डिजिटल इंडिया में डेटा सुरक्षा का सवाल: क्या आम नागरिक सचमुच सुरक्षित है?
तेज़ी से डिजिटल होती दुनिया में भारत ने अभूतपूर्व प्रगति की है.ऑनलाइन बैंकिंग, यूपीआई भुगतान, आधार आधारित सेवाएँ, ई-गवर्नेंस और सोशल मीडिया — इन सबने आम नागरिक के जीवन को आसान बनाया है.लेकिन इस सुविधा के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हुआ है: क्या हमारे डेटा की सुरक्षा सच में सुनिश्चित है?
5 फ़रवरी जैसे समय में, जब डिजिटल उपयोग अपने चरम पर है, डेटा सुरक्षा केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह नागरिक अधिकार, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय विश्वास से जुड़ा विषय बन चुका है.
बढ़ता डिजिटल उपयोग, बढ़ता जोखिम
भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता देशों में शामिल है.करोड़ों लोग रोज़ाना डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन खरीदारी और सरकारी सेवाओं का उपयोग करते हैं.लेकिन इसी के साथ:साइबर फ्रॉड के मामले बढ़ रहे हैं.फिशिंग कॉल और फर्जी लिंक आम हो चुके हैं.निजी जानकारी का दुरुपयोग तेजी से हो रहा है.अक्सर देखा जाता है कि एक छोटी-सी लापरवाही — जैसे ओटीपी साझा करना या संदिग्ध लिंक खोलना — व्यक्ति की पूरी बचत पर भारी पड़ सकती है.
डेटा केवल जानकारी नहीं, पहचान है
डिजिटल युग में डेटा ही पहचान बन चुका है.आधार नंबर, मोबाइल नंबर, बैंक डिटेल, लोकेशन और ऑनलाइन व्यवहार — ये सब मिलकर किसी व्यक्ति की पूरी प्रोफाइल तैयार कर देते हैं.यदि यह जानकारी गलत हाथों में चली जाए तो:आर्थिक नुकसान,पहचान की चोरी,ब्लैकमेलिंग,वित्तीय धोखाधड़ी,जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं.इसलिए डेटा सुरक्षा अब केवल आईटी विशेषज्ञों का विषय नहीं, बल्कि हर नागरिक की चिंता है.
कानून बने, लेकिन जागरूकता कम
भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन से जुड़े कानूनों की दिशा में कदम उठाए गए हैं.सरकार और संस्थाएँ लगातार सुरक्षा ढाँचा मजबूत करने की बात करती हैं.फिर भी ज़मीनी हकीकत यह है कि:आम लोगों को अपने डिजिटल अधिकारों की जानकारी कम है.साइबर अपराध की शिकायत प्रक्रिया जटिल लगती है.छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बेहद सीमित है.यानी कानून मौजूद हैं, पर सुरक्षा की वास्तविक भावना अभी भी अधूरी है.
जिम्मेदारी किसकी?
डेटा सुरक्षा को केवल सरकार या कंपनियों पर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है.यह तीन स्तरों की साझा जिम्मेदारी है:
1. सरकार,मजबूत साइबर सुरक्षा ढाँचा,तेज़ शिकायत निवारण प्रणाली,सख्त दंड व्यवस्था.
2. कंपनियाँ और डिजिटल प्लेटफॉर्म
यूज़र डेटा का सुरक्षित संग्रहण,पारदर्शी प्राइवेसी पॉलिसी,डेटा लीक पर जवाबदेही.
3. आम नागरिक
ओटीपी और पासवर्ड साझा न करना,संदिग्ध लिंक से सावधान रहना,समय-समय पर सुरक्षा सेटिंग अपडेट करना,जब तक ये तीनों स्तर साथ नहीं आएँगे, तब तक पूर्ण सुरक्षा संभव नहीं.मध्यम वर्ग पर सबसे बड़ा असर,डिजिटल फ्रॉड का सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग पर पड़ता है,क्योंकि:उनकी बचत सीमित होती है,वे डिजिटल सेवाओं पर निर्भर रहते हैं,कानूनी लड़ाई लड़ना कठिन होता है,एक छोटी-सी धोखाधड़ी वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है.यही कारण है कि डेटा सुरक्षा का सवाल सीधे आर्थिक स्थिरता से जुड़ जाता है.
समाधान की दिशा
स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन असंभव नहीं.कुछ ठोस कदम हालात बदल सकते हैं:स्कूल स्तर से डिजिटल सुरक्षा शिक्षा,हर जिले में साइबर हेल्प सेंटर,फ्रॉड पीड़ितों के लिए त्वरित वित्तीय राहत,मजबूत डेटा प्रोटेक्शन नियमों का सख्त पालन,सबसे जरूरी है — डर नहीं, जागरूकता.
निष्कर्ष
डिजिटल इंडिया की सफलता केवल तकनीक से तय नहीं होगी,बल्कि इस बात से तय होगी कि आम नागरिक खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है.सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना ही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती है.यदि डेटा सुरक्षित है, तो डिजिटल भविष्य मजबूत है.लेकिन यदि डेटा असुरक्षित है, तो पूरी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है.इसलिए सवाल अब भी वही है —क्या हम सचमुच सुरक्षित हैं, या केवल सुरक्षित होने का भ्रम जी रहे हैं?
आलोक कुमार
