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शनिवार, 22 अगस्त 2026

Bihar : स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड: कर्ज की सीमा नहीं, सपनों की उड़ान बचाइए

 


स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड: कर्ज की सीमा नहीं, सपनों की उड़ान बचाइए

जिस योजना का मकसद गरीब बिहार के बच्चों को यह भरोसा देना था कि पैसे की कमी उनके सपनों की सबसे बड़ी दीवार नहीं बनेगी, आज वही योजना सवालों के घेरे में है। सवाल सिर्फ ₹4 लाख से ₹2 लाख का नहीं है। सवाल यह है कि बिहार का गरीब और मध्यमवर्गीय विद्यार्थी आखिर अपनी उच्च शिक्षा का खर्च कैसे उठाएगा?

बिहार में शिक्षा और रोजगार की चर्चा जब भी होती है, एक सवाल सबसे पहले सामने आता है—क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का बच्चा भी इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर या किसी दूसरे पेशेवर पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर सकता है? इसी सवाल का जवाब देने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत की थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने इसे अपने विकास एजेंडे ‘आर्थिक हल, युवाओं को बल’ के तहत लागू किया और सात निश्चय कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

2 अक्टूबर 2016, गांधी जयंती के दिन शुरू हुई इस योजना ने उन विद्यार्थियों के लिए उम्मीद पैदा की, जिनके सामने प्रतिभा तो थी, लेकिन आर्थिक संसाधन नहीं थे। 12वीं पास विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए अधिकतम ₹4 लाख तक शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उद्देश्य यही था कि पैसे के अभाव में कोई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई न छोड़े। जिला निबंधन एवं परामर्श केंद्र यानी DRCC के माध्यम से संचालित यह योजना बिहार के शिक्षा मॉडल में एक महत्वपूर्ण प्रयोग मानी गई।

लेकिन सत्र 2026-27 में व्यवस्था में बदलाव के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विद्यार्थियों और विपक्षी दलों का आरोप है कि स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत मिलने वाले शिक्षा ऋण की सीमा ₹4 लाख से घटाकर ₹2 लाख कर दी गई है। अगर वास्तव में ऐसा होता, तो यह फैसला निश्चित रूप से गरीब विद्यार्थियों के भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता था।

क्योंकि आज उच्च शिक्षा की वास्तविक लागत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, तकनीकी और दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस के साथ हॉस्टल, भोजन, किताबें, लैपटॉप, परिवहन और अन्य खर्च जुड़ते हैं। ऐसे में ₹2 लाख की राशि कई पाठ्यक्रमों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।

गरीब परिवार का विद्यार्थी जब उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलता है तो उसके सामने केवल कॉलेज की फीस नहीं होती। उसे रहने और खाने का खर्च भी उठाना पड़ता है। परिवार पहले से आर्थिक दबाव में हो तो अतिरिक्त ऋण लेना आसान नहीं होता। बैंकिंग प्रक्रिया, दस्तावेज और ब्याज की चिंता अलग होती है।

यही कारण है कि छात्रों के बीच यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि कहीं आर्थिक कठिनाई उनकी पढ़ाई के रास्ते में फिर से बाधा न बन जाए। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि सरकार उच्च शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का माध्यम मानती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि गरीब विद्यार्थी बीच रास्ते में आर्थिक संकट के कारण कॉलेज छोड़ने को मजबूर न हो।

हालांकि विवाद के बीच बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कुल ऋण राशि में कटौती नहीं की गई है। सरकार के अनुसार ₹2 लाख तक का ऋण पहले की तरह बिहार राज्य शिक्षा वित्त निगम के माध्यम से लिया जा सकेगा। वहीं ₹2 लाख से ₹4 लाख तक की अतिरिक्त राशि के लिए विद्यार्थियों को केंद्र सरकार के PM-Vidyalaxmi Portal के माध्यम से वाणिज्यिक बैंकों में आवेदन करना होगा।

सरकार का यह भी कहना है कि नियमित रूप से किस्त चुकाने वाले विद्यार्थियों को बैंक से लिए गए ऋण पर ब्याज में 30 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी। सरकार की दलील है कि नई व्यवस्था में बैंकों को शामिल करने से योजना का दायरा बढ़ेगा और ज्यादा विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता मिल सकेगी।

यहीं से असली सवाल पैदा होता है—योजना का विस्तार कागज पर हो रहा है या विद्यार्थी के लिए वास्तव में सुविधा बढ़ रही है?

सरकार अगर कहती है कि ₹4 लाख की सुविधा बरकरार है तो उसे विद्यार्थियों के सामने पूरी प्रक्रिया बेहद सरल और पारदर्शी तरीके से रखनी चाहिए। कितने विद्यार्थियों को ₹2 लाख तक की राशि कितने समय में मिलेगी? ₹2 लाख से अधिक राशि के लिए बैंक में आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी? कितने दिन में ऋण स्वीकृत होगा? क्या बैंक अतिरिक्त शर्तें लगाएंगे? क्या गरीब विद्यार्थी को किसी प्रकार की गारंटी या अतिरिक्त सुरक्षा देनी होगी? इन सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं।

क्योंकि सरकारी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि अधिसूचना में कितनी राशि लिखी है। सफलता इस बात से तय होती है कि जरूरतमंद विद्यार्थी को पैसा कितनी आसानी, कितनी जल्दी और कितनी निश्चितता से मिलता है।

विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला है। राजद नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज पार्टी ने बदलाव का विरोध किया है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल राजनीति से ऊपर होना चाहिए।

सरकार को भी आलोचना को राजनीतिक हमला मानकर खारिज करने के बजाय विद्यार्थियों की आशंकाओं को गंभीरता से सुनना चाहिए। अगर नई व्यवस्था वास्तव में बेहतर है तो सरकार को आंकड़ों के साथ यह साबित करना चाहिए कि इससे पहले की तुलना में कितने अधिक विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा और ऋण प्राप्त करने में कितना समय लगेगा।

शिक्षा पर खर्च को बोझ नहीं, निवेश समझना होगा। बिहार जैसे राज्य के लिए यह और भी जरूरी है, जहां बड़ी आबादी युवा है और रोजगार के बेहतर अवसरों के लिए उच्च शिक्षा की ओर देख रही है। एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी अगर केवल इसलिए डॉक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक नहीं बन पाता कि उसके परिवार के पास फीस और हॉस्टल का खर्च उठाने के पैसे नहीं हैं, तो नुकसान केवल उस परिवार का नहीं, पूरे समाज का है।

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की मूल भावना यही थी कि पैसा किसी बच्चे की प्रतिभा को रोक न सके। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यवस्था बदलने के नाम पर प्रक्रिया जटिल न हो और गरीब विद्यार्थी बैंकिंग औपचारिकताओं में उलझकर अपने सपने न छोड़ दे।

सरकार चाहे तो इसके लिए एक स्पष्ट सार्वजनिक रोडमैप जारी कर सकती है। उसमें आवेदन से लेकर ऋण स्वीकृति और राशि जारी होने तक प्रत्येक चरण की समय-सीमा बताई जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि बिहार सरकार और बैंक की जिम्मेदारी कहां से शुरू और कहां खत्म होती है। इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों में पैदा हुआ भ्रम दूर होगा।

जरूरत इस बात की है कि सरकार विद्यार्थियों को यह संदेश दे—₹2 लाख की प्रक्रिया हो या ₹4 लाख की सुविधा, पढ़ाई के रास्ते में पैसे की दीवार नहीं खड़ी होने दी जाएगी।

बिहार को अपने युवाओं को कर्ज का बोझ नहीं, अवसर का भरोसा देना होगा। आखिर किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारतें, सड़कें या योजनाएं नहीं, बल्कि उसके पढ़े-लिखे और सक्षम युवा होते हैं।

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की असली परीक्षा यही है कि वह कितने सपनों को डिग्री तक और कितनी प्रतिभाओं को रोजगार तक पहुंचाता है।

अगर योजना की राशि वही है, लेकिन उसे पाने का रास्ता कठिन हो गया, तो विद्यार्थी के लिए समस्या फिर भी बनी रहेगी। और अगर व्यवस्था सरल, पारदर्शी और समयबद्ध है, तो यही योजना बिहार के हजारों युवाओं के लिए सामाजिक बदलाव का मजबूत माध्यम बन सकती है।

इसलिए बहस केवल ₹2 लाख बनाम ₹4 लाख की नहीं होनी चाहिए। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि बिहार के गरीब बच्चे को उच्च शिक्षा का अधिकार व्यवहार में कितना आसान मिला है।

सपनों को कर्ज की शर्तों में नहीं तौलना चाहिए। सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक कमजोरी किसी विद्यार्थी की प्रतिभा का फैसला न करे। स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड तभी सफल होगा, जब बिहार का बच्चा यह कह सके—पैसा कम था, लेकिन मेरा सपना छोटा नहीं हुआ।


आलोक कुमार

Bihar : दिव्यांग संतान का हक पिता की मौत का इंतजार क्यों करे?

 

दिव्यांग संतान का हक पिता की मौत का इंतजार क्यों करे? पटना हाईकोर्ट का फैसला सिर्फ पेंशन नहीं, संवेदना का दस्तावेज

 किसी दिव्यांग बच्चे के अधिकार के लिए उसके पिता की मृत्यु का इंतजार करना पड़े—क्या इससे अधिक असंवेदनशील व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है? जिस बच्चे को जीवनभर अभिभावक के सहारे की जरूरत है, उसे उसी अभिभावक के जीवित रहते सरकारी रिकॉर्ड में उसका अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए?

पटना हाईकोर्ट का हालिया फैसला इसी बुनियादी सवाल को व्यवस्था के सामने खड़ा करता है। यह फैसला केवल पेंशन भुगतान आदेश यानी PPO में नाम जोड़ने की प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं है, बल्कि उस सोच को चुनौती देता है जिसमें कागज नियम से बड़ा और इंसान नियम से छोटा हो जाता है।

पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पेंशनर पिता के जीवनकाल में ही उसके दिव्यांग आश्रित बच्चे का नाम पेंशन भुगतान आदेश में शामिल किया जा सकता है। अदालत ने यह भी साफ किया कि PPO में नाम दर्ज करना तत्काल पारिवारिक पेंशन देने के बराबर नहीं है। यह भविष्य में मिलने वाले अधिकार को सुरक्षित करने की प्रशासनिक व्यवस्था है। यानी सरकार को आज कोई अतिरिक्त पेंशन नहीं देनी है, लेकिन दिव्यांग संतान के भविष्य के अधिकार को आज ही सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित किया जा सकता है।

मामला सोनपुर, सारण निवासी सेवानिवृत्त चपरासी रामानंद राय और उनके 50 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित बेटे दीपक कुमार पुष्पेन्द्र से जुड़ा था। रामानंद राय ने अपने बेटे का नाम PPO में दर्ज कराने की मांग की थी। लेकिन वित्त विभाग और महालेखाकार कार्यालय की ओर से यह तर्क सामने आया कि नियमानुसार दिव्यांग संतान का दावा माता-पिता की मृत्यु के बाद ही सामने आता है।

यहीं से इस मामले का असली सवाल पैदा होता है—क्या किसी दिव्यांग व्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए उसके माता-पिता की मृत्यु जरूरी है?

पटना हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह ने प्रक्रियात्मक देरी और नाम दर्ज करने से इनकार को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना के विपरीत माना।

अदालत की चिंता बेहद स्वाभाविक है। सरकारी कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद आम तौर पर परिवार की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रहती। दूसरी तरफ उम्र बढ़ने के साथ चिकित्सा, दवा और देखभाल का खर्च बढ़ता जाता है। ऐसे परिवार में यदि कोई दिव्यांग संतान है तो उसके भविष्य की चिंता और अधिक गंभीर हो जाती है।

पेंशनर पिता अपनी जिंदगी में ही यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके बाद उसके बच्चे को सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। यह मांग किसी अतिरिक्त सुविधा की मांग नहीं है। यह उस भविष्य की सुरक्षा की मांग है जब परिवार का सबसे बड़ा सहारा मौजूद नहीं होगा।

व्यवस्था को यह समझना होगा कि कानून का उद्देश्य केवल कागजों पर प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार को सुरक्षित करना है। अगर किसी अधिकार को हासिल करने के लिए उस व्यक्ति के सहारे को ही खत्म होने का इंतजार करना पड़े, तो ऐसी प्रक्रिया पर पुनर्विचार होना चाहिए।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मान, समानता और सामाजिक सुरक्षा के व्यापक अधिकारों से जोड़ा है। ऐसे में सरकारी नियमों की व्याख्या भी उसी मानवीय दृष्टिकोण के अनुरूप होनी चाहिए। नियम यदि अधिकार की राह आसान बनाते हैं तो वे कल्याणकारी शासन का माध्यम हैं; लेकिन यदि वही नियम अधिकार को टालने का कारण बन जाएं तो उनमें सुधार की जरूरत है।

पटना हाईकोर्ट का फैसला इसी दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने बिहार के मुख्य सचिव को यह भी सलाह दी कि जरूरत पड़ने पर बिहार पेंशन नियमावली में संशोधन किया जाए, ताकि दिव्यांगजनों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

यह टिप्पणी अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि मामला सिर्फ एक व्यक्ति की याचिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि राज्य के कितने ऐसे पेंशनर हैं जिनकी दिव्यांग संतान है और जिनके नाम अभी PPO में दर्ज नहीं हैं। यदि ऐसी कोई प्रशासनिक बाधा मौजूद है तो उसे दूर करने के लिए स्पष्ट, सरल और समयबद्ध व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

सरकार चाहे तो इसके लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया बना सकती है। पेंशनर को सेवा या सेवानिवृत्ति के समय ही आश्रित दिव्यांग संतान का विवरण दर्ज कराने की सुविधा दी जा सकती है। आवश्यक प्रमाणपत्रों का सत्यापन एक निर्धारित समय में हो और PPO में नाम दर्ज होने की सूचना संबंधित परिवार को दी जाए। इससे भविष्य में मृत्यु के बाद शुरू होने वाली लंबी कागजी प्रक्रिया काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

यह व्यवस्था केवल दिव्यांग बच्चों के हित में नहीं होगी, बल्कि उन बुजुर्ग माता-पिताओं के लिए भी राहत होगी जो जीवन के अंतिम पड़ाव में सबसे अधिक इसी चिंता से घिरे रहते हैं कि उनके बाद उनके आश्रित बच्चे की देखभाल कौन करेगा और उसका आर्थिक भविष्य कैसे सुरक्षित होगा।

ऐसे माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सवाल अक्सर यह नहीं होता कि आज उनका बच्चा कैसे जी रहा है, बल्कि यह होता है कि कल उनके नहीं रहने पर उसका क्या होगा?

यही कारण है कि इस फैसले को केवल कानूनी जीत के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अदालत ने रास्ता दिखाया है, अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उस रास्ते को स्थायी व्यवस्था में बदले।

बिहार सरकार के सामने अब अवसर है कि वह पेंशन व्यवस्था की समीक्षा करे और ऐसी प्रक्रिया तैयार करे जिसमें पात्र दिव्यांग आश्रितों के नाम पहले से दर्ज किए जा सकें। इससे न केवल परिवारों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि सरकारी कार्यालयों में मृत्यु के बाद होने वाली अनावश्यक भागदौड़ और विवाद भी कम होंगे।

यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारी केवल नियम की भाषा न देखें, बल्कि नियम के पीछे मौजूद सामाजिक उद्देश्य को भी समझें। कल्याणकारी राज्य में कानून का अंतिम लक्ष्य नागरिक को राहत, सुरक्षा और सम्मान देना है।

किसी दिव्यांग संतान को अपने अधिकार के लिए पिता की मृत्यु का इंतजार न करना पड़े—इससे अधिक मानवीय व्यवस्था क्या हो सकती है? पेंशन की रकम बाद में मिले या नियम के अनुसार मिले, लेकिन अधिकार का भरोसा आज मिलना चाहिए।

क्योंकि अधिकार मृत्यु के बाद पैदा नहीं होते। अधिकार पहले से मौजूद होते हैं; व्यवस्था का काम उन्हें समय रहते सुरक्षित करना है।

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला इसी बुनियादी मानवीय सिद्धांत की याद दिलाता है। अब जरूरत है कि बिहार सरकार इसे एक मिसाल बनाकर पेंशन नियमावली, प्रशासनिक प्रक्रिया और सरकारी सोच—तीनों में ऐसा बदलाव करे, जिससे किसी दिव्यांग आश्रित को अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए अपने माता-पिता के चले जाने का इंतजार न करना पड़े।

यह सिर्फ एक PPO में नाम जोड़ने का सवाल नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जो एक पिता अपने राज्य से करता है—मेरे बाद मेरे बच्चे को अकेला मत छोड़ना।


आलोक कुमार

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

Bihar : सीलिंग का डर नहीं, समाधान चाहिए: छोटे दुकानदारों को नियम समझा

 


सीलिंग का डर नहीं, समाधान चाहिए: छोटे दुकानदारों को नियम समझाइए, आजीविका मत छीनिए

 जिस मकान से वर्षों तक नगर निगम ने टैक्स लिया, उसी मकान में चल रही छोटी-सी दुकान आज अचानक ‘अवैध’ कैसे हो गई? अगर व्यवस्था को वर्षों से सब पता था, तो कार्रवाई से पहले संवाद क्यों?

शहरों में कानून और व्यवस्था जरूरी है, लेकिन कानून लागू करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब किसी कार्रवाई का सीधा असर हजारों छोटे दुकानदारों और उनके परिवारों की रोजी-रोटी पर पड़ रहा हो। पटना सहित शहरी क्षेत्रों में आवासीय मकानों के व्यावसायिक उपयोग का मामला आज इसी वजह से गंभीर सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।

2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से राजधानी पटना सहित राज्य के शहरी क्षेत्रों में आवासीय मकानों के व्यावसायिक उपयोग का सर्वे कराने और वास्तविक उपयोग के आधार पर कर निर्धारण की बात सामने आई थी। इस सोच का मूल उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नियमित, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाना था। यानी जिस संपत्ति का जैसा वास्तविक उपयोग हो रहा है, उसके अनुरूप कर और नियम तय हों तथा नागरिक स्पष्ट व्यवस्था के भीतर अपना व्यवसाय चला सकें।

आज सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और उसके बाद नगर निगम की कार्रवाई के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वर्षों से किसी आवासीय मकान के हिस्से में छोटी दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करने वाले व्यक्ति के सामने सीधे सीलिंग का डर खड़ा करना ही समाधान है?

कानून और न्यायालय के निर्देशों का पालन होना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन कानून का पालन कराने के साथ प्रशासन की जिम्मेदारी यह भी है कि प्रभावित नागरिकों को नियम समझाए जाएं, उनकी स्थिति सुनी जाए और जहां संभव हो, वैधानिक समाधान का रास्ता बताया जाए।

छोटी दुकान के पीछे पूरा परिवार

शहर में हजारों छोटे दुकानदार ऐसे हैं जिनका कारोबार किसी बड़े व्यावसायिक परिसर में नहीं, बल्कि अपने मकान के एक कमरे, बरामदे या सड़क से लगे छोटे हिस्से में चलता है। कहीं किराना की दुकान है, कहीं दर्जी की मशीन, कहीं मोबाइल रिपेयरिंग, कहीं स्टेशनरी, चाय-नाश्ता या छोटी वर्कशॉप।

इन दुकानों के पीछे कोई बड़ा कारोबारी साम्राज्य नहीं होता। वहां एक परिवार की रोज की जरूरतें जुड़ी होती हैं।

ऐसे में किसी दुकान का शटर बंद होने का अर्थ सिर्फ एक व्यापारिक गतिविधि बंद होना नहीं है। इसका मतलब परिवार की आमदनी रुकना, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होना, घर का खर्च संकट में पड़ना और कई मामलों में वर्षों की मेहनत से खड़ी आजीविका का समाप्त हो जाना है।

इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य नियम लागू करना जरूर होना चाहिए, लेकिन आजीविका पर अचानक प्रहार करना नहीं।

वर्षों तक टैक्स लिया गया तो संवाद क्यों नहीं?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नगर निगम की पुरानी व्यवस्था से भी जुड़ा है। यदि किसी मकान में लंबे समय से व्यावसायिक गतिविधि चल रही थी, संपत्ति नगर निगम के रिकॉर्ड में दर्ज थी, उसका असेसमेंट होता रहा और संपत्ति कर भी जमा किया जाता रहा, तो संबंधित नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसे अब तक स्पष्ट रूप से नियम क्यों नहीं बताया गया?

यहां किसी अधिकारी या विभाग को दोषी ठहराने के बजाय व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।

नागरिकों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि आवासीय और व्यावसायिक उपयोग में अंतर क्या है। किस प्रकार का उपयोग व्यावसायिक श्रेणी में आता है? उस पर कितना कर लागू होगा? कौन-से दस्तावेज चाहिए? क्या उपयोग परिवर्तन, अनुमति या नियमितीकरण की कोई प्रक्रिया उपलब्ध है? यदि किसी प्रकार की कमी है तो उसे दूर करने के लिए कितना समय मिलेगा?

कानून का पालन जरूरी है, लेकिन कानून के नाम पर भय का माहौल बनाना जरूरी नहीं है।

सीलिंग से पहले काउंसलिंग

नगर निगम को बड़े पैमाने पर काउंसलिंग और जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। प्रत्येक वार्ड में सहायता शिविर लगाकर नागरिकों को नियम समझाए जा सकते हैं। संपत्ति मालिकों और दुकानदारों को उनके मामलों की स्थिति बताई जा सकती है और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी दी जा सकती है।

इसके बाद सर्वे, नोटिस, कर निर्धारण और आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

सीलिंग यदि कानून के तहत आवश्यक हो तो वह अंतिम कार्रवाई हो सकती है, लेकिन हर मामले में उसे पहला कदम बना देना व्यावहारिक समाधान नहीं लगता—विशेषकर उन छोटे कारोबारियों के मामले में जो वर्षों से खुले तौर पर अपना व्यवसाय चला रहे हैं।

पार्षद बनें जनता और प्रशासन के बीच सेतु

इस पूरे मामले में स्थानीय पार्षद की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। पार्षद सिर्फ नोटिस या कार्रवाई की जानकारी देने वाला जनप्रतिनिधि नहीं होना चाहिए। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता और प्रशासन के बीच सेतु बनना है।

यदि किसी वार्ड में बड़ी संख्या में मकानों के व्यावसायिक उपयोग का मामला है तो पार्षद को नगर निगम अधिकारियों के साथ बैठक करनी चाहिए। नागरिकों को नियम समझाने चाहिए, दुकानदारों की समस्याएं सुननी चाहिए और प्रशासन के सामने व्यावहारिक समाधान रखना चाहिए।

जनप्रतिनिधि का काम सिर्फ यह बताना नहीं होना चाहिए कि कार्रवाई होने वाली है। उसका काम यह सुनिश्चित करना भी है कि लोगों को यह पता हो कि कार्रवाई से बचने के लिए वैधानिक रास्ता क्या है।

नागरिक को अपराधी नहीं, करदाता समझिए

व्यवस्था में यदि वर्षों से कोई कमी रही है तो उसका पूरा बोझ अचानक नागरिक के सिर डालना भी उचित नहीं होगा। प्रशासन को यह देखना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की या वह ऐसी व्यवस्था में काम करता रहा जहां स्पष्ट मार्गदर्शन और प्रभावी निगरानी नहीं थी।

नागरिक को अपराधी मानकर नहीं, करदाता और शहर के हिस्सेदार के रूप में देखना होगा।

पटना जैसे शहर की अर्थव्यवस्था केवल बड़े मॉल, शोरूम और कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों से नहीं चलती। शहर की आर्थिक गतिविधियों में हजारों छोटे दुकानदारों की भी बड़ी भूमिका है। सुबह शटर उठाकर देर शाम तक मेहनत करने वाला दुकानदार शहर की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करता है और उसी कमाई से अपने परिवार का जीवन चलाता है।

नियम भी रहें, रास्ता भी मिले

नगर निगम को चाहिए कि इस विषय पर स्पष्ट और चरणबद्ध नीति सामने रखे।

पहले व्यापक सर्वे हो। फिर वास्तविक उपयोग के आधार पर संपत्तियों की स्थिति स्पष्ट की जाए। इसके बाद संबंधित लोगों को नोटिस देकर नियम और आवश्यक प्रक्रिया समझाई जाए। जहां वैधानिक विकल्प उपलब्ध हो, वहां नियमितीकरण या उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया बताई जाए। कर निर्धारण की जरूरत हो तो वह किया जाए और लोगों को उचित समय दिया जाए।

इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे जरूरी है।

साथ ही वर्षों से कर जमा करने वाले संपत्ति मालिकों के मामलों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। यदि निगम के रिकॉर्ड और वास्तविक उपयोग में अंतर है तो उसे संवाद के माध्यम से ठीक करने का प्रयास होना चाहिए।

सवाल कानून का नहीं, कानून लागू करने के तरीके का है

यह बहस कानून के विरोध की नहीं है। सवाल यह है कि कानून लागू कैसे किया जाए?

यदि नियम के अनुसार व्यावसायिक उपयोग पर अलग कर देना है, तो कर निर्धारण की प्रक्रिया पूरी कीजिए। यदि अनुमति या उपयोग परिवर्तन जरूरी है, तो उसका रास्ता बताइए। यदि दस्तावेज चाहिए, तो उसकी सूची सार्वजनिक कीजिए। यदि समय चाहिए, तो उचित समय दीजिए।

हर मामले में पहला हथियार सीलिंग क्यों हो?

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है स्पष्ट नियम, प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की।

छोटे दुकानदार कानून से भागना नहीं चाहते। वे केवल चाहते हैं कि नियम स्पष्ट हों, उन्हें सुना जाए, उचित समय मिले और उनकी वर्षों पुरानी आजीविका अचानक खत्म न कर दी जाए।

नगर निगम को भी याद रखना होगा कि उसकी जिम्मेदारी केवल टैक्स वसूलना और कार्रवाई करना नहीं है। नगर निगम का मूल उद्देश्य शहर का नियमन करते हुए नागरिकों की सुविधा और सार्वजनिक हित की रक्षा करना है।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या हम सीलिंग के डर से शहर चलाएंगे या संवाद और समाधान से?

कानून लागू हो, कर निर्धारित हो, शहर व्यवस्थित हो और नियमों का पालन भी हो—लेकिन छोटे दुकानदार की रोजी-रोटी को बचाते हुए।

कार्रवाई हो तो नियम के अनुसार, संवाद हो तो सम्मान के साथ और समाधान हो तो मानवीय दृष्टिकोण से।

क्योंकि किसी गरीब की दुकान का शटर बंद करना आसान है, लेकिन उसके घर का चूल्हा जलाए रखना ही असली प्रशासनिक संवेदनशीलता है।

सीलिंग का भय नहीं—काउंसलिंग और समाधान चाहिए।


आलोक कुमार


Bihar : कोशी हर साल रास्ता बदलती है, क्या सरकार अब समाधान का रास्ता बदलेगी?

 

कोशी हर साल रास्ता बदलती है, क्या सरकार अब समाधान का रास्ता बदलेगी?

 हर साल कोशी आती है, घर बहाती है, खेत निगलती है और हजारों लोगों को बेघर कर जाती है। फिर राहत की नाव आती है, कुछ दिनों का राशन मिलता है और सरकारी फाइलों में बाढ़ की कहानी बंद हो जाती है। लेकिन कोशी तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों की जिंदगी में यह कहानी कभी खत्म नहीं होती। सवाल यही है—आखिर कब तक कोशी के नाम पर पीढ़ियां विस्थापन, कटाव, मुआवजे की प्रतीक्षा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीती रहेंगी?

कोशी नदी को बिहार की त्रासदी और जीवनदायिनी नदी—दोनों रूपों में देखा जाता है। इसकी धाराएं खेतों को उपजाऊ बनाती हैं, लेकिन जब नदी उफनती है तो वही पानी घर, खेत, सड़क और जीवन की पूरी व्यवस्था को तहस-नहस कर देता है। खासकर तटबंध के भीतर रहने वाले परिवारों के लिए बाढ़ कोई कभी-कभार आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह उनके जीवन का स्थायी संकट बन चुकी है।

इसी लंबे संकट को कोशी नव निर्माण मंच (KNM) ने 20 अगस्त 2026 को जिला अधिकारी, सुपौल को सौंपे ज्ञापन के माध्यम से सामने रखा। ज्ञापन में बाढ़ और कटाव से प्रभावित लोगों के पुनर्वास, मुआवजे, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, राजस्व व्यवस्था और कोशी समस्या के स्थायी समाधान से जुड़ी 10 प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इन मांगों को केवल प्रशासनिक मांगों की सूची मानना इस समस्या की गंभीरता को कम करके देखना होगा। यह उन परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज है, जिनके लिए हर साल बाढ़ के साथ एक नया संघर्ष शुरू होता है।

पुनर्वास सबसे बड़ा सवाल

ज्ञापन में बेला गोठ, बगहा, पंचगछिया, खोखनहा, ढोली, सियानी और पिपराही जैसे गांवों के कटाव पीड़ितों को तत्काल सरकारी जमीन या निर्धारित पुनर्वास स्थल पर बसाने की मांग की गई है। वहीं पिछले वर्ष लालगंज, तेलवा, दुबियाही और घोधररिया सहित प्रभावित इलाकों के लोगों को आपदा विभाग के मानकों के अनुरूप गृह-क्षति का बकाया भुगतान देने की मांग भी उठाई गई है।

दरअसल, बाढ़ के बाद सबसे बड़ी समस्या सिर्फ घर टूटना नहीं होती। घर टूटने के साथ परिवार की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा भी टूट जाती है। दस्तावेज, रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, पशुधन और भविष्य की योजनाएं—सब कुछ प्रभावित होता है। ऐसे में मुआवजे के लिए महीनों या वर्षों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना पीड़ित परिवारों के संकट को और बढ़ाता है।

तटबंध के भीतर का पानी भी बाढ़ है

ज्ञापन की एक महत्वपूर्ण मांग यह है कि तटबंध के भीतर आए पानी को भी बाढ़ मानते हुए आपदा प्रबंधन विभाग की मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP के अनुसार राहत उपलब्ध कराई जाए।

यह सवाल प्रशासनिक परिभाषा से अधिक मानवीय है। पानी जब किसी परिवार के घर में घुसता है, खेत को डुबोता है, पशुओं को प्रभावित करता है और रोजमर्रा की जिंदगी रोक देता है, तो उस परिवार के लिए वह बाढ़ ही है। राहत का आधार सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पानी किस प्रशासनिक सीमा या तकनीकी श्रेणी में आता है।

जमीन मिले, लेकिन वास्तविक पीड़ितों को

मंच ने तटबंध के बीच और कटाव के बाद बेघर हुए लोगों का व्यापक सर्वेक्षण कराने की मांग की है। साथ ही पुनर्वास स्थलों पर हुए कथित कब्जों को हटाकर वास्तविक पीड़ितों को जमीन उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

यहां सरकार के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक तरफ पुनर्वास के लिए जमीन उपलब्ध कराना, दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि उसका लाभ उन्हीं परिवारों तक पहुंचे जिन्होंने बाढ़ और कटाव में अपना घर खोया है। यदि पुनर्वास की जमीन ही वास्तविक पीड़ितों तक नहीं पहुंचेगी तो पूरी नीति सवालों के घेरे में आ जाएगी।

बाढ़ में चापाकल और शौचालय भी जीवनरक्षक हैं

तटबंध के भीतर ऊंचे टीलों पर सुरक्षित शरणस्थल, चापाकल, शौचालय, रोशनी और सामुदायिक रसोई की मांग भी महत्वपूर्ण है। बाढ़ के समय ये सुविधाएं सामान्य विकास योजनाओं का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाली व्यवस्थाएं बन जाती हैं।

इसी तरह अनुबंधित नावों की सूची सार्वजनिक करने की मांग प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ी है। बाढ़ के समय नाव ही कई परिवारों के लिए अस्पताल, बाजार, स्कूल और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का एकमात्र माध्यम बन जाती है। इसलिए नावों की संख्या, संचालन और उपलब्धता की जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

बच्चों का भविष्य भी बचाना होगा

तटबंध के भीतर स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्र, उप स्वास्थ्य केंद्र और निःशुल्क कोशी छात्रावास खोलने की मांग बताती है कि कोशी संकट सिर्फ आज के विस्थापन का मुद्दा नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल भी है।

लगातार बाढ़ और विस्थापन के बीच बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष परेशानी होती है। यदि किसी इलाके में वर्षों तक बुनियादी संस्थान नहीं पहुंचते, तो वहां गरीबी और पिछड़ापन पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रह सकता है।

राजस्व और जमीन के अधिकार का प्रश्न

ज्ञापन में चार हेक्टेयर तक लगान माफी के बावजूद कथित वसूली पर रोक और वसूली गई राशि वापस करने की मांग की गई है। इसके साथ तटबंध के भीतर की जमीन का लगान और सेस माफ करने तथा नदी में समाहित जमीनों को सर्वे में रैयतों के नाम पर दर्ज रखने की मांग भी की गई है।

नदी का कटाव किसी परिवार की जमीन छीन सकता है, लेकिन क्या उसके साथ उसका कानूनी और सामाजिक अधिकार भी खत्म हो जाना चाहिए? यही सवाल इस मांग के केंद्र में है।

बिना पुनर्वास के विस्थापन नहीं

ज्ञापन की एक मानवीय मांग यह भी है कि तटबंध या स्पर पर बसे बाढ़ पीड़ितों को बिना पुनर्वास के वहां से न हटाया जाए। प्रशासन को अवैध कब्जे और मजबूरी में बसे विस्थापित परिवारों के बीच अंतर करना होगा।

किसी परिवार को हटाना प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उसे सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान देना प्रशासन की वास्तविक जिम्मेदारी है।

प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ी मांग भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है। जो परिवार तटबंध से बाहर जमीन खरीद चुके हैं, उन्हें वहां घर बनाने का अवसर मिलना चाहिए। पुनर्वास का उद्देश्य लोगों को फिर से असुरक्षित परिस्थितियों में धकेलना नहीं, बल्कि सुरक्षित जीवन देना होना चाहिए।

कोशी का स्थायी समाधान कब?

सबसे बड़ा सवाल फिर भी कोशी के स्थायी समाधान का है। सभी छाड़न धाराओं का सर्वे कर उन्हें पुनर्जीवित करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय लोकज्ञान को जोड़ने की मांग इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है।

कोशी को केवल बांध, तटबंध और राहत की समस्या मानकर समाधान नहीं निकाला जा सकता। नदी का स्वभाव, उसकी धाराएं, गाद, भूगोल और सदियों से नदी के साथ जी रहे लोगों का अनुभव—इन सभी को नीति निर्माण में शामिल करना होगा।

अब सरकार के सामने विकल्प साफ है—हर साल बाढ़ आने का इंतजार कर राहत बांटी जाए या कोशी के भीतर रहने वाले लोगों के भविष्य का स्थायी समाधान खोजा जाए।

कोशी नव निर्माण मंच का ज्ञापन सरकार के लिए सिर्फ दस मांगों का कागज नहीं होना चाहिए। यह कोशी क्षेत्र की नीति को राहत-केंद्रित व्यवस्था से अधिकार, पुनर्वास और स्थायी विकास की दिशा में बदलने का अवसर हो सकता है।

बाढ़ के बाद नाव भेज देना प्रशासनिक कार्रवाई है, लेकिन बाढ़ से पहले सुरक्षित घर, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना सुशासन की असली पहचान है।

कोशी हर साल अपना रास्ता खोजती है। अब सरकार को भी कोशी पीड़ितों के लिए स्थायी समाधान का रास्ता खोजना होगा।

आलोक कुमार

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

India : राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 


राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 जिस उम्र में आज के नेता राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने की तैयारी करते हैं, उसी उम्र में राजीव गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बागडोर संभाल ली थी। सवाल यह नहीं कि राजीव गांधी की राजनीति से हर कोई सहमत था या नहीं; सवाल यह है कि क्या आज का भारत उस युवा प्रधानमंत्री के उस सपने को याद करता है, जिसमें तकनीक, आधुनिकता और सद्भावना के सहारे देश को 21वीं सदी में ले जाने की कोशिश थी?

20 अगस्त भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती का दिन है। देश में यह दिन ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में भी याद किया जाता है। यह अवसर केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि उन विचारों और नीतिगत प्रयासों को समझने का भी है, जिनके केंद्र में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द, तकनीकी आधुनिकीकरण और बदलते भारत की कल्पना थी।

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। वे केवल 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीति के इतिहास में इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनने की घटना अपने आप में उल्लेखनीय है। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा था। ऐसे असाधारण समय में राजीव गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व संभाला और देश के प्रधानमंत्री बने।

उनका प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल 1984 से 1989 तक रहा। यह वह समय था जब भारत एक ओर पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था और धीमी प्रक्रियाओं से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर दुनिया कंप्यूटर, दूरसंचार और सूचना तकनीक की नई क्रांति की ओर बढ़ रही थी।

तकनीक को भविष्य से जोड़ने की कोशिश

राजीव गांधी के कार्यकाल की एक प्रमुख पहचान भारत के तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों को माना जाता है। कंप्यूटरीकरण और दूरसंचार के विस्तार पर जोर दिया गया। उस समय कंप्यूटर आज की तरह सामान्य जीवन का हिस्सा नहीं थे। नई तकनीक को लेकर रोजगार खत्म होने जैसी आशंकाएं भी व्यक्त की जाती थीं।

ऐसे माहौल में तकनीक को विकास का साधन मानना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण था।

दूरसंचार और कंप्यूटर के क्षेत्र में उस दौर में किए गए प्रयासों ने आगे चलकर भारत की सूचना प्रौद्योगिकी यात्रा के लिए आधार तैयार करने में भूमिका निभाई। आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल शासन भारतीय जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन इस परिवर्तन की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। इसके पीछे कई दशकों की नीतियां, प्रयोग और संस्थागत प्रयास हैं। राजीव गांधी का दौर उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

उनकी सरकार ने शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आधुनिक सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की। युवा भारत को नई तकनीकी दुनिया से जोड़ने की उनकी सोच आज के डिजिटल भारत के संदर्भ में फिर चर्चा में आती है।

उपलब्धियों के साथ विवाद भी

हालांकि किसी भी राजनीतिक नेता का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। राजीव गांधी का कार्यकाल विवादों से भी घिरा रहा।

बोफोर्स प्रकरण ने उनकी सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया और 1989 के आम चुनावों में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। शाहबानो मामले से जुड़े फैसले और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी उनकी सरकार की नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर बहस को जन्म दिया।

अयोध्या से संबंधित घटनाक्रम और श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का निर्णय भी उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण और विवादित अध्यायों में शामिल हैं। श्रीलंका नीति ने भारत को जटिल राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों में उलझाया और बाद के वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आए।

इसलिए राजीव गांधी को समझने का सही तरीका न तो केवल उनका महिमामंडन है और न ही उनकी पूरी राजनीतिक विरासत को खारिज कर देना। इतिहास को उपलब्धियों और गलतियों दोनों के साथ पढ़ना चाहिए।

सद्भावना दिवस का अर्थ

राजीव गांधी की जयंती को सद्भावना दिवस के रूप में मनाने का विचार आज के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में विशेष महत्व रखता है।

लेकिन सद्भावना का अर्थ केवल सरकारी कार्यक्रमों में शपथ लेना, पुष्पांजलि अर्पित करना या नेताओं के संदेश जारी करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ समाज में आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग की संस्कृति को मजबूत करना है।

लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है। हर नागरिक किसी एक दल या विचारधारा से सहमत हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी, सामाजिक नफरत या हिंसक भाषा में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक बहस कई बार तर्क से ज्यादा आक्रोश पर आधारित दिखाई देती है। विचारों के जवाब विचारों से देने के बजाय व्यक्ति पर हमला करना आसान हो गया है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र को लेकर तनाव भी सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करता है।

ऐसे समय में सद्भावना दिवस केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक संदेश बन सकता है।

21वीं सदी का सपना और आज का भारत

राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात की थी। आज भारत 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़ा है। देश ने अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, दूरसंचार, स्टार्टअप और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

लेकिन विकास की तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, ग्रामीण-शहरी अंतर और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

इसलिए राजीव गांधी की जयंती पर केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि भारत तकनीकी रूप से कितना आगे बढ़ा। बड़ा सवाल यह है कि क्या तकनीकी और आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

आधुनिक भारत केवल तेज इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और अत्याधुनिक तकनीक से नहीं बनेगा। आधुनिकता का अर्थ बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के अवसर, सामाजिक न्याय और नागरिकों के बीच विश्वास भी है।

राजनीति में सद्भावना की जरूरत

आज राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीखी दिखाई देती है। चुनाव लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन चुनावी प्रतिस्पर्धा को समाज में स्थायी विभाजन का कारण नहीं बनना चाहिए।

सद्भावना का अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक मतभेद खत्म कर दिए जाएं। इसका अर्थ है कि मतभेदों के बावजूद संवाद बना रहे। सत्ता पक्ष विपक्ष की बात सुने और विपक्ष सरकार से सवाल पूछे, लेकिन दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करें।

राजीव गांधी की राजनीतिक विरासत पर मतभेद हो सकते हैं और होने भी चाहिए। किसी भी नेता को आलोचना से ऊपर रखना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन आलोचना के साथ इतिहास से सीखना भी जरूरी है।

उनके कार्यकाल की तकनीकी और प्रशासनिक पहलों से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को समझा जा सकता है, जबकि बोफोर्स, शाहबानो, अयोध्या और श्रीलंका जैसे विवादित अध्याय सत्ता के निर्णयों की जटिलता और राजनीतिक जोखिमों को समझने का अवसर देते हैं।

श्रद्धांजलि का अर्थ क्या हो?

राजीव गांधी की जयंती पर तस्वीर पर फूल चढ़ाना एक परंपरा हो सकती है, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि उससे आगे जाती है।

यदि हम तकनीक को मानव विकास का माध्यम बनाएं, सामाजिक विभाजन को कम करने की कोशिश करें, असहमति के अधिकार का सम्मान करें और देश के कमजोर वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करें, तो सद्भावना दिवस का संदेश अधिक सार्थक होगा।

आज भारत के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं—तेजी से आधुनिक बनना और मानवीय बने रहना।

सवाल यही है कि क्या भारत तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से अधिक सहिष्णु, लोकतांत्रिक और एकजुट भी बन रहा है?

राजीव गांधी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनकी उपलब्धियों और गलतियों दोनों से सीखना भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत होगा। 20 अगस्त को उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही हो सकता है कि हम उस भारत पर विचार करें, जो आधुनिक भी हो, तकनीकी रूप से सक्षम भी हो और सबसे बढ़कर अपने नागरिकों के बीच सद्भावना बनाए रखने में सक्षम भी हो।

आलोक कुमार

India : वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

 वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

2014 के दावों से 2026 की हकीकत तक—अब जनता हिसाब मांग रही है


राजनीति में वादे करना आसान होता है, लेकिन वर्षों बाद उन्हीं वादों की कसौटी पर खुद को खड़ा करना कठिन। 2014 में महंगाई, खासकर पेट्रोल, चीनी और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों को लेकर जिस तरह राजनीतिक बहस हुई थी, उसकी गूंज आज 2026 में भी सुनाई देती है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद किसी सरकार को अपने पुराने बयानों, दावों और वादों का हिसाब जनता को नहीं देना चाहिए?

लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती। वह पूरे कार्यकाल में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछने का अधिकार रखती है। यदि किसी राजनीतिक दल ने महंगाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था, तो वर्षों बाद उससे यह पूछना भी स्वाभाविक है कि आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट की स्थिति कितनी बदली?

महंगाई का सवाल केवल किसी एक वस्तु की कीमत तक सीमित नहीं है। चीनी, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का सीधा असर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए तो छोटी कीमत वृद्धि भी अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है।

पुराने दावों की आज के दौर में परीक्षा

2014 के आसपास महंगाई को लेकर जिस राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल हुआ, वह भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। उस समय आम लोगों के बीच बढ़ती कीमतों को लेकर असंतोष था और राजनीतिक दलों ने इसे सत्ता परिवर्तन के लिए प्रभावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया।

लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता हासिल करने के बाद होती है। विपक्ष में रहते हुए जो सवाल किसी सरकार से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता में आने के बाद भी पूछे जाने चाहिए। सत्ता बदलने के साथ जवाबदेही का सिद्धांत नहीं बदल सकता।

आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि 2014 में किसने क्या कहा था और 2026 में कौन किससे सवाल पूछ रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार अपने कार्यकाल के दौरान महंगाई को नियंत्रित करने, लोगों की आय बढ़ाने और घरेलू खर्च का दबाव कम करने में सफल रही?

जनता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा ठोस आंकड़ों की जरूरत है।

एथनॉल नीति और पेट्रोल का सवाल

पेट्रोल की कीमतों के साथ एथनॉल मिश्रण भी चर्चा का विषय है। सरकार एथनॉल को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

यह नीति कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यदि देश पेट्रोल में घरेलू रूप से उत्पादित एथनॉल का मिश्रण बढ़ाता है, तो तेल आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना बनती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि क्षेत्र को बाजार उपलब्ध कराने जैसे लाभ भी हो सकते हैं।

लेकिन उपभोक्ता का सवाल अलग है—इस नीति का प्रत्यक्ष लाभ उसकी जेब तक कितना पहुंचा?

यदि एथनॉल मिश्रण बढ़ रहा है, तो सरकार को पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए कि इससे तेल आयात में कितनी बचत हुई, किसानों को कितना आर्थिक लाभ मिला, चीनी उद्योग को कितना फायदा हुआ और उपभोक्ताओं को इससे क्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राहत मिली।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह कहना कि एथनॉल की जरूरत ही नहीं है या हर परिस्थिति में एथनॉल पेट्रोल से महंगा है, बिना ठोस आंकड़ों के उचित निष्कर्ष नहीं होगा। ऊर्जा नीति का मूल्यांकन केवल एक कीमत से नहीं बल्कि उत्पादन लागत, आयात बचत, कृषि आय, पर्यावरणीय प्रभाव और उपभोक्ता मूल्य सहित कई मानकों पर होना चाहिए।

पेट्रोल की कीमत का पूरा सच क्या है?

पेट्रोल की खुदरा कीमत कई घटकों से मिलकर बनती है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, केंद्र और राज्य सरकारों के कर, डीलर कमीशन तथा अन्य लागत मिलकर अंतिम कीमत निर्धारित करते हैं।

इसलिए अलग-अलग देशों में पेट्रोल की कीमतों की सीधी तुलना करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। अलग देशों की कर व्यवस्था, आय का स्तर, मुद्रा विनिमय दर और ऊर्जा बाजार अलग होते हैं।

फिर भी एक सवाल जनता का बना रहता है—जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तब घरेलू उपभोक्ता को उसका अनुपातिक लाभ कितना मिलता है?

इस सवाल का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों से दिया जाना चाहिए।

सरकार को समय-समय पर यह बताना चाहिए कि पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य करों की हिस्सेदारी कितनी है, कच्चे तेल की लागत कितनी है, तेल विपणन कंपनियों की लागत और मार्जिन क्या है तथा कीमतों में बदलाव का उपभोक्ता पर कितना प्रभाव पड़ा।

महंगाई सिर्फ आंकड़ा नहीं, घरेलू अनुभव है

सरकारें अक्सर महंगाई को थोक मूल्य सूचकांक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और अन्य आर्थिक आंकड़ों के माध्यम से समझाती हैं। ये आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन आम नागरिक की जिंदगी केवल सांख्यिकीय तालिकाओं से नहीं चलती।

एक परिवार के लिए महंगाई का अर्थ है महीने के अंत में बची रकम। इसका अर्थ है कि पहले जितने पैसों में घर का राशन आता था, अब उतने में कितना सामान आता है। इसका अर्थ है बच्चों की पढ़ाई, इलाज, यात्रा, बिजली, किराया और भोजन के बीच संतुलन बनाना।

इसीलिए महंगाई का वास्तविक मूल्यांकन केवल प्रतिशत वृद्धि से नहीं बल्कि लोगों की आय और खर्च के बीच संबंध से भी होना चाहिए।

यदि आय बढ़ती है लेकिन आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं का खर्च उससे तेज गति से बढ़ता है, तो परिवार को महंगाई का दबाव महसूस होता रहेगा।

जनता को नारे नहीं, हिसाब चाहिए

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार विरोधी होना नहीं है। बल्कि सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत है।

यदि सरकार की नीतियां प्रभावी हैं तो उन्हें आंकड़ों के साथ जनता के सामने रखने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। और यदि किसी नीति में कमी दिखाई देती है, तो उसे सुधारना ही सुशासन की पहचान है।

महंगाई पर बहस को राजनीतिक आरोपों से आगे ले जाने की जरूरत है। सरकार और विपक्ष दोनों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने महंगाई कम करने के लिए क्या किया, कौन-सी नीतियां सफल रहीं और किन क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

जनता यह भी जानना चाहती है कि किसानों की आय, मजदूरों की मजदूरी, छोटे कारोबारियों की लागत और मध्यम वर्ग की बचत पर महंगाई का वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

जवाबदेही का पैमाना एक होना चाहिए

राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने पुराने बयानों को केवल विपक्ष के हथियार के रूप में न देखें। यदि कोई दावा चुनाव के दौरान जनता के सामने किया गया था, तो सत्ता में आने के बाद उसकी प्रगति बताना भी राजनीतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जनता की स्मृति को कमजोर समझना राजनीति की बड़ी भूल हो सकती है। पुराने भाषण, पुराने वादे और पुराने दावे आज डिजिटल दौर में आसानी से उपलब्ध हैं। इसलिए राजनीतिक जवाबदेही अब केवल चुनावी घोषणा-पत्र तक सीमित नहीं रह सकती।

2026 का नागरिक यह पूछ सकता है कि 2014 में जो कहा गया था, उसका परिणाम क्या निकला? यह सवाल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता में आने वाला हर राजनीतिक दल इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

आखिरकार महंगाई का सवाल केवल चीनी या पेट्रोल के दाम का सवाल नहीं है। यह विश्वास, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल है।

वादे चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन भरोसा केवल काम से बनता है।

और जब जनता सवाल पूछती है तो लोकतंत्र की मांग बहुत सीधी है—उसे नारे नहीं, आंकड़े चाहिए; आरोप नहीं, जवाब चाहिए; और वादे नहीं, उनकी वास्तविकता का हिसाब चाहिए।

आलोक कुमार

बुधवार, 19 अगस्त 2026

Patna : दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई

 


दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई

सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण से उन्होंने कलीसियाई जीवन में बनाई अपनी अलग पहचान

किसी व्यक्ति का जीवन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से भी पहचाना जाता है जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ जाता है। दिवंगत पीटर फ्रांसिस का जीवन सेवा, अनुशासन, संगीत और कलीसियाई जिम्मेदारी के प्रति समर्पण का ऐसा ही उदाहरण रहा। कुर्जी पल्ली की गीत मंडली से जुड़े लोगों के लिए उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक ऐसे सहयोगी और मार्गदर्शक की कमी है, जिसने संगीत सेवा को नई ऊर्जा और ऊंचाई प्रदान की।

कुर्जी पल्ली के प्रधान पल्ली पुरोहित फादर सेल्विन जेवियर ने दिवंगत पीटर फ्रांसिस के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम की। उनके अनुसार, पीटर फ्रांसिस का व्यक्तित्व केवल उनके संगीत कौशल तक सीमित नहीं था। उनके जीवन में जिम्मेदारी, निरंतर अभ्यास और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।

तमिलनाडु से शुरू हुआ जीवन का सफर

पीटर फ्रांसिस मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले थे। युवावस्था में उन्होंने विश्वविख्यात येसु समाज (जेसुइट) में प्रवेश लिया। उस समय उनके साथ फादर प्रकाश लुइस, फादर रंजन लाजरूस आदि भी थे। येसु समाज में बिताए समय ने उनके व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया।

हालांकि जीवन की परिस्थितियों और अपने निर्णयों के चलते बाद में उन्होंने येसु समाज से अलग होने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने भारतीय नौसेना में अपनी सेवाएं दीं। सैन्य सेवा का अनुभव उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रति गंभीरता को और मजबूत करने वाला रहा।

येसु समाज से अलग होने के बावजूद उनके जीवन में अनुशासन और सेवा की भावना बनी रही। फादर सेल्विन जेवियर ने इसी पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि पीटर फ्रांसिस संस्था से बाहर जरूर आ गए थे, लेकिन उनके व्यवहार और कार्यों में एक जेसुइट जैसी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन हमेशा दिखाई देता रहा।

परिवार और सामाजिक जिम्मेदारी

भारतीय नौसेना में सेवा के बाद पीटर फ्रांसिस ने पारिवारिक जीवन को अपनाया। उन्होंने बालूपर की आशा ठाकुर से विवाह किया। उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं।

परिवार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने समाज और कलीसिया के प्रति अपने दायित्वों को भी गंभीरता से निभाया। यही संतुलन उनके व्यक्तित्व की विशेषता रहा।

उनके परिचितों के लिए पीटर फ्रांसिस ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने निजी जीवन की जिम्मेदारियों और सामुदायिक सेवा के बीच संतुलन स्थापित किया। उन्होंने अपने अनुभव और प्रतिभा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समुदाय के लिए उपयोग किया।

संगीत बना सेवा का माध्यम

पीटर फ्रांसिस के जीवन की सबसे उल्लेखनीय पहचान उनके संगीत प्रेम और कलीसियाई संगीत सेवा से जुड़ी रही। विशेष रूप से कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को बेहतर बनाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने गीत मंडली के संगीत स्तर को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गिटार बजाने में उन्हें विशेष महारत हासिल थी। उनके हाथों में गिटार केवल एक वाद्य यंत्र नहीं था, बल्कि प्रार्थना और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता था।

संगीत की उनकी समझ, नियमित अभ्यास और समर्पण ने गीत मंडली से जुड़े अनेक लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने संगीत को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं देखा, बल्कि कलीसियाई सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

किसी भी गीत मंडली की सफलता केवल अच्छे गायकों पर निर्भर नहीं करती। उसके पीछे संगीत की समझ, तालमेल, अभ्यास और सामूहिक अनुशासन भी आवश्यक होता है। पीटर फ्रांसिस ने इन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया और गीत मंडली को व्यवस्थित तथा प्रभावी बनाने में योगदान दिया।

नई पीढ़ी को मिला मार्गदर्शन

पीटर फ्रांसिस की एक बड़ी विशेषता यह रही कि वे अपने संगीत ज्ञान को अपने तक सीमित रखने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके अनुभव से गीत मंडली के अन्य सदस्यों को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिला।

गिटार वादन के साथ-साथ संगीत की बारीकियों को समझना, अभ्यास करना और सामूहिक प्रस्तुति में तालमेल बनाए रखना—इन सभी क्षेत्रों में उनका अनुभव उपयोगी रहा। उनके साथ काम करने वाले लोगों के लिए उनका मार्गदर्शन लंबे समय तक यादगार रहेगा।

उनका जीवन यह भी बताता है कि किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता केवल प्रतिभा से हासिल नहीं होती। उसके लिए निरंतर अभ्यास, अनुशासन और दूसरों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता जरूरी होती है। पीटर फ्रांसिस ने इन गुणों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से प्रदर्शित किया।

संस्था से अलग होकर भी सेवा की भावना कायम

पीटर फ्रांसिस के जीवन की एक विशेष बात यह रही कि उन्होंने येसु समाज छोड़ने के बाद भी सेवा की भावना को अपने जीवन से अलग नहीं होने दिया। फादर सेल्विन जेवियर के अनुसार, उनके व्यक्तित्व में जेसुइट जीवन से जुड़ी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन की झलक लंबे समय तक दिखाई देती रही।

यह बात इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सेवा की भावना किसी एक संस्था या पद तक सीमित नहीं होती। व्यक्ति जहां भी हो, वह अपने आचरण और कार्यों के माध्यम से समाज और समुदाय के लिए योगदान दे सकता है।

पीटर फ्रांसिस ने नौसेना में सेवा की, परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं और इसके साथ कलीसिया तथा संगीत के क्षेत्र में भी योगदान दिया। उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों को देखें तो एक बात लगातार दिखाई देती है—कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता।

उनकी स्मृति बनी रहेगी

किसी व्यक्ति की वास्तविक विरासत केवल उसके द्वारा अर्जित वस्तुओं में नहीं, बल्कि उन लोगों में दिखाई देती है जिन्हें उसने प्रभावित किया। पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को जो योगदान दिया, वह उनके जाने के बाद भी स्मृतियों में बना रहेगा।

उनका संगीत ज्ञान, गिटार वादन की दक्षता, अनुशासन और कलीसियाई सेवा के प्रति समर्पण आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित कर सकता है। विशेष रूप से गीत मंडली के सदस्यों के लिए उनकी याद संगीत और सेवा के साथ जुड़ी रहेगी।

कुर्जी पल्ली की गीत मंडली में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। जिन लोगों ने उनके साथ संगीत सेवा की, उनके लिए पीटर फ्रांसिस केवल एक कुशल गिटार वादक नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सहयोगी थे जिन्होंने सामूहिक प्रयास को बेहतर बनाने में अपना योगदान दिया।

उनके जीवन से यह संदेश भी मिलता है कि प्रतिभा का सबसे सुंदर रूप तब सामने आता है जब वह दूसरों के काम आती है। संगीत तब और अधिक अर्थपूर्ण बन जाता है जब वह लोगों को जोड़ता है, प्रार्थना को स्वर देता है और समुदाय में एकता की भावना पैदा करता है।

दिवंगत पीटर फ्रांसिस की स्मृति उनके परिवार, मित्रों, कुर्जी पल्ली और गीत मंडली से जुड़े लोगों के बीच लंबे समय तक जीवित रहेगी। सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति उनका समर्पण उनके जीवन की ऐसी विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी याद कर सकती हैं।

आलोेक कुमार