महिला आरक्षण पर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने, सवाल फिर वही—महिलाओं को संसद में जगह कब?
भारत की राजनीति में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का सवाल एक बार फिर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का कारण बन गया है। एक ओर सरकार का तर्क है कि महिला आरक्षण को प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए परिसीमन जरूरी है, वहीं विपक्ष का कहना है कि वर्ष 2023 में संसद से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने में अब और देरी क्यों? महिलाओं को संसद में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने का रास्ता पहले ही संवैधानिक रूप से तैयार किया जा चुका है, फिर उसके क्रियान्वयन को परिसीमन से जोड़कर क्यों टाला जा रहा है?यही वह सवाल है जिसने अगस्त 2026 में संसद की राजनीति को गरमा दिया है।
वर्ष 2023 में संसद ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया था। लेकिन इस कानून में इसके तत्काल लागू होने की व्यवस्था नहीं थी। कानून के अनुसार, आरक्षण की शुरुआत जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात होनी है।
यानी कानून बना, लेकिन उसकी वास्तविक राजनीतिक परिणति अभी बाकी है।
यहीं से मौजूदा विवाद शुरू होता है।
सरकार का पक्ष है कि परिसीमन के माध्यम से निर्वाचन क्षेत्रों का नया निर्धारण किया जाएगा और उसी प्रक्रिया के तहत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण होगा। 2026 में पेश किए गए प्रस्तावों में लोकसभा की संख्या बढ़ाने, परिसीमन कराने और महिला आरक्षण को लागू करने के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश की गई। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता तैयार करना था।
सरकार के नजरिये से देखें तो तर्क में दम दिखाई देता है। जनसंख्या में बड़े बदलाव के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाने की प्रक्रिया हो सकती है। सरकार यह भी कहती रही है कि परिसीमन के माध्यम से “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” की संवैधानिक भावना को मजबूत किया जाएगा।
लेकिन विपक्ष की चिंता दूसरी है।
विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़ना आवश्यक नहीं है। यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को संसद में अधिक प्रतिनिधित्व देना चाहती है तो 2023 में पारित कानून को मौजूदा लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटों के आधार पर लागू किया जा सकता है। विपक्ष के मुताबिक, महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन को आगे बढ़ाना अलग राजनीतिक और संघीय सवालों को एक साथ जोड़ देता है।
यह विवाद केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं है। इसके पीछे भारतीय संघीय ढांचे का एक गंभीर प्रश्न भी छिपा है।
परिसीमन के बाद राज्यों की लोकसभा सीटों के अनुपात में बदलाव हो सकता है। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें आशंका है कि भविष्य के परिसीमन में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। इसलिए दक्षिणी राज्यों समेत विपक्षी दल परिसीमन के तरीके और समय को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
ऐसे में महिला आरक्षण का मुद्दा दो अलग-अलग बहसों के बीच फंस गया है—एक बहस महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की और दूसरी परिसीमन तथा राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की।
विडंबना यह है कि दोनों पक्ष महिलाओं के प्रतिनिधित्व के पक्ष में होने का दावा कर रहे हैं।
सरकार कहती है कि वह महिला आरक्षण को लागू करना चाहती है और इसके लिए जरूरी संवैधानिक ढांचा तैयार कर रही है। विपक्ष कहता है कि वह महिला आरक्षण का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे परिसीमन के साथ जोड़ने का विरोध करता है। विपक्ष का तर्क सीधा है—“आपने 2023 में महिला आरक्षण का कानून बनाया था, अब उसी कानून को लागू कीजिए और महिलाओं के लिए संसद के दरवाजे खोलिए।”
लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां इतनी सरल नहीं हैं।
2026 में परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक संशोधन को लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत नहीं मिल सका। इसके बाद संबंधित विधेयकों की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी। इससे यह संकेत मिलता है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता अभी भी राजनीतिक सहमति से दूर है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व कब मिलेगा?
भारत की राजनीति में महिलाएं आज हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी ने यह साबित किया है कि राजनीतिक नेतृत्व केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है। संसद और विधानसभाओं में भी महिलाओं की संख्या बढ़ाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
लेकिन यदि महिला आरक्षण राजनीतिक सहमति की कमी, परिसीमन और संवैधानिक प्रक्रियाओं के बीच उलझा रहा तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन महिलाओं को होगा जो राजनीतिक व्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व की प्रतीक्षा कर रही हैं।
यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बनती है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि महिला आरक्षण लागू करने की उसकी वास्तविक समय-सीमा क्या है। विपक्ष को भी केवल विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर ऐसा वैकल्पिक रास्ता सामने रखना चाहिए जिससे महिलाओं का प्रतिनिधित्व जल्द से जल्द बढ़ाया जा सके और साथ ही राज्यों के हितों की रक्षा हो।
महिला आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाया जाना चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि कौन महिला आरक्षण के पक्ष में है और कौन विरोध में। असली सवाल यह है कि भारत की आधी आबादी को संसद में उसकी हिस्सेदारी कब मिलेगी?
2023 का कानून उम्मीद लेकर आया था। 2026 की राजनीति ने उस उम्मीद को फिर विवाद के घेरे में खड़ा कर दिया है। सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं, लेकिन संसद के बाहर बैठी करोड़ों महिलाएं शायद एक ही सवाल पूछ रही हैं—कानून बन चुका है, बहस भी हो चुकी है, फिर संसद के दरवाजे हमारे लिए पूरी तरह कब खुलेंगे?
यही सवाल आने वाले दिनों में भारतीय लोकतंत्र की राजनीति के केंद्र में रहेगा।
आलोक कुमार