✦ Latest News Loading...

रविवार, 16 अगस्त 2026

India : अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा

 


अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा: असहमति और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

क्या अब बंदूक से नहीं, विचारों से लड़ी जाएगी नक्सलवाद की लड़ाई? और अगर विचारों की लड़ाई होगी, तो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कौन तय करेगा?

15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल ने स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री ने माओवादी और नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद के साथ-साथ ऐसी मानसिकता रखने वालों को भी पहचानना और अलग-थलग करना जरूरी है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।

यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है—क्या किसी हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थन और सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा?

प्रधानमंत्री के बयान को सरकार के नजरिए से देखें तो उसका तर्क समझ में आता है। भारत लंबे समय से माओवादी हिंसा और सशस्त्र उग्रवाद की चुनौती का सामना करता रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हिंसा, हथियारबंद विद्रोह और संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक कमजोर करने का प्रयास गंभीर सुरक्षा चुनौती है। ऐसे मामलों में राज्य का कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है।

लेकिन समस्या उस समय शुरू होती है जब हिंसक नक्सलवाद और शांतिपूर्ण असहमति के बीच की रेखा अस्पष्ट हो जाए।

लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि नागरिक सरकार से सवाल कर सकता है। कोई बेरोजगारी पर सवाल उठा सकता है, महंगाई का विरोध कर सकता है, किसी कानून को गलत बता सकता है, सरकारी योजना की कमियां गिना सकता है या संसद और सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है। पत्रकार सत्ता से कठिन प्रश्न पूछ सकता है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में बहस कर सकते हैं। लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता किसी नीति के खिलाफ अपनी राय रख सकते हैं।

इन गतिविधियों को अपने आप में नक्सली या राष्ट्रविरोधी मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा।

यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसकी परिभाषा क्या है?

प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि इस तरह के राजनीतिक विशेषण सरकार के आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तो व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इससे विवाद और राजनीतिक हो गया।

वहीं सत्ता पक्ष का तर्क अलग है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका संकेत उन लोगों की ओर है जो लोकतंत्र और देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ नक्सली या ‘अर्बन नक्सल’ जैसी विचारधारा फैलाने का प्रयास करते हैं। यानी सरकार का पक्ष यह है कि निशाना सामान्य आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी विचारधारा है जो हिंसा और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का समर्थन करती है।

यहीं से लोकतांत्रिक बहस की असली कसौटी सामने आती है।

किसी विचार से असहमति को उस विचार के हिंसक होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अगर कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है तो पहले यह देखा जाना चाहिए कि वह क्या कह रहा है, किस तरीके से कह रहा है और क्या वह हिंसा का समर्थन करता है। केवल सरकार विरोधी होना किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बना देता। इसी तरह किसी नीति का विरोध करना संविधान-विरोधी गतिविधि नहीं है।

भारत का लोकतंत्र इसी विविधता पर खड़ा है। यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका है। सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है और विपक्ष को सवाल पूछने का। मीडिया को सरकार की उपलब्धियां बताने के साथ उसकी कमियां उजागर करने का भी अधिकार है। विश्वविद्यालयों में विचारों का टकराव होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसलिए रास्ता बेहद स्पष्ट होना चाहिए—विचार का जवाब विचार से और अपराध का जवाब कानून से।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में हिंसा को बढ़ावा देता है, हथियारबंद विद्रोह का समर्थन करता है या संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से समाप्त करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहा है, तो उसे केवल राजनीतिक लेबल देकर अलग-थलग करना लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहीं यह धीरे-धीरे राजनीतिक असहमति का पर्याय न बन जाए।

आज यदि सत्ता पक्ष के आलोचक को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा और कल किसी दूसरी सरकार के विरोधी को कोई दूसरा राजनीतिक लेबल दिया जाएगा, तो सार्वजनिक बहस मुद्दों से हटकर आरोपों और पहचान की राजनीति में बदल सकती है।

स्वतंत्रता दिवस का महत्व यहां और बढ़ जाता है। 15 अगस्त केवल ब्रिटिश शासन से मिली स्वतंत्रता की स्मृति नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक यात्रा की याद भी है जिसमें भारतीय नागरिक ने अपनी आवाज, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी के लिए संघर्ष किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचार रखने की स्वतंत्रता, सवाल पूछने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असहमति की जगह भी है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि लोकतंत्र हिंसा को स्वीकार करे। लोकतंत्र हिंसा और शांतिपूर्ण असहमति के बीच स्पष्ट अंतर करता है। हिंसा कानून का विषय है, जबकि विचार लोकतांत्रिक बहस का।

इसलिए प्रधानमंत्री के बयान को सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक अर्थ में तभी देखा जा सकता है जब ‘दिमागी नक्सल’ से आशय केवल उन लोगों से हो जो वास्तव में हिंसक माओवादी विचारधारा या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करते हैं। लेकिन यदि यह शब्द पत्रकारों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं या आम नागरिकों की शांतिपूर्ण आलोचना के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह गंभीर लोकतांत्रिक चिंता पैदा करेगा।

आज जरूरत किसी नए राजनीतिक लेबल की नहीं, बल्कि स्पष्ट परिभाषा और संवैधानिक मर्यादा की है।

क्योंकि किसी भी सरकार की शक्ति केवल उसके बहुमत में नहीं होती। उसकी वास्तविक लोकतांत्रिक ताकत इस बात में भी दिखाई देती है कि वह अपने आलोचकों को कितना स्थान देती है।

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षा बलों, विकास और कानून के माध्यम से लड़ी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल सहमति से नहीं होती। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता के सामने सवाल पूछने की जगह बनी रहे।

इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द से शुरू हुई बहस का असली प्रश्न यही है—क्या यह हिंसक विचारधारा के खिलाफ चेतावनी बनेगा या असहमति पर नया राजनीतिक लेबल?

इसका उत्तर केवल सरकार या विपक्ष को नहीं देना है। इसका उत्तर पूरे लोकतांत्रिक समाज को देना होगा।

क्योंकि बंदूक का मुकाबला कानून कर सकता है, लेकिन विचारों का मुकाबला केवल विचारों से ही किया जा सकता है। और लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं—लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा है।

Keralam: राजा महाबली के स्वागत का पर्व

 

ओणम: राजा महाबली के स्वागत का पर्व, जहां फूलों की रंगोली से लेकर साद्या तक दिखती है केरल की संस्कृति

 क्या कोई त्योहार ऐसा भी हो सकता है, जिसमें राजा अपने राज्य में नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के दिलों में लौटता हो? केरल का ओणम इसी भावनात्मक और सांस्कृतिक विश्वास का उत्सव है। फूलों से घर-आंगन सजते हैं, पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू फैलती है, नौकाएं पानी पर दौड़ती हैं और लोकगीतों की धुनों के बीच राजा महाबली के स्वागत की तैयारी होती है।

केरल का प्रसिद्ध 10 दिवसीय फसल और सांस्कृतिक उत्सव ओणम 16 अगस्त 2026 को अथम से शुरू हो रहा है और इसका प्रमुख दिन तिरुवोनम 26 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। ओणम केवल फसल और समृद्धि की खुशी का पर्व नहीं है, बल्कि यह समानता, दान, वचन, सद्भाव और प्रजा के प्रति प्रेम की उस कल्पना को भी जीवित रखता है, जिसे राजा महाबली के आदर्श शासन से जोड़ा जाता है।

अथम से शुरू होती है दस दिनों की रंगीन यात्रा

ओणम के पहले दिन अथम से घरों के आंगन में फूलों की रंगोली यानी पूक्कलम बनाने की परंपरा शुरू होती है। जैसे-जैसे उत्सव के दिन आगे बढ़ते हैं, पूक्कलम में नए फूल और नए डिजाइन जुड़ते जाते हैं। तिरुवोनम के दिन यह रंग-बिरंगी सजावट अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है।

इन दस दिनों में केरल का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन उत्सव में बदल जाता है। पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विभिन्न लोककलाएं लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ती हैं। इसी दौरान होने वाली वल्लम कली यानी पारंपरिक नौका दौड़ ओणम की पहचान बन चुकी है।

ओणम का महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें परिवार और समाज को साथ आने का अवसर मिलता है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं, घरों में अतिथियों का स्वागत करते हैं और सामूहिक भोजन के माध्यम से सामाजिक एकता का अनुभव करते हैं।

कौन हैं राजा महाबली?

ओणम की आत्मा को समझने के लिए राजा महाबली की कथा को समझना जरूरी है। महाबली को मावेली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक परंपरा में उन्हें प्रह्लाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र बताया गया है।

कथा के अनुसार महाबली अत्यंत शक्तिशाली, न्यायप्रिय, दानी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके शासन में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। लोककथाओं में उनके राज्य को ऐसे आदर्श समाज के रूप में याद किया जाता है, जहां लोगों के बीच भेदभाव कम था और राजा अपनी प्रजा के कल्याण को प्राथमिकता देता था।

महाबली की लोकप्रियता और शक्ति इतनी बढ़ी कि देवताओं को चिंता होने लगी। पौराणिक कथा के अनुसार तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और महाबली की परीक्षा लेने उनके पास पहुंचे।

तीन पग भूमि और महाबली का महान वचन

कथा के अनुसार महाबली एक यज्ञ कर रहे थे और दान देने के लिए प्रसिद्ध थे। उसी समय वामन एक छोटे कद के ब्राह्मण बालक के रूप में उनके पास पहुंचे और केवल तीन पग भूमि मांग ली।

महाबली के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु हैं। उन्होंने राजा को सावधान किया। लेकिन महाबली अपने वचन से पीछे नहीं हटे।

दान की अनुमति मिलते ही वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश तथा स्वर्ग को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं था।

महाबली ने अपने वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा कदम उनके सिर पर रखा जाए। भगवान विष्णु ने उनके सिर पर तीसरा पग रखा और महाबली पाताल लोक चले गए।

लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। महाबली की दानशीलता, वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रिय प्रजा से मिलने पृथ्वी पर लौट सकेंगे।

लोकमान्यता है कि ओणम के दिनों में राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने केरल लौटते हैं। इसलिए लोग अपने घर सजाते हैं, पूक्कलम बनाते हैं और अपने प्रिय राजा के स्वागत की तैयारी करते हैं।

ओणम साद्या: केले के पत्ते पर सजी केरल की संस्कृति

ओणम का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण ओणम साद्या है। यह पारंपरिक रूप से एक शाकाहारी भोज होता है, जिसे केले के पत्ते पर विशेष तरीके से परोसा जाता है। इसमें कई तरह के व्यंजन शामिल होते हैं और बड़े आयोजनों में व्यंजनों की संख्या काफी अधिक हो सकती है।

साद्या में चोरु यानी चावल मुख्य भोजन होता है। इसके साथ परिप्पु, घी, सांभर और रसम परोसे जाते हैं। सब्जियों और पारंपरिक तैयारियों में अवियल, थोरन, ओलन, कालन, एरिसेरी और कूटू करी जैसे व्यंजन शामिल होते हैं।

इसके अलावा पचड़ी और किचड़ी, इंजीपुली, विभिन्न प्रकार के अचार और पपाडम भी भोजन का हिस्सा होते हैं। मीठे व्यंजनों में प्रथमन या पायसम का विशेष स्थान है। केले से बने पारंपरिक व्यंजन भी साद्या के स्वाद को अलग पहचान देते हैं।

भोजन के अंत में मोरु यानी मसालेदार छाछ भी परोसी जाती है।

साद्या केवल स्वाद का अनुभव नहीं है। केले के पत्ते पर एक साथ सजाए गए अनेक व्यंजन केरल की कृषि, स्थानीय उत्पादों, पाक-कला और सामूहिक जीवन की झलक दिखाते हैं। एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करने की परंपरा सामाजिक समानता और सामूहिकता की भावना को भी मजबूत करती है।

नौका दौड़ और लोककला बनाती है ओणम को खास

ओणम के दौरान केरल के अलग-अलग हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इनमें पारंपरिक नृत्य और लोककलाओं की विशेष भूमिका रहती है।

वल्लम कली, जिसे स्नेक बोट रेस के रूप में भी जाना जाता है, ओणम उत्सव की सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है। लंबी पारंपरिक नावों में सवार नाविक सामूहिक ताल और गीतों के साथ पानी को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन, सहयोग और स्थानीय परंपरा का प्रदर्शन भी है।

इस तरह ओणम खेत से लेकर नदी तक और घर के आंगन से लेकर सामुदायिक आयोजनों तक पूरे केरल को उत्सव के रंग में रंग देता है।

ओणम का संदेश आज भी प्रासंगिक

राजा महाबली की कथा को केवल पौराणिक प्रसंग मानकर छोड़ देना ओणम के व्यापक सामाजिक संदेश को सीमित कर देगा। इस कथा के केंद्र में दान, वचन, विनम्रता, भक्ति और प्रजा के प्रति प्रेम जैसे मूल्य दिखाई देते हैं।

महाबली के पास शक्ति और वैभव था, लेकिन निर्णायक क्षण में उन्होंने अपने वचन को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने अपना राज्य खोया, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। यही कारण है कि लोकस्मृति में उनका स्थान ऐसे राजा के रूप में बना रहा, जिसकी प्रजा आज भी उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है।

ओणम यह संदेश भी देता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि केवल धन से नहीं मापी जाती। जब परिवार एक साथ बैठते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे के सुख में शामिल होते हैं, भोजन साझा किया जाता है और लोकपरंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं, तभी संस्कृति वास्तव में जीवित रहती है।

16 अगस्त से शुरू होकर 26 अगस्त 2026 के तिरुवोनम तक चलने वाला यह उत्सव केवल केरल की पहचान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। इसमें एक राजा की स्मृति फूलों की रंगोली, नौकाओं की गति, लोकनृत्यों, गीतों और केले के पत्ते पर सजे भोजन के माध्यम से आज भी जीवित दिखाई देती है।

और शायद ओणम का सबसे खूबसूरत संदेश यही है—राजा महाबली लौटते हैं या नहीं, लेकिन उनकी प्रजा के सुख, समानता और समृद्धि का सपना हर वर्ष ओणम के साथ जरूर लौटता है।


शनिवार, 15 अगस्त 2026

India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 


असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा?

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की।

ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है।

भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक बदलावों का मूल्यांकन भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या 1947 से 2014 तक की भारत की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को ही कमतर करके 2014 को एक निर्णायक शुरुआत के रूप में पेश किया जाना चाहिए?

यहीं भाजपा के अपने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अटल बिहारी वाजपेयी का दौर।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओं में रहे। वे 1996 में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने और फिर 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। उस समय भी भारत वही लोकतांत्रिक गणराज्य था, जिसकी नींव 1947 की स्वतंत्रता और 1950 के संविधान के बाद मजबूत हुई थी।

तो यदि 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” भारत नहीं था, तो 1998 से 2004 के बीच का भारत क्या था?

क्या उस समय भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था?

क्या देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते थे?

क्या संसद अस्तित्व में नहीं थी?

क्या सरकार जनता के जनादेश से नहीं बनी थी?

और क्या भाजपा स्वयं उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी?

इन सवालों का उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ है—भारत तब भी एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य था। जनता सरकार चुनती थी, सरकारें बदलती थीं और संविधान देश के शासन का आधार था।

वाजपेयी का दौर भाजपा की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और चुनौतियों का सामना किया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। 1999 का कारगिल युद्ध भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। उसी दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और संचार क्षेत्र में विस्तार जैसे मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

इसलिए 2014 को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन मानना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसे भारत की आजादी का दूसरा जन्म बताना ऐतिहासिक दृष्टि से अलग तरह का दावा है।

2014 एक राजनीतिक परिवर्तन का वर्ष है; 1947 एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता का वर्ष।

दोनों घटनाओं का महत्व अलग है।

यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श को स्वस्थ बनाता है। किसी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए देश के पिछले 67 वर्षों को असफल या अधूरा बताना आवश्यक नहीं है। इसी तरह 2014 से पहले की सरकारों की उपलब्धियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि 2014 के बाद हुए बदलावों से असहमति नहीं हो सकती।

भारत की कहानी किसी एक सरकार से शुरू नहीं होती और किसी एक सरकार पर खत्म भी नहीं होती।

कांग्रेस के शासन में देश ने कई संस्थाएं और नीतियां विकसित कीं। जनता पार्टी के दौर में सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक क्षमता सामने आई। भाजपा के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकारों ने आर्थिक नीति, अधिकार आधारित कानूनों और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से अपनी छाप छोड़ी। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी अनेक नीतिगत और राजनीतिक बदलाव हुए।

इन सभी चरणों को जोड़कर ही आधुनिक भारत की तस्वीर बनती है।

देश की आजादी किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है।

15 अगस्त 1947 का महत्व इसलिए नहीं है कि उस दिन कोई एक सरकार सत्ता में आई थी। उसका महत्व इसलिए है कि सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन के बाद भारत ने अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था।

इसी तरह 2014 का महत्व इसलिए है कि उस वर्ष केंद्र में सत्ता का एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ। लेकिन सत्ता परिवर्तन और स्वतंत्रता प्राप्ति को समान अर्थ देना इतिहास और राजनीति के बीच की सीमा को धुंधला कर सकता है।

भाजपा यदि 2014 के बाद की उपलब्धियों पर गर्व करती है, तो उसे पूरा अधिकार है। लेकिन उसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा होने के कारण उसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर पर भी गर्व होना चाहिए।

क्योंकि यदि वाजपेयी का शासन भाजपा की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवपूर्ण अध्याय है, तो यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि 2014 से पहले का भारत गुलाम भारत नहीं था।

वह वही भारत था जिसने संविधान को स्वीकार किया, चुनावों की लंबी परंपरा बनाई, सत्ता परिवर्तन देखे, युद्ध झेले, आर्थिक संकटों से निकला, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान कायम की।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “असली आजादी” किस सरकार के समय मिली।

बहस यह होनी चाहिए कि आजादी मिलने के बाद भारत को और अधिक स्वतंत्र, समान, सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाने के लिए किस सरकार ने क्या किया।

क्योंकि किसी पुराने दौर को छोटा करके किसी नए दौर की उपलब्धि बड़ी नहीं होती।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि हर सरकार अपने काम से इतिहास में जगह बनाए—इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा परिभाषित करके नहीं।


आलोक कुमार


Ranchi : मिशन की ओर उन्मुख बुलाहट : झारखंड-बिहार में नई सुदृढ़ता की सिनॉडल दृष्टि

मिशन की ओर उन्मुख बुलाहट : झारखंड-बिहार में नई सुदृढ़ता की सिनॉडल दृष्टि

क्या बुलाहट संवर्धन केवल धार्मिक जीवन में प्रवेश करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित है, या युवाओं को सुनने, समझने, साथ चलने और मिशन के लिए तैयार करने की व्यापक प्रक्रिया भी है? रांची में आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार ने बुलाहट संवर्धन को इसी नई मिशनरी और सिनॉडल दृष्टि से देखने की कोशिश की।

रांची। कलीसिया में बुलाहट यानी Vocation की चर्चा लंबे समय से धर्मगुरुओं, धर्मबहनों और समर्पित धार्मिक जीवन के लिए युवाओं को प्रेरित करने के संदर्भ में होती रही है। लेकिन बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में बुलाहट की समझ को भी व्यापक बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि कितने युवा धार्मिक जीवन की ओर आकर्षित हो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि कलीसिया युवाओं को किस तरह सुन रही है, उनके साथ कैसे चल रही है और उन्हें मिशन में किस प्रकार सहभागी बना रही है।

इसी दिशा में 12 से 14 अगस्त 2026 तक CCBI VSCR Commission की ओर से रांची स्थित Social Development Centre में बिहार-झारखंड क्षेत्र के Vocation Promoters और प्रारंभिक स्तर के Formators के लिए तीन दिवसीय National Zone Seminar-cum-Workshop आयोजित किया गया।

“Strengthening Vocation Promotion through Pastoral Mission Orientation” विषय पर आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 57 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। आयोजन का उद्देश्य केवल बुलाहट संवर्धन की तकनीकों पर चर्चा करना नहीं था, बल्कि इसे एक ऐसी पास्तोरल, मिशनरी और सिनॉडल प्रक्रिया के रूप में समझना था, जिसमें युवा स्वयं कलीसिया की यात्रा के सक्रिय सहभागी बन सकें।

रांची के सहायक धर्माध्यक्ष बिशप आनंद डेविड खलखो ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। वहीं CCBI VSCR Commission के Executive Secretary फादर चार्ल्स लियोन ने आज के युवाओं के सामने मौजूद सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों को समझने तथा उनके साथ प्रभावी ढंग से चलने की आवश्यकता पर मार्गदर्शन दिया।
सेमिनार से उभरने वाला सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि बुलाहट को केवल संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया मानना पर्याप्त नहीं है। किसी युवा को धार्मिक जीवन की ओर प्रेरित करने से पहले उसके जीवन को समझना जरूरी है। उसके सपने क्या हैं? उसके संघर्ष क्या हैं? वह किन सामाजिक परिस्थितियों से गुजर रहा है? विश्वास, कलीसिया और अपने भविष्य को लेकर उसके मन में कौन से सवाल हैं?

इन प्रश्नों को सुने बिना बुलाहट संवर्धन अधूरा रह सकता है।
मुख्य वक्ता मोस्ट रेव. विंसेंट ऐंड, रांची के महाधर्माध्यक्ष एवं CCBI के महासचिव, ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि vocation promotion केवल कुछ नियुक्त व्यक्तियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी कलीसिया का मिशन है। इसके केंद्र में सुनना, विवेक करना, साथ देना और मिशनरी पहुंच जैसे तत्व होने चाहिए।
यही दृष्टि आज के समय में विशेष महत्व रखती है। नई पीढ़ी केवल निर्देश सुनना नहीं चाहती; वह संवाद, सम्मान और सहभागिता को भी महत्व देती है। यदि युवा यह महसूस करे कि कलीसिया उसे केवल कुछ बताना नहीं चाहती, बल्कि उसकी बात भी सुनना चाहती है, तो विश्वास और संबंध दोनों अधिक मजबूत हो सकते हैं।

हाशिये के समुदायों तक पहुंच जरूरी
सेमिनार में समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और प्रवासी आबादी को भी बुलाहट संवर्धन की मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया गया। फादर जैसन वडास्सेरी ने इस महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखा।
यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर की बुलाहट किसी एक सामाजिक वर्ग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि बुलाहट संवर्धन वास्तव में मिशनरी है, तो उसे उन समुदायों तक भी पहुंचना होगा जो सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र से अक्सर दूर रह जाते हैं।

झारखंड और बिहार के संदर्भ में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीण समाज, आदिवासी समुदाय, प्रवासी परिवार, शहरी युवा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में एक ही प्रकार की Vocation Promotion रणनीति हर युवा तक समान प्रभाव से नहीं पहुंच सकती।

डिजिटल दुनिया में बुलाहट की नई राह
इसी क्रम में फादर वैलेरियन लोबो ने डिजिटल माध्यमों और नई तकनीकों के उपयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। आज युवाओं का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया, मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संवाद करता है। इसलिए कलीसिया के लिए भी जरूरी है कि वह युवाओं तक पहुंचने के लिए केवल पारंपरिक माध्यमों पर निर्भर न रहे।

डिजिटल माध्यमों का उपयोग केवल धार्मिक संदेशों के प्रसार तक सीमित नहीं होना चाहिए। ये युवाओं को सुनने, उनके प्रश्नों का उत्तर देने, विश्वास से जुड़े विषयों पर संवाद करने और व्यक्तिगत संबंध विकसित करने के अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।

इस दृष्टि से भविष्य का Vocation Promotion केवल चर्च परिसर, स्कूल या युवा शिविरों तक सीमित नहीं रहेगा। उसे डिजिटल दुनिया में भी अपनी प्रभावी और जिम्मेदार उपस्थिति बनानी होगी।

Mission 2033 और आगे की दिशा
तीन दिवसीय आयोजन का समापन CCBI Mission 2033 Pastoral Plan पर चिंतन के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने बुलाहट संवर्धन को अधिक पास्तोरल, मिशनरी और सिनॉडल संस्कृति में आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
लेकिन यह प्रतिबद्धता केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाकर पूरी नहीं होगी। इसके लिए परिवारों, पल्ली समुदायों, विद्यालयों, युवा समूहों और धार्मिक संस्थाओं के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक होगा।

वास्तव में आज कलीसिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने युवा सेमिनरी या कॉन्वेंट की ओर जा रहे हैं। इससे बड़ा प्रश्न यह है—क्या कलीसिया युवाओं को सचमुच सुन रही है? क्या वह उनके प्रश्नों और संघर्षों के साथ चल रही है? क्या युवाओं को केवल भविष्य का नेतृत्वकर्ता माना जा रहा है या आज के मिशन का सहभागी भी?

रांची का यह आयोजन इसी बदलाव की ओर संकेत करता है।
बुलाहट की खेती केवल Vocation Camp, सेमिनरी या कॉन्वेंट में नहीं होती। इसकी शुरुआत परिवार में होती है, विद्यालय में होती है, पल्ली समुदाय में होती है और युवा समूहों के बीच होती है। इसलिए बुलाहट संवर्धन को कुछ लोगों या समितियों का काम मानने के बजाय पूरी कलीसिया की साझा जिम्मेदारी बनाना ही सिनॉडल दृष्टि की वास्तविक परीक्षा है।

युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान के सहभागी
जरूरत इस बात की है कि युवा को केवल “भविष्य का धर्मगुरु” या “भविष्य की धर्मबहन” समझने के बजाय आज के मिशन का सहभागी माना जाए। इससे बुलाहट की अवधारणा व्यापक होगी और कलीसिया तथा युवाओं के बीच संबंध भी मजबूत होंगे।

झारखंड और बिहार जैसे विविध सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में यह दृष्टिकोण कलीसिया के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां अलग-अलग समुदायों, भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच मिशन को आगे बढ़ाने के लिए ऐसी बुलाहट संवर्धन प्रक्रिया चाहिए जो स्थानीय वास्तविकताओं को समझे और युवाओं को केवल लक्ष्य समूह नहीं, बल्कि मिशन के सहयात्री के रूप में देखे।

रांची में हुआ यह सेमिनार इसी परिवर्तन की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा सकता है। इसका संदेश स्पष्ट है—बुलाहट को केवल खोजना नहीं, उसे सुनना है; युवाओं को केवल बुलाना नहीं, उनके साथ चलना है; और कलीसिया के भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करनी, बल्कि आज से ही उसके मिशनरी भविष्य का निर्माण करना है।
यही सिनॉडल कलीसिया की पहचान भी है—जहां कोई अकेला नहीं चलता, बल्कि सभी सुनते हैं, समझते हैं, विवेक करते हैं और साथ मिलकर मिशन की राह आगे बढ़ाते हैं।

झारखंड और बिहार में बुलाहट संवर्धन की यह नई दृष्टि यदि परिवार से लेकर पल्ली, विद्यालय, युवा समूह और डिजिटल मंचों तक व्यवहार में उतरती है, तो इसका प्रभाव केवल धार्मिक vocations को मजबूत करने तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरी कलीसिया को अधिक सहभागी, संवेदनशील, संवादशील और मिशनरी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

— आलोक कुमार

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

India : जब धर्म-शिक्षा संवाद बने, तभी चर्च सचमुच सहभागी बनेगा

 


जब धर्म-शिक्षा संवाद बने, तभी चर्च सचमुच सहभागी बनेगा

क्या धर्म-शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित रहेगी, या वह लोगों को सुनने, समझने और साथ चलने की संस्कृति भी सिखाएगी? अहमदाबाद धर्मप्रांत में हुआ एक दिवसीय सेमिनार इसी सवाल का जवाब तलाशता दिखाई दिया।

चर्च केवल उपदेश देने वाली संस्था नहीं, बल्कि साथ चलने वाला समुदाय है। यही Synodality की मूल भावना है—सुनना, सहभागिता और मिलकर आगे बढ़ना। इसी दृष्टि को धर्म-शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक रूप देने के लिए अहमदाबाद धर्मप्रांत ने 11 अगस्त 2026 को “Synodal Approaches in Catechetics and Introduction to YOUCAT” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार आयोजित किया।

इस आयोजन में 67 पुरोहितों, धर्मबहनों, धार्मिक समुदायों के सदस्यों और कैटेचिस्टों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन "फादर विजय मचाडो", CCBI Commission for Faith Formation के Executive Secretary, ने किया। लेकिन इस आयोजन की अहमियत केवल प्रतिभागियों की संख्या में नहीं, बल्कि उस सोच में है जिसे धर्म-शिक्षा के भविष्य के लिए सामने रखा गया।

आज की पीढ़ी केवल यह सुनना नहीं चाहती कि उसे क्या मानना चाहिए। वह यह भी जानना चाहती है कि क्यों मानना चाहिए, उसे कैसे समझना चाहिए और अपने जीवन में विश्वास को किस तरह उतारना चाहिए। ऐसे समय में YOUCAT जैसे संवादात्मक माध्यम धर्म-शिक्षा को अधिक सहभागी, प्रश्नोन्मुख और जीवन से जुड़ा बनाने की संभावना रखते हैं।

धर्म-शिक्षा में संवाद क्यों जरूरी?

सेमिनार में "Synodal Approaches in Catechetics", "Spiritual Conversation Methodology" और "YOUCAT Dialogical Method" पर विशेष चर्चा हुई। इन पद्धतियों का मूल संदेश स्पष्ट है—धर्म-शिक्षा में केवल बोलने वाला शिक्षक और सुनने वाला विद्यार्थी नहीं होना चाहिए। वहां संवाद होना चाहिए, प्रश्नों के लिए जगह होनी चाहिए और अपने अनुभवों को साझा करने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए।

धर्म और विश्वास से जुड़े सवाल हमेशा केवल किताबों के सवाल नहीं होते। वे व्यक्ति के परिवार, संबंधों, संघर्षों, भविष्य, रोजगार, शिक्षा, समाज और व्यक्तिगत अनुभवों से भी जुड़े होते हैं। इसलिए यदि कैटेकेसिस केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की गतिविधि बनकर रह जाए, तो वह जीवन की वास्तविक समस्याओं से कट सकती है।

इसके विपरीत, यदि धर्म-शिक्षा व्यक्ति के जीवन, प्रश्नों, संघर्षों और आध्यात्मिक खोज से जुड़े, तो वही प्रक्रिया समुदाय निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

आज बच्चे इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से अनेक विचारों से परिचित होते हैं। युवा धार्मिक, सामाजिक और नैतिक प्रश्नों पर खुलकर चर्चा करना चाहते हैं। परिवार भी बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे वातावरण में धर्म-शिक्षा का तरीका भी ऐसा होना चाहिए जो प्रश्नों से घबराए नहीं, बल्कि प्रश्नों को विश्वास की गहरी समझ तक पहुंचने का अवसर बनाए।

सेमिनार से पैरिश तक

अहमदाबाद के इस सेमिनार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि प्रतिभागियों ने केवल विचार-विमर्श नहीं किया, बल्कि "पैरिश स्तर की pastoral plans" भी तैयार कीं। इसका अर्थ है कि कार्यक्रम का उद्देश्य केवल एक दिन का प्रशिक्षण देना नहीं था, बल्कि वहां मिली सीख को स्थानीय कलीसियाई जीवन में उतारने की दिशा में कदम बढ़ाना भी था।

यही किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम की वास्तविक परीक्षा है। सभागार में लिए गए संकल्प तभी सार्थक होते हैं, जब वे पैरिश, परिवार और समुदाय के जीवन में दिखाई दें।

यदि तैयार की गई योजनाएं नियमित रूप से लागू होती हैं, तो कैटेकेसिस केवल रविवार की कक्षा या धार्मिक पाठ तक सीमित नहीं रहेगी। वह युवाओं की बैठकों, परिवारों के संवाद, बच्चों की धार्मिक शिक्षा और समुदाय के सामूहिक जीवन का हिस्सा बन सकती है।

 “From womb to tomb” की व्यापक दृष्टि

धर्म-शिक्षा को भी अब जीवन के अलग-अलग चरणों से जोड़ने की आवश्यकता है। सेमिनार में सामने आई “from womb to tomb” यानी गर्भ से कब्र तक की भावना इसी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करती है।

विश्वास-निर्माण केवल बच्चों की धार्मिक कक्षाओं तक सीमित नहीं हो सकता। युवाओं, विवाहित दंपतियों, अभिभावकों, बुजुर्गों और जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके लोगों के लिए भी निरंतर और संवेदनशील faith formation की आवश्यकता है।

बच्चे को विश्वास की पहली शिक्षा परिवार से मिलती है। युवा अपने जीवन के उद्देश्य और भविष्य को लेकर प्रश्न करता है। विवाह के बाद विश्वास को परिवार और संबंधों के अनुभव से जोड़ना पड़ता है। बुजुर्गों के लिए विश्वास जीवन की स्मृतियों, अनुभवों और आशा का आधार बन सकता है। इसलिए धर्म-शिक्षा को जीवन के हर पड़ाव के साथ चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक सार्थक होगा।

Synodal Church की असली कसौटी

Synodal Church का अर्थ केवल बैठकें आयोजित करना नहीं है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति को केवल सदस्य नहीं, बल्कि सहभागी माना जाए। कैटेचेसिस इस सहभागिता का मजबूत आधार बन सकती है—यदि उसमें सुनने की क्षमता, संवाद की स्वतंत्रता और सामूहिक discernment की भावना हो।

यहीं से चर्च के सामने एक बड़ा सवाल भी आता है—क्या सामान्य लोकधर्मी केवल कार्यक्रमों में भाग लेने वाले लोग हैं, या वे चर्च के चिंतन और मिशन में सक्रिय भागीदार भी हैं?

यदि उत्तर दूसरा है, तो धर्म-शिक्षा में उनकी आवाज, अनुभव और प्रश्नों को स्थान देना आवश्यक होगा। संवाद तभी वास्तविक होगा जब वह दोतरफा हो।

अहमदाबाद धर्मप्रांत का यह प्रयास इसलिए उल्लेखनीय है कि उसने धर्म-शिक्षा को केवल पाठ पढ़ाने की प्रक्रिया न मानकर "साथ चलने, साथ सुनने और साथ सीखने की प्रक्रिया" के रूप में देखने का आग्रह किया है।

अब असली परीक्षा 11 अगस्त के बाद शुरू होती है। क्या तैयार की गई parish plans जमीन पर उतरेंगी? क्या YOUCAT और dialogical methods युवाओं तथा परिवारों तक पहुंचेंगे? क्या कैटेकेसिस पैरिश जीवन का नियमित और अभिन्न हिस्सा बनेगी? क्या लोगों के प्रश्नों को पर्याप्त जगह मिलेगी?

यदि इन सवालों का उत्तर सकारात्मक रहा, तो यह सेमिनार केवल एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं रहेगा। वह अहमदाबाद धर्मप्रांत में धर्म-शिक्षा की एक नई दिशा का प्रारंभ बन सकता है।

क्योंकि जीवंत विश्वास केवल सिखाया नहीं जाता। उसे "सुना जाता है, समझा जाता है, प्रश्नों के साथ परखा जाता है, जीवन में जिया जाता है और समुदाय के साथ साझा किया जाता है।"

यही वह बिंदु है जहां धर्म-शिक्षा, केवल धार्मिक पाठ्यक्रम न रहकर, सहभागी चर्च के निर्माण की शक्ति बन सकती है।

आलोेक कुमार

Bihar : पल्ली परिषद की बैठक में क्या होता है? लोकधर्मियों को जानकारी क्यों नहीं मिलती?

पल्ली परिषद की बैठक में क्या होता है? लोकधर्मियों को जानकारी क्यों नहीं मिलती?


अगर पल्ली परिषद में पल्ली के विकास, कार्यक्रमों, समितियों और समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होती है, तो यह सवाल स्वाभाविक है—जिस समुदाय के लिए फैसले लिए जाते हैं, क्या उस समुदाय को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि बैठक में क्या चर्चा हुई और क्या निर्णय लिए गए?

कैथोलिक चर्च की स्थानीय व्यवस्था में पल्ली परिषद (Parish Council) लोकधर्मियों की सहभागिता का एक महत्वपूर्ण मंच मानी जाती है। इसका उद्देश्य केवल बैठक करना या कार्यक्रमों की सूची बनाना नहीं, बल्कि पल्ली के जीवन, मिशन, सामाजिक सेवा, धार्मिक गतिविधियों और विकास से जुड़े विषयों में लोकधर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी है।

लेकिन इसी व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल लगातार सामने आता है—पल्ली परिषद की बैठकों में आखिर क्या होता है और आम लोकधर्मियों को उसकी जानकारी कितनी मिलती है?

यह सवाल किसी व्यक्ति, पुरोहित या किसी विशेष पल्ली को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है। यह सवाल व्यवस्था की पारदर्शिता और समुदाय की सहभागिता से जुड़ा है।

पल्ली परिषद क्या है?

अलग-अलग धर्मप्रांतों में पल्ली परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली स्थानीय नियमों के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्यतः इसमें लोकधर्मियों के प्रतिनिधि और अन्य निर्धारित सदस्य शामिल होते हैं।

परिषद में पल्ली के धार्मिक कार्यक्रमों, सामाजिक गतिविधियों, युवाओं और बच्चों से जुड़े कार्यक्रमों, सेवा कार्यों, समितियों, विकास योजनाओं तथा समुदाय की आवश्यकताओं पर विचार किया जा सकता है।

इस दृष्टि से पल्ली परिषद को केवल प्रशासनिक समिति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह **लोकधर्मियों और पल्ली नेतृत्व के बीच संवाद का माध्यम** भी हो सकती है।

यही कारण है कि परिषद जितनी महत्वपूर्ण होगी, उसके कामकाज में पारदर्शिता और संवाद का महत्व भी उतना ही बढ़ेगा।

पारदर्शिता का सवाल क्यों?

यदि परिषद में पल्ली के सामूहिक हित से जुड़े विषयों पर चर्चा होती है, तो बैठक के बाद कम-से-कम प्रमुख निर्णयों और आगामी कार्यों की जानकारी समुदाय तक पहुंचना स्वाभाविक अपेक्षा हो सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि बैठक में कही गई हर बात सार्वजनिक कर दी जाए।

व्यक्तिगत समस्याएं, अनुशासनात्मक मामले, निजी विवाद या संवेदनशील विषय गोपनीय रखना आवश्यक हो सकता है। लेकिन यदि किसी बैठक में पल्ली के विकास, सामाजिक सेवा, कार्यक्रमों, समितियों या सामुदायिक परियोजनाओं के संबंध में निर्णय लिए गए हैं, तो उनके बारे में सामान्य जानकारी समुदाय को दी जा सकती है।

यहीं गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन की आवश्यकता सामने आती है।

 कुर्जी पल्ली से उठा सवाल

कुर्जी पल्ली परिषद से संबंधित एक बातचीत में जब बैठक में हुई चर्चा की जानकारी देने का अनुरोध किया गया, तो परिषद के एक सदस्य की ओर से कथित तौर पर कहा गया:

“We can't talk about what we discussed in the parish council meeting.”**

अर्थात, “हम पल्ली परिषद की बैठक में क्या चर्चा हुई, उसके बारे में बात नहीं कर सकते।”

यदि यह कथन सही संदर्भ में सामने आया है, तो इससे कई सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या परिषद की पूरी बैठक गोपनीय होती है? क्या केवल कुछ संवेदनशील विषय गोपनीय होते हैं? क्या परिषद के निर्णयों का कोई संक्षिप्त विवरण तैयार किया जाता है? यदि तैयार होता है तो क्या वह लोकधर्मियों तक पहुंचाया जाता है?

इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि **एक स्पष्ट और स्वस्थ व्यवस्था की आवश्यकता पर चर्चा करना** है।

 संसद से तुलना कितनी उचित?

पल्ली परिषद की तुलना सीधे संसद या विधानसभा से नहीं की जा सकती। संसद संवैधानिक संस्था है, जबकि पल्ली परिषद चर्च की स्थानीय धार्मिक-सामुदायिक व्यवस्था का हिस्सा है।

फिर भी पारदर्शिता की भावना के स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं से कुछ सीख जरूर ली जा सकती है।

संसद में प्रश्न पूछे जाते हैं, बहस होती है, समितियां काम करती हैं और कार्यवाही का रिकॉर्ड तैयार होता है। इसी तरह किसी पल्ली परिषद में भी सामुदायिक हित से जुड़े निर्णयों का व्यवस्थित रिकॉर्ड और उसका उपयुक्त सार्वजनिक सारांश लोगों में विश्वास बढ़ा सकता है।

पूरी मिनट्स नहीं, निर्णयों का सारांश

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

बैठक की पूरी मिनट्स सार्वजनिक करना और बैठक के निर्णयों का सार्वजनिक सारांश देना एक ही बात नहीं है।

मान लीजिए परिषद में किसी व्यक्ति से जुड़ा संवेदनशील मामला आया। उसकी पूरी चर्चा सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।

लेकिन यदि परिषद ने यह तय किया कि युवाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होगा, गरीब परिवारों के लिए सेवा परियोजना चलेगी, किसी समिति को नई जिम्मेदारी दी जाएगी या कोई सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, तो इन फैसलों की सामान्य जानकारी पल्लीवासियों को दी जा सकती है।

इससे गोपनीयता भी बनी रहेगी और समुदाय को जानकारी भी मिलेगी।

 लोकधर्मी प्रतिनिधि की भूमिका

लोकधर्मी प्रतिनिधि की भूमिका केवल बैठक में उपस्थित होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

वह पल्ली और परिषद के बीच सेतु बन सकता है।

लोगों की समस्याओं और सुझावों को परिषद तक पहुंचाना तथा परिषद के सामूहिक निर्णयों की जानकारी समुदाय तक पहुंचाना उसकी सहभागिता को अधिक प्रभावी बना सकता है।

बेशक, यह सब धर्मप्रांत और पल्ली के नियमों तथा आवश्यक गोपनीयता की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।

क्योंकि सहभागिता के बिना प्रतिनिधित्व अधूरा है और जवाबदेही के बिना सहभागिता कमजोर पड़ जाती है।

क्या हो सकता है पारदर्शिता मॉडल?

हर पल्ली में बैठक के बाद एक छोटा **Parish Council Bulletin** जारी किया जा सकता है।

इसमें केवल प्रमुख और सार्वजनिक जानकारी शामिल हो, जैसे—

*बैठक की तारीख

*प्रमुख विषय

* लिए गए सामूहिक निर्णय

* गठित समितियां

* समितियों को दी गई जिम्मेदारियां

* पिछली बैठक के निर्णयों की प्रगति

* आगामी कार्यक्रम

* आवश्यक सामुदायिक सहयोग

इसे चर्च नोटिस बोर्ड, मुद्रित बुलेटिन, वेबसाइट या अधिकृत डिजिटल माध्यमों से साझा किया जा सकता है।

इस व्यवस्था में व्यक्तिगत और संवेदनशील मामलों को शामिल करने की जरूरत नहीं होगी।

पारदर्शिता से विश्वास बढ़ता है

किसी भी संस्था में जानकारी का अभाव अक्सर गलतफहमी और संदेह को जन्म देता है।

इसके विपरीत, स्पष्ट और संतुलित जानकारी लोगों को संस्था से जोड़ती है।

यदि लोगों को पता हो कि परिषद किन सामुदायिक विषयों पर काम कर रही है, किसे कौन-सी जिम्मेदारी दी गई है और किसी निर्णय पर कितनी प्रगति हुई है, तो वे भी बेहतर तरीके से सहयोग कर सकते हैं।

लोकधर्मियों को केवल कार्यक्रमों में शामिल करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें जानकारी, संवाद, सहभागिता और जवाबदेही की प्रक्रिया में स्थान देना भी जरूरी है।

सवाल कुर्जी से आगे का है

कुर्जी पल्ली परिषद से संबंधित कथित जवाब को पूरे चर्च या सभी पल्ली परिषदों की स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। प्रत्येक पल्ली की व्यवस्था अलग हो सकती है।

लेकिन इस प्रसंग ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा किया है—

क्या पल्ली परिषदों के लिए पारदर्शिता और सूचना-साझाकरण की स्पष्ट नीति होनी चाहिए?

यदि हां, तो कौन-सी जानकारी लोकधर्मियों को दी जाए और कौन-सी जानकारी गोपनीय रखी जाए?

यही बहस अब अधिक गंभीरता से होनी चाहिए।

द्वितीय वाटिकन महासभा ने चर्च के जीवन और मिशन में लोकधर्मियों की सक्रिय भूमिका पर जोर दिया। उस भावना को मजबूत करने के लिए केवल परिषद का गठन पर्याप्त नहीं है।

प्रतिनिधित्व के साथ संवाद, सहभागिता के साथ जवाबदेही और नेतृत्व के साथ पारदर्शिता भी जरूरी है।

आखिर जिस समुदाय के नाम पर पल्ली परिषद काम करती है, उस समुदाय को कम-से-कम यह जानने का अवसर तो मिलना ही चाहिए कि उसके प्रतिनिधि किन सामूहिक मुद्दों पर विचार कर रहे हैं, कौन-से निर्णय लिए गए हैं और उन निर्णयों का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है।

पल्ली परिषद की मजबूती केवल उसकी बैठकों से नहीं, बल्कि समुदाय के विश्वास से तय होगी। और विश्वास वहीं मजबूत होता है, जहां संवाद, सहभागिता और पारदर्शिता साथ-साथ चलें।


आलोेक कुमार

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

India : 15 अगस्त से देशभर में चलेगा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान

 जेन अल्फा की स्कूली समस्याओं की जिम्मेदारी अब जेन जी के कंधों पर


15 अगस्त से देशभर में चलेगा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान, ग्रामीण सरकारी स्कूलों का होगा सोशल ऑडिट

आजादी के 80 साल बाद भी अगर गांव का बच्चा पानी, शौचालय और बिजली के लिए तरसे, तो सवाल सिर्फ स्कूल का नहीं—हमारी सामूहिक जवाबदेही का है।

जेन अल्फा यानी आज की नई पीढ़ी के बच्चों की स्कूली समस्याओं को लेकर अब जेन जी के युवाओं ने जमीनी पहल की जिम्मेदारी उठाने का दावा किया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक **अभिजीत दीपके** ने स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त से ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए राष्ट्रव्यापी **‘स्कूल ठीक करो’ अभियान** शुरू करने की घोषणा की है। इस अभियान का उद्देश्य केवल सरकारी स्कूलों की कमियां गिनाना नहीं, बल्कि गांव के लोगों को स्कूलों की निगरानी, सवाल पूछने और सुधार की प्रक्रिया से सीधे जोड़ना है।

अभियान के तहत ग्रामीण सरकारी स्कूलों का **सोशल ऑडिट** करने और स्थानीय स्तर पर उनकी वास्तविक स्थिति सामने लाने की योजना है। साथ ही गांव के सरपंचों को **‘सरपंच चैलेंज’** दिया जाएगा, ताकि पंचायत स्तर पर स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रतिस्पर्धात्मक और सकारात्मक माहौल बनाया जा सके।

 स्कूलों की जमीनी हकीकत सामने लाने की कोशिश

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान में अभिभावकों, युवाओं और ग्रामीण नागरिकों से अपने गांव के सरकारी स्कूलों का दौरा करने की अपील की जाएगी। उनसे स्कूल में बिजली, पीने का पानी, शौचालय, मिड-डे मील, कक्षाओं की स्थिति और दूसरी आवश्यक सुविधाओं की वास्तविक स्थिति देखने को कहा जाएगा।

किसी स्कूल में सुविधा की कमी मिलने पर ग्रामीण उसकी तस्वीर या वीडियो बनाकर समस्या को सार्वजनिक कर सकते हैं। इससे सरकारी योजनाओं और कागजी दावों के साथ-साथ स्कूल की वास्तविक स्थिति पर भी चर्चा संभव होगी।

हालांकि सोशल ऑडिट तभी प्रभावी माना जाएगा जब उसके बाद संबंधित विभाग और स्थानीय प्रशासन समस्याओं के समाधान की दिशा में कदम उठाएं। केवल तस्वीर या वीडियो सामने आ जाना समाधान नहीं है। असली सफलता तब होगी जब खराब शौचालय ठीक हो, पानी की व्यवस्था हो, बिजली पहुंचे और बच्चों को सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण मिले।

 ‘सरपंच चैलेंज’ से पंचायतों की जवाबदेही

अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘सरपंच चैलेंज’ बताया गया है। इसके माध्यम से देशभर के सरपंचों से अपने गांव के सरकारी स्कूल की स्थिति सुधारने का आह्वान किया जाएगा।

जो पंचायतें अपने स्कूलों में बेहतर बदलाव करेंगी, उनके स्कूलों के ‘सुधार से पहले और सुधार के बाद’ के फोटो सोशल मीडिया पर साझा किए जाएंगे। इसका उद्देश्य अच्छे काम करने वाले जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक रूप से प्रोत्साहित करना है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण स्कूल केवल शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं हैं। पंचायत, स्थानीय समुदाय, अभिभावक और जनप्रतिनिधि भी स्कूल के माहौल को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

 पैतृक गांव से होगी शुरुआत

अभिजीत दीपके इस राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरुआत महाराष्ट्र के हिंगोली स्थित अपने पैतृक गांव से करने की बात कह रहे हैं। वहां वह स्थानीय सरपंच से मुलाकात कर सरकारी स्कूल की स्थिति और उसके सुधार की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे।

अभियान की शुरुआत किसी बड़े शहर, राजधानी या सरकारी कार्यालय से करने के बजाय गांव से करना अपने आप में एक संदेश है। इसका संकेत यह है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार की शुरुआत जमीनी स्तर से भी हो सकती है।

अगर गांव के लोग अपने स्कूल को लेकर सक्रिय हो जाएं और पंचायत भी अपनी जिम्मेदारी निभाए, तो कई छोटी लेकिन महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर संभव हो सकता है।

आजादी के आठ दशक बाद भी सवाल

भारत को स्वतंत्र हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कहीं भवन की स्थिति खराब है, कहीं स्वच्छ शौचालय की कमी है, तो कहीं बिजली, पानी या शिक्षण संसाधनों की समस्या सामने आती है।

दूसरी ओर शहरों के कई स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल संसाधन, आधुनिक प्रयोगशालाएं और बेहतर खेल सुविधाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में ग्रामीण बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव शिक्षा में समान अवसर के सवाल को गंभीर बनाता है।

किसी बच्चे का जन्म गांव में होना उसके शिक्षा के अधिकार और अवसरों को सीमित नहीं कर सकता। यदि देश जेन अल्फा को भविष्य की पीढ़ी मानता है, तो उसके स्कूलों की गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

जेन जी की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

जेन जी के पास सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और ऑनलाइन जनभागीदारी की बड़ी क्षमता है। मोबाइल फोन के माध्यम से किसी गांव की समस्या कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन डिजिटल सक्रियता को वास्तविक सामाजिक कार्रवाई से जोड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की उपयोगिता इसी बात से तय होगी कि सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो के बाद जमीन पर क्या बदलाव आता है। युवाओं को केवल समस्याएं दिखाने के बजाय संबंधित अधिकारियों, पंचायतों और शिक्षा विभाग के साथ संवाद की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।

सरकार के साथ समाज की भी जिम्मेदारी

सरकारी स्कूलों की जिम्मेदारी निश्चित रूप से सरकार और संबंधित विभागों की है। बजट, शिक्षक, भवन, पाठ्य सामग्री, भोजन और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकारी व्यवस्था का दायित्व है। लेकिन समाज भी अपने आसपास के स्कूलों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता।

अभिभावकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके बच्चे किस वातावरण में पढ़ रहे हैं। ग्रामीण नागरिकों को यह देखने का अधिकार है कि सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किस प्रकार हो रहा है। पंचायतों को स्थानीय समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाने और समाधान के लिए प्रयास करने चाहिए।

यही भागीदारी लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत कर सकती है।

 अभियान की असली सफलता बदलाव में होगी

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान यदि केवल स्वतंत्रता दिवस के आसपास सोशल मीडिया गतिविधि बनकर रह गया, तो इसका प्रभाव सीमित होगा। लेकिन यदि यह नियमित स्कूल निरीक्षण, समुदाय की भागीदारी, पंचायत की जवाबदेही और प्रशासन से संवाद का माध्यम बनता है, तो ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में एक उपयोगी मॉडल विकसित हो सकता है।

जेन अल्फा के बच्चों का भविष्य केवल किताबों और परीक्षाओं से तय नहीं होगा। उनके लिए सुरक्षित स्कूल, स्वच्छ वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर भी जरूरी हैं।

स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराना देशभक्ति का प्रतीक है, लेकिन **हर बच्चे को सम्मानजनक और समान शिक्षा का अवसर दिलाने की कोशिश स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ को जमीन पर उतारने का काम भी हो सकती है।**

अगर जेन जी के युवा जेन अल्फा के बच्चों के लिए स्कूलों की स्थिति सुधारने का अभियान चलाते हैं और गांव के लोग इसमें सक्रिय भागीदारी करते हैं, तो यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के बेहतर भविष्य की दिशा में जनभागीदारी की शुरुआत बन सकता है।

आजादी के 80 साल बाद भी अगर गांव का बच्चा पानी, शौचालय और बिजली के लिए तरसे, तो सवाल सिर्फ स्कूल का नहीं—हमारी सामूहिक जवाबदेही का है।


आलोक कुमार