 को अभिजीत दिपके के नेतृत्व में शुरू हुआ यह अभियान किसी चुनावी महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। आंदोलनकारियों का कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय की एक मौखिक टिप्पणी के बाद "कॉकरोच" शब्द को उन्होंने विरोध के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। संदेश स्पष्ट था—यदि व्यवस्था युवाओं को महत्वहीन समझती है, तब भी वे अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करेंगे। यही प्रतीक आगे चलकर एक व्यापक जन-अभियान का आधार बना।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा कारण था प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया पर उठते सवाल। विशेष रूप से नीट (NEET) परीक्षा से जुड़े विवादों ने लाखों छात्रों के मन में गहरा अविश्वास पैदा किया। वर्षों की कठिन तैयारी, परिवारों की आर्थिक और भावनात्मक उम्मीदें तथा युवाओं का भविष्य एक ऐसी व्यवस्था के भरोसे था, जिस पर बार-बार प्रश्नचिह्न लग रहे थे। ऐसे माहौल में कॉकरोच जनता पार्टी ने केवल नाराज़गी व्यक्त नहीं की, बल्कि उस असंतोष को संगठित स्वर देने का प्रयास किया।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल माध्यम बने। एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर अभियान ने तेज़ी से समर्थन जुटाया। कुछ ही समय में ऑनलाइन विरोध जंतर-मंतर सहित देश के कई शहरों में धरना-प्रदर्शन और जनसभाओं में बदल गया। यह डिजिटल युग का ऐसा उदाहरण था, जहाँ सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि जनमत निर्माण और संगठन का प्रभावी मंच बन गया।

आंदोलन की एक विशेषता यह भी रही कि उसने केवल विरोध तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। कॉकरोच जनता पार्टी ने व्यवस्था सुधार के लिए पाँच प्रमुख मांगें सामने रखीं। इनमें पेपर लीक पर कठोर और प्रभावी रोक, परीक्षा एवं भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता, सूचना के अधिकार (RTI) को अधिक प्रभावी बनाना, नेताओं के दल-बदल पर कड़ी रोक तथा शिक्षा एवं रोजगार व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना शामिल था। इन मांगों ने आंदोलन को भावनात्मक नारों से आगे बढ़ाकर नीतिगत विमर्श का विषय बना दिया।

आंदोलन का सबसे चर्चित पहलू केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग रही। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि यदि परीक्षा प्रणाली में लगातार गंभीर अनियमितताएँ सामने आती हैं, तो उसकी राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इस मांग ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दिया और सरकार पर दबाव बढ़ाया कि वह केवल आश्वासन देने के बजाय ठोस कदम उठाए।

हालाँकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल विरोध में नहीं, बल्कि संवाद में निहित होती है। यही इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भी रही। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई। प्रतिनिधियों ने अपनी मांगें विस्तार से सरकार के समक्ष रखीं और सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा अन्य प्रमुख मुद्दों पर आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया गया। इसके बाद आंदोलन के नेतृत्व ने घोषणा की कि जिन मूल उद्देश्यों को लेकर संघर्ष शुरू किया गया था, उन पर सकारात्मक पहल होने के कारण आंदोलन को समाप्त किया जा रहा है।

यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश छोड़ता है। पहला, किसी भी आंदोलन की सफलता केवल सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि नीतिगत सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने में होती है। दूसरा, सरकार यदि संवाद का रास्ता अपनाए और आंदोलनकारी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें, तो टकराव की जगह समाधान की संभावना मजबूत होती है। तीसरा, डिजिटल युग में कोई भी छोटा अभियान, यदि वह वास्तविक जनसमस्याओं से जुड़ा हो, राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन सकता है।

फिर भी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अभी शेष है। क्या सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन व्यवहार में भी दिखाई देंगे? क्या परीक्षा प्रणाली वास्तव में अधिक पारदर्शी बनेगी? क्या पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों पर प्रभावी रोक लगेगी? और क्या लाखों युवाओं का टूटा हुआ विश्वास फिर से स्थापित हो सकेगा? इन प्रश्नों का उत्तर आने वाले समय में सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन से मिलेगा।

भारत का युवा केवल रोजगार नहीं चाहता; वह निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन ईमानदारी से हो और उसका भविष्य किसी भ्रष्ट तंत्र, परीक्षा माफिया या प्रशासनिक लापरवाही का शिकार न बने। यदि यह आंदोलन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में स्थायी परिवर्तन ला पाता है, तो इसकी सफलता केवल एक संगठन की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सफलता मानी जाएगी।

अंततः, कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन यह साबित करता है कि लोकतंत्र में किसी आवाज़ की ताकत उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े जनविश्वास और मुद्दों की गंभीरता से तय होती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है, लेकिन उससे उठे प्रश्न तब तक जीवित रहते हैं, जब तक उनके स्थायी समाधान नहीं मिल जाते। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार अपने वादों को किस गंभीरता से लागू करती है। क्योंकि आंदोलन भले समाप्त हो गया हो, पर देश के करोड़ों युवाओं की उम्मीदें अभी भी एक ऐसी व्यवस्था की प्रतीक्षा कर रही हैं, जो उन्हें निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी भर्ती और सम्मानजनक भविष्य का भरोसा दे सके।