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मंगलवार, 9 जून 2026

Bihar : ए.एन. कॉलेज में आईपीएल खिलाड़ी शाकिब हुसैन का सम्मान, युवाओं को दिया सफलता का मंत्र

 पटना के ए.एन. कॉलेज में आईपीएल 2026 में सनराइजर्स हैदराबाद का प्रतिनिधित्व कर रहे शाकिब हुसैन का सम्मान किया गया। उन्होंने युवाओं को मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास का संदेश दिया


"हर बड़े खिलाड़ी की कहानी किसी स्टेडियम की चमक से नहीं, बल्कि छोटे मैदानों की धूल, कठिन संघर्षों और बड़े सपनों से शुरू होती है। जब किसी युवा की मेहनत उसे देश के सबसे बड़े क्रिकेट मंच तक पहुंचा देती है, तो उसकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रह जाती, बल्कि वह हजारों युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने वाली प्रेरणा बन जाती है। बिहार के युवा क्रिकेटर शाकिब हुसैन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने आज राज्य के युवाओं में नए विश्वास का संचार किया है।"

पटना स्थित ए.एन. कॉलेज में मंगलवार को उत्साह, गर्व और प्रेरणा का अनूठा माहौल देखने को मिला, जब बिहार के उभरते क्रिकेट खिलाड़ी तथा आईपीएल 2026 में सनराइजर्स हैदराबाद का प्रतिनिधित्व कर रहे शाकिब हुसैन का महाविद्यालय परिवार की ओर से भव्य स्वागत और सम्मान किया गया।

कॉलेज परिसर में आयोजित इस सम्मान समारोह में शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों ने गर्मजोशी के साथ शाकिब का स्वागत किया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल एक खिलाड़ी को सम्मानित करना नहीं था, बल्कि युवाओं को यह संदेश देना भी था कि प्रतिभा, मेहनत और समर्पण के बल पर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

प्राचार्या ने बताया युवाओं की प्रेरणा

महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रत्ना अमृत ने शाकिब हुसैन को सम्मानित करते हुए उनकी उपलब्धियों की सराहना की और कहा कि वे बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं।


उन्होंने कहा कि खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और संघर्ष करने की शक्ति भी सिखाता है। ऐसे खिलाड़ियों की उपलब्धियां युवाओं को अपने सपनों को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देती हैं।

प्राचार्या ने यह भी कहा कि बिहार में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता केवल उन्हें उचित अवसर, प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने की है। यदि सही दिशा और सहयोग मिले तो राज्य के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बना सकते हैं।

बिहार में क्रिकेट की संभावनाओं पर हुई चर्चा

कार्यक्रम के दौरान प्राचार्या प्रो. रत्ना अमृत और शाकिब हुसैन के बीच बिहार में क्रिकेट के भविष्य को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

बातचीत में खेल अवसंरचना के विकास, खिलाड़ियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं और ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को आगे लाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

दोनों ने इस बात पर सहमति जताई कि बिहार में बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर और संसाधन नहीं मिल पाते। यदि खेल सुविधाओं का विस्तार किया जाए और खिलाड़ियों को आधुनिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो राज्य राष्ट्रीय क्रिकेट मानचित्र पर और अधिक मजबूती से अपनी पहचान स्थापित कर सकता है।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को खोजने और उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। क्योंकि बिहार के कई सफल खिलाड़ी छोटे कस्बों और गांवों से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे हैं।

सफलता का मंत्र: अनुशासन, अभ्यास और आत्मविश्वास

कार्यक्रम के दौरान छात्रों और युवा खिलाड़ियों को संबोधित करते हुए शाकिब हुसैन ने अपने संघर्ष और सफलता की यात्रा साझा की।

उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। निरंतर अभ्यास, कड़ी मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास ही किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी पूंजी होती है।

शाकिब ने बताया कि क्रिकेट में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है निरंतर सीखते रहना और कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानना।

उन्होंने युवाओं से कहा कि असफलताओं से घबराने के बजाय उन्हें सीखने का अवसर समझना चाहिए। हर खिलाड़ी के जीवन में चुनौतियां आती हैं, लेकिन जो खिलाड़ी धैर्य और समर्पण बनाए रखता है, वही अंततः सफलता प्राप्त करता है।

ए.एन. कॉलेज के खिलाड़ियों को मिलेगा मार्गदर्शन

शाकिब हुसैन ने ए.एन. कॉलेज के क्रिकेट खिलाड़ियों को हर संभव सहयोग और मार्गदर्शन देने का आश्वासन भी दिया।

उन्होंने कहा कि वे समय-समय पर कॉलेज के खिलाड़ियों के साथ संवाद करेंगे और अपने अनुभव साझा करेंगे ताकि युवा खिलाड़ी खेल के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित कर सकें।

उनका मानना है कि यदि खिलाड़ियों को सही दिशा, प्रेरणा और तकनीकी मार्गदर्शन मिले तो बिहार के युवा क्रिकेटर भी देश और दुनिया के बड़े मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं।

उनकी इस घोषणा का कॉलेज के छात्रों और खिलाड़ियों ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

युवाओं में दिखा खास उत्साह

समारोह के दौरान छात्रों में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई छात्रों ने शाकिब से उनके क्रिकेट करियर, प्रशिक्षण पद्धति और आईपीएल अनुभवों के बारे में सवाल पूछे।

युवा खिलाड़ियों के लिए यह अवसर किसी प्रेरणादायक पाठशाला से कम नहीं था। उन्हें एक ऐसे खिलाड़ी से सीधे संवाद करने का मौका मिला जिसने संघर्ष से आगे बढ़कर भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रतिष्ठित मंच आईपीएल तक का सफर तय किया है।

छात्रों का कहना था कि शाकिब की सफलता उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति और अधिक गंभीर तथा समर्पित बनने की प्रेरणा देती है।

शिक्षा और खेल का संतुलन भी जरूरी

कार्यक्रम में यह संदेश भी प्रमुखता से सामने आया कि खेल और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।

कॉलेज प्रशासन ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा के साथ-साथ खेल गतिविधियों में भागीदारी भी व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। खेल युवाओं को टीम भावना, नेतृत्व क्षमता और मानसिक मजबूती प्रदान करते हैं।

शाकिब हुसैन की उपलब्धि इस बात का उदाहरण है कि यदि युवा सही योजना और मेहनत के साथ आगे बढ़ें तो शिक्षा और खेल दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

उपस्थित रहे कई गणमान्य शिक्षक

इस अवसर पर पूर्व प्रभारी प्राचार्य प्रो. शैलेश कुमार सिंह, शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो. सुशील कुमार सिंह, बर्सर डॉ. अभिषेक दत्त, परीक्षा नियंत्रक डॉ. संजीत लाल, डॉ. संजय सिंह सहित महाविद्यालय के अनेक शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

सभी ने शाकिब हुसैन को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं और उम्मीद जताई कि वे आने वाले वर्षों में बिहार तथा देश का नाम और अधिक रोशन करेंगे।

निष्कर्ष

ए.एन. कॉलेज में आयोजित यह सम्मान समारोह केवल एक खिलाड़ी के स्वागत का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि युवाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस देने वाला प्रेरणादायक अवसर भी था।

शाकिब हुसैन की उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा यदि मेहनत और अनुशासन के साथ जुड़ जाए तो सफलता निश्चित होती है। उनकी यात्रा बिहार के हजारों युवा खिलाड़ियों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है।

ए.एन. कॉलेज परिवार ने विश्वास व्यक्त किया कि शाकिब हुसैन की उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रेरित करती रहेंगी और बिहार के खेल जगत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

आलोक कुमार

Bihar : आस्था की पुकार: आइए, डाकबाबा मंदिर के जीर्णोद्धार में बनें सहभागी

 पटना के मखदुमपुर स्थित डाकबाबा मंदिर के जीर्णोद्धार अभियान में जुटे श्रद्धालु और स्थानीय लोग

"मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं होता, वह किसी समाज की आस्था, संस्कृति और विरासत का जीवंत प्रतीक होता है। जब किसी मंदिर की घंटियां बजती हैं तो केवल ध्वनि नहीं गूंजती, बल्कि पीढ़ियों की श्रद्धा, विश्वास और परंपराएं भी जीवंत हो उठती हैं।"

दीघा थाना क्षेत्र के मखदुमपुर मोहल्ले में स्थित डाकबाबा मंदिर भी ऐसी ही एक पवित्र धरोहर है, जो वर्षों से हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक चेतना और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में सड़क किनारे कराया गया था। समय के साथ मोहल्ला बदला, सड़कें बदलीं, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन डाकबाबा मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा और विश्वास कभी नहीं बदला। वर्षों से यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना लेकर माथा टेकते रहे हैं।

कई परिवारों के लिए यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं और स्मृतियों का हिस्सा है। बच्चों के मुंडन संस्कार से लेकर नई शुरुआत की पूजा तक, जीवन के अनेक महत्वपूर्ण अवसर इस मंदिर से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि डाकबाबा मंदिर आज भी मखदुमपुर और आसपास के क्षेत्रों की धार्मिक पहचान का अभिन्न अंग माना जाता है।

एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना और आहत हुई आस्था

कुछ दिन पूर्व घटी एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। बताया जाता है कि नशे की हालत में बुलडोजर चला रहे चालक द्वारा मंदिर के एक हिस्से में टक्कर मार दी गई, जिससे मंदिर की संरचना को नुकसान पहुंचा।

यह केवल एक निर्माण को हुई क्षति नहीं थी। इस घटना ने उन हजारों श्रद्धालुओं की भावनाओं को भी आहत किया, जिनकी आस्था वर्षों से इस मंदिर से जुड़ी रही है। घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय लोगों में दुख और चिंता का माहौल व्याप्त हो गया।

लोगों का कहना है कि मंदिर के क्षतिग्रस्त होने का दर्द केवल ईंटों और दीवारों के टूटने का दर्द नहीं है, बल्कि उस विरासत को लगी चोट है जिसे कई पीढ़ियों ने श्रद्धा और सम्मान के साथ संजोकर रखा था।

समाज ने लिया पुनर्निर्माण का संकल्प

घटना के बाद मोहल्ले के धार्मिक, सामाजिक और जागरूक लोगों ने कई दौर की बैठकें कीं। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि डाकबाबा मंदिर का जीर्णोद्धार केवल आवश्यक ही नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी है।

इसी भावना के साथ यह निर्णय लिया गया कि मंदिर को पहले से अधिक सुंदर, सुरक्षित और व्यवस्थित रूप में पुनर्स्थापित किया जाएगा।

इस निर्णय के तहत 8 जून से डाकबाबा मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य की शुरुआत की जा रही है। यह कार्य केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता, श्रद्धा और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक बनने जा रहा है।

क्यों जरूरी है मंदिर का जीर्णोद्धार?

किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति और विरासत से होती है। यदि हम अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से दूर होती चली जाएंगी।

डाकबाबा मंदिर का जीर्णोद्धार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल वर्तमान पीढ़ी की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी एक जिम्मेदारी है।

जब बच्चे और युवा इस मंदिर को देखेंगे, इसकी परंपराओं को जानेंगे और यहां होने वाले धार्मिक आयोजनों में भाग लेंगे, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत जीवित रह सकेगी।

मंदिरों का संरक्षण केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है।

आपका सहयोग क्यों महत्वपूर्ण है?

किसी भी बड़े सामाजिक या धार्मिक कार्य की सफलता समाज की सहभागिता पर निर्भर करती है। डाकबाबा मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए भी समाज के प्रत्येक वर्ग का सहयोग आवश्यक है।

चाहे आपका सहयोग आर्थिक हो, श्रमदान के रूप में हो या फिर इस अभियान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के रूप में—हर योगदान महत्वपूर्ण है।

याद रखिए, बड़े निर्माण केवल बड़े दान से नहीं होते। हजारों लोगों की छोटी-छोटी सहभागिता मिलकर बड़े बदलाव का आधार बनती है।

आपकी श्रद्धा से दिया गया एक छोटा-सा योगदान भी मंदिर के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

दान केवल राशि नहीं, पुण्य का अवसर है

भारतीय संस्कृति में दान को सदैव श्रेष्ठ कर्म माना गया है। विशेष रूप से धार्मिक और जनहित के कार्यों में दिया गया सहयोग समाज और संस्कृति को मजबूत बनाने का माध्यम बनता है।

डाकबाबा मंदिर के जीर्णोद्धार में दिया गया आपका योगदान केवल निर्माण सामग्री खरीदने में ही सहायक नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी बनेगा कि समाज अपनी आस्था और विरासत की रक्षा के लिए एकजुट है।

आज जो सहयोग आप करेंगे, वही आने वाले वर्षों में हजारों श्रद्धालुओं को एक सुरक्षित और भव्य मंदिर के रूप में दिखाई देगा।

आइए, हम सब मिलकर इतिहास रचें

आज आवश्यकता केवल आर्थिक सहायता की नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प की है। हमें यह साबित करना है कि समाज की आस्था को कोई क्षति स्थायी रूप से कमजोर नहीं कर सकती।

यदि हम सभी मिलकर आगे आएं, तो डाकबाबा मंदिर न केवल पुनः अपने पुराने स्वरूप में लौटेगा, बल्कि पहले से अधिक भव्य और आकर्षक रूप में स्थापित होगा।

यह अवसर केवल मंदिर निर्माण का नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपनी विरासत को सुरक्षित रखने का है।

भावपूर्ण अपील

डाकबाबा मंदिर जीर्णोद्धार समिति आप सभी श्रद्धालुओं, समाजसेवियों, धर्मप्रेमियों और क्षेत्रवासियों से विनम्र आग्रह करती है कि इस पुण्य कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लें।

अपनी श्रद्धा, क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार दान दें। अपने मित्रों, परिजनों और परिचितों को भी इस अभियान से जोड़ें।

आपका सहयोग, आपका विश्वास और आपकी सहभागिता ही इस पवित्र कार्य को सफल बनाएगी।

आइए, हम सब मिलकर डाकबाबा मंदिर को उसकी पुरानी गरिमा, भव्यता और आध्यात्मिक पहचान वापस दिलाएं।

दान करें। सहयोग करें। जुड़ें।

क्योंकि आस्था की रक्षा, हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।


आलोक कुमार


Bihar: पप्पू यादव ने गडकरी से की संपर्क पथ निर्माण की मांग

दियारा से विकास की राह: पप्पू यादव ने गडकरी से की संपर्क पथ निर्माण की मांग, सीमांचल को जोड़ने की नई पहल

"किसी भी क्षेत्र का विकास केवल बड़े पुलों और चौड़ी सड़कों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से तय होता है कि उस विकास का लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं। जब करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बन जाएं, लेकिन गांव का किसान, छात्र, मरीज और मजदूर उससे सीधे लाभान्वित न हो सके, तब विकास की तस्वीर अधूरी दिखाई देती है। बिहार के दियारा क्षेत्र की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां आधुनिक बुनियादी ढांचे के बावजूद संपर्क मार्गों की कमी लोगों की परेशानियां बढ़ा रही है।"

इसी समस्या को प्रमुखता से उठाते हुए पूर्णिया संसदीय क्षेत्र के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने नई दिल्ली में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात कर दियारा क्षेत्र के विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण मांगों को उनके समक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने केवल एक सड़क निर्माण की मांग नहीं की, बल्कि बिहार के दियारा, कोसी और सीमांचल क्षेत्र की कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में व्यापक पहल की आवश्यकता पर जोर दिया।

गडकरी को सौंपा स्मरण पत्र

नई दिल्ली में हुई शिष्टाचार मुलाकात के दौरान सांसद पप्पू यादव ने दियारा विकास संघर्ष समिति, पटना एवं सारण की ओर से पूर्व में प्रेषित निवेदन के क्रम में केंद्रीय मंत्री को एक विस्तृत स्मरण पत्र सौंपा।

ज्ञापन में विशेष रूप से जेपी सेतु के समानांतर राष्ट्रीय राजमार्ग-139 के अंतर्गत गंगा नदी पर निर्मित दीघा-सोनपुर 6-लेन पुल से ग्राम पंचायत नकटा दियारा नया टोला तक संपर्क स्थापित करने के लिए पिलर संख्या-16 के निकट एप्रोच रोड रैम्प निर्माण की मांग की गई।

सांसद ने मंत्री को बताया कि वर्तमान में इस संपर्क मार्ग के अभाव में हजारों ग्रामीणों को रोजमर्रा के आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बड़ी परियोजनाएं बनने के बावजूद स्थानीय आबादी को उनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

सड़क नहीं, जीवन की जरूरत है यह परियोजना

सांसद पप्पू यादव ने अपने आग्रह में स्पष्ट किया कि यह मांग केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और आपातकालीन सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच से जुड़ा हुआ है।

दियारा क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अक्सर अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, बाजार और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई बार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती, जिससे गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

यदि नकटा दियारा नया टोला से पिलर संख्या-16 तक एप्रोच रोड रैम्प का निर्माण हो जाता है, तो हजारों लोगों का आवागमन आसान हो जाएगा और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।

दियारा क्षेत्र की वर्षों पुरानी मांग

गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे दियारा क्षेत्र लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते रहे हैं। बाढ़, कटाव और परिवहन सुविधाओं के अभाव ने इन क्षेत्रों के विकास को प्रभावित किया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़े पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग बनने के बावजूद गांवों को उनसे जोड़ने वाले संपर्क मार्गों की कमी के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।

ऐसे में दियारा क्षेत्र के लिए संपर्क पथ का निर्माण केवल एक स्थानीय मांग नहीं बल्कि क्षेत्रीय विकास की आवश्यकता बन चुका है।पटना से पूर्णिया 

तक बेहतर कनेक्टिविटी की पहल

मुलाकात के दौरान सांसद पप्पू यादव ने केवल दियारा क्षेत्र की समस्या नहीं उठाई, बल्कि पटना से पूर्णिया तक बेहतर कनेक्टिविटी विकसित करने का भी आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि बिहार के पूर्वी हिस्से, विशेषकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र, अभी भी मजबूत सड़क नेटवर्क की दृष्टि से और अधिक निवेश की मांग करते हैं। बेहतर सड़क संपर्क न केवल आवागमन को आसान बनाएगा, बल्कि व्यापार, पर्यटन और निवेश को भी प्रोत्साहित करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीमांचल क्षेत्र की कनेक्टिविटी मजबूत होती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे पूर्वी बिहार की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

पूर्णिया एयरपोर्ट तक फोरलेन सड़क की मांग


सांसद ने केंद्रीय मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में एक और महत्वपूर्ण मांग रखी। उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग-31 के जीरो माइल (गुलाबबाग) से पूर्णिया एयरपोर्ट तक फोरलेन सड़क अथवा सीधा राष्ट्रीय राजमार्ग विकसित करने का आग्रह किया।

वर्तमान में शहर के भीतर बढ़ते ट्रैफिक दबाव के कारण यात्रियों को जाम की समस्या का सामना करना पड़ता है। यदि एयरपोर्ट तक सीधा और चौड़ा मार्ग उपलब्ध हो जाए, तो यात्रा समय में कमी आएगी और क्षेत्रीय विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी एयरपोर्ट की सफलता केवल उसके रनवे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वहां तक पहुंचने वाली सड़क व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

स्मार्ट सिटी और इंटरनेशनल स्टेडियम का भी उठाया मुद्दा

सड़क परियोजनाओं के अलावा सांसद पप्पू यादव ने पूर्णिया के समग्र विकास से जुड़े अन्य मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया।

उन्होंने पूर्णिया को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना है कि सीमांचल का सबसे महत्वपूर्ण शहर होने के बावजूद पूर्णिया अभी भी कई आधुनिक शहरी सुविधाओं से वंचित है।

इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर पूर्णिया में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम के निर्माण की मांग करने की भी बात कही है।

यदि यह परियोजना साकार होती है, तो इससे न केवल खेल प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा, बल्कि क्षेत्र में खेल पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

 विकास की राजनीति या जनहित का मुद्दा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दे किसी भी क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सड़क, पुल, एयरपोर्ट और खेल सुविधाएं सीधे तौर पर रोजगार, निवेश और सामाजिक विकास को प्रभावित करती हैं।

ऐसे में दियारा संपर्क पथ, पूर्णिया एयरपोर्ट फोरलेन और स्मार्ट सिटी जैसी मांगों को केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि इन परियोजनाओं पर अमल होता है, तो लाखों लोगों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।

निष्कर्ष

नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से सांसद पप्पू यादव की मुलाकात ने बिहार के दियारा और सीमांचल क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण विकासात्मक मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। नकटा दियारा संपर्क पथ, पूर्णिया एयरपोर्ट फोरलेन, स्मार्ट सिटी और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम जैसी परियोजनाएं केवल निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के भविष्य से जुड़ी उम्मीदें हैं।

अब निगाहें केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि इन प्रस्तावों को स्वीकृति और गति मिलती है, तो दियारा से लेकर सीमांचल तक विकास की नई राह खुल सकती है और लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे लाखों लोगों की उम्मीदों को नया आधार मिल सकता है।

आलोक कुमार



Bihar : शहर में ऑटो और टेंपू किराए में वृद्धि कर दी गई

       पटना में बैटरी से चलने वाली हवा-हवाई टेंपू का भाड़ा,'हवा-हवाई' का नया गणित: ईंधन बढ़े या न बढ़े, जेब ढीली होना तय है!


"महंगाई
का असर जब आम आदमी की जेब पर पड़ता है, तो वह केवल आंकड़ों का विषय नहीं रह जाता। वह रोजमर्रा की जिंदगी की हकीकत बन जाता है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब बढ़ती लागत के नाम पर ऐसी वसूली शुरू हो जाए, जिसका वास्तविक खर्च से सीधा संबंध ही न हो।"

बिहार की राजधानी पटना इन दिनों कुछ ऐसे ही सवालों से जूझ रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद शहर में ऑटो और टेंपू किराए में वृद्धि कर दी गई है। पहली नजर में यह फैसला सामान्य लग सकता है, क्योंकि ईंधन महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन बहस तब शुरू हुई जब सीएनजी और बैटरी से चलने वाले वाहनों ने भी लगभग उसी अनुपात में किराया बढ़ा दिया।

अब यात्रियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी वाहन का संचालन पेट्रोल या डीजल पर निर्भर ही नहीं है, तो फिर ईंधन मूल्य वृद्धि का बोझ यात्रियों पर क्यों डाला जा रहा है?

सुबह की शुरुआत अब किराए की बहस से

पटना की सड़कों पर सुबह का दृश्य कुछ बदला-बदला नजर आता है। पहले लोगों की चिंता समय पर कार्यालय, कॉलेज या बाजार पहुंचने की होती थी, लेकिन अब यात्रा शुरू होने से पहले ही किराए को लेकर बहस छिड़ जाती है।

बस स्टैंड, ऑटो स्टैंड और प्रमुख चौक-चौराहों पर अक्सर यात्रियों और चालकों के बीच किराए को लेकर नोकझोंक देखी जा सकती है। कोई पुराने किराए पर जाने की मांग करता है तो कोई नए निर्धारित किराए का हवाला देता है। नतीजा यह है कि सफर शुरू होने से पहले ही तनाव का माहौल बन जाता है।

तीन रुपये की बढ़ोतरी, लेकिन असर कहीं ज्यादा

टेंपू चालक यूनियनों द्वारा कई रूटों पर न्यूनतम किराया बढ़ाकर दस रुपये कर दिया गया है। देखने में यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन इसका प्रभाव उन हजारों लोगों पर पड़ता है जो प्रतिदिन कई बार सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं।

एक छात्र, जो रोज चार बार ऑटो या ई-रिक्शा से यात्रा करता है, उसके लिए प्रतिदिन कुछ रुपये का अतिरिक्त खर्च महीने के अंत तक सैकड़ों रुपये का बोझ बन जाता है। यही स्थिति नौकरीपेशा कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की भी है।

महंगाई पहले से ही घरेलू बजट पर दबाव बना रही है। ऐसे में परिवहन खर्च में बढ़ोतरी आम लोगों के लिए एक और चुनौती बन गई है।

सबसे बड़ा सवाल: बैटरी और सीएनजी वाहन क्यों महंगे हुए?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि पटना में चलने वाले लगभग सभी प्रकार के सार्वजनिक वाहनों ने किराया बढ़ा दिया है।

पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के साथ-साथ सीएनजी वाहन और बैटरी चालित ई-रिक्शा भी नए किराए पर यात्रियों से पैसे वसूल रहे हैं।

यहीं से जनता के सवाल शुरू होते हैं।

यदि ई-रिक्शा में पेट्रोल या डीजल का उपयोग नहीं होता, तो ईंधन मूल्य वृद्धि का तर्क वहां कैसे लागू हो सकता है? क्या केवल इसलिए कि अन्य वाहन किराया बढ़ा रहे हैं, सभी श्रेणियों के वाहनों को भी ऐसा करने का अधिकार मिल जाना चाहिए?

यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि तार्किक और नीतिगत भी है।

चालकों की अपनी मजबूरियां भी हैं

दूसरी ओर, चालकों का पक्ष भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

कई ई-रिक्शा चालक बताते हैं कि वाहन खरीदने में उन्हें भारी निवेश करना पड़ा है। बैंक ऋण की किस्तें, बैटरी बदलने का खर्च, मरम्मत, टायर, पार्किंग शुल्क और रखरखाव की लागत लगातार बढ़ रही है।

कुछ चालक बिजली दरों में वृद्धि का भी हवाला देते हैं। उनका कहना है कि बैटरी चार्जिंग की लागत पहले की तुलना में अधिक हो गई है।

इन तर्कों में वास्तविकता जरूर दिखाई देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन लागतों का कोई आधिकारिक और पारदर्शी आकलन किया गया है? यदि किया गया है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

यूनियन का दबाव और प्रतिस्पर्धा का सवाल

इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। कई चालकों का कहना है कि वे व्यक्तिगत रूप से कम किराया लेने के पक्ष में हों, तब भी ऐसा करना आसान नहीं है।

कुछ चालक स्वीकार करते हैं कि यूनियन द्वारा तय किराए से कम वसूली करने पर उन्हें विरोध या दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में अधिकांश चालक निर्धारित दरों का पालन करने को मजबूर हो जाते हैं।

यहीं से मामला केवल किराया वृद्धि का नहीं रह जाता, बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अधिकार का भी बन जाता है।

यदि कोई चालक कम किराए पर बेहतर सेवा देना चाहता है, तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन यदि सामूहिक दबाव इस स्वतंत्रता को सीमित करता है, तो यह बाजार व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है।

जनता और चालक के बीच फंसा प्रशासन

पटना जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में सार्वजनिक परिवहन लाखों लोगों की दैनिक आवश्यकता है। छात्र, कर्मचारी, छोटे व्यवसायी, मजदूर और बुजुर्ग बड़ी संख्या में ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा पर निर्भर हैं।

इसके बावजूद किराया निर्धारण की प्रक्रिया आम लोगों के लिए स्पष्ट नहीं दिखती।

कई यात्रियों का कहना है कि उन्हें यह तक जानकारी नहीं होती कि कौन-सा किराया अधिकृत है और कौन-सा नहीं। सार्वजनिक स्थानों पर किराया सूची का अभाव भी भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा करता है।

ऐसे में प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किराया बढ़ाना आवश्यक है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए। जनता को बताया जाना चाहिए कि परिचालन लागत कितनी बढ़ी और किराया किस गणना के आधार पर तय किया गया।

पारदर्शिता ही समाधान का रास्ता

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और बैटरी चालित वाहनों की परिचालन लागत अलग-अलग होती है। इसलिए सभी श्रेणियों के वाहनों पर एक समान किराया वृद्धि लागू करना आर्थिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक श्रेणी के वाहन की वास्तविक लागत का अध्ययन किया जाए और उसी आधार पर किराया निर्धारित किया जाए।

यदि किराया निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी होगी, तो यात्रियों और चालकों दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा विवाद की स्थिति भी कम होगी।

निष्कर्ष: सवाल केवल तीन रुपये का नहीं, भरोसे का है

पटना की सड़कों पर दौड़ते ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा केवल परिवहन के साधन नहीं हैं। वे उस व्यवस्था का आईना भी हैं, जिसमें आम आदमी रोजाना महंगाई और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है।

जनता जानना चाहती है कि यदि किराया बढ़ा है तो उसका आधार क्या है? क्या यह वास्तविक लागत वृद्धि का परिणाम है या फिर एक सामूहिक निर्णय, जिसका बोझ सीधे यात्रियों पर डाला जा रहा है?

आखिरकार सवाल केवल तीन रुपये का नहीं है। सवाल पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे का है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक पटना की सड़कों पर किराए को लेकर यह बहस जारी रहेगी और आम आदमी की जेब पर बढ़ता बोझ भी।

आलोक कुमार


Bihar : मानसून की दस्तक और किसानों की उम्मीदें: खेती की तैयारी में जुटा बिहार

 

बिहार में मानसून की आहट के साथ किसान खरीफ फसलों की तैयारी में जुट गए 

बिहार में मानसून की आहट के साथ किसान खरीफ फसलों की तैयारी में जुट गए हैं। जानिए खेती, सिंचाई, बीज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मानसून का प्रभाव।

"आसमान में दिखने वाले हर बादल के साथ बिहार के किसानों की उम्मीदें भी उड़ान भरने लगती हैं। क्योंकि यहां मानसून सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि खेतों की हरियाली, घरों की खुशहाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई शुरुआत का संदेश लेकर आता है।"

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। जून का महीना शुरू होते ही गांवों में खेती की तैयारियां तेज हो गई हैं। खेतों की जुताई, बीजों की व्यवस्था और सिंचाई संसाधनों की तैयारी के बीच किसानों की निगाहें अब मानसून पर टिकी हुई हैं।

राज्य के अधिकांश किसान खरीफ फसलों, विशेष रूप से धान की खेती पर निर्भर हैं। धान उत्पादन का बड़ा हिस्सा समय पर होने वाली वर्षा पर आधारित होता है। यही कारण है कि मानसून की पहली बारिश किसानों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं मानी जाती।

इन दिनों बिहार के विभिन्न जिलों में किसान खेतों की मेड़बंदी, जुताई और बुआई की तैयारियों में जुटे हुए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य और समय पर रहता है, तो इस वर्ष कृषि उत्पादन बेहतर हो सकता है। वहीं बारिश में देरी या असमान वितरण खेती के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

कृषि विभाग भी किसानों को उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से किसानों को सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके और लागत को नियंत्रित रखा जा सके।

हालांकि किसानों की चिंताएं भी कम नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में मौसम की अनिश्चितता ने खेती को प्रभावित किया है। कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी सूखे जैसी परिस्थितियों ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण किसान अब पहले की तुलना में अधिक सतर्क दिखाई दे रहे हैं।

सिंचाई व्यवस्था खेती की सफलता का एक महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में नहर, तालाब और भूजल आधारित सिंचाई की बेहतर सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान अपेक्षाकृत अधिक आश्वस्त हैं। लेकिन अभी भी कई इलाकों में खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। ऐसे क्षेत्रों में मानसून की देरी किसानों की चिंता बढ़ा देती है।

मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण बाजार, कृषि मजदूर, पशुपालन और स्थानीय व्यापार भी इससे सीधे प्रभावित होते हैं। अच्छी वर्षा होने पर किसानों की आय बढ़ती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को गांव स्तर पर जनआंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए। तालाबों, पोखरों और पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण भविष्य की जल चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बदलते समय के साथ बिहार का किसान भी बदल रहा है। मोबाइल फोन, मौसम पूर्वानुमान सेवाओं और कृषि सलाह ऐप्स का उपयोग कर किसान खेती से जुड़े निर्णय अधिक वैज्ञानिक तरीके से लेने लगे हैं। डिजिटल तकनीक और कृषि नवाचार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का कार्य कर रहे हैं।

फिलहाल किसानों की निगाहें आसमान पर टिकी हुई हैं। हर बादल उन्हें बेहतर फसल और खुशहाल भविष्य की उम्मीद देता है। यदि मानसून अनुकूल रहा, तो यह केवल खेतों में हरियाली ही नहीं लाएगा, बल्कि ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

निष्कर्ष

मानसून बिहार की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा है। समय पर और संतुलित वर्षा लाखों किसानों के सपनों को साकार कर सकती है, जबकि मौसम की अनिश्चितता चुनौतियां बढ़ा सकती है। ऐसे में वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि प्रबंधन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में पूरे बिहार की नजरें मानसून की चाल पर टिकी रहेंगी, क्योंकि इसी पर किसानों की मेहनत और उम्मीदों का भविष्य निर्भर करता है।


आलोक कुमार

सोमवार, 8 जून 2026

Bihar : बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शिष्टाचार मुलाकात

  बिहार के भविष्य की नई तस्वीर: जब शिक्षा और नेतृत्व एक मंच पर आए

किसी भी राज्य की वास्तविक ताकत उसकी सड़कों, इमारतों या प्राकृतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके शिक्षित, जागरूक और सशक्त युवाओं में निहित होती है। जब शिक्षा जगत और शासन व्यवस्था भविष्य की दिशा तय करने के लिए एक साथ आते हैं, तब ऐसी मुलाकातें केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रह जातीं, बल्कि विकास की नई संभावनाओं का आधार बनती हैं।

पटना में ऐसा ही एक प्रेरणादायक अवसर देखने को मिला, जब पटना वीमेंस कॉलेज (स्वायत्त) के प्रतिनिधिमंडल ने  बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शिष्टाचार मुलाकात की है। इस दौरान राज्य में शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और शैक्षणिक विकास के विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा हुई।नेतृत्व से शिष्टाचार भेंट कर शिक्षा, कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया।

कॉलेज की प्राचार्या डॉ. सिस्टर एम. रश्मि ए.सी. के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने पदभार ग्रहण करने पर शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इस प्रतिनिधिमंडल में उप-प्राचार्या डॉ. सिस्टर एम. तनिशा ए.सी. तथा श्री आलोक जॉन, डीन – नेशनल एंड इंटरनेशनल कोलैबोरेशन्स एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज (NICCS) भी शामिल थे।

मुलाकात के दौरान उच्च शिक्षा के बदलते स्वरूप, छात्राओं को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने तथा रोजगारोन्मुख शिक्षा की आवश्यकता पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल ने कॉलेज की नवीनतम शैक्षणिक, शोध एवं विकासात्मक पहलों की जानकारी साझा करते हुए बताया कि आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि युवाओं को कौशल, नेतृत्व और नवाचार से सशक्त बनाना भी है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में उद्योग जगत और संस्थानों की अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त नहीं मानी जाती। व्यावहारिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता, समस्या समाधान की क्षमता और नेतृत्व कौशल अब सफलता के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कॉलेज छात्राओं को भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।

बैठक में महिला सशक्तिकरण, कौशल आधारित शिक्षा, उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप नए पाठ्यक्रमों के विकास तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार किया गया। प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।

राज्य नेतृत्व ने शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कॉलेज द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की तथा भविष्य की योजनाओं के लिए सकारात्मक सहयोग का आश्वासन दिया। शिक्षा संस्थानों और शासन व्यवस्था के बीच इस प्रकार का संवाद राज्य के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

यह मुलाकात केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक भी थी। जब सरकार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर कार्य करते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन की गति और अधिक तेज हो जाती है।

पटना वीमेंस कॉलेज लंबे समय से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। संस्थान का उद्देश्य केवल छात्राओं को शिक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, सक्षम और समाज का नेतृत्व करने योग्य नागरिक बनाना भी है।

यह मुलाकात एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि बिहार का भविष्य केवल विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि शिक्षित, आत्मविश्वासी और सशक्त बेटियों के सपनों को उड़ान देने से उज्ज्वल बनेगा। शिक्षा और नेतृत्व का यह संगम निश्चित रूप से राज्य के विकास की नई कहानी लिखने की क्षमता रखता है।

India : 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें

 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें: क्या 9 जुलाई की बैठक से निकलेगा कोई रास्ता?

जिस उम्र में व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और सुकून मिलना चाहिए, उस उम्र में यदि उसे दवा, भोजन और जीवनयापन के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।

देश के लाखों ईपीएस-95 (EPS-95) पेंशनभोगी पिछले एक दशक से अधिक समय से इसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक ओर महंगाई लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर हजार से डेढ़ हजार रुपये मासिक पेंशन पाने वाले अनेक बुजुर्ग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए सं
घर्ष कर रहे हैं। न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता लागू करने तथा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग को लेकर वर्षों से आंदोलन जारी है।

12 वर्षों से जारी है संघर्ष

ईपीएफओ पेंशनभोगियों की विभिन्न मांगों को लेकर वर्ष 2013-14 के दौरान राष्ट्रीय संघर्ष समिति का गठन किया गया था। इसके बाद देशभर में पेंशनभोगियों ने धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और जनजागरण अभियान चलाए।

समिति के अध्यक्ष अशोक राउत के नेतृत्व में पेंशनभोगियों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। लाखों सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान नियमित अंशदान देकर देश की औद्योगिक और आर्थिक प्रगति में योगदान दिया है, इसलिए वृद्धावस्था में उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

क्यों उठ रही है 7,500 रुपये न्यूनतम पेंशन की मांग?

पेंशनभोगियों का कहना है कि वर्तमान न्यूनतम पेंशन आज की आर्थिक परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं है। दवाइयों, स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली, भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच 1,000 या 1,500 रुपये मासिक पेंशन में जीवनयापन करना बेहद कठिन हो गया है।

उनका तर्क है कि यदि न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये तक बढ़ाया जाता है, तो लाखों बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है और वे अपनी बुनियादी जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी कर सकेंगे।

 महंगाई भत्ते की मांग भी प्रमुख मुद्दा

पेंशनभोगियों की दूसरी प्रमुख मांग परिवर्तनीय महंगाई भत्ता (DA) लागू करने की है।

वर्तमान व्यवस्था में पेंशन राशि वर्षों तक स्थिर बनी रहती है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि समय के साथ पेंशन की वास्तविक क्रय शक्ति घटती चली जाती है।

पेंशनभोगियों का मानना है कि यदि महंगाई भत्ता लागू किया जाए, तो बढ़ती कीमतों का प्रभाव कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है।

 स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती जरूरत

वृद्धावस्था में स्वास्थ्य संबंधी खर्च सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होता है। राष्ट्रीय संघर्ष समिति लंबे समय से पति-पत्नी दोनों के लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करती रही है।

उनका कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ नियमित जांच, दवाइयां और अस्पताल सेवाएं आवश्यक हो जाती हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुरक्षा का दायरा बढ़ाना लाखों परिवारों को राहत दे सकता है।

आश्वासन बहुत मिले, समाधान अब भी बाकी

पिछले कई वर्षों में पेंशनभोगियों के प्रतिनिधिमंडलों और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच अनेक दौर की बातचीत हुई है। कई बार मांगों पर सकारात्मक विचार करने का आश्वासन भी दिया गया।

हालांकि अब तक ऐसा कोई व्यापक निर्णय सामने नहीं आया है जिससे सभी पेंशनभोगियों को अपेक्षित राहत मिल सके। यही कारण है कि बुजुर्गों के बीच उम्मीद और निराशा दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं।

9 जुलाई की बैठक पर टिकी हैं निगाहें

पेंशनभोगियों के बीच चर्चा है कि पेंशन संबंधी मुद्दों पर आगामी 9 जुलाई को एक महत्वपूर्ण बैठक हो सकती है, जिसमें विभिन्न मांगों पर विचार-विमर्श किया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय या आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

यही वजह है कि देशभर के लाखों पेंशनभोगियों की निगाहें इस संभावित बैठक पर टिकी हुई हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार केवल चर्चा नहीं, बल्कि कोई ठोस पहल देखने को मिल सकती है।

केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक प्रश्न भी

यह मुद्दा केवल पेंशन राशि का नहीं है। यह उन लोगों के सम्मान, सुरक्षा और जीवन की गरिमा का भी प्रश्न है, जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सक्रिय वर्ष देश के विकास और उद्योगों की प्रगति में लगाए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में पेंशनभोगियों की समस्याओं को केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

ईपीएस-95 पेंशनभोगियों का संघर्ष अब 12 वर्ष से अधिक पुराना हो चुका है। न्यूनतम पेंशन वृद्धि, महंगाई भत्ता और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग लगातार उठाई जाती रही है। आने वाले समय में सरकार इस दिशा में क्या निर्णय लेती है, इस पर लाखों परिवारों की उम्मीदें टिकी हुई हैं।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि उन बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन का है जिन्होंने अपने श्रम और योगदान से देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आलोक कुमार