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India : EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद

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  EPS-95 Pension Update 2026: ₹7,500 पेंशन का सच, ₹25,000 वेतन सीमा और Higher Pension पर बड़ा अपडेट नई दिल्ली/पटना। Employees' Pension Scheme-1995 यानी EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद, मांग और इंतजार का साल बना हुआ है। देशभर में न्यूनतम पेंशन को मौजूदा ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता यानी DA देने और पेंशनर्स व उनके जीवनसाथियों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधा की मांग लगातार उठती रही है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है— ₹7,500 अभी EPS-95 की स्वीकृत न्यूनतम पेंशन नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में EPS-95 के तहत न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह है। सरकार ने भी संसद में इसकी पुष्टि की है। इसलिए सोशल मीडिया पर ₹7,500 पेंशन लागू होने का दावा देखने वाले पेंशनर्स को आधिकारिक आदेश के बिना ऐसी खबरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। ₹7,500 पेंशन का सच क्या है? EPS-95 पेंशनर्स की प्रमुख मांग है कि न्यूनतम मासिक पेंशन को बढ़ाकर ₹7,500 किया जाए। इसके साथ महंगाई भत्ता और बेहतर मेडिकल सुविधा की मांग भी जुड़ी हुई है। लेकिन मांग और सरकारी फैसला एक ही चीज नहीं हैं। वर्तम...

Bihar : गांव की सड़क और अस्पताल तक पहुंच का सीधा संबंध

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  गांव की सड़क और अस्पताल तक पहुंच का सीधा संबंध गांव की सड़क केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का रास्ता नहीं है। यह स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सड़क अच्छी हो तो मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकता है, एंबुलेंस गांव तक पहुंच सकती है और गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में इलाज मिलने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन सड़क खराब हो, रास्ते में कीचड़ और जलभराव हो या गांव का संपर्क मुख्य मार्ग से टूट जाए, तो अस्पताल कुछ किलोमीटर दूर होने के बावजूद मरीज के लिए बहुत दूर हो जाता है। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा अक्सर अस्पताल, डॉक्टर, दवाइयों और जांच सुविधाओं तक सीमित रहती है। लेकिन स्वास्थ्य सेवा की सफलता केवल अस्पताल की चारदीवारी के भीतर तय नहीं होती। मरीज अस्पताल तक कितनी जल्दी और सुरक्षित पहुंचता है, यह भी स्वास्थ्य व्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। यही कारण है कि ग्रामीण सड़क और स्वास्थ्य सेवा को अलग-अलग विषय मानकर योजना बनाना व्यावहारिक नहीं है। सड़क खराब तो इलाज में देरी गांव में अचानक बीमारी, दुर्घटना, प्रसव या किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की स्...

Bihar : सड़क बनती है, टूटती है और फिर बनती है

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सड़क बनती है, टूटती है और फिर बनती है—जवाबदेही किसकी? बिहार में सड़क निर्माण और मरम्मत पर हर साल बड़ी राशि खर्च होती है। नई सड़क बनती है, कुछ समय बाद उस पर गड्ढे दिखाई देने लगते हैं, बरसात में कई जगह सड़क की परत उखड़ जाती है और फिर मरम्मत के नाम पर सरकारी मशीनरी सक्रिय हो जाती है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क क्यों टूटी। बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्माण में कमी थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है और जनता के पैसे से बनी सड़क इतनी जल्दी खराब क्यों हुई? सड़क किसी भी राज्य के विकास की बुनियादी जरूरत है। यह गांव को बाजार से, किसान को मंडी से, मरीज को अस्पताल से और बच्चों को स्कूल-कॉलेज से जोड़ती है। सड़क मजबूत होगी तो परिवहन आसान होगा, समय बचेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। लेकिन जब सड़क की गुणवत्ता कमजोर हो, पानी की निकासी की उचित व्यवस्था न हो और समय पर रखरखाव नहीं किया जाए, तो यही विकास का आधार लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। सड़क बनने के बाद उसकी उम्र कौन तय करता है? किसी सरकारी सड़क के निर्माण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता, सड़क की मोटाई, बेस और सब-बेस, दबाव, जलनिकासी तथ...

Saharsa :कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है?

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  कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है? नदी का स्वभाव, तटबंध और विकास मॉडल पर उठते सवाल कोसी क्षेत्र में बाढ़ अब केवल बारिश के दिनों में आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह हर साल लौटने वाला ऐसा संकट बन चुकी है, जिसका असर खेतों, घरों, पशुपालन, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार तक दिखाई देता है। बाढ़ के दौरान राहत और बचाव की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन पानी उतरने के बाद एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हो जाता है—आखिर कोसी क्षेत्र में बाढ़ का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा है? बिहार की कोसी नदी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता रहा है। हिमालय से निकलकर बिहार के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करने वाली यह नदी अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद और अवसाद लेकर आती है। नदी का स्वभाव ऐतिहासिक रूप से बदलता रहा है और इसके प्रवाह में बदलाव ने इसके आसपास बसे इलाकों को हमेशा बाढ़ के जोखिम में रखा है। हिमालय से मैदान तक का सफर ही बनाता है संकट कोसी की बाढ़ को समझने के लिए सबसे पहले उसके भौगोलिक चरित्र को समझना जरूरी है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में जब भारी बारिश होती है तो उसका पानी...

Bihar : क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?

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  बिहार में बाढ़: राहत के बाद पुनर्वास का सवाल, क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा? बिहार बाढ़ राहत के बाद पुनर्वास, बिंद टोली पटना, बाढ़ प्रभावित गरीब परिवार, बिहार में बाढ़ की समस्या, स्थायी पुनर्वास, बाढ़ पीड़ितों की समस्या पटना। बिहार में बाढ़ कोई नई आपदा नहीं है। हर साल नदियां उफनती हैं, तटबंधों के भीतर और बाहर रहने वाली आबादी पानी से घिरती है, घर डूबते हैं, खेत बर्बाद होते हैं और प्रशासन राहत एवं बचाव अभियान शुरू करता है। नावें चलती हैं, राहत सामग्री बांटी जाती है, सामुदायिक रसोई शुरू होती है और सरकारी स्तर पर स्थिति की निगरानी की जाती है। यह सब जरूरी है। लेकिन असली सवाल इसके बाद शुरू होता है— जब पानी उतर जाएगा, तब इन लोगों का क्या होगा? बाढ़ के दौरान राहत दिखाई देती है, लेकिन पुनर्वास की चिंता अक्सर सुर्खियों से बाहर चली जाती है। यही बिहार की बाढ़ की सबसे बड़ी मानवीय विडंबना है। पटना के कुर्जी स्थित बिंद टोली जैसे इलाके इस सवाल को और गंभीर बना देते हैं। यहां रहने वाले गरीब परिवारों के लिए बाढ़ केवल कुछ दिनों तक घर में पानी घुसने की समस्या नहीं है। कई परिवारों के लिए यह ...

Bihar : स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी

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  स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी बक्सर। डुमरांव प्रखंड के नथुनी अहीर के डेरा स्थित मध्य विद्यालय में छात्राओं से कथित आपत्तिजनक व्यवहार की घटना के बाद शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ ही रहे थे कि अब ब्रह्मपुर प्रखंड के एक अन्य सरकारी विद्यालय में सामने आई अनियमितताओं ने व्यवस्था को फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। मध्य विद्यालय गरहथा कला में एक साथ चार शिक्षकों का निलंबन केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि विद्यालयों में पढ़ाई, अनुशासन, प्रशासन और निगरानी की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि निलंबित शिक्षकों में एक शिक्षक पर निरीक्षण के दौरान एक छात्रा से अपने कंधे की मालिश कराने का आरोप सामने आया। यह आरोप छात्र-शिक्षक संबंधों की मर्यादा और विद्यालय में बच्चों की गरिमा से जुड़ा संवेदनशील विषय है। हालांकि, आरोप की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही मानी जाएगी। जिला शिक्षा पदाधिकारी इंद्र कुमार कर्ण के कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार, 25 अगस्त को मध्य विद्...

Bihar : निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा?

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निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा? पटना। बच्चे के हाथ में स्कूल बैग है, लेकिन उस बैग का वजन सिर्फ किताबों का नहीं है। उसके साथ स्कूल फीस, एडमिशन चार्ज, यूनिफॉर्म, जूते, किताबें, कॉपियां, परिवहन और कई दूसरे खर्चों का बोझ भी जुड़ा है। सवाल यह है कि मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की कोशिश में आखिर कितनी आर्थिक कीमत चुकाए? हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़े, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करे और भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा हो। लेकिन बदलते समय में निजी स्कूलों की फीस और उससे जुड़े खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। एक तरफ सरकारी स्कूलों की सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं, तो दूसरी ओर निजी स्कूलों की फीस अभिभावकों के सामने अलग तरह का आर्थिक संकट खड़ा करती है। मध्यमवर्गीय परिवार न तो हमेशा महंगी निजी शिक्षा को आसानी से वहन कर पाते हैं और न ही बच्चों की शिक्षा से समझौता करना चाहते हैं। यही दोहरी मजबूरी परिवार के मासिक बजट पर लगातार दबाव बढ़ाती...