शनिवार, 5 सितंबर 2026

Bihar : स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी

 


स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी

बक्सर। डुमरांव प्रखंड के नथुनी अहीर के डेरा स्थित मध्य विद्यालय में छात्राओं से कथित आपत्तिजनक व्यवहार की घटना के बाद शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ ही रहे थे कि अब ब्रह्मपुर प्रखंड के एक अन्य सरकारी विद्यालय में सामने आई अनियमितताओं ने व्यवस्था को फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। मध्य विद्यालय गरहथा कला में एक साथ चार शिक्षकों का निलंबन केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि विद्यालयों में पढ़ाई, अनुशासन, प्रशासन और निगरानी की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि निलंबित शिक्षकों में एक शिक्षक पर निरीक्षण के दौरान एक छात्रा से अपने कंधे की मालिश कराने का आरोप सामने आया। यह आरोप छात्र-शिक्षक संबंधों की मर्यादा और विद्यालय में बच्चों की गरिमा से जुड़ा संवेदनशील विषय है। हालांकि, आरोप की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही मानी जाएगी।

जिला शिक्षा पदाधिकारी इंद्र कुमार कर्ण के कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार, 25 अगस्त को मध्य विद्यालय गरहथा कला का निरीक्षण किया गया था। निरीक्षण के दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधियों, अभिभावकों और मध्याह्न भोजन से जुड़े कर्मियों की मौजूदगी भी बताई गई। निरीक्षण के बाद तैयार प्रतिवेदन में विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, शिक्षकों की कार्यशैली और प्रशासनिक गतिविधियों से संबंधित कई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।

चार शिक्षकों पर विभागीय कार्रवाई

निरीक्षण के बाद कार्रवाई की जद में प्रभारी प्रधानाध्यापक राधामोहन यादव तथा विशिष्ट शिक्षक रामबचन यादव, राकेश सिंह और योगेंद्र यादव आए हैं।

जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय की ओर से 3 सितंबर को जारी अलग-अलग आदेशों के तहत चारों शिक्षकों को बिहार सरकारी सेवक नियमावली के प्रावधानों के तहत निलंबित किए जाने और विभागीय कार्रवाई शुरू किए जाने की बात सामने आई है।

निलंबन का अर्थ यह नहीं है कि लगाए गए प्रत्येक आरोप अंतिम रूप से सिद्ध हो चुका है। विभागीय प्रक्रिया में संबंधित शिक्षकों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और जांच के निष्कर्ष के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। लेकिन निरीक्षण के दौरान दर्ज की गई शिकायतें विद्यालय की व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जरूर पैदा करती हैं।

छात्रा से मालिश कराने का आरोप सबसे संवेदनशील

निलंबित शिक्षक रामबचन यादव के खिलाफ दर्ज आरोपों में सबसे संवेदनशील मामला एक छात्रा से अपने कंधे की मालिश कराने का है।

यदि किसी विद्यालय में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का मामला नहीं रह जाता। यह विद्यालय के वातावरण, बच्चों की गरिमा और शिक्षकों की जिम्मेदारी से भी जुड़ जाता है।

इसके अलावा संबंधित शिक्षक पर पाठटीका तैयार नहीं करने, विद्यार्थियों को गृहकार्य नहीं देने और निर्धारित समय-सारणी के अनुसार कक्षाओं का संचालन नहीं करने जैसे आरोप भी निरीक्षण के दौरान दर्ज किए गए हैं।

सवाल यह है कि जिस शिक्षक को बच्चों को पढ़ाने, मार्गदर्शन देने और अनुशासन का वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है, वहां ऐसी शिकायत सामने आने से पहले निगरानी व्यवस्था क्या कर रही थी?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विद्यालय में बच्चों की सुरक्षा और सम्मान किसी भी शैक्षणिक व्यवस्था की पहली शर्त होनी चाहिए।

मोबाइल में व्यस्त रहने का आरोप

निरीक्षण प्रतिवेदन में विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां सामने आई हैं। जांच के दौरान कुछ शिक्षकों के पढ़ाई कराने के बजाय मोबाइल फोन में व्यस्त पाए जाने की बात कही गई है। कक्षाओं के संचालन में भी अनियमितता का उल्लेख किया गया है।

यदि किसी विद्यालय में शिक्षक नियमित रूप से कक्षा का संचालन नहीं कर रहे हैं, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। खासकर उन विद्यार्थियों पर, जिनके परिवार अतिरिक्त ट्यूशन या निजी शिक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकते।

बताया गया है कि विद्यालय की स्थिति को लेकर छात्र-छात्राओं में नाराजगी इतनी बढ़ी कि उन्होंने विद्यालय के मुख्य द्वार पर तालाबंदी तक कर दी

बच्चों का इस तरह विरोध करना सामान्य स्थिति नहीं माना जा सकता। इसके पीछे उनकी पढ़ाई, विद्यालय के वातावरण या व्यवस्था को लेकर असंतोष हो सकता है। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल अनुशासनहीनता मानकर समाप्त करने के बजाय उसके कारणों की भी जांच जरूरी है।

प्रधानाध्यापक पर प्रशासनिक और वित्तीय सवाल

प्रभारी प्रधानाध्यापक राधामोहन यादव के खिलाफ भी कई तरह के आरोप सामने आए हैं। इनमें विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था के अलावा प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े सवाल शामिल हैं।

निरीक्षण के दौरान कुछ महत्वपूर्ण पंजी उपलब्ध नहीं मिलने की बात सामने आई। कंपोजिट ग्रांट के खर्च से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं पाए जाने का उल्लेख किया गया है।

विद्यालय में बच्चों को मिलने वाले मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी निरीक्षण प्रतिवेदन में असंतोष दर्ज होने की बात कही गई है।

इसके अलावा विद्यालय की खेल सामग्री और विद्यार्थियों की कॉपियां शौचालय में बंद मिलने की बात भी सामने आई है।

यदि यह स्थिति जांच में सही पाई जाती है, तो सवाल केवल सामान रखने की जगह का नहीं है। यह विद्यालय में उपलब्ध संसाधनों के प्रबंधन और उनके उपयोग की व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है।

निलंबन के बाद असली परीक्षा

चार शिक्षकों का निलंबन विभाग की ओर से तत्काल कार्रवाई जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है।

क्या विद्यालय में नियमित पढ़ाई बहाल होगी?

क्या बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिलेगा?

क्या मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता की निगरानी मजबूत होगी?

क्या वित्तीय और प्रशासनिक अभिलेख व्यवस्थित किए जाएंगे?

क्या विद्यालय में उपलब्ध खेल सामग्री और अन्य संसाधनों का बच्चों के हित में उपयोग होगा?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या भविष्य में ऐसी शिकायतों को समय रहते पहचानकर रोका जा सकेगा?

निलंबन किसी मामले में जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप विद्यालय की पूरी व्यवस्था नहीं सुधरती। इसके लिए लगातार निरीक्षण, शिकायतों की त्वरित जांच, शिक्षकों की जवाबदेही और विद्यालय प्रबंधन की सक्रिय भूमिका जरूरी है।

सरकारी स्कूलों में निगरानी क्यों जरूरी?

बक्सर के गरहथा कला मध्य विद्यालय का मामला एक स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई जरूर है, लेकिन इसके भीतर सरकारी स्कूलों की निगरानी से जुड़ा बड़ा सवाल छिपा है।

विद्यालय में शिक्षक की उपस्थिति हो, कक्षा में पढ़ाई हो, बच्चों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो, सरकारी संसाधनों का सही इस्तेमाल हो और अभिभावकों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए—ये सभी शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी जरूरतें हैं।

डुमरांव के विद्यालय में सामने आई घटना और अब गरहथा कला में चार शिक्षकों पर कार्रवाई, दोनों मामलों को एक ही घटना मानना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों से बच्चों की सुरक्षा, शिक्षक की जवाबदेही और शिक्षा विभाग की निगरानी पर सवाल जरूर उठते हैं।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किसी व्यवस्था के बोझ नहीं, बल्कि समाज के भविष्य हैं। इसलिए उनके लिए स्कूल केवल भवन और उपस्थिति रजिस्टर नहीं होना चाहिए। वह ऐसा स्थान होना चाहिए जहां उन्हें शिक्षा के साथ सम्मान, सुरक्षा और अवसर मिले।

सरकारी स्कूल बच्चों का भविष्य गढ़ने की जगह हैं, किसी की मनमानी का मैदान नहीं।

गरहथा कला की कार्रवाई को इसी व्यापक नजरिए से देखना होगा। चार शिक्षकों का निलंबन खबर जरूर है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब विद्यालय की व्यवस्था बदलेगी?

क्योंकि कार्रवाई तभी सार्थक मानी जाएगी, जब उसके बाद बच्चों की कक्षा में पढ़ाई लौटे, विद्यालय में अनुशासन लौटे और अभिभावकों का भरोसा भी वापस आए।

आलोक कुमार

Bihar : निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा?

निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा?

पटना। बच्चे के हाथ में स्कूल बैग है, लेकिन उस बैग का वजन सिर्फ किताबों का नहीं है। उसके साथ स्कूल फीस, एडमिशन चार्ज, यूनिफॉर्म, जूते, किताबें, कॉपियां, परिवहन और कई दूसरे खर्चों का बोझ भी जुड़ा है। सवाल यह है कि मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की कोशिश में आखिर कितनी आर्थिक कीमत चुकाए?

हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़े, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करे और भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा हो। लेकिन बदलते समय में निजी स्कूलों की फीस और उससे जुड़े खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।

एक तरफ सरकारी स्कूलों की सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं, तो दूसरी ओर निजी स्कूलों की फीस अभिभावकों के सामने अलग तरह का आर्थिक संकट खड़ा करती है। मध्यमवर्गीय परिवार न तो हमेशा महंगी निजी शिक्षा को आसानी से वहन कर पाते हैं और न ही बच्चों की शिक्षा से समझौता करना चाहते हैं।

यही दोहरी मजबूरी परिवार के मासिक बजट पर लगातार दबाव बढ़ाती है।

फीस सिर्फ मासिक शुल्क तक सीमित नहीं

किसी निजी स्कूल की वास्तविक लागत को केवल मासिक ट्यूशन फीस देखकर समझना मुश्किल है। अभिभावकों के सामने सालभर अलग-अलग प्रकार के खर्च आते रहते हैं।

स्कूल फीस के अलावा एडमिशन या री-एडमिशन से जुड़े शुल्क, किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म, जूते, बैग, परिवहन, परीक्षा से जुड़े खर्च और विभिन्न गतिविधियों के शुल्क परिवार के बजट को प्रभावित करते हैं।

कई परिवारों के लिए परेशानी यह है कि ये खर्च एक साथ नहीं आते। कभी किताबों का खर्च, कभी यूनिफॉर्म, कभी परिवहन और कभी किसी गतिविधि या अन्य शुल्क की जरूरत सामने आती है।

परिणाम यह होता है कि परिवार को पूरे वर्ष बच्चे की शिक्षा के लिए अलग-अलग मदों में पैसा जुटाना पड़ता है।

बच्चे की फीस परिवार के बजट का केवल एक हिस्सा नहीं रह जाती, बल्कि कई बार पूरे बजट की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है।

मध्यमवर्ग के सामने सबसे बड़ा सवाल

मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति अक्सर ऐसी होती है कि वे न तो हर सरकारी सहायता के दायरे में आते हैं और न ही महंगी निजी शिक्षा का खर्च आसानी से उठा सकते हैं।

यही कारण है कि शिक्षा को लेकर उनका संघर्ष अलग दिखाई देता है।

निजी स्कूल की फीस भारी है, लेकिन बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने को लेकर अभिभावकों के मन में गुणवत्ता, अंग्रेजी शिक्षा, सुविधाओं और भविष्य की प्रतिस्पर्धा को लेकर अलग-अलग आशंकाएं रहती हैं।

ऐसे में माता-पिता अपनी आय और बच्चों की जरूरतों के बीच लगातार संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं।

कई परिवार बच्चों की फीस समय पर जमा करने के लिए दूसरे खर्चों में कटौती करते हैं। मनोरंजन, यात्रा, बचत और भविष्य के लिए किए जाने वाले निवेश तक को सीमित करना पड़ सकता है।

अच्छी शिक्षा की चाह बनाम आर्थिक क्षमता

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे को बेहतर वातावरण मिले। अंग्रेजी भाषा, कंप्यूटर शिक्षा, खेल, अनुशासन, गतिविधियां और आधुनिक शिक्षण पद्धति जैसी सुविधाएं भी उनकी अपेक्षाओं का हिस्सा बन चुकी हैं।

निजी स्कूल इन सुविधाओं के माध्यम से अभिभावकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—

क्या अच्छी शिक्षा का मतलब अनिवार्य रूप से महंगी शिक्षा होना चाहिए?

यदि किसी परिवार की आय सीमित है, तो क्या वह अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा दिलाने के अवसर से पीछे हटने के लिए मजबूर हो?

शिक्षा में गुणवत्ता जरूरी है, लेकिन उसके साथ आर्थिक पहुंच भी जरूरी है। कोई व्यवस्था तभी व्यापक रूप से सफल मानी जाएगी, जब उसमें सामान्य आय वाले परिवार भी अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर लगातार आर्थिक तनाव में न रहें।

फीस बढ़ने का असर सिर्फ जेब पर नहीं

बढ़ती शिक्षा लागत का असर केवल परिवार की जेब पर नहीं पड़ता। इसका प्रभाव उसकी पूरी आर्थिक योजना पर पड़ सकता है।

एक मध्यमवर्गीय परिवार को घर का किराया या होम लोन, राशन, बिजली, स्वास्थ्य, परिवहन, मोबाइल, घरेलू जरूरतों और अन्य खर्चों का हिसाब रखना पड़ता है। इसके बाद बच्चों की शिक्षा का खर्च सामने आता है।

यदि स्कूल फीस और उससे जुड़े खर्च लगातार बढ़ते हैं, तो परिवार की बचत प्रभावित हो सकती है। भविष्य के लिए निवेश कम हो सकता है और अचानक आने वाली आर्थिक जरूरतों से निपटना कठिन हो सकता है।

कई माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता देते हुए अपनी व्यक्तिगत जरूरतों को पीछे कर देते हैं।

यानी स्कूल की फीस का असर स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरे परिवार के जीवन पर पड़ता है।

क्या अभिभावकों की आवाज सुनी जाती है?

फीस के सवाल पर स्कूल और अभिभावकों के बीच संवाद बेहद जरूरी है।

अभिभावकों को यह समझने का अधिकार होना चाहिए कि वे जिस शुल्क का भुगतान कर रहे हैं, उसके बदले स्कूल कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है। फीस संरचना स्पष्ट होनी चाहिए और अलग-अलग शुल्कों की जानकारी अभिभावकों को आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।

दूसरी ओर स्कूलों की वास्तविक लागत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिक्षकों का वेतन, भवन का रखरखाव, बिजली, परिवहन, शिक्षण सामग्री और अन्य सुविधाओं पर खर्च होता है।

इसलिए मुद्दा स्कूलों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का नहीं है।

मुद्दा यह है कि शिक्षा अभिभावकों के लिए आर्थिक रूप से असहनीय न बन जाए।

शिक्षा बाजार नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी है

निजी स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अनेक निजी विद्यालय बेहतर शैक्षणिक वातावरण और सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सभी निजी स्कूलों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा।

लेकिन शिक्षा एक संवेदनशील क्षेत्र है। यहां गुणवत्ता के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी है।

स्कूल प्रबंधन, अभिभावक और सरकार के बीच ऐसा संतुलन होना चाहिए जिसमें विद्यालयों की गुणवत्ता बनी रहे, शिक्षकों को उचित वेतन और सम्मान मिले तथा अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।

शिक्षक दिवस पर यह सवाल भी जरूरी

5 सितंबर को जब हम शिक्षक का सम्मान करते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था के आर्थिक पक्ष पर भी चर्चा होनी चाहिए।

सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी एक चुनौती है और निजी स्कूलों की फीस दूसरी। इन दोनों परिस्थितियों के बीच सबसे अधिक दबाव उस मध्यमवर्गीय परिवार पर पड़ सकता है, जो अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा देने के लिए अपनी सीमित आय से लगातार संघर्ष कर रहा है।

आखिर शिक्षा का उद्देश्य परिवार को आर्थिक संकट में डालना नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य को मजबूत करना होना चाहिए।

मध्यमवर्गीय माता-पिता अपने बच्चों के सपनों की कीमत चुका रहे हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि फीस कितनी है—सवाल यह है कि उस फीस के कारण कितने परिवारों की बचत, सुरक्षा और भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।

शिक्षा तभी वास्तव में सशक्तिकरण का माध्यम बनेगी, जब गुणवत्ता, पारदर्शिता और आर्थिक पहुंच—तीनों साथ चलेंगे।

क्योंकि बच्चे की पढ़ाई परिवार की सबसे बड़ी चिंता नहीं, उसकी सबसे बड़ी उम्मीद होनी चाहिए।

आलोक कुमार

Bihar : शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी

 शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी?


पटना।
हर साल 5 सितंबर को देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक समाज के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और शिक्षक के महत्व पर भाषण दिए जाते हैं। लेकिन इस सम्मान के बीच एक बड़ा सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—क्या हमारे सरकारी स्कूल शिक्षकों को वह वातावरण और संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं, जिनके सहारे वे बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकें?

शिक्षक केवल किताब पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह बच्चे के ज्ञान, सोच, अनुशासन, आत्मविश्वास और भविष्य की नींव तैयार करता है। लेकिन जब उसी शिक्षक के सामने बड़ी कक्षाएं, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाने की चुनौती हो, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य मुश्किल हो जाता है।

शिक्षक हैं, लेकिन पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय कितना?

सरकारी विद्यालयों में शिक्षक की जिम्मेदारी केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं रहती। कई बार उन्हें विभिन्न प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों से भी जुड़ना पड़ता है। चुनाव संबंधी जिम्मेदारियां, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्य, रिकॉर्ड तैयार करना और अलग-अलग प्रकार की रिपोर्टिंग जैसी जिम्मेदारियां शिक्षकों के समय को प्रभावित कर सकती हैं।

यह सवाल शिक्षकों की कार्यक्षमता पर सवाल उठाने का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने का है।

यदि शिक्षक का महत्वपूर्ण समय कक्षा के बाहर के कामों में चला जाए, तो कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त समय कौन निकालेगा? जिन बच्चों को पढ़ने या लिखने में कठिनाई है, उनकी पहचान और सहायता कैसे होगी? प्रत्येक विद्यार्थी की प्रगति पर व्यक्तिगत ध्यान कैसे दिया जाएगा?

शिक्षक से बेहतर परिणाम की अपेक्षा जरूर होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए पढ़ाने का पर्याप्त समय भी सुनिश्चित करना होगा।

संसाधनों की कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर असर

आज शिक्षा केवल ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है। कंप्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल सामग्री, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सामग्री और बेहतर कक्षा-कक्ष आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन सभी सरकारी विद्यालयों में इन सुविधाओं की स्थिति समान नहीं है। कहीं विद्यालय भवन है, लेकिन पर्याप्त कमरे नहीं हैं। कहीं कमरे हैं तो फर्नीचर की कमी दिखाई देती है। कहीं कंप्यूटर उपलब्ध हैं, लेकिन उनके नियमित उपयोग के लिए तकनीकी सहायता या इंटरनेट की समस्या सामने आती है। कई विद्यालयों में पुस्तकालय मौजूद होने के बावजूद बच्चों तक पुस्तकों की नियमित पहुंच सुनिश्चित करना चुनौती बना रहता है।

सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने संसाधन उपलब्ध कराए गए। असली सवाल यह है कि वे संसाधन जमीन पर कितने प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं।

अगर किसी स्कूल में कंप्यूटर है लेकिन बिजली या इंटरनेट की सुविधा नियमित नहीं है, तो डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य कितना पूरा होगा? यदि विज्ञान प्रयोगशाला है लेकिन प्रयोग कराने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है, तो बच्चे किताबी ज्ञान से आगे कैसे बढ़ेंगे?

शिक्षक दिवस पर बच्चों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए

शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का दिन नहीं होना चाहिए। यह शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा का अवसर भी बन सकता है।

एक सरकारी स्कूल का विद्यार्थी क्या चाहता है?

वह चाहता है कि शिक्षक नियमित रूप से कक्षा में हों। उसे समझने वाला शिक्षक मिले। किताब के साथ प्रयोग करने का अवसर मिले। स्कूल में साफ पानी, शौचालय, बिजली, सुरक्षित भवन और बैठने की उचित व्यवस्था हो। सबसे महत्वपूर्ण, उसे ऐसा वातावरण मिले जहां सवाल पूछने पर उसे हतोत्साहित न किया जाए।

बच्चों की सीखने की क्षमता केवल पाठ्यपुस्तक पूरी करने से तय नहीं होती। उन्हें सवाल पूछने, अपनी बात रखने, गतिविधियों में भाग लेने और अपनी गलतियों से सीखने का अवसर भी चाहिए।

यदि इन बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में व्यवस्था कमजोर रहती है, तो केवल शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

केवल शिक्षक दिवस पर सम्मान काफी नहीं

शिक्षकों को एक दिन सम्मानित करने से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। शिक्षक का वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उसे पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय, जरूरी संसाधन, प्रशिक्षण और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिले।

इसी तरह बच्चों का सम्मान तब होगा, जब सरकारी स्कूल में उन्हें ऐसी शिक्षा मिले, जो उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने के समान अवसर दे।

सरकारी विद्यालयों को मजबूत करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण परिवारों की बड़ी संख्या अपने बच्चों की शिक्षा के लिए इन्हीं विद्यालयों पर निर्भर करती है। सरकारी स्कूल मजबूत होंगे तो इसका सीधा लाभ उन परिवारों को मिलेगा, जिनके पास निजी स्कूलों की फीस, परिवहन और अन्य खर्च उठाने की सीमित क्षमता है।

शिक्षक और व्यवस्था आमने-सामने नहीं, साथ-साथ

बेहतर शिक्षा के लिए शिक्षक और शिक्षा विभाग को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखना समाधान नहीं है। शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी, विद्यालय प्रबंधन और प्रशासन—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

शिक्षकों की जवाबदेही निश्चित रूप से होनी चाहिए। विद्यार्थियों की उपस्थिति, पढ़ाई की गुणवत्ता और सीखने के परिणामों की नियमित समीक्षा जरूरी है। लेकिन जवाबदेही के साथ संसाधन, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग भी मिलना चाहिए।

यदि किसी शिक्षक को पर्याप्त प्रशिक्षण मिले, कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या संतुलित हो, गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ नियंत्रित हो और विद्यालय की बुनियादी सुविधाएं बेहतर हों, तो उससे बेहतर परिणाम की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक होगी।

सरकारी स्कूलों में सुधार की जरूरत कहां है?

शिक्षक दिवस के अवसर पर सरकार और शिक्षा विभाग के सामने कुछ बुनियादी सवाल रखे जाने चाहिए।

क्या हर सरकारी स्कूल में विषय के अनुसार पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं?

क्या हर कक्षा में बच्चों के बैठने की उचित व्यवस्था है?

क्या स्कूलों में पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं केवल कागज पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से उपयोग में भी हैं?

क्या डिजिटल संसाधनों का इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई बेहतर बनाने के लिए हो रहा है?

क्या शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से अनावश्यक रूप से बचाया जा रहा है?

क्या ग्रामीण और शहरी सरकारी विद्यालयों के बीच संसाधनों की खाई लगातार कम हो रही है?

इन सवालों का जवाब केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि स्कूल की वास्तविक स्थिति देखकर मिलना चाहिए।

शिक्षक दिवस का असली संदेश

5 सितंबर को यदि हम वास्तव में शिक्षक का सम्मान करना चाहते हैं, तो बात केवल फूल, माला, प्रमाणपत्र और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

शिक्षक का सम्मान उसकी कक्षा में दिखाई देना चाहिए।

जब शिक्षक के पास पढ़ाने का पर्याप्त समय होगा, जब उसके पास आवश्यक शिक्षण सामग्री होगी, जब उसे प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग मिलेगा और जब स्कूल का वातावरण बच्चों के अनुकूल होगा, तभी शिक्षक अपनी भूमिका को और प्रभावी ढंग से निभा सकेगा।

क्योंकि शिक्षक किसी भी राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। लेकिन भविष्य गढ़ने वाले हाथों को यदि पर्याप्त औजार ही न दिए जाएं, तो उनसे चमत्कार की उम्मीद कितनी उचित है?

शिक्षक दिवस पर सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक को सम्मान के साथ संसाधन भी मिलें और बच्चों को अधिकार के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी।

शिक्षक का सम्मान केवल मंच पर नहीं, स्कूल की कक्षा में दिखाई देना चाहिए।


आलोक कुमार

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

Bihar : कागज पर राहत, जमीन पर कड़वाहट क्यों?


बाढ़ में डूबा दियारा, राहत में डूबी व्यवस्था! नकटा के पीड़ितों का सवाल—कागज पर राहत, जमीन पर कड़वाहट क्यों?

दीघा घाट राहत शिविर में शौचालय, भोजन, पानी, चिकित्सा और पशु चारे की कमी का आरोप; दियारा विकास संघर्ष समिति ने डीएम को ज्ञापन देकर 6 सितंबर को धरना-प्रदर्शन की चेतावनी दी

पटना। बाढ़ जब आती है तो वह केवल खेत, घर और रास्ते नहीं डुबोती, बल्कि व्यवस्था की असली तस्वीर भी सामने ला देती है। सरकारी बैठकों में राहत के इंतजाम के दावे किए जा सकते हैं और कागजों पर व्यवस्थाएं पूरी दिखाई जा सकती हैं, लेकिन बाढ़ पीड़ित के लिए असली सवाल तब खड़ा होता है, जब वह राहत शिविर में पहुंचकर पूछता है—“अब हम जाएं तो जाएं कहां?”

ग्राम पंचायत नकटा दियारा के बाढ़ पीड़ितों की ऐसी ही परेशानी का मामला सामने आया है। 4 सितंबर 2026 को दीघा घाट स्थित राहत शिविर के निरीक्षण के बाद दियारा विकास संघर्ष समिति ने कथित अव्यवस्थाओं को लेकर पटना जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। समिति ने अंचलाधिकारी, पाटलिपुत्र के माध्यम से प्रशासन के सामने अपनी मांगें रखीं और चेतावनी दी कि यदि व्यवस्थाओं में तत्काल सुधार नहीं हुआ तो 6 सितंबर को राहत शिविर स्थल पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।

समिति की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस लेख में नहीं की जा रही है। हालांकि, बाढ़ के बीच उठाए गए ये सवाल प्रशासन के लिए गंभीर हैं, क्योंकि राहत शिविर में रहने वाले परिवारों की जरूरतें सीधे जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ी होती हैं।

राहत शिविर में बुनियादी सुविधाओं का सवाल

बाढ़ के दौरान राहत शिविर किसी परिवार के लिए अस्थायी घर की तरह होता है। इसलिए वहां सुरक्षित रहने की जगह के साथ शौचालय, स्वच्छ पेयजल, भोजन, चिकित्सा, बिजली और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं जरूरी हो जाती हैं।

दियारा विकास संघर्ष समिति का आरोप है कि दीघा घाट राहत शिविर में इन सुविधाओं को लेकर कई समस्याएं हैं। समिति ने विशेष रूप से शौचालयों की संख्या बढ़ाने की मांग की है और कम से कम 10 चलंत शौचालय उपलब्ध कराने की बात कही है।

बड़ी संख्या में लोगों के एक स्थान पर रहने की स्थिति में पर्याप्त शौचालय नहीं होने से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है। इसलिए राहत शिविर की व्यवस्था का मूल्यांकन केवल लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जरूरतों के हिसाब से किया जाना जरूरी है।

भोजन केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं

बाढ़ पीड़ितों के लिए भोजन की व्यवस्था राहत अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। समिति ने आरोप लगाया है कि शिविर में भोजन के साथ सुबह और शाम चाय-नाश्ते की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

समिति ने मांग की है कि एक समय पूरी-सब्जी का भोजन, सुबह चाय-नाश्ता और शाम को भी चाय-नाश्ता उपलब्ध कराया जाए।

जिस परिवार का चूल्हा बाढ़ के कारण बंद हो चुका हो, उसके लिए राहत शिविर में मिलने वाला भोजन ही जीवन का सहारा बन जाता है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता, मात्रा और समय—तीनों पर निगरानी जरूरी है।

स्वच्छ पानी और बीमारी का खतरा

बाढ़ के दौरान स्वच्छ पेयजल की जरूरत और बढ़ जाती है। दूषित पानी और खराब स्वच्छता से संक्रमण तथा जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

समिति ने राहत शिविर में फिल्टर पानी तथा पांच पानी टैंकर उपलब्ध कराने की मांग की है। प्रशासन के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि लोगों को पर्याप्त मात्रा में साफ और सुरक्षित पानी नियमित रूप से मिल रहा है या नहीं।

मवेशियों की चिंता भी राहत का हिस्सा

दियारा क्षेत्र के ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था खेती और पशुपालन से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए बाढ़ में केवल परिवार को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना ही पर्याप्त नहीं है। मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

समिति ने पशुओं के लिए सूखी कुट्टी के साथ चोकर और दाना उपलब्ध कराने की मांग की है।

किसान के लिए पशु केवल जानवर नहीं, बल्कि उसकी आजीविका का हिस्सा होता है। यदि बाढ़ के दौरान पशुओं को पर्याप्त चारा नहीं मिला तो इसका असर बाढ़ के बाद भी परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।

नाव सेवा पर कथित वसूली का आरोप

दियारा क्षेत्र में बाढ़ के दौरान नाव जीवनरेखा बन जाती है। सड़क और सामान्य रास्ते बंद होने के बाद नाव के जरिए ही लोग सुरक्षित स्थानों तक पहुंचते हैं और जरूरी सामान लाते-ले जाते हैं।

समिति ने नाव से आवागमन के दौरान कथित अवैध वसूली की शिकायत भी प्रशासन के सामने रखी है। यदि ऐसी शिकायतें सामने आई हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

आपदा के समय किसी व्यक्ति की मजबूरी का फायदा उठाकर अतिरिक्त राशि वसूलना गंभीर विषय हो सकता है। इसलिए नाव संचालन, रूट और शुल्क संबंधी व्यवस्था में पारदर्शिता तथा निगरानी जरूरी है।

सरकारी स्कूलों को आश्रय स्थल बनाने की मांग

समिति ने दीघा पोस्ट ऑफिस रोड स्थित दो सरकारी स्कूलों को खोलकर बाढ़ पीड़ित महिलाओं और पुरुषों के लिए रहने की व्यवस्था करने की मांग की है।

यदि संबंधित विद्यालय सुरक्षित हैं और प्रशासनिक रूप से उनका इस्तेमाल संभव है, तो उन्हें अस्थायी आश्रय स्थल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे मौजूदा राहत शिविर पर दबाव भी कम हो सकता है।

शिविर में गर्मी, उमस और मच्छरों से बचाव के लिए पंखे लगाने की मांग भी की गई है।

24 घंटे चिकित्सा और राशन की जरूरत

बाढ़ प्रभावित इलाकों में बीमारी और आकस्मिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बना रहता है। बुखार, दस्त, त्वचा संबंधी संक्रमण, चोट, सर्पदंश या अन्य आपात स्थिति में तत्काल चिकित्सा सुविधा की जरूरत होती है।

समिति ने नकटा दियारा में फंसे लोगों तक सूखा राशन और पशु चारा पहुंचाने तथा 24 घंटे मेडिकल टीम उपलब्ध कराने की मांग की है।

इसके साथ ही बाढ़ पीड़ितों के लिए स्वीकृत सरकारी अनुदान राशि का अविलंब वितरण करने की मांग भी उठाई गई है।

अब प्रशासन की परीक्षा

राहत शिविर के निरीक्षण और ज्ञापन के दौरान दियारा विकास संघर्ष समिति के सूत्रधार एवं सामाजिक कार्यकर्ता त्रिभुवन प्रसाद यादव, उपसंयोजक रामशंकर सिंह, पूर्व बीडीसी सदस्य-सह-राजद के पूर्व प्रखंड अध्यक्ष डॉ. यदु प्रसाद सिंह, वर्षा नो, रामजी प्रसाद यादव, कामता प्रसाद सिंह, गौतम कुमार यादव, विशाल कुमार यादव, अनिकेत कुमार सिंह, चंदेश्वर प्रसाद सिंह उर्फ सिपाही जी, वीरेंद्र विद्रोही, उप सरपंच गांधी जी, लालदेव राय सहित दर्जनों सदस्यों की मौजूदगी बताई गई।

अब प्रशासन के सामने दो स्पष्ट बातें हैं—ज्ञापन दिया जा चुका है और 6 सितंबर को धरना-प्रदर्शन की चेतावनी भी सामने आ चुकी है।

ऐसे में बेहतर होगा कि प्रशासन आंदोलन का इंतजार करने के बजाय राहत शिविर की व्यवस्थाओं की तत्काल समीक्षा करे। जहां कमी मिले, वहां सुधार किया जाए और जिन आरोपों की शिकायत की गई है, उनकी जांच कर स्थिति स्पष्ट की जाए।

बाढ़ पीड़ितों को लंबी राजनीतिक बहस नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए—साफ पानी, पर्याप्त भोजन, शौचालय, इलाज, सुरक्षित आश्रय, नाव और पशुओं के लिए चारा।

आपदा प्रबंधन की असली सफलता प्रेस विज्ञप्ति या सरकारी दावे में नहीं, बल्कि उस परिवार की स्थिति में दिखाई देती है जो बाढ़ के बीच राहत शिविर में सुरक्षित महसूस करता है।

गंगा का पानी एक दिन उतर जाएगा। लेकिन राहत व्यवस्था की कमियां अगर समय रहते नहीं सुधरीं, तो बाढ़ का असर लोगों की जिंदगी और व्यवस्था के प्रति उनके भरोसे पर लंबे समय तक बना रह सकता है।

सवाल इसलिए बड़ा है—दियारा डूबा है, लेकिन क्या संवेदनशीलता भी डूब गई है?


आलोक कुमार

Bihar : गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां

 


गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां

गांव से शहर जाने वाले मजदूरों के सामने रोजगार की अनिश्चितता, समय पर मजदूरी न मिलना, सुरक्षित आवास की कमी, स्वास्थ्य जोखिम, सामाजिक सुरक्षा और परिवार से दूरी जैसी कई चुनौतियां होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक काम की व्यवस्था करना जरूरी है।

पटना। गांव की पगडंडी से निकलकर जब कोई मजदूर शहर की ओर जाता है, तो उसके साथ केवल एक छोटा-सा बैग नहीं होता। उसके कंधे पर पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। आंखों में बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत, बेटी की शादी, बुजुर्ग माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का सपना होता है। वह गांव इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे अपना घर पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि घर में उसके श्रम के बदले पर्याप्त आमदनी का रास्ता नहीं बन पाता।

बिहार जैसे राज्यों में गांव से शहर की ओर मजदूरों का जाना कोई नई घटना नहीं है। वर्षों से लाखों परिवारों की अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा प्रवासी मजदूरी पर टिका हुआ है। लेकिन पलायन की तस्वीर अक्सर इतनी भर दिखाई जाती है कि मजदूर शहर गया, काम किया और पैसा घर भेज दिया। इसके पीछे छिपी वास्तविक चुनौतियों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।

रोजगार मिलने की गारंटी नहीं

शहर पहुंचते ही मजदूर को स्थायी नौकरी मिल जाए, यह जरूरी नहीं है। बहुत से प्रवासी मजदूर ठेकेदारों या बिचौलियों के माध्यम से निर्माण स्थल, फैक्टरी, होटल, गोदाम, ईंट-भट्ठे और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम तलाशते हैं।

आज काम मिला तो मजदूरी मिली, कल काम नहीं मिला तो आमदनी भी नहीं। दूसरी तरफ शहर में रहने का खर्च लगातार चलता रहता है। किराया, भोजन, आने-जाने का खर्च और मोबाइल जैसी जरूरतों के लिए पैसा चाहिए, चाहे उस दिन काम मिले या नहीं।

यही वजह है कि शहर में काम करने वाला मजदूर अक्सर रोजगार के साथ-साथ रोजगार की निरंतरता की चिंता भी करता है।

समय पर मजदूरी मिलना भी चुनौती

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के सामने कई बार सबसे बड़ी समस्या मजदूरी के भुगतान को लेकर होती है। काम पूरा होने के बाद भुगतान के लिए कई दिनों या हफ्तों तक इंतजार करना पड़ सकता है।

बाहर से आए मजदूर के पास स्थानीय स्तर पर मजबूत सामाजिक नेटवर्क नहीं होता। उसे यह भी डर रहता है कि ज्यादा सवाल पूछने या शिकायत करने पर अगली बार काम न मिले।

मजदूरी में देरी का सीधा असर उसके परिवार पर पड़ता है। गांव में घर चलाने के लिए भेजे जाने वाले पैसे रुक जाते हैं। बच्चों की फीस, राशन, दवा और खेती से जुड़े खर्च प्रभावित होने लगते हैं।

रहने के लिए सुरक्षित जगह कहां मिले?

शहर में मजदूरों के लिए सस्ता और सुरक्षित आवास मिलना आसान नहीं है। कई मजदूर छोटे कमरों में कई लोगों के साथ रहते हैं। कहीं झुग्गी में रहना पड़ता है तो कहीं निर्माणाधीन इमारत के आसपास अस्थायी ठिकाना बनाना पड़ता है।

स्वच्छ पानी, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। काम की जगह और रहने की जगह के बीच लंबी दूरी होने पर आने-जाने का खर्च भी बढ़ जाता है।

कम आय वाले मजदूर के लिए आवास की समस्या केवल सुविधा का सवाल नहीं है। यह उसकी आय, स्वास्थ्य और परिवार की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।

स्वास्थ्य और कार्यस्थल की सुरक्षा

मजदूर की जिंदगी की एक और बड़ी चुनौती स्वास्थ्य और सुरक्षा है। निर्माण कार्य, फैक्टरी, सड़क निर्माण, भारी सामान उठाने और मशीनों के आसपास काम करने में दुर्घटना का खतरा बना रहता है।

लंबे समय तक काम करने से शारीरिक थकान और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। गर्मी, बारिश, धूल, प्रदूषण और असुरक्षित कार्यस्थल में लगातार काम करना शरीर पर भारी पड़ता है।

दुर्घटना होने पर समस्या और गंभीर हो जाती है। मजदूर घायल हुआ तो कुछ समय के लिए उसकी कमाई बंद हो सकती है, जबकि परिवार का खर्च चलता रहता है। ऐसे समय में इलाज का खर्च और आय का नुकसान दोनों परिवार पर दबाव डाल सकते हैं।

शहर में सामाजिक पहचान का संकट

प्रवासी मजदूरों की सामाजिक असुरक्षा भी कम गंभीर समस्या नहीं है। गांव में व्यक्ति को लोग पहचानते हैं। पड़ोसी, पंचायत, स्थानीय दुकानदार और रिश्तेदार उसके सामाजिक जीवन का हिस्सा होते हैं। शहर में पहुंचने के बाद वही व्यक्ति अक्सर केवल एक श्रमिक बनकर रह जाता है।

स्थानीय प्रशासन, अस्पताल, बैंक, स्कूल और सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाने में उसे कठिनाई हो सकती है। भाषा, दस्तावेज, स्थानीय जानकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी की कमी उसके लिए अतिरिक्त बाधा बन जाती है।

इसलिए प्रवासी मजदूर के लिए शहर केवल रोजगार की नई जगह नहीं, बल्कि एक पूरी तरह नया सामाजिक वातावरण भी होता है।

परिवार से दूरी की कीमत

कई मजदूर अकेले शहर में रहते हैं और उनका परिवार गांव में रहता है। बाहर कमाने वाला व्यक्ति पैसे भेजता है, लेकिन बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और खेती की जिम्मेदारी पीछे छूटे परिवार पर आ जाती है।

दूसरी स्थिति में पूरा परिवार शहर चला जाता है। तब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। बार-बार जगह बदलने के कारण उनकी शिक्षा की निरंतरता टूट सकती है।

महिलाओं के लिए भी शहर में नए वातावरण के साथ तालमेल बैठाना आसान नहीं होता। सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सुविधा और बच्चों की देखभाल जैसी जरूरतें परिवार के सामने नई चुनौतियां खड़ी करती हैं।

बिचौलियों की भूमिका पर सवाल

मजदूर और काम देने वाले के बीच बिचौलियों या ठेकेदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। रोजगार दिलाने के नाम पर कई स्तर के लोग शामिल हो जाएं तो मजदूर की वास्तविक मजदूरी और उसके हाथ में आने वाली रकम के बीच अंतर पैदा हो सकता है।

कई मजदूर काम शुरू करते समय काम के घंटे, भुगतान की तारीख, अतिरिक्त काम की मजदूरी और रहने की व्यवस्था जैसी बातों की पूरी जानकारी नहीं ले पाते। इसकी एक वजह यह भी है कि उनके सामने तत्काल काम पाने की जरूरत होती है।

इसलिए रोजगार व्यवस्था में पारदर्शिता और लिखित शर्तों की जानकारी मजदूरों के हित में महत्वपूर्ण हो सकती है।

शहरों के विकास में मजदूरों का योगदान

इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद प्रवासी मजदूर शहरों की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। सड़कें, पुल, मकान, बाजार, फैक्ट्रियां, होटल और अनेक सेवाएं उनके श्रम से चलती हैं।

शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन्हीं हाथों को अक्सर सबसे कम सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए मजदूर को केवल सस्ता श्रम मानना उसके योगदान को कम करके आंकना है।

सवाल यह नहीं है कि मजदूर गांव छोड़कर शहर क्यों जाता है। सवाल यह है कि शहर पहुंचने के बाद उसके साथ कैसा व्यवहार होता है?

यदि मजदूर देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है, तो उसे सुरक्षित कार्यस्थल, समय पर मजदूरी, सम्मानजनक आवास, स्वास्थ्य सुविधा, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।

गांव में रोजगार के विकल्प भी जरूरी

शहर की समस्याओं का समाधान केवल शहर में नहीं है। गांवों में रोजगार के स्थायी अवसर पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।

कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, छोटे उद्योग, ग्रामीण निर्माण, हस्तशिल्प और कौशल आधारित सेवाओं को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार बढ़ाया जा सकता है।

जब गांव के मजदूर के सामने एक से अधिक विकल्प होंगे, तब उसका शहर जाना मजबूरी के बजाय उसकी पसंद और आर्थिक रणनीति का हिस्सा बन सकता है।

किसी मजदूर का शहर जाना अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब उसके श्रम की कीमत कम और उसकी मजबूरी की कीमत ज्यादा हो जाती है।

गांव का मजदूर केवल मजदूरी करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अपने परिवार, गांव और देश की अर्थव्यवस्था को संभालने वाला नागरिक है। उसके संघर्ष को आंकड़ों के पीछे छिपाने के बजाय उसकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन हाथों को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार मिलना ही सच्चे विकास की पहचान होगी।

आलोक कुमार

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

 


ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है।

पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश?

पलायन को केवल बेरोजगारी का परिणाम मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन कई कारणों का मिला-जुला परिणाम है। रोजगार की कमी निश्चित रूप से इसका बड़ा कारण है, लेकिन इसके साथ मजदूरी का स्तर, काम की निरंतरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जुड़ी हुई है।

खेती से पूरे परिवार का गुजारा क्यों मुश्किल हो रहा है?

ग्रामीण बिहार में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आजीविका का आधार है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खेती से पूरे परिवार का साल भर गुजारा करना कठिन होता जा रहा है। जमीन का आकार छोटा है, खेती की लागत बढ़ रही है और सिंचाई की सुविधा हर क्षेत्र में समान नहीं है। ऐसे में खेती से होने वाली आमदनी और परिवार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जाता है।

यही अंतर ग्रामीण युवाओं को दूसरे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है। गांव में यदि किसी युवक को महीने में कुछ दिनों का ही काम मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में उसे लगातार काम और अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिल सकती है, तो उसका बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए हर पलायन को केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा। कई युवा आज पलायन को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखते हैं।

मजबूरी का पलायन और अवसर की तलाश अलग है

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मजबूरी में किया गया पलायन और अवसर की तलाश में किया गया पलायन एक जैसा नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर दूसरे शहर में नौकरी करता है, बेहतर वेतन पाता है और परिवार का जीवन स्तर ऊपर उठाता है, तो इसे आर्थिक गतिशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि कोई मजदूर गांव में काम न मिलने के कारण असुरक्षित परिस्थितियों में दूसरे राज्य जाता है, अस्थायी जगह पर रहता है और मजदूरी या काम की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

ग्रामीण बिहार के सामने चुनौती यह है कि यहां लोगों के पास रोजगार चुनने के विकल्प कितने हैं। अगर विकल्प केवल बाहर जाने का है, तो यह विकास की कमजोरी को दिखाता है।

पढ़ाई के बाद भी गांव में रोजगार क्यों नहीं?

ग्रामीण युवाओं की एक बड़ी समस्या स्थानीय स्तर पर कौशल के अनुरूप रोजगार का अभाव है। शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच दूरी अब भी दिखाई देती है।

कई युवा डिग्री या तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन यदि उनके आसपास उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें पटना, दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद या अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता है।

इसका असर केवल उस युवक पर नहीं पड़ता। गांव की युवा श्रमशक्ति बाहर चली जाती है। इससे स्थानीय बाजार, छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होती है।

परिवार के लिए प्रवासी मजदूर की कमाई कितनी महत्वपूर्ण है?

पलायन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ता है। घर में अक्सर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं। खेती और घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बुजुर्गों के कंधों पर आ जाता है।

दूसरी तरफ बाहर कमाने गया व्यक्ति परिवार को पैसे भेजता है। इसी आय से बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का खर्च, खेती में निवेश और मकान जैसी जरूरतें पूरी होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी मजदूर केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लंबे समय तक परिवार से दूर रहने की कीमत भी होती है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जीवन में दूरी का असर दिखाई देता है। प्रवासी श्रमिकों को काम की असुरक्षा, दुर्घटना, बीमारी, मजदूरी में देरी और रहने की खराब परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

गांव में रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में ऐसे रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को केवल मजबूरी में बाहर न जाना पड़े?

इसका जवाब केवल सरकारी नौकरियों में नहीं है। गांवों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, छोटे विनिर्माण केंद्र, हस्तशिल्प और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

यदि किसान अपनी उपज को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय गांव या प्रखंड स्तर पर उसका प्रसंस्करण कर सके, तो स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय और रोजगार दोनों पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह ग्रामीण युवाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए, जिसके बाद बाजार में वास्तविक रोजगार उपलब्ध हो। इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, ड्राइविंग, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में मांग के अनुरूप कौशल विकास किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और इंटरनेट भी रोजगार से जुड़े हैं

ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते समय बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क, बिजली, इंटरनेट, बैंकिंग और बाजार तक आसान पहुंच किसी भी छोटे व्यवसाय के लिए जरूरी है।

जब किसी गांव तक बाजार पहुंचेगा, तभी वहां व्यवसाय खड़ा करने की संभावना बढ़ेगी। जब व्यवसाय बढ़ेगा, तभी स्थानीय रोजगार पैदा होगा। इसलिए ग्रामीण विकास को केवल सड़क बनाने या भवन तैयार करने तक सीमित करने के बजाय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पलायन रोकना नहीं, सुरक्षित विकल्प देना जरूरी

सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर व्यक्ति को अपने गांव में ही रोक दिया जाए। देश के भीतर रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आर्थिक विकास का हिस्सा भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी, शोषण और असुरक्षा का पर्याय बन जाता है।

इसलिए जरूरत ऐसे ग्रामीण आर्थिक मॉडल की है, जिसमें गांव का युवा चाहे तो गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कर सके और चाहे तो बाहर जाकर अपनी प्रतिभा और कौशल के अनुरूप बेहतर अवसर हासिल कर सके।

ग्रामीण बिहार के पलायन को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे एक परिवार की जरूरत, एक किसान की आर्थिक मजबूरी, एक युवा की महत्वाकांक्षा और बेहतर भविष्य का सपना छिपा है।

पलायन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है; मजबूरी वाले पलायन को अवसर में बदलना समाधान है। बिहार के गांवों को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जहां रोजगार के लिए घर छोड़ना मजबूरी न हो और बाहर जाना केवल बेहतर अवसर चुनने का फैसला हो। विकल्प होना ही वास्तविक विकास की निशानी है।

आलोक कुमार

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

Bihar: कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाओं की जमीनी पड़ताल

 


कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाओं की जमीनी पड़ताल

पटना। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई भारत में दशकों से जारी है। सरकारें बदलती रहीं, योजनाओं के नाम और स्वरूप बदलते रहे, बजट बढ़ता रहा, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चों की कमजोर काया आज भी व्यवस्था से एक असहज सवाल पूछती है—आखिर सरकारी पोषण योजनाओं का वास्तविक लाभ उन बच्चों तक कितनी दूर पहुंचा, जिनके नाम पर ये योजनाएं बनाई गई हैं?

बिहार जैसे राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वच्छ पेयजल की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच बच्चों के पोषण को प्रभावित करती है। ऐसे में कुपोषण केवल भोजन की कमी का परिणाम नहीं है। यह गरीबी, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मातृ शिक्षा और सरकारी सेवाओं की पहुंच से जुड़ा हुआ व्यापक सामाजिक संकट है।

सरकार ने बच्चों और माताओं के पोषण के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों, पूरक पोषाहार, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं और विभिन्न पोषण अभियानों के माध्यम से बड़ा तंत्र खड़ा किया है। लेकिन असली परीक्षा कागज पर नहीं, गांव के उस आंगनबाड़ी केंद्र में होती है जहां एक मां अपने बच्चे के लिए पोषण और स्वास्थ्य की उम्मीद लेकर पहुंचती है।

योजना बहुत, परिणाम कितना?

कुपोषण से निपटने के लिए सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और छोटे बच्चों को लक्षित कर पोषण सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। बच्चों के वजन और वृद्धि की निगरानी की जाती है। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का प्रावधान है।

लेकिन सवाल यह है कि इन योजनाओं का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाता है?

यदि किसी जिले में हजारों बच्चे योजना के लाभार्थी के रूप में दर्ज हैं, तो क्या यह भी पता किया जाता है कि उनमें से कितने बच्चों का वजन वास्तव में सुधरा? कितने बच्चे कुपोषण की श्रेणी से बाहर आए? कितनी माताओं को नियमित पोषण संबंधी सलाह मिली?

लाभार्थियों की संख्या बढ़ना योजना की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार ही वास्तविक सफलता का पैमाना होना चाहिए।

आंगनबाड़ी केंद्रों की असली तस्वीर

आंगनबाड़ी केंद्र कुपोषण के खिलाफ सरकारी लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यही वह स्थान है जहां छोटे बच्चों को पूरक पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं से जोड़ा जाना है।

लेकिन कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाओं का सवाल अब भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बच्चों के बैठने की व्यवस्था और साफ-सफाई जैसी सुविधाएं किसी भी बाल केंद्र के लिए अनिवार्य हैं।

यदि बच्चा जिस केंद्र में पोषण पाने जाता है, वहां स्वच्छता ही कमजोर हो, तो यह व्यवस्था की विडंबना है।

आंगनबाड़ी सेविका और सहायिका पर भी जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ है। उन्हें बच्चों के रिकॉर्ड से लेकर पोषाहार, माताओं से संपर्क और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में सहयोग तक कई काम करने पड़ते हैं। इसलिए सरकार को यह भी देखना होगा कि उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन और मानवीय सहयोग मिल रहा है या नहीं।

भोजन की गुणवत्ता पर सवाल

कुपोषण के खिलाफ सबसे जरूरी हथियार संतुलित और पौष्टिक भोजन है। लेकिन केवल भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं। भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, विविधता और नियमितता भी महत्वपूर्ण है।

बच्चों को उनकी उम्र और जरूरत के अनुरूप पोषण मिलना चाहिए। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी योजनाओं में उचित स्थान मिल सकता है। अंडा, दाल, हरी सब्जियां, दूध या अन्य पौष्टिक विकल्प जहां संभव हों, वहां भोजन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकते हैं।

यह भी जरूरी है कि पोषाहार की गुणवत्ता की निगरानी केवल कागजी जांच तक सीमित न रहे। जिस भोजन को बच्चा खा रहा है, उसकी गुणवत्ता का सामाजिक निरीक्षण भी होना चाहिए।

कुपोषित बच्चे की पहचान के बाद क्या?

कुपोषण की पहचान होना पहला कदम है, अंतिम समाधान नहीं।

किसी बच्चे का वजन कम पाया गया या वह गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आया, तो उसके बाद क्या हुआ? क्या स्वास्थ्यकर्मी ने उसका नियमित फॉलोअप किया? क्या परिवार को आवश्यक सलाह मिली? क्या बच्चे को जरूरत के अनुसार उपचार मिला?

यही वह बिंदु है जहां स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होती है।

एक विभाग द्वारा आंकड़ा तैयार कर देने से बच्चे का स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई को विभागीय सीमाओं से बाहर निकालकर संयुक्त अभियान बनाना होगा।

मां का पोषण भी उतना ही जरूरी

बच्चे के कुपोषण की चर्चा करते समय अक्सर मां की स्थिति को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य और पोषण बच्चे के विकास की नींव तैयार करता है।

यदि गर्भवती महिला खुद एनीमिया, भोजन की कमी या स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता से जूझ रही है, तो उसके बच्चे के स्वस्थ जन्म की संभावना भी प्रभावित हो सकती है।

इसलिए पोषण अभियान का केंद्र केवल बच्चा नहीं होना चाहिए। गर्भवती महिला से लेकर धात्री मां और नवजात शिशु तक एक निरंतर पोषण शृंखला बनानी होगी।

स्वच्छता और पेयजल को क्यों भूल जाते हैं?

कुपोषण का संबंध केवल भोजन से नहीं है। दूषित पानी, खराब स्वच्छता और बार-बार होने वाली बीमारियां भी बच्चे के शरीर की पोषण क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।

अगर बच्चे को पर्याप्त भोजन मिले लेकिन वह बार-बार संक्रमण से बीमार होता रहे, तो पोषण का लाभ सीमित हो सकता है। इसलिए कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में स्वच्छ पेयजल, शौचालय, साफ-सफाई और स्वास्थ्य जागरूकता को भी बराबर महत्व देना होगा।

आंकड़ों से आगे निकलने का समय

सरकारी योजनाओं की समीक्षा केवल इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि कितने केंद्र खुले, कितने बच्चों का पंजीकरण हुआ और कितने पैकेट पोषाहार बांटे गए। अब समय है कि सरकार परिणाम आधारित निगरानी अपनाए।

हर जिले में यह देखा जाना चाहिए कि कुपोषण की स्थिति क्या है, किन इलाकों में समस्या अधिक है और सरकारी हस्तक्षेप के बाद वास्तविक सुधार कितना हुआ।

पंचायत और समुदाय को निगरानी में शामिल किया जाए। अभिभावकों से फीडबैक लिया जाए। आंगनबाड़ी केंद्रों की सुविधाओं और पोषाहार की गुणवत्ता का सामाजिक ऑडिट कराया जाए। जहां कमी मिले, वहां जिम्मेदारी तय हो।

सवाल अब व्यवस्था से है

कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन योजनाओं की सफलता का दावा तभी सार्थक होगा जब उसका असर गरीब परिवार की रसोई और बच्चे के स्वास्थ्य में दिखाई दे।

सरकार को यह समझना होगा कि कुपोषण किसी आंकड़े की समस्या नहीं, एक बच्चे के भविष्य की समस्या है। जिस बच्चे को जीवन के शुरुआती वर्षों में पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।

इसलिए अब केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं, पुरानी योजनाओं की कठोर जमीनी समीक्षा चाहिए। बजट खर्च होने से ज्यादा जरूरी है कि उसका परिणाम दिखाई दे।

बिहार के गांवों में जब कोई मां अपने कमजोर बच्चे को आंगनबाड़ी केंद्र लेकर जाती है, तो वह सरकारी आंकड़ा नहीं होती। वह राज्य की विकास व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होती है।

कुपोषण के खिलाफ लड़ाई तब जीती जाएगी, जब सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि बच्चों की सेहत में बदलाव दिखाई देगा। यही किसी भी पोषण योजना की असली सफलता और सरकार की सबसे बड़ी जवाबदेही है।

आलोक कुमार

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