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रविवार, 30 अगस्त 2026

Bihar : एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

 


एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

पटना। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चाय में एक चम्मच चीनी कम की जाए या ज्यादा। बचत जरूरी है, मितव्ययिता भी जरूरी है और संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब देश और समाज के सामने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति जैसे गंभीर सवाल खड़े हों, तब पत्रकारिता का दायरा केवल व्यक्तिगत बचत की सलाह तक सीमित नहीं रह सकता।

पत्रकार रूबिका लियाकत की ओर से एक चम्मच चीनी बचाने की बात कही गई है। इस सलाह को बचत के सामान्य संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के संदर्भ में इससे कहीं बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या मीडिया जनता की छोटी-छोटी बचत पर बात करने के साथ-साथ उन बड़ी नीतियों और व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जिनका सीधा असर करोड़ों परिवारों की आय और खर्च पर पड़ता है?

यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता की असली भूमिका सामने आती है।

पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है

पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है।

सरकार कोई योजना घोषित करती है तो पत्रकार का सवाल होना चाहिए कि योजना का लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा। बजट में शिक्षा के लिए राशि बढ़ती है तो सवाल होना चाहिए कि स्कूलों में उसका असर दिखाई क्यों नहीं देता। किसानों के लिए योजनाएं बनती हैं तो यह देखना जरूरी है कि किसान की लागत और आय में वास्तविक बदलाव कितना आया।

अगर बेरोजगारी पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं तो पत्रकार को रोजगार के आंकड़ों, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करनी चाहिए।

किसी नेता ने क्या कहा, यह खबर हो सकती है; लेकिन उसने जो कहा, वह सच कितना है—यह पत्रकारिता का बड़ा सवाल है।

स्टूडियो से बाहर निकलने की जरूरत

आज मीडिया का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो, डिजिटल स्क्रीन और सोशल मीडिया की तेज रफ्तार के बीच काम कर रहा है। कुछ मिनटों की बहस में कई बड़े मुद्दे उठते हैं और अगले दिन कोई नया मुद्दा उनकी जगह ले लेता है।

समस्या यह है कि जमीनी पत्रकारिता में समय लगता है।

किसी गांव में सरकारी योजना की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वहां जाना पड़ता है। लाभार्थियों से बात करनी पड़ती है। सरकारी दस्तावेज देखने पड़ते हैं। अधिकारियों से सवाल पूछने पड़ते हैं और कई बार अलग-अलग स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करनी पड़ती है।

यही मेहनत खबर को केवल बयान से रिपोर्ट में बदलती है।

कैमरे के सामने जोर से बोलना आसान हो सकता है, लेकिन दस्तावेज के आधार पर सत्ता से कठिन सवाल पूछना पत्रकारिता की असली परीक्षा है।

जनता की छोटी बचत और बड़ी आर्थिक परेशानी

एक परिवार अगर चीनी, बिजली, पानी या किसी अन्य घरेलू खर्च में थोड़ी बचत करता है तो निश्चित रूप से उसके बजट पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ऐसी बचत से परिवार की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो जाएगा?

यदि परिवार की आय सीमित है और खाद्य पदार्थ, शिक्षा, इलाज, किराया, परिवहन तथा खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो समस्या केवल खर्च कम करने की नहीं है।

यहां पत्रकारिता को व्यापक तस्वीर सामने रखनी चाहिए।

एक किसान को खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर कितना खर्च करना पड़ रहा है? उसकी फसल किस कीमत पर बिक रही है? एक बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कितना पैसा खर्च कर रहा है? एक गरीब परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज के बावजूद दवाओं पर कितना खर्च कर रहा है?

ये वे सवाल हैं जिनका जवाब जनता के घरेलू बजट से जुड़ा है।

सत्ता से सवाल पूछना सरकार विरोध नहीं

सरकार से सवाल पूछना अक्सर राजनीतिक विरोध के रूप में देखा जाने लगता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।

पत्रकार का काम सरकार का विरोध करना नहीं है। लेकिन उसका काम सरकार की घोषणाओं और नीतियों की स्वतंत्र जांच करना जरूर है।

अगर कोई सरकारी योजना सफल है तो पत्रकार को उसकी सफलता भी दिखानी चाहिए। अगर किसी योजना में कमी है तो उस कमी को भी सामने लाना चाहिए।

इसी तरह विपक्ष के दावों की भी जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खबर किस राजनीतिक पक्ष के पक्ष में जा रही है। पैमाना यह होना चाहिए कि तथ्य क्या कहते हैं।

आर्थिक और राजनीतिक दबाव की चुनौती

मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव की चर्चा नई नहीं है। विज्ञापन, कारोबारी हित, दर्शकों की संख्या, डिजिटल ट्रैफिक और राजनीतिक संबंधों का प्रभाव पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।

लेकिन इन चुनौतियों के बीच पत्रकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बनी रहती है।

हर खबर में सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता नहीं है। उसी तरह हर सरकारी दावे को बिना जांच स्वीकार कर लेना भी पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवाल तथ्य आधारित होना चाहिए। आलोचना करनी हो तो प्रमाण के साथ करनी चाहिए। आरोप लगाना हो तो संबंधित पक्ष का जवाब भी लेना चाहिए।

बेबाक पत्रकारिता और जिम्मेदार पत्रकारिता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

सोशल मीडिया के दौर में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी

आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल से वीडियो बनाकर सूचना साझा कर सकता है। सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना का खतरा भी बढ़ा है।

यही कारण है कि पेशेवर पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

पत्रकार को वायरल दावे को खबर बनाने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। तस्वीर पुरानी है या नई, बयान पूरा है या काटकर प्रस्तुत किया गया है, आंकड़ा किस स्रोत से आया है और सरकारी दावा जमीन पर कितना सही है—इन सबकी जांच जरूरी है।

तेज खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीय खबर है।

स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका

बड़ी राष्ट्रीय खबरों के बीच स्थानीय समस्याएं अक्सर दब जाती हैं। लेकिन आम नागरिक के जीवन पर सबसे सीधा असर स्थानीय प्रशासन, स्कूल, अस्पताल, सड़क, राशन, बिजली, पानी, रोजगार और कृषि व्यवस्था का होता है।

इसलिए स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की पहली पंक्ति है।

किसी गांव के स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, किसी अस्पताल में दवा नहीं है, किसी किसान को भुगतान नहीं मिला या किसी सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचा—ये खबरें छोटी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है।

पत्रकारिता को शोर नहीं, पड़ताल चाहिए

आज खबरों की दुनिया में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। क्लिक, व्यू और वायरल होने की होड़ में कभी-कभी गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, पड़ताल में है।

एक अच्छी रिपोर्ट किसी सरकारी फाइल और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच का अंतर दिखा सकती है। एक खोजी रिपोर्ट वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी सामने ला सकती है। एक स्थानीय रिपोर्ट किसी अधिकारी को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है।

यही पत्रकारिता की सामाजिक उपयोगिता है।

असली सवाल चीनी नहीं, पत्रकारिता की मिठास है

एक चम्मच चीनी बचाने की सलाह पर बहस अपनी जगह हो सकती है। बचत की आदत परिवार के बजट के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन पत्रकारिता के सामने इससे कहीं बड़ा सवाल है।

क्या हम जनता की आवाज को उतनी ही मजबूती से लिख रहे हैं, जितनी मजबूती से सत्ता के बयान प्रसारित करते हैं?

क्या हम किसान की लागत पूछ रहे हैं? क्या हम बेरोजगार युवा की बेचैनी समझ रहे हैं? क्या हम सरकारी स्कूल और अस्पताल की वास्तविक स्थिति देख रहे हैं? क्या हम योजनाओं के आंकड़ों के पीछे छिपी जमीनी सच्चाई तलाश रहे हैं?

पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाज को यह बताना नहीं कि उसे अपनी चाय कितनी मीठी रखनी चाहिए। पत्रकारिता को यह भी पूछना होगा कि उसके जीवन में महंगाई, बेरोजगारी और असमानता की कड़वाहट क्यों बढ़ रही है।

क्योंकि अगर पत्रकार सवाल पूछना छोड़ दे, अगर मीडिया सत्ता से जवाब मांगना बंद कर दे और अगर खबर केवल बयान दोहराने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

एक चम्मच चीनी बचाने से चाय की मिठास बदल सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मिठास तभी बचेगी जब पत्रकारिता सच बोलने और सत्ता से सवाल पूछने का साहस बचाए रखे।


आलोक कुमार


Bihar : छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

 

छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जमीन का आकार भले छोटा हो, लेकिन परिवार की आय, भोजन और रोजगार का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा होता है। ऐसे किसानों के लिए खेती की सफलता केवल अच्छे बीज और खाद पर निर्भर नहीं करती। सबसे जरूरी जरूरत है—समय पर, पर्याप्त और किफायती सिंचाई

बारिश सामान्य रही तो किसान की उम्मीद बढ़ती है, लेकिन मानसून में देरी, लंबे सूखे अंतराल या जरूरत से ज्यादा बारिश पूरी फसल की योजना बिगाड़ सकती है। बड़े किसान किसी हद तक निजी नलकूप, पंपसेट या अन्य साधनों से इस जोखिम को संभाल लेते हैं। छोटे किसान के पास ऐसे विकल्प सीमित होते हैं।

इसलिए सिंचाई का सवाल केवल खेत में पानी पहुंचाने का विषय नहीं है। यह किसान की लागत, फसल के चुनाव, उत्पादन, जोखिम और अंततः उसकी आय से सीधे जुड़ा हुआ है।

बारिश पर निर्भरता अब भी बड़ी मजबूरी

बिहार में मानसून कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। खरीफ मौसम में धान सहित कई फसलों के लिए बारिश की भूमिका बड़ी होती है। लेकिन बारिश कब होगी, कितनी होगी और कितने अंतराल पर होगी, इसका भरोसा किसान के पास नहीं होता।

कई बार लगातार बारिश से खेतों में जलभराव हो जाता है तो कभी बारिश रुकने से फसल को तत्काल पानी की जरूरत पड़ती है। ऐसी स्थिति में जिसके पास अपनी सिंचाई व्यवस्था नहीं है, उसे दूसरे किसान के नलकूप या पंपसेट पर निर्भर रहना पड़ता है।

यहीं से खेती की लागत बढ़ने लगती है। किसान को पानी खरीदना पड़ सकता है, पंप किराये पर लेना पड़ सकता है और खेत तक पानी पहुंचाने के लिए अतिरिक्त पाइप या मजदूरी का खर्च उठाना पड़ सकता है।

निजी नलकूप हर छोटे किसान की पहुंच में नहीं

ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूप और पंपसेट सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन हैं। लेकिन इन्हें स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी चाहिए। बोरिंग, पंप, पाइप, बिजली कनेक्शन और रखरखाव पर होने वाला खर्च छोटे किसान के लिए बड़ा निवेश हो सकता है।

जिस किसान के पास सीमित जमीन है, उसके सामने यह सवाल रहता है कि महंगे सिंचाई उपकरण पर पैसा लगाने से उसकी लागत कितनी बढ़ेगी और निवेश की भरपाई कब होगी।

यही कारण है कि कई छोटे किसान आसपास के किसानों की सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। इससे पानी की उपलब्धता और कीमत दोनों उनके नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

डीजल पंप खेती को महंगा बनाते हैं

जहां कृषि बिजली की पर्याप्त सुविधा नहीं है, वहां डीजल पंप किसानों के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनते हैं। लेकिन डीजल, मशीन किराया, ऑपरेटर की मजदूरी और खेत तक पानी पहुंचाने का खर्च मिलकर सिंचाई को महंगा बना सकता है।

समस्या तब और गंभीर होती है जब एक ही फसल में कई बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। हर बार किसान को अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। अगर उसी समय बाजार में फसल का भाव कमजोर हो जाए तो किसान की आय पर दोहरा दबाव पड़ता है।

इसलिए सिंचाई नीति में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि पानी उपलब्ध है या नहीं। यह भी देखना होगा कि किसान को वह पानी कितनी लागत पर मिल रहा है।

बिजली कनेक्शन से आगे की जरूरत

ग्रामीण इलाकों में बिजली का विस्तार हुआ है, लेकिन कृषि के लिए बिजली की उपलब्धता और उसकी नियमितता अलग विषय है। किसान को जिस समय खेत में पानी की जरूरत हो, उसी समय बिजली उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।

यदि बिजली अनियमित हो या सिंचाई के लिए सुविधाजनक समय पर उपलब्ध न हो तो किसान को वैकल्पिक रूप से डीजल पंप का सहारा लेना पड़ सकता है।

इसलिए कृषि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल कनेक्शन की संख्या से नहीं होना चाहिए। विश्वसनीय आपूर्ति, उचित समय और कम लागत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

नहर बनी तो क्या अंतिम खेत तक पानी पहुंचा?

नहरें बिहार में सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। जहां नहरों से पर्याप्त पानी मिलता है, वहां किसान निजी पंप और डीजल पर निर्भरता कम कर सकता है।

लेकिन किसी नहर का निर्माण हो जाना और उसके अंतिम छोर तक नियमित पानी पहुंचना दो अलग बातें हैं। रखरखाव की कमी, गाद जमा होना, टूट-फूट या स्थानीय स्तर पर वितरण की समस्या के कारण कई बार उपलब्ध पानी का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।

इसलिए सरकारी सिंचाई परियोजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि कितने खेतों को नियमित और पर्याप्त पानी मिल रहा है।

सामुदायिक सिंचाई छोटे किसानों के लिए उपयोगी मॉडल

छोटे किसान अकेले महंगा नलकूप या सोलर पंप लगाने में सक्षम नहीं हो सकते। ऐसे में सामुदायिक सिंचाई व्यवस्था एक व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।

गांव के किसानों का समूह मिलकर सामुदायिक नलकूप, सोलर पंप या छोटी सिंचाई परियोजना चला सकता है। उपकरण का खर्च साझा किया जा सकता है और पानी के उपयोग के आधार पर शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।

इस मॉडल की सफलता के लिए पारदर्शिता जरूरी है। किस किसान को कब पानी मिलेगा, कितना शुल्क लगेगा और खराब उपकरण की मरम्मत कौन कराएगा—इन सभी सवालों के स्पष्ट नियम होने चाहिए।

सौर ऊर्जा से घट सकता है सिंचाई का खर्च

सौर ऊर्जा आधारित पंप ग्रामीण सिंचाई के लिए संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है या डीजल पर खर्च अधिक होता है, वहां सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

लेकिन छोटे किसानों के लिए शुरुआती निवेश अब भी चुनौती है। इसलिए केवल व्यक्तिगत सोलर पंप पर जोर देने के बजाय सामुदायिक सोलर सिंचाई मॉडल पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

साथ ही भूजल के अत्यधिक दोहन से बचना जरूरी है। सस्ता पानी उपलब्ध कराने की कोशिश ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में भूजल स्तर गंभीर रूप से प्रभावित हो।

पुराने जलस्रोतों का पुनर्जीवन क्यों जरूरी?

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब, आहर-पईन और अन्य पारंपरिक जलस्रोत कभी स्थानीय जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। इनके संरक्षण और पुनर्जीवन से बारिश के पानी को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और सिंचाई के लिए स्थानीय संसाधन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

वर्षा जल संचयन और खेतों में पानी रोकने की व्यवस्था भी छोटे किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे सिंचाई का दबाव कम करने के साथ-साथ पानी की बर्बादी रोकने में भी मदद मिलेगी।

सिंचाई बेहतर होगी तो फसल का विकल्प भी बढ़ेगा

सिंचाई की अनिश्चितता किसान के फसल चुनाव को भी प्रभावित करती है। जिस किसान को पानी की गारंटी नहीं है, वह अधिक जोखिम वाली या अधिक पानी मांगने वाली फसल लेने से बच सकता है।

अगर नियमित सिंचाई उपलब्ध हो तो किसान सब्जियों, दलहन, तेलहन और अन्य मूल्यवान फसलों की ओर भी बढ़ सकता है। इससे खेती से आय बढ़ाने की संभावना बन सकती है।

हालांकि फसल विविधीकरण के साथ बाजार, भंडारण और उचित कीमत की व्यवस्था भी जरूरी है। केवल पानी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा।

सिंचाई का मतलब किसान की आर्थिक सुरक्षा

छोटे किसान के लिए सिंचाई की समस्या इसलिए बड़ी है क्योंकि उसके पास पानी, पूंजी और बाजार—तीनों पर सीमित नियंत्रण होता है। बारिश पर अत्यधिक निर्भरता खेती को जोखिमपूर्ण बनाती है और निजी सिंचाई व्यवस्था कई बार उसकी लागत बढ़ा देती है।

इस चुनौती का समाधान केवल नए नलकूप लगाने में नहीं है। अंतिम खेत तक पानी पहुंचाना, कृषि बिजली को भरोसेमंद बनाना, नहरों का प्रभावी रखरखाव, पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण, सामुदायिक सिंचाई, सौर ऊर्जा और भूजल प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

किसान के खेत में सही समय पर पानी पहुंचना केवल कृषि सुविधा नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक सुरक्षा है। जब किसान को हर फसल के लिए आसमान की ओर देखने की मजबूरी कम होगी, तब खेती अधिक सुरक्षित होगी।

बिहार के कृषि भविष्य का असली सवाल यही है—क्या ऐसी सिंचाई व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें छोटे किसान भी बिना अत्यधिक कर्ज और अतिरिक्त लागत के समय पर अपने खेत तक पानी पहुंचा सकें?

अगर इसका जवाब हां में देना है, तो सिंचाई को केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि किसान की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत के रूप में देखना होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल

बिहार के किसानों की लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ती दूरी: खेत में मेहनत किसान की, कीमत तय करने की ताकत किसकी?

पटना। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल है। गांवों कीबड़ी आबादी खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी, मंडी कारोबार और उससे जुड़े छोटे व्यवसायों पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन, सब्जियां और फल जैसी फसलें किसानों की आय का प्रमुख साधन हैं। लेकिन कृषि की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फसल पैदा करने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसान को मिलने वाला बाजार भाव कई बार उसकी उम्मीद के अनुरूप नहीं होता।

यही अंतर बिहार के किसान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। खेती में जोखिम किसान का है, मौसम का असर किसान झेलता है, उत्पादन की लागत किसान उठाता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी कीमत तय करने की ताकत अक्सर उसके हाथ में नहीं रहती।

बीज से बाजार तक बढ़ता खर्च

आज खेती पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। खेत की जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, कृषि मशीनरी और फसल को बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। जिन किसानों के पास अपनी मशीन या सिंचाई का साधन नहीं है, उनके लिए लागत और बढ़ जाती है।

इसके अलावा प्राकृतिक जोखिम भी कम नहीं हुए हैं। कभी अत्यधिक बारिश, कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी फसल में रोग किसानों की पूरी गणित बिगाड़ देते हैं। किसान पहले से यह निश्चित नहीं कर सकता कि मौसम उसके साथ कितना सहयोग करेगा।

छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति और कठिन है। सीमित पूंजी के कारण उन्हें खेती के लिए कई बार उधार लेना पड़ता है। फसल तैयार होने के बाद कर्ज चुकाने, अगली फसल की तैयारी करने और परिवार का खर्च चलाने का दबाव सामने होता है। ऐसे में बाजार भाव कम होने के बावजूद किसान अपनी उपज रोककर रखने की स्थिति में नहीं होता।

फसल तैयार होते ही क्यों गिर जाता है किसान का विकल्प?

किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय वह होता है जब फसल बाजार में पहुंचती है। यदि उस समय कीमत अच्छी है तो उसकी पूरी साल की मेहनत कुछ हद तक सफल हो सकती है। लेकिन कीमत गिर गई तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।

इसका एक बड़ा कारण भंडारण की सीमित सुविधा है। जिसके पास पर्याप्त गोदाम या सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था नहीं है, वह लंबे समय तक फसल रोक नहीं सकता। उसे जल्दी बिक्री करनी पड़ती है।

यहीं किसान की मजबूरी उसकी सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करती है।

शहर में उपभोक्ता किसी कृषि उत्पाद के लिए अधिक कीमत चुका सकता है, लेकिन खेत से निकलने वाली वही उपज किसान को अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है। परिवहन, छंटाई, पैकेजिंग, थोक कारोबार और खुदरा बिक्री के अलग-अलग खर्च इसमें जुड़ते हैं। सवाल यह है कि इस पूरी मूल्य-श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी कैसे बढ़ाई जाए?

केवल बिचौलिये को दोष देना समाधान नहीं

किसानों को कम कीमत मिलने की चर्चा होते ही बिचौलियों का नाम सामने आता है। लेकिन समस्या को केवल बिचौलियों तक सीमित करना कृषि बाजार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

असल सवाल यह है कि किसान के पास विकल्प कितने हैं।

यदि किसान के आसपास कई खरीदार हों, उसे अलग-अलग बाजारों के भाव की जानकारी हो, उसकी उपज रखने के लिए गोदाम हो और परिवहन की सुविधा उपलब्ध हो, तो वह बेहतर कीमत के लिए बातचीत कर सकता है।

इसके विपरीत यदि गांव में एक-दो खरीदार ही उपलब्ध हैं और किसान के पास फसल रखने की सुविधा नहीं है, तो उसकी स्थिति कमजोर हो जाती है। इसलिए कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ किसान की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है।

एमएसपी की घोषणा और वास्तविक बिक्री में अंतर

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। लेकिन किसी फसल का एमएसपी घोषित होना और प्रत्येक किसान का अपनी पूरी उपज उस कीमत पर बेच पाना अलग-अलग बातें हैं।

किसान के लिए वास्तविक सुरक्षा तभी बनेगी जब खरीद व्यवस्था उसके नजदीक हो, खरीद प्रक्रिया स्पष्ट हो और भुगतान समय पर मिले। सरकारी खरीद केंद्रों की पहुंच, उनकी सक्रियता और खरीद की समयबद्धता इसलिए महत्वपूर्ण है।

बिहार में किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है जिसमें सरकारी खरीद का लाभ केवल कागज पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से खेत और गांव तक पहुंचे।

मक्का और सब्जी उत्पादकों की परेशानी अलग

मक्का जैसे उत्पादों के किसानों को बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। वहीं सब्जी उत्पादकों की समस्या और भी संवेदनशील है क्योंकि उनकी फसल जल्दी खराब हो सकती है।

टमाटर, फूलगोभी, भिंडी और हरी सब्जियों की कीमत किसी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने पर अचानक गिर सकती है। किसान के सामने ऐसी स्थिति में मुश्किल विकल्प होता है—कम कीमत पर बेच दे या फसल खराब होने का खतरा उठाए।

इस समस्या का समाधान केवल अधिक उत्पादन नहीं है। ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, ग्रेडिंग सेंटर, प्रसंस्करण इकाइयां और स्थानीय खाद्य उद्योग विकसित करने की जरूरत है। इससे किसान को अपनी उपज तुरंत बेचने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

एफपीओ से बढ़ सकती है किसानों की ताकत

एक छोटा किसान अकेले बाजार में बड़ी मात्रा में उपज बेचने वाले कारोबारी से बराबरी की बातचीत नहीं कर पाता। लेकिन कई किसान मिलकर किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ बनाएं तो स्थिति बदल सकती है।

सामूहिक खरीद से इनपुट की लागत कम करने, सामूहिक बिक्री से बेहतर कीमत प्राप्त करने और ग्रेडिंग-पैकेजिंग जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ती है।

हालांकि केवल एफपीओ बना देना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें बाजार की जानकारी, प्रशिक्षित प्रबंधन, कार्यशील पूंजी और बड़े खरीदारों से सीधे संपर्क की जरूरत है।

मोबाइल पर भाव की जानकारी से आगे बढ़ना होगा

आज किसान के हाथ में मोबाइल फोन है। अलग-अलग बाजारों की कीमतों की जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो सकती है। लेकिन सूचना तभी उपयोगी है जब किसान उसके आधार पर वास्तविक व्यापारिक निर्णय ले सके।

किसान को यह पता होना चाहिए कि उसकी उपज की कीमत अलग-अलग बाजारों में कितनी है, वहां तक परिवहन का खर्च कितना आएगा और किस खरीदार से बेहतर सौदा संभव है।

इसलिए भविष्य की कृषि व्यवस्था में डिजिटल जानकारी को डिजिटल बाजार और वास्तविक बिक्री व्यवस्था से जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

कृषि नीति का अंतिम पैमाना किसान की शुद्ध आय हो

कृषि विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सभी खर्च निकालने के बाद उसके पास कितना पैसा बचा।

यदि उत्पादन बढ़ता है लेकिन लागत भी उसी गति से बढ़ती है और किसान की शुद्ध आय नहीं बढ़ती, तो कृषि विकास अधूरा माना जाएगा।

बिहार में कृषि नीति को किसान की वास्तविक आय से जोड़ने की जरूरत है। सस्ती सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, सामूहिक खरीद, बेहतर ग्रामीण सड़क, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और पारदर्शी बाजार व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।

किसान को सिर्फ उत्पादक नहीं, बाजार का भागीदार बनाना होगा

बिहार के किसान की चुनौती केवल खेत तक सीमित नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि फसल बाजार तक पहुंचने के बाद उसके पास कितने विकल्प हैं।

किसान को केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसे लागत कम करने, जोखिम घटाने और बेहतर कीमत प्राप्त करने के साधन भी देने होंगे।

अगर किसान के पास भंडारण की सुविधा हो, बाजार की सही जानकारी हो, कई खरीदारों तक पहुंच हो और सामूहिक रूप से बिक्री करने की क्षमता हो तो उसकी सौदेबाजी मजबूत होगी।

आखिरकार कृषि की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खेत से कितनी फसल निकली। सवाल यह होना चाहिए कि उस फसल से किसान की शुद्ध आय कितनी बढ़ी

बिहार के कृषि भविष्य के लिए यही सबसे बड़ा सवाल है—क्या ऐसी बाजार व्यवस्था तैयार की जा सकती है जिसमें किसान अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर न हो, बल्कि सही समय और सही कीमत चुनने के लिए उसके पास पर्याप्त विकल्प हों?

कृषि तभी टिकाऊ बनेगी जब खेत की मेहनत का उचित हिस्सा किसान की जेब तक पहुंचे।


आलोक कुमार

शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bengal : एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।

 Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद मां Sweta Ancel का सवाल- ‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’


पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 28 मई से 28 अगस्त तक तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अपने बेटे Aadvik Hilarian को खो चुकी मां Sweta Ancel के लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है। बेटे की मौत के तीन महीने पूरे होने पर Sweta Ancel ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा और नाराजगी व्यक्त करते हुए न्याय की मांग दोहराई है।

उनका कहना है कि घटना के बाद समय गुजरता गया, लेकिन उनके परिवार के लिए जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। एक मां ने अपना बच्चा खो दिया, एक परिवार की दुनिया उजड़ गई और अब भी उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर उनके बेटे की मौत की जिम्मेदारी कब तय होगी और उन्हें न्याय कब मिलेगा?

Sweta Ancel की सार्वजनिक अपील ने एक बार फिर इस मामले को बच्चों की सुरक्षा, स्कूल प्रशासन की जवाबदेही और जांच की गति जैसे महत्वपूर्ण सवालों के केंद्र में ला दिया है।

तीन महीने बाद भी मां के सवाल कायम

किसी माता-पिता के लिए बच्चे को खोने का दर्द शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। Sweta Ancel के लिए भी तीन महीने बीत जाना किसी राहत का संकेत नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे घटना के बाद धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया, जबकि उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है।

उनकी पीड़ा का सबसे बड़ा हिस्सा यही है कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता, लेकिन वह चाहती हैं कि उसकी मौत के पीछे यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

स्कूल प्रबंधन पर कथित लापरवाही के आरोप

Aadvik Hilarian की मां ने स्कूल प्रबंधन और घटना के समय स्विमिंग पूल में मौजूद बताए गए शिक्षकों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल Ravi Victor तथा Vikash Gaitano, Alfred Simon और Natal नामक शिक्षकों की भूमिका की जांच और कार्रवाई की मांग की है।

मां का आरोप है कि यदि बच्चे की निगरानी और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सावधानी बरती जाती तो शायद हादसे को रोका जा सकता था।

हालांकि, इन आरोपों को फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी तभी तय हो सकती है जब सक्षम जांच एजेंसी तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच करे।

इस मामले में स्कूल प्रबंधन और संबंधित शिक्षकों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पूरी तस्वीर एकतरफा न रहे।

स्विमिंग पूल में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत और उसके परिवार के दुख तक सीमित नहीं है। यदि किसी स्कूल परिसर में स्विमिंग पूल संचालित किया जाता है तो वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था होना बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषकर बच्चों के मामले में कुछ मिनट भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए ऐसे हादसे के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि घटना कैसे हुई। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि उस समय सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या था, बच्चों की निगरानी कौन कर रहा था, आपात स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और बचाव के लिए उपलब्ध संसाधन पर्याप्त थे या नहीं।

‘सब कुछ फिर सामान्य कैसे हो गया?’

Sweta Ancel की सार्वजनिक पीड़ा में एक सवाल बार-बार सामने आता है—जिस परिवार ने अपना बच्चा खो दिया, उसके लिए सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन बाकी दुनिया फिर सामान्य कैसे हो गई?

उनके अनुसार स्कूल की गतिविधियां सामान्य रूप से चल रही हैं। यही स्थिति उनके दर्द को और गहरा करती है।

एक मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस जगह से उसका बच्चा वापस नहीं लौटा, वहां कुछ समय बाद रोजमर्रा की गतिविधियां फिर शुरू हो जाएं।

हालांकि किसी संस्था की गतिविधियों का जारी रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जांच या कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

पुलिस और प्रशासन से जवाब की उम्मीद

Sweta Ancel ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि तीन महीने बीतने के बाद भी उन्हें वह न्याय नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रही हैं।

उनका मूल सवाल सीधा है—

एक बच्चे की मौत की जिम्मेदारी आखिर कब तय होगी?

ऐसे मामलों में परिवार को केवल जांच की सूचना ही नहीं, बल्कि जांच की प्रगति और कानूनी प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना भी जरूरी है।

निष्पक्ष जांच का अर्थ यह भी है कि सभी पक्षों के बयान लिए जाएं, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच हो और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्य स्थापित किए जाएं।

एक मां की लड़ाई अब बच्चों की सुरक्षा का सवाल

Sweta Ancel ने संकेत दिया है कि वह अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई जारी रखेंगी। उनका संघर्ष अब केवल व्यक्तिगत न्याय की मांग नहीं रह गया है। इससे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्यापक सवाल भी उठते हैं।

क्या स्कूलों में स्विमिंग पूल के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित निगरानीकर्मी होते हैं?

क्या बच्चों की संख्या के अनुपात में निगरानी की व्यवस्था रहती है?

क्या आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध होती है?

क्या कर्मचारियों को बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सुरक्षा नियम केवल कागज पर हैं या वास्तव में उनका पालन भी होता है?

इन सवालों का जवाब केवल इसी मामले के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संस्थानों के लिए जरूरी है जहां बच्चों को खेल, तैराकी या अन्य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है।

न्याय के साथ व्यवस्था में सुधार भी जरूरी

किसी बच्चे की मौत के बाद परिवार के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण मांग होती है। लेकिन ऐसी घटनाओं से व्यवस्था को भी सीख लेनी चाहिए।

यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।

स्कूलों में नियमित सुरक्षा ऑडिट, प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और बच्चों की गतिविधियों की उचित निगरानी जैसे कदम हादसों का जोखिम कम कर सकते हैं।

‘Justice for Aadvik’ की मांग

तीन महीने बाद भी Sweta Ancel की सबसे बड़ी मांग वही है—Justice for Aadvik

एक मां अपने बेटे को वापस नहीं ला सकती। लेकिन वह यह जरूर चाहती है कि उसके बच्चे की मौत को भुला न दिया जाए और यदि किसी की लापरवाही या चूक सामने आती है तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

इस मामले में सबसे जरूरी है कि भावनाओं और आरोपों से अलग निष्पक्ष जांच तथा तथ्यात्मक निष्कर्ष सामने आएं।

आखिर किसी परिवार को न्याय तभी मिलेगा जब यह स्पष्ट हो कि घटना में वास्तव में क्या हुआ, उस समय सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, किसकी क्या जिम्मेदारी थी और जांच में कौन-से तथ्य सामने आए।

निष्कर्ष

Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद उनकी मां का सवाल आज भी वही है—‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’

यह सवाल एक मां के व्यक्तिगत दर्द से निकला है, लेकिन इसके भीतर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा मुद्दा भी छिपा है।

जांच निष्पक्ष हो, सभी पक्षों को सुना जाए, तथ्य सामने आएं और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी साबित होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो—यही इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा है।

एक बच्चे की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। लेकिन उसकी मौत से व्यवस्था यह सुनिश्चित जरूर कर सकती है कि भविष्य में किसी दूसरे माता-पिता को ऐसा सवाल न पूछना पड़े—

“मेरे बच्चे के साथ ऐसा क्यों हुआ और न्याय कब मिलेगा?”

Justice for Aadvik — एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।


आलोक कुमार

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार

Bihar : पंचायतों में विकास का पैसा: गांव तक पहुंचते-पहुंचते क्या बदल जाता है?

 पंचायतों में विकास का पैसा: गांव तक पहुंचते-पहुंचते क्या बदल जाता है?


पटना। भारत में लोकतंत्र की असली तस्वीर केवल संसद और विधानसभा में नहीं दिखाई देती। इसकी सबसे महत्वपूर्ण झलक गांव की चौपाल, पंचायत भवन, ग्रामीण सड़क, नाली, स्कूल और पेयजल व्यवस्था में मिलती है। पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि गांव की समस्याओं की पहचान स्थानीय स्तर पर हो, योजनाएं ग्रामीण जरूरतों के अनुसार बनें और विकास का पैसा वास्तविक जरूरतों पर खर्च हो।

लेकिन वर्षों से एक सवाल ग्रामीण समाज में बना हुआ है—सरकार से पंचायत तक पहुंचने वाला विकास का पैसा गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते-पहुंचते कितना प्रभावी रह जाता है?

यह सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं है। इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही, योजना की गुणवत्ता, प्रशासनिक निगरानी और स्थानीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता भी जुड़ी हुई है।

पैसा आता है, फिर भी विकास अधूरा क्यों?

गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता, सामुदायिक भवन, जल संरक्षण और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग योजनाओं के तहत धन उपलब्ध कराया जाता है। कागज पर किसी योजना की स्वीकृति हो सकती है, निर्माण पूरा दिखाया जा सकता है और भुगतान भी जारी हो सकता है।

लेकिन जमीन पर तस्वीर हमेशा वैसी नहीं होती।

कहीं नई बनी सड़क कुछ महीनों में टूट जाती है, कहीं नाली बनने के बाद भी जलजमाव खत्म नहीं होता और कहीं पेयजल योजना होने के बावजूद ग्रामीणों को पुराने जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यहीं से फाइल और जमीन के बीच का अंतर सामने आता है।

विकास राशि की पूरी प्रक्रिया समझना जरूरी

पंचायत का पैसा सामान्यतः एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरता है। योजना का चयन, स्वीकृति, तकनीकी प्रक्रिया, कार्यादेश, निर्माण, मापी, बिल और भुगतान जैसे कई चरण होते हैं। इस दौरान पंचायत प्रतिनिधियों के साथ अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी और कार्य एजेंसियां भी भूमिका निभाती हैं।

यदि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे तो अनियमितता की गुंजाइश कम हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब ग्रामीणों को यह पता ही नहीं होता कि उनके गांव में किस योजना के लिए कितना पैसा स्वीकृत हुआ है।

एक सामान्य ग्रामीण के लिए यह जानना कठिन हो सकता है कि योजना की लागत कितनी है, काम कब पूरा होना है, किसके माध्यम से कराया जा रहा है और भुगतान की स्थिति क्या है।

जब जनता को जानकारी नहीं मिलेगी तो वह निगरानी कैसे करेगी?

सूचना बोर्ड केवल औपचारिकता न बने

किसी विकास कार्य के स्थल पर योजना की जानकारी देने वाला बोर्ड ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। उसमें योजना का नाम, लागत, काम की अवधि और संबंधित जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।

यदि सड़क निर्माण की लागत लाखों रुपये है तो ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि सड़क कितनी लंबी है और निर्माण का निर्धारित मानक क्या है।

सूचना जितनी सरल और स्पष्ट होगी, जनता की निगरानी उतनी ही मजबूत होगी।

यही कारण है कि पंचायत स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण और जन निगरानी को केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में देखना चाहिए।

खराब गुणवत्ता भी सार्वजनिक नुकसान है

भ्रष्टाचार की चर्चा अक्सर पैसे की हेराफेरी तक सीमित हो जाती है, जबकि घटिया निर्माण भी जनता के लिए बड़ा नुकसान है।

मान लीजिए किसी सड़क का निर्माण पूरा हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में पूरी राशि खर्च हो गई। लेकिन कुछ ही समय बाद सड़क टूटने लगी। ऐसी स्थिति में केवल सड़क की मरम्मत का सवाल नहीं है। दोबारा मरम्मत के लिए फिर सार्वजनिक धन खर्च होगा।

इसलिए किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उस पर पैसा खर्च हुआ या नहीं।

असल सवाल होना चाहिए—उस पैसे से बना काम कितने समय तक ग्रामीणों के लिए उपयोगी रहा?

पंचायत प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी

पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका केवल योजना पारित कराने या उद्घाटन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें ग्रामसभा को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

गांव में यदि पीने के पानी की समस्या गंभीर है तो विकास की प्राथमिकता उसी दिशा में होनी चाहिए। यदि स्कूल तक जाने वाली सड़क खराब है तो पहले उसका समाधान जरूरी हो सकता है।

स्थानीय लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि विकास की प्राथमिकताएं गांव की वास्तविक जरूरतों से तय हों।

ग्रामसभा को मजबूत करना होगा

ग्रामसभा पंचायत व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन यदि ग्रामसभा केवल बैठक, हस्ताक्षर और उपस्थिति तक सीमित रह जाए तो उसका उद्देश्य कमजोर हो जाता है।

ग्रामीणों को योजनाओं के बारे में सवाल पूछने का अधिकार महसूस करना चाहिए।

मसलन—

  • योजना की कुल लागत कितनी है?

  • काम कब शुरू हुआ?

  • पूरा होने की समय-सीमा क्या है?

  • काम किस एजेंसी या व्यक्ति के माध्यम से हो रहा है?

  • गुणवत्ता की जांच किसने की?

  • कितना भुगतान किया गया?

  • काम पूरा होने के बाद उसकी देखरेख कौन करेगा?

ऐसे सवाल पंचायत को कमजोर नहीं करते। बल्कि वे स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

डिजिटल पारदर्शिता का बेहतर इस्तेमाल

आज पंचायतों से जुड़ी योजनाओं और सरकारी खर्च की जानकारी को डिजिटल माध्यमों से अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। योजना की स्वीकृति, लागत, प्रगति, भुगतान और पूर्णता जैसी जानकारी सार्वजनिक होने से ग्रामीणों को निगरानी का अवसर मिलेगा।

हालांकि केवल वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल जानकारी ऐसी भाषा और स्वरूप में होनी चाहिए जिसे सामान्य ग्रामीण भी आसानी से समझ सके।

हर पंचायत भवन में एक 'विकास सूचना पट' बनाया जा सकता है, जहां चल रही और पूरी हो चुकी प्रमुख योजनाओं का विवरण सरल भाषा में प्रदर्शित हो।

भुगतान के साथ गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी तय हो

किसी विकास कार्य का भुगतान हो जाना अपने आप में उसकी सफलता का प्रमाण नहीं होना चाहिए। यदि काम घटिया है तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई।

सिर्फ निर्माण करने वाली एजेंसी या व्यक्ति पर जिम्मेदारी डाल देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित प्रक्रिया में गुणवत्ता की पुष्टि किसने की और भुगतान की अनुमति किस आधार पर दी गई।

जिम्मेदारी जितनी स्पष्ट होगी, व्यवस्था उतनी जवाबदेह होगी।

हर पंचायत को भ्रष्ट मानना भी सही नहीं

पंचायतों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर गंभीरता से जांच होनी चाहिए, लेकिन हर पंचायत प्रतिनिधि या कर्मचारी को भ्रष्ट मान लेना भी उचित नहीं है।

देश के गांवों में ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि और कर्मचारी हैं जो सीमित संसाधनों में ईमानदारी से काम करते हैं। अच्छे काम को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है जितना गलत काम पर कार्रवाई करना।

इससे ईमानदार प्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ेगा और अनियमितता करने वालों पर सामाजिक तथा प्रशासनिक दबाव बनेगा।

ग्रामीण केवल लाभार्थी नहीं, निगरानीकर्ता भी हैं

ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी ताकत स्वयं ग्रामीण जनता हो सकती है। जिस गांव में लोग योजनाओं की जानकारी रखते हैं, ग्रामसभा में भाग लेते हैं और काम की गुणवत्ता पर सवाल पूछते हैं, वहां व्यवस्था अधिक जवाबदेह बन सकती है।

जनता की भूमिका केवल पंचायत चुनाव के समय वोट देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पूरे कार्यकाल में प्रतिनिधियों और प्रशासन के साथ संवाद जरूरी है।

निष्कर्ष

पंचायतों में विकास का पैसा गांव तक पहुंचते-पहुंचते तभी कमजोर पड़ता है जब पारदर्शिता कम हो, जनता की निगरानी कमजोर हो और जिम्मेदारी स्पष्ट न हो। इसके उलट ग्रामसभा सक्रिय हो, योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक हो, गुणवत्ता की जांच मजबूत हो और अनियमितता पर समय रहते कार्रवाई हो तो सरकारी धन का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंच सकता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पंचायत को कितना पैसा मिला।

असली सवाल यह होना चाहिए कि उस पैसे से गांव को कितना स्थायी और उपयोगी विकास मिला।

सरकारी पैसा किसी नेता, अधिकारी या पंचायत का निजी संसाधन नहीं है। यह जनता के संसाधनों से आता है। इसलिए जनता का अपने विकास के पैसे का हिसाब मांगना किसी व्यवस्था के खिलाफ जाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करना है।

गांव की सड़क मजबूत हो, नाली काम करे, पानी मिले, स्कूल बेहतर हों और सार्वजनिक सुविधाएं लंबे समय तक टिकें—यही विकास राशि की वास्तविक सफलता है।




आलोक कुमार

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

India : EPS-95 Pension: ₹1,000 पेंशन बढ़ाने में सरकार की मजबूरी


EPS-95 Pension: ₹1,000 पेंशन बढ़ाने में सरकार की मजबूरी, फिर ₹22 हजार करोड़ के दावे पर ₹6.25 करोड़ का सेटलमेंट क्यों?

पटना। देश में आर्थिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल सामने है। एक तरफ EPS-95 Pension के तहत मिलने वाली न्यूनतम मासिक पेंशन को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 करने की मांग लंबे समय से उठ रही है। दूसरी तरफ Zee Group के संस्थापक और Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency प्रक्रिया में करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के मुकाबले ₹6.25 करोड़ के भुगतान वाली योजना को NCLT ने मंजूरी दी है।

दोनों मामले कानूनी और आर्थिक रूप से अलग हैं। फिर भी इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर एक बड़ा सार्वजनिक सवाल जरूर उठता है—आर्थिक व्यवस्था में आम नागरिक और बड़े वित्तीय दायित्वों से जुड़े मामलों के लिए राहत और समाधान का पैमाना क्या है?

EPS-95 Pensioners की मांग आखिर क्या है?

Employees' Pension Scheme यानी EPS-95 के तहत न्यूनतम पेंशन वर्तमान में ₹1,000 प्रति माह है। पेंशनर्स लंबे समय से इसे बढ़ाकर कम से कम ₹7,500 प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं। अगस्त 2026 में लोकसभा में भी इस मुद्दे पर सवाल उठा था, लेकिन सरकार ने न्यूनतम पेंशन बढ़ाकर ₹7,500 करने की घोषणा नहीं की। सरकार ने पेंशन फंड की स्थिरता और भविष्य की देनदारियों से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया है।

31 मार्च 2026 तक करीब 85.84 लाख पेंशनर EPS के तहत मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे। ऐसे में न्यूनतम पेंशन का सवाल केवल कुछ लोगों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

पेंशनर्स का तर्क है कि महंगाई, दवाइयों, बिजली, किराये और रोजमर्रा की जरूरतों के मौजूदा दौर में ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन पर्याप्त नहीं है। उनका सवाल है कि दशकों तक काम करने के बाद बुढ़ापे में मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा इतनी कम क्यों होनी चाहिए?

सुभाष चंद्रा मामले में कितना बड़ा अंतर?

अब सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत insolvency मामले पर नजर डालिए। NCLT के सामने उनके खिलाफ करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims थे। स्वीकृत repayment plan में creditors के लिए ₹6.25 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित है, जबकि करीब ₹25 लाख insolvency प्रक्रिया की लागत के लिए रखे गए हैं। इस हिसाब से creditors को admitted claims का लगभग 0.03 प्रतिशत ही मिलने वाला है और haircut करीब 99.97 प्रतिशत बैठता है।

लेकिन यहां एक बेहद जरूरी बात समझना आवश्यक है।

इसे सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं होगा कि “₹22 हजार करोड़ का सरकारी कर्ज माफ कर दिया गया।” मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency और उन व्यक्तिगत गारंटियों से जुड़ा है, जो Essel Group से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के संबंध में दी गई थीं। मूल कर्जदार कंपनियों और उनकी संपत्तियों से जुड़े दावे अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय हो सकते हैं।

यानी ₹22,006.57 करोड़ की पूरी राशि को सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिया गया कर्ज मानना भी सही नहीं होगा।

फिर सवाल इतना बड़ा क्यों है?

सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि ₹22,006 करोड़ और ₹6.25 करोड़ के बीच का अंतर असाधारण रूप से बड़ा है।

NCLT के सामने रखी गई योजना को creditors के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला। रिपोर्टों के अनुसार वोटिंग में करीब 80.81 प्रतिशत voting share ने योजना का समर्थन किया, जबकि HDFC Bank और LIC Housing Finance सहित कुछ संस्थानों ने इसका विरोध किया।

यही कारण है कि मामला केवल सोशल मीडिया की बहस तक सीमित नहीं रहा। कुछ वित्तीय संस्थान इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में हैं। HDFC Bank appeal के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि LIC Housing Finance ने भी NCLAT जाने की बात कही है।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अगर कानूनी व्यवस्था किसी insolvency मामले में इतना बड़ा haircut स्वीकार कर सकती है, तो आम नागरिक की आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

आम आदमी की EMI और बड़े कर्ज का फर्क

देश का मध्यमवर्गीय परिवार बैंक से लिया गया छोटा-सा कर्ज भी समय पर चुकाने की कोशिश करता है। EMI में देरी होने पर ब्याज, penalty, recovery calls और credit history पर असर जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

छोटे कारोबारी के लिए बैंक का कर्ज और भी बड़ा जोखिम बन सकता है। कई बार कारोबार में नुकसान होने पर परिवार की बचत और संपत्ति तक खतरे में पड़ जाती है।

ऐसे माहौल में जब आम नागरिक हजारों या लाखों रुपये के कर्ज की किस्तों को लेकर चिंतित रहता है, तब हजारों करोड़ रुपये के admitted claims के मुकाबले कुछ करोड़ रुपये की repayment योजना स्वाभाविक रूप से बहस पैदा करती है।

लेकिन यहां भी तुलना करते समय कानूनी अंतर समझना जरूरी है। Insolvency resolution का उद्देश्य हर स्थिति में पूरी रकम वसूल करना नहीं होता। इसका उद्देश्य उपलब्ध कानूनी ढांचे के भीतर creditors और debtor के बीच समाधान निकालना भी होता है। NCLT का काम भी केवल यह देखना नहीं है कि रकम कितनी बड़ी है, बल्कि यह देखना होता है कि योजना कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।

EPS-95 Pension पर सरकार से स्पष्ट जवाब क्यों जरूरी?

यहीं से EPS-95 Pensioners का सवाल फिर महत्वपूर्ण हो जाता है।

पेंशनर्स की मांग ₹7,500 न्यूनतम पेंशन की है। सरकार ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी है। ऐसे में सरकार को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि फंड की स्थिरता और भविष्य की देनदारियां चुनौती हैं।

जरूरत इस बात की है कि सरकार स्पष्ट आंकड़ों के साथ बताए कि ₹7,500 न्यूनतम पेंशन लागू करने में कितने अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी, वर्तमान EPS फंड की स्थिति क्या है और सरकार किस विकल्प पर विचार कर रही है।

क्योंकि ₹1,000 की पेंशन पाने वाला बुजुर्ग व्यक्ति भी महंगाई का सामना उसी बाजार में करता है, जिसमें बाकी लोग करते हैं।

आर्थिक न्याय का मतलब क्या है?

सुभाष चंद्रा का मामला और EPS-95 Pension एक ही कानूनी श्रेणी के विषय नहीं हैं। इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।

लेकिन लोकतंत्र में नीतिगत सवाल पूछना पूरी तरह उचित है।

एक तरफ insolvency कानून बड़े वित्तीय विवादों को समाधान के रास्ते पर ले जाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ लाखों पेंशनर्स अपनी न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

ऐसे में सरकार और नीति-निर्माताओं से पूछा जाना चाहिए कि देश के बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक न्यूनतम पेंशन सुनिश्चित करने की वास्तविक वित्तीय बाधा क्या है?

साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि insolvency व्यवस्था में creditors के हितों की पर्याप्त सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए, खासकर तब जब admitted claims और वास्तविक recovery के बीच इतना बड़ा अंतर दिखाई दे।

सवाल पेंशन का भी है और व्यवस्था पर भरोसे का भी

EPS-95 Pensioners की मांग केवल ₹7,500 की रकम तक सीमित नहीं है। यह उस भरोसे से जुड़ी है कि नौकरी के वर्षों के बाद बुजुर्गावस्था में उन्हें न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।

वहीं सुभाष चंद्रा का मामला यह सवाल सामने लाता है कि insolvency कानून के तहत creditors के हित और debtor के समाधान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

₹22,006.57 करोड़ और ₹6.25 करोड़ का अंतर निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन इसे सीधे “सरकारी कर्जमाफी” कहना सही नहीं होगा। यह व्यक्तिगत insolvency resolution से जुड़ा मामला है और इसके खिलाफ कुछ creditors कानूनी चुनौती की तैयारी में हैं।

फिर भी इस पूरे घटनाक्रम से एक सवाल जरूर निकलता है—

जब आर्थिक व्यवस्था बड़े वित्तीय विवादों के लिए कानूनी समाधान तलाश सकती है, तो EPS-95 के लाखों पेंशनर्स को ₹1,000 से सम्मानजनक न्यूनतम पेंशन तक पहुंचाने का रास्ता कब निकलेगा?

यही सवाल आज उन बुजुर्गों का है, जिन्होंने अपने कामकाजी जीवन में योगदान दिया और अब अपने बुढ़ापे के लिए सरकार से सिर्फ इतनी उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी पेंशन उनके जीवन की बुनियादी जरूरतों के सामने पूरी तरह बेबस न हो।

आर्थिक न्याय का असली अर्थ केवल बड़े वित्तीय मामलों का समाधान नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्ग को सम्मानजनक सुरक्षा देना भी है।

आलोक कुुमार