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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

India : राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 


राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 जिस उम्र में आज के नेता राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने की तैयारी करते हैं, उसी उम्र में राजीव गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बागडोर संभाल ली थी। सवाल यह नहीं कि राजीव गांधी की राजनीति से हर कोई सहमत था या नहीं; सवाल यह है कि क्या आज का भारत उस युवा प्रधानमंत्री के उस सपने को याद करता है, जिसमें तकनीक, आधुनिकता और सद्भावना के सहारे देश को 21वीं सदी में ले जाने की कोशिश थी?

20 अगस्त भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती का दिन है। देश में यह दिन ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में भी याद किया जाता है। यह अवसर केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि उन विचारों और नीतिगत प्रयासों को समझने का भी है, जिनके केंद्र में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द, तकनीकी आधुनिकीकरण और बदलते भारत की कल्पना थी।

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। वे केवल 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीति के इतिहास में इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनने की घटना अपने आप में उल्लेखनीय है। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा था। ऐसे असाधारण समय में राजीव गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व संभाला और देश के प्रधानमंत्री बने।

उनका प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल 1984 से 1989 तक रहा। यह वह समय था जब भारत एक ओर पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था और धीमी प्रक्रियाओं से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर दुनिया कंप्यूटर, दूरसंचार और सूचना तकनीक की नई क्रांति की ओर बढ़ रही थी।

तकनीक को भविष्य से जोड़ने की कोशिश

राजीव गांधी के कार्यकाल की एक प्रमुख पहचान भारत के तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों को माना जाता है। कंप्यूटरीकरण और दूरसंचार के विस्तार पर जोर दिया गया। उस समय कंप्यूटर आज की तरह सामान्य जीवन का हिस्सा नहीं थे। नई तकनीक को लेकर रोजगार खत्म होने जैसी आशंकाएं भी व्यक्त की जाती थीं।

ऐसे माहौल में तकनीक को विकास का साधन मानना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण था।

दूरसंचार और कंप्यूटर के क्षेत्र में उस दौर में किए गए प्रयासों ने आगे चलकर भारत की सूचना प्रौद्योगिकी यात्रा के लिए आधार तैयार करने में भूमिका निभाई। आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल शासन भारतीय जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन इस परिवर्तन की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। इसके पीछे कई दशकों की नीतियां, प्रयोग और संस्थागत प्रयास हैं। राजीव गांधी का दौर उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

उनकी सरकार ने शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आधुनिक सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की। युवा भारत को नई तकनीकी दुनिया से जोड़ने की उनकी सोच आज के डिजिटल भारत के संदर्भ में फिर चर्चा में आती है।

उपलब्धियों के साथ विवाद भी

हालांकि किसी भी राजनीतिक नेता का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। राजीव गांधी का कार्यकाल विवादों से भी घिरा रहा।

बोफोर्स प्रकरण ने उनकी सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया और 1989 के आम चुनावों में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। शाहबानो मामले से जुड़े फैसले और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी उनकी सरकार की नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर बहस को जन्म दिया।

अयोध्या से संबंधित घटनाक्रम और श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का निर्णय भी उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण और विवादित अध्यायों में शामिल हैं। श्रीलंका नीति ने भारत को जटिल राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों में उलझाया और बाद के वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आए।

इसलिए राजीव गांधी को समझने का सही तरीका न तो केवल उनका महिमामंडन है और न ही उनकी पूरी राजनीतिक विरासत को खारिज कर देना। इतिहास को उपलब्धियों और गलतियों दोनों के साथ पढ़ना चाहिए।

सद्भावना दिवस का अर्थ

राजीव गांधी की जयंती को सद्भावना दिवस के रूप में मनाने का विचार आज के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में विशेष महत्व रखता है।

लेकिन सद्भावना का अर्थ केवल सरकारी कार्यक्रमों में शपथ लेना, पुष्पांजलि अर्पित करना या नेताओं के संदेश जारी करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ समाज में आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग की संस्कृति को मजबूत करना है।

लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है। हर नागरिक किसी एक दल या विचारधारा से सहमत हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी, सामाजिक नफरत या हिंसक भाषा में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक बहस कई बार तर्क से ज्यादा आक्रोश पर आधारित दिखाई देती है। विचारों के जवाब विचारों से देने के बजाय व्यक्ति पर हमला करना आसान हो गया है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र को लेकर तनाव भी सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करता है।

ऐसे समय में सद्भावना दिवस केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक संदेश बन सकता है।

21वीं सदी का सपना और आज का भारत

राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात की थी। आज भारत 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़ा है। देश ने अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, दूरसंचार, स्टार्टअप और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

लेकिन विकास की तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, ग्रामीण-शहरी अंतर और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

इसलिए राजीव गांधी की जयंती पर केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि भारत तकनीकी रूप से कितना आगे बढ़ा। बड़ा सवाल यह है कि क्या तकनीकी और आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

आधुनिक भारत केवल तेज इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और अत्याधुनिक तकनीक से नहीं बनेगा। आधुनिकता का अर्थ बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के अवसर, सामाजिक न्याय और नागरिकों के बीच विश्वास भी है।

राजनीति में सद्भावना की जरूरत

आज राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीखी दिखाई देती है। चुनाव लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन चुनावी प्रतिस्पर्धा को समाज में स्थायी विभाजन का कारण नहीं बनना चाहिए।

सद्भावना का अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक मतभेद खत्म कर दिए जाएं। इसका अर्थ है कि मतभेदों के बावजूद संवाद बना रहे। सत्ता पक्ष विपक्ष की बात सुने और विपक्ष सरकार से सवाल पूछे, लेकिन दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करें।

राजीव गांधी की राजनीतिक विरासत पर मतभेद हो सकते हैं और होने भी चाहिए। किसी भी नेता को आलोचना से ऊपर रखना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन आलोचना के साथ इतिहास से सीखना भी जरूरी है।

उनके कार्यकाल की तकनीकी और प्रशासनिक पहलों से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को समझा जा सकता है, जबकि बोफोर्स, शाहबानो, अयोध्या और श्रीलंका जैसे विवादित अध्याय सत्ता के निर्णयों की जटिलता और राजनीतिक जोखिमों को समझने का अवसर देते हैं।

श्रद्धांजलि का अर्थ क्या हो?

राजीव गांधी की जयंती पर तस्वीर पर फूल चढ़ाना एक परंपरा हो सकती है, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि उससे आगे जाती है।

यदि हम तकनीक को मानव विकास का माध्यम बनाएं, सामाजिक विभाजन को कम करने की कोशिश करें, असहमति के अधिकार का सम्मान करें और देश के कमजोर वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करें, तो सद्भावना दिवस का संदेश अधिक सार्थक होगा।

आज भारत के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं—तेजी से आधुनिक बनना और मानवीय बने रहना।

सवाल यही है कि क्या भारत तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से अधिक सहिष्णु, लोकतांत्रिक और एकजुट भी बन रहा है?

राजीव गांधी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनकी उपलब्धियों और गलतियों दोनों से सीखना भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत होगा। 20 अगस्त को उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही हो सकता है कि हम उस भारत पर विचार करें, जो आधुनिक भी हो, तकनीकी रूप से सक्षम भी हो और सबसे बढ़कर अपने नागरिकों के बीच सद्भावना बनाए रखने में सक्षम भी हो।

आलोक कुमार

India : वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

 वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

2014 के दावों से 2026 की हकीकत तक—अब जनता हिसाब मांग रही है


राजनीति में वादे करना आसान होता है, लेकिन वर्षों बाद उन्हीं वादों की कसौटी पर खुद को खड़ा करना कठिन। 2014 में महंगाई, खासकर पेट्रोल, चीनी और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों को लेकर जिस तरह राजनीतिक बहस हुई थी, उसकी गूंज आज 2026 में भी सुनाई देती है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद किसी सरकार को अपने पुराने बयानों, दावों और वादों का हिसाब जनता को नहीं देना चाहिए?

लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती। वह पूरे कार्यकाल में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछने का अधिकार रखती है। यदि किसी राजनीतिक दल ने महंगाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था, तो वर्षों बाद उससे यह पूछना भी स्वाभाविक है कि आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट की स्थिति कितनी बदली?

महंगाई का सवाल केवल किसी एक वस्तु की कीमत तक सीमित नहीं है। चीनी, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का सीधा असर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए तो छोटी कीमत वृद्धि भी अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है।

पुराने दावों की आज के दौर में परीक्षा

2014 के आसपास महंगाई को लेकर जिस राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल हुआ, वह भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। उस समय आम लोगों के बीच बढ़ती कीमतों को लेकर असंतोष था और राजनीतिक दलों ने इसे सत्ता परिवर्तन के लिए प्रभावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया।

लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता हासिल करने के बाद होती है। विपक्ष में रहते हुए जो सवाल किसी सरकार से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता में आने के बाद भी पूछे जाने चाहिए। सत्ता बदलने के साथ जवाबदेही का सिद्धांत नहीं बदल सकता।

आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि 2014 में किसने क्या कहा था और 2026 में कौन किससे सवाल पूछ रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार अपने कार्यकाल के दौरान महंगाई को नियंत्रित करने, लोगों की आय बढ़ाने और घरेलू खर्च का दबाव कम करने में सफल रही?

जनता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा ठोस आंकड़ों की जरूरत है।

एथनॉल नीति और पेट्रोल का सवाल

पेट्रोल की कीमतों के साथ एथनॉल मिश्रण भी चर्चा का विषय है। सरकार एथनॉल को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

यह नीति कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यदि देश पेट्रोल में घरेलू रूप से उत्पादित एथनॉल का मिश्रण बढ़ाता है, तो तेल आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना बनती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि क्षेत्र को बाजार उपलब्ध कराने जैसे लाभ भी हो सकते हैं।

लेकिन उपभोक्ता का सवाल अलग है—इस नीति का प्रत्यक्ष लाभ उसकी जेब तक कितना पहुंचा?

यदि एथनॉल मिश्रण बढ़ रहा है, तो सरकार को पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए कि इससे तेल आयात में कितनी बचत हुई, किसानों को कितना आर्थिक लाभ मिला, चीनी उद्योग को कितना फायदा हुआ और उपभोक्ताओं को इससे क्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राहत मिली।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह कहना कि एथनॉल की जरूरत ही नहीं है या हर परिस्थिति में एथनॉल पेट्रोल से महंगा है, बिना ठोस आंकड़ों के उचित निष्कर्ष नहीं होगा। ऊर्जा नीति का मूल्यांकन केवल एक कीमत से नहीं बल्कि उत्पादन लागत, आयात बचत, कृषि आय, पर्यावरणीय प्रभाव और उपभोक्ता मूल्य सहित कई मानकों पर होना चाहिए।

पेट्रोल की कीमत का पूरा सच क्या है?

पेट्रोल की खुदरा कीमत कई घटकों से मिलकर बनती है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, केंद्र और राज्य सरकारों के कर, डीलर कमीशन तथा अन्य लागत मिलकर अंतिम कीमत निर्धारित करते हैं।

इसलिए अलग-अलग देशों में पेट्रोल की कीमतों की सीधी तुलना करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। अलग देशों की कर व्यवस्था, आय का स्तर, मुद्रा विनिमय दर और ऊर्जा बाजार अलग होते हैं।

फिर भी एक सवाल जनता का बना रहता है—जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तब घरेलू उपभोक्ता को उसका अनुपातिक लाभ कितना मिलता है?

इस सवाल का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों से दिया जाना चाहिए।

सरकार को समय-समय पर यह बताना चाहिए कि पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य करों की हिस्सेदारी कितनी है, कच्चे तेल की लागत कितनी है, तेल विपणन कंपनियों की लागत और मार्जिन क्या है तथा कीमतों में बदलाव का उपभोक्ता पर कितना प्रभाव पड़ा।

महंगाई सिर्फ आंकड़ा नहीं, घरेलू अनुभव है

सरकारें अक्सर महंगाई को थोक मूल्य सूचकांक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और अन्य आर्थिक आंकड़ों के माध्यम से समझाती हैं। ये आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन आम नागरिक की जिंदगी केवल सांख्यिकीय तालिकाओं से नहीं चलती।

एक परिवार के लिए महंगाई का अर्थ है महीने के अंत में बची रकम। इसका अर्थ है कि पहले जितने पैसों में घर का राशन आता था, अब उतने में कितना सामान आता है। इसका अर्थ है बच्चों की पढ़ाई, इलाज, यात्रा, बिजली, किराया और भोजन के बीच संतुलन बनाना।

इसीलिए महंगाई का वास्तविक मूल्यांकन केवल प्रतिशत वृद्धि से नहीं बल्कि लोगों की आय और खर्च के बीच संबंध से भी होना चाहिए।

यदि आय बढ़ती है लेकिन आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं का खर्च उससे तेज गति से बढ़ता है, तो परिवार को महंगाई का दबाव महसूस होता रहेगा।

जनता को नारे नहीं, हिसाब चाहिए

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार विरोधी होना नहीं है। बल्कि सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत है।

यदि सरकार की नीतियां प्रभावी हैं तो उन्हें आंकड़ों के साथ जनता के सामने रखने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। और यदि किसी नीति में कमी दिखाई देती है, तो उसे सुधारना ही सुशासन की पहचान है।

महंगाई पर बहस को राजनीतिक आरोपों से आगे ले जाने की जरूरत है। सरकार और विपक्ष दोनों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने महंगाई कम करने के लिए क्या किया, कौन-सी नीतियां सफल रहीं और किन क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

जनता यह भी जानना चाहती है कि किसानों की आय, मजदूरों की मजदूरी, छोटे कारोबारियों की लागत और मध्यम वर्ग की बचत पर महंगाई का वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

जवाबदेही का पैमाना एक होना चाहिए

राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने पुराने बयानों को केवल विपक्ष के हथियार के रूप में न देखें। यदि कोई दावा चुनाव के दौरान जनता के सामने किया गया था, तो सत्ता में आने के बाद उसकी प्रगति बताना भी राजनीतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जनता की स्मृति को कमजोर समझना राजनीति की बड़ी भूल हो सकती है। पुराने भाषण, पुराने वादे और पुराने दावे आज डिजिटल दौर में आसानी से उपलब्ध हैं। इसलिए राजनीतिक जवाबदेही अब केवल चुनावी घोषणा-पत्र तक सीमित नहीं रह सकती।

2026 का नागरिक यह पूछ सकता है कि 2014 में जो कहा गया था, उसका परिणाम क्या निकला? यह सवाल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता में आने वाला हर राजनीतिक दल इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

आखिरकार महंगाई का सवाल केवल चीनी या पेट्रोल के दाम का सवाल नहीं है। यह विश्वास, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल है।

वादे चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन भरोसा केवल काम से बनता है।

और जब जनता सवाल पूछती है तो लोकतंत्र की मांग बहुत सीधी है—उसे नारे नहीं, आंकड़े चाहिए; आरोप नहीं, जवाब चाहिए; और वादे नहीं, उनकी वास्तविकता का हिसाब चाहिए।

आलोक कुमार

बुधवार, 19 अगस्त 2026

Patna : दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई

 


दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई

सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण से उन्होंने कलीसियाई जीवन में बनाई अपनी अलग पहचान

किसी व्यक्ति का जीवन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से भी पहचाना जाता है जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ जाता है। दिवंगत पीटर फ्रांसिस का जीवन सेवा, अनुशासन, संगीत और कलीसियाई जिम्मेदारी के प्रति समर्पण का ऐसा ही उदाहरण रहा। कुर्जी पल्ली की गीत मंडली से जुड़े लोगों के लिए उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक ऐसे सहयोगी और मार्गदर्शक की कमी है, जिसने संगीत सेवा को नई ऊर्जा और ऊंचाई प्रदान की।

कुर्जी पल्ली के प्रधान पल्ली पुरोहित फादर सेल्विन जेवियर ने दिवंगत पीटर फ्रांसिस के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम की। उनके अनुसार, पीटर फ्रांसिस का व्यक्तित्व केवल उनके संगीत कौशल तक सीमित नहीं था। उनके जीवन में जिम्मेदारी, निरंतर अभ्यास और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।

तमिलनाडु से शुरू हुआ जीवन का सफर

पीटर फ्रांसिस मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले थे। युवावस्था में उन्होंने विश्वविख्यात येसु समाज (जेसुइट) में प्रवेश लिया। उस समय उनके साथ फादर प्रकाश लुइस, फादर रंजन लाजरूस आदि भी थे। येसु समाज में बिताए समय ने उनके व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया।

हालांकि जीवन की परिस्थितियों और अपने निर्णयों के चलते बाद में उन्होंने येसु समाज से अलग होने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने भारतीय नौसेना में अपनी सेवाएं दीं। सैन्य सेवा का अनुभव उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रति गंभीरता को और मजबूत करने वाला रहा।

येसु समाज से अलग होने के बावजूद उनके जीवन में अनुशासन और सेवा की भावना बनी रही। फादर सेल्विन जेवियर ने इसी पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि पीटर फ्रांसिस संस्था से बाहर जरूर आ गए थे, लेकिन उनके व्यवहार और कार्यों में एक जेसुइट जैसी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन हमेशा दिखाई देता रहा।

परिवार और सामाजिक जिम्मेदारी

भारतीय नौसेना में सेवा के बाद पीटर फ्रांसिस ने पारिवारिक जीवन को अपनाया। उन्होंने बालूपर की आशा ठाकुर से विवाह किया। उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं।

परिवार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने समाज और कलीसिया के प्रति अपने दायित्वों को भी गंभीरता से निभाया। यही संतुलन उनके व्यक्तित्व की विशेषता रहा।

उनके परिचितों के लिए पीटर फ्रांसिस ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने निजी जीवन की जिम्मेदारियों और सामुदायिक सेवा के बीच संतुलन स्थापित किया। उन्होंने अपने अनुभव और प्रतिभा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समुदाय के लिए उपयोग किया।

संगीत बना सेवा का माध्यम

पीटर फ्रांसिस के जीवन की सबसे उल्लेखनीय पहचान उनके संगीत प्रेम और कलीसियाई संगीत सेवा से जुड़ी रही। विशेष रूप से कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को बेहतर बनाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने गीत मंडली के संगीत स्तर को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गिटार बजाने में उन्हें विशेष महारत हासिल थी। उनके हाथों में गिटार केवल एक वाद्य यंत्र नहीं था, बल्कि प्रार्थना और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता था।

संगीत की उनकी समझ, नियमित अभ्यास और समर्पण ने गीत मंडली से जुड़े अनेक लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने संगीत को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं देखा, बल्कि कलीसियाई सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

किसी भी गीत मंडली की सफलता केवल अच्छे गायकों पर निर्भर नहीं करती। उसके पीछे संगीत की समझ, तालमेल, अभ्यास और सामूहिक अनुशासन भी आवश्यक होता है। पीटर फ्रांसिस ने इन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया और गीत मंडली को व्यवस्थित तथा प्रभावी बनाने में योगदान दिया।

नई पीढ़ी को मिला मार्गदर्शन

पीटर फ्रांसिस की एक बड़ी विशेषता यह रही कि वे अपने संगीत ज्ञान को अपने तक सीमित रखने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके अनुभव से गीत मंडली के अन्य सदस्यों को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिला।

गिटार वादन के साथ-साथ संगीत की बारीकियों को समझना, अभ्यास करना और सामूहिक प्रस्तुति में तालमेल बनाए रखना—इन सभी क्षेत्रों में उनका अनुभव उपयोगी रहा। उनके साथ काम करने वाले लोगों के लिए उनका मार्गदर्शन लंबे समय तक यादगार रहेगा।

उनका जीवन यह भी बताता है कि किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता केवल प्रतिभा से हासिल नहीं होती। उसके लिए निरंतर अभ्यास, अनुशासन और दूसरों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता जरूरी होती है। पीटर फ्रांसिस ने इन गुणों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से प्रदर्शित किया।

संस्था से अलग होकर भी सेवा की भावना कायम

पीटर फ्रांसिस के जीवन की एक विशेष बात यह रही कि उन्होंने येसु समाज छोड़ने के बाद भी सेवा की भावना को अपने जीवन से अलग नहीं होने दिया। फादर सेल्विन जेवियर के अनुसार, उनके व्यक्तित्व में जेसुइट जीवन से जुड़ी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन की झलक लंबे समय तक दिखाई देती रही।

यह बात इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सेवा की भावना किसी एक संस्था या पद तक सीमित नहीं होती। व्यक्ति जहां भी हो, वह अपने आचरण और कार्यों के माध्यम से समाज और समुदाय के लिए योगदान दे सकता है।

पीटर फ्रांसिस ने नौसेना में सेवा की, परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं और इसके साथ कलीसिया तथा संगीत के क्षेत्र में भी योगदान दिया। उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों को देखें तो एक बात लगातार दिखाई देती है—कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता।

उनकी स्मृति बनी रहेगी

किसी व्यक्ति की वास्तविक विरासत केवल उसके द्वारा अर्जित वस्तुओं में नहीं, बल्कि उन लोगों में दिखाई देती है जिन्हें उसने प्रभावित किया। पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को जो योगदान दिया, वह उनके जाने के बाद भी स्मृतियों में बना रहेगा।

उनका संगीत ज्ञान, गिटार वादन की दक्षता, अनुशासन और कलीसियाई सेवा के प्रति समर्पण आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित कर सकता है। विशेष रूप से गीत मंडली के सदस्यों के लिए उनकी याद संगीत और सेवा के साथ जुड़ी रहेगी।

कुर्जी पल्ली की गीत मंडली में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। जिन लोगों ने उनके साथ संगीत सेवा की, उनके लिए पीटर फ्रांसिस केवल एक कुशल गिटार वादक नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सहयोगी थे जिन्होंने सामूहिक प्रयास को बेहतर बनाने में अपना योगदान दिया।

उनके जीवन से यह संदेश भी मिलता है कि प्रतिभा का सबसे सुंदर रूप तब सामने आता है जब वह दूसरों के काम आती है। संगीत तब और अधिक अर्थपूर्ण बन जाता है जब वह लोगों को जोड़ता है, प्रार्थना को स्वर देता है और समुदाय में एकता की भावना पैदा करता है।

दिवंगत पीटर फ्रांसिस की स्मृति उनके परिवार, मित्रों, कुर्जी पल्ली और गीत मंडली से जुड़े लोगों के बीच लंबे समय तक जीवित रहेगी। सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति उनका समर्पण उनके जीवन की ऐसी विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी याद कर सकती हैं।

आलोेक कुमार

India : हिंदू खतरे में है या भविष्य? NEET के सवाल पर राजनीति कब तक?

 


हिंदू खतरे में है या भविष्य? NEET के सवाल पर राजनीति कब तक?

जब बच्चों के हाथ में किताबें हों और नेताओं के हाथ में ‘खतरे’ का नारा, तब सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, देश के भविष्य का होता है।

सोशल मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल है, जिसमें सांसद रवि किशन के नाम से कथित तौर पर कहा गया है—“यहाँ हिंदू खतरे में है और तुम लोगों को NEET एग्जाम की पड़ी है। जब हिंदू ही नहीं रहेगा तो NEET एग्जाम का क्या करोगे?” हालांकि इस कथन की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इसे रवि किशन का प्रमाणित बयान मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इस वायरल पोस्टर ने एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या हमारे बच्चों के भविष्य के सवालों को भी धार्मिक भय की राजनीति के नीचे दबा दिया जाएगा?

NEET सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों विद्यार्थियों के सपनों का रास्ता है। किसी के लिए डॉक्टर बनने का सपना, किसी परिवार की वर्षों की मेहनत और किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सामाजिक-आर्थिक बदलाव की उम्मीद। जिस बच्चे ने वर्षों तक किताबों के बीच बैठकर पढ़ाई की, उसके सामने परीक्षा का सवाल आता है तो उसे रोजगार, मेडिकल कॉलेजों की सीट, फीस, कोचिंग का खर्च, परीक्षा की पारदर्शिता और भविष्य की चिंता होती है।

उसे यह सुनने की जरूरत नहीं कि वह पहले यह साबित करे कि वह किस धर्म का है।

डर की राजनीति से बच्चों का भविष्य नहीं बनता

राजनीति में धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल नया नहीं है। लेकिन जब ‘खतरे’ की भाषा इतनी हावी हो जाए कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और युवाओं के भविष्य के प्रश्न पीछे छूट जाएँ, तब लोकतंत्र को खुद से सवाल करना चाहिए।

अगर हिंदू खतरे में है तो खतरे का तथ्य क्या है?

कहाँ खतरा है? किससे खतरा है? सरकार या संबंधित संगठनों के पास इसके प्रमाण और आंकड़े क्या हैं? और यदि कोई वास्तविक खतरा है तो उसका समाधान क्या है?

इन सवालों का जवाब दिए बिना केवल “हिंदू खतरे में है” कहना समस्या का समाधान नहीं हो सकता। भय पैदा करना और समाधान देना दो अलग बातें हैं।

भारत के बच्चे किसी धार्मिक युद्ध के लिए पैदा नहीं हुए हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, किसान, उद्यमी और सैनिक बनने का सपना देखते हैं। वे अपने माता-पिता की उम्मीद हैं। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्हें बेहतर शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य कब मिलेगा।

NEET की तैयारी करने वाला बच्चा किसी का दुश्मन नहीं

विडंबना यह है कि एक तरफ देश मेडिकल शिक्षा को मजबूत करने की बात करता है, दूसरी तरफ NEET जैसी परीक्षा को लेकर लाखों परिवार तनाव में रहते हैं। परीक्षा व्यवस्था, सीटों की उपलब्धता, फीस, कोचिंग का खर्च और पारदर्शिता जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहते हैं।

ऐसे समय में यदि कोई राजनीतिक संदेश युवाओं से कहे कि “पहले धर्म बचाओ, परीक्षा बाद में देना”, तो यह विद्यार्थियों की वास्तविक चिंताओं से ध्यान हटाने जैसा होगा।

देश का हिंदू तभी मजबूत होगा जब उसका बच्चा शिक्षित होगा।

देश का मुसलमान तभी मजबूत होगा जब उसका बच्चा शिक्षित होगा। देश का ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन या किसी भी समुदाय का बच्चा तभी मजबूत होगा जब उसके हाथ में किताब होगी, उसके पास अवसर होगा और उसकी मेहनत को न्याय मिलेगा।

भारत की ताकत किसी एक समुदाय के भय में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की शिक्षा, अवसर और संवैधानिक समानता में है।

नेताओं से एक सीधा सवाल

अगर सचमुच हिंदू खतरे में है तो नेताओं को केवल चुनावी मंचों से नारे लगाने के बजाय संसद और सार्वजनिक नीति के स्तर पर ठोस समाधान सामने रखना चाहिए।

अगर युवा खतरे में है तो बेरोजगारी पर बहस होनी चाहिए।

अगर विद्यार्थी खतरे में हैं तो परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बहस होनी चाहिए।

अगर गरीब परिवार खतरे में हैं तो मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत और अवसरों की उपलब्धता पर बहस होनी चाहिए।

अगर देश का भविष्य खतरे में है तो सरकारी स्कूलों, विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य व्यवस्था और रोजगार पर बहस होनी चाहिए।

सिर्फ खतरे का नारा लगाने से कोई खतरा खत्म नहीं होता।

और यदि कोई नेता वास्तव में ऐसा बयान देता है, तो उससे यह पूछना बिल्कुल जायज है कि वह युवाओं को डर देना चाहता है या दिशा?

धर्म की रक्षा शिक्षा से भी होती है

किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति केवल राजनीतिक नारों में नहीं होती। वह उसके मूल्यों, संस्कृति, शिक्षा, नैतिकता और मानवीय संवेदना में होती है।

अगर कोई हिंदू परिवार अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है तो उसे NEET की तैयारी करने दीजिए। उसे डराइए मत।

उसे यह मत बताइए कि उसका भविष्य किसी दूसरे समुदाय की मौजूदगी से खतरे में है। उसे यह बताइए कि वह पढ़े, आगे बढ़े और समाज की सेवा करे।

कल वही डॉक्टर किसी हिंदू मरीज का इलाज करेगा और किसी मुसलमान, ईसाई या सिख मरीज का भी। अस्पताल में बीमारी मरीज का धर्म पूछकर शरीर में प्रवेश नहीं करती।

असली खतरा क्या है?

आज भारत के सामने असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किससे खतरे में है। असली सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहे हैं? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या परीक्षाएँ पारदर्शी हैं? क्या गरीब परिवार का बच्चा भी डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकता है?

इन सवालों से ध्यान हटाकर समाज को धार्मिक डर में उलझाना आसान हो सकता है, लेकिन इससे देश मजबूत नहीं होगा।

इसलिए वायरल पोस्टर चाहे किसी का वास्तविक बयान हो या सोशल मीडिया पर बनाई गई सामग्री—उसकी सत्यता की जांच जरूरी है। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति के नाम से बयान फैलाना भी उचित नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति वास्तव में ऐसा बयान देता है, तो उससे जवाब मांगना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।

“हिंदू खतरे में है”—यह कहने से पहले खतरे का प्रमाण दीजिए।

और बच्चों से यह कहने से पहले कि “NEET की क्या जरूरत है”, एक बार उनके सपनों को देखिए।

क्योंकि जिस देश के बच्चे डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे हों, उस देश को उनके हाथ में किताब चाहिए—डर का झंडा नहीं।

भारत का भविष्य केवल मंदिर-मस्जिद की बहस से नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, प्रयोगशालाओं और रोजगार के अवसरों से भी तय होगा।

और याद रखिए—

जिस दिन राजनीति ने बच्चों की किताबों से बड़ा अपना धार्मिक डर बना लिया, उसी दिन सवाल केवल हिंदू-मुसलमान का नहीं, भारत के भविष्य का हो जाता है।


आलोेक कुमार

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

Bihar : चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

 


चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

चुनाव के दौरान जनता राजा बन जाती है और उम्मीदवार रंक। लेकिन जैसे ही नतीजे आते हैं, तस्वीर पलट जाती है—रंक राजा बन जाता है और जनता फिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि के दरबार में खड़ी दिखाई देती है। लोकतंत्र की असली चुनौती इसी उलटफेर को रोकने की है।

लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि चुनाव के दौरान जिस जनता के दरवाजे पर नेता सिर झुकाकर पहुंचते हैं, वही जनता चुनाव परिणाम के बाद अक्सर अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती नजर आती है। वोट मांगते समय जनता सर्वोपरि होती है, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत बढ़ जाती है।

यही सवाल आज बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक के रूप में शपथ लेना उनके राजनीतिक सफर का नया अध्याय है। राजनीति और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर बैठकर विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे।

रणनीतिकार से ‘माननीय’ बनने का यह सफर केवल पद परिवर्तन नहीं है। इसके साथ संवैधानिक अधिकार, संसदीय जिम्मेदारी और जनता के प्रति जवाबदेही भी जुड़ जाती है।

चुनाव जीतना अंत नहीं, शुरुआत है

किसी भी उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जिम्मेदारी का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत होता है।

जनता ने किसी प्रतिनिधि को विधानसभा इसलिए नहीं भेजा कि वह केवल सदन की कार्यवाही में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। उससे अपेक्षा होती है कि वह क्षेत्र की समस्याओं को विधानसभा में उठाए, सरकार से सवाल पूछे, नीतियों पर बहस करे और जनता की आवाज को सत्ता तक पहुंचाए।

विधायक बनने के बाद प्रशांत किशोर के सामने भी यही कसौटी होगी।

बांकीपुर के मतदाताओं ने उन्हें जो जनादेश दिया है, वह अब उनके लिए राजनीतिक पूंजी से ज्यादा जिम्मेदारी है। सड़क, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, शहरी सुविधाएं और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों के विषय नहीं रहेंगे। इन पर काम और जवाब दोनों देना होगा।

विधायक के पास अधिकार हैं, लेकिन जनता के ऊपर नहीं

विधायक को सदन में जनता के मुद्दे उठाने, प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने और कानून निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार मिलता है। राज्य के बजट और वित्तीय प्रस्तावों पर विधानसभा की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका होती है।

विधायक का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के विधायक भी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं और विपक्ष के विधायक भी।

सदन में मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकार प्रतिनिधि को जनता से ऊपर रखने के लिए नहीं होते। उनका उद्देश्य यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना अनुचित दबाव या भय के अपने विचार रख सकें और सार्वजनिक हित के मुद्दे उठा सकें।

यानी अधिकार जितने बड़े हैं, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

क्या चुनाव के बाद भी जनता राजा रहती है?

यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—क्या चुनाव जीतने के बाद भी जनता राजा बनी रहती है?

संवैधानिक दृष्टि से जवाब स्पष्ट है—हाँ।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम स्रोत जनता है। विधायक जनता द्वारा चुना जाता है और उसका कार्यकाल सीमित होता है। वह स्थायी शासक नहीं है। अगले चुनाव में वही जनता उसके काम का मूल्यांकन कर सकती है।

लेकिन राजनीतिक व्यवहार में तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है।

चुनाव के दौरान उम्मीदवार घर-घर जाते हैं। मतदाताओं के सामने अपनी योजनाएं रखते हैं। हाथ जोड़ते हैं, समर्थन मांगते हैं और कहते हैं कि वे जनता की सेवा करने आए हैं।

परिणाम आने के बाद वही नागरिक किसी प्रमाणपत्र, सड़क, नाली, पेंशन, रोजगार, अस्पताल या सरकारी योजना से जुड़ी समस्या लेकर जनप्रतिनिधि के कार्यालय के चक्कर लगाता है।

यह बदलाव लोकतंत्र की भावना के लिए गंभीर सवाल है।

जनता से दूरी लोकतंत्र को कमजोर करती है

जनप्रतिनिधि और जनता के बीच दूरी बढ़ने का मतलब केवल राजनीतिक दूरी नहीं है। इससे लोकतंत्र की जवाबदेही कमजोर होती है।

यदि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि से मिलने में कठिनाई हो, यदि शिकायतों का जवाब न मिले, यदि चुनाव के दौरान किए गए वादों की समीक्षा न हो और यदि पांच साल तक संवाद केवल चुनावी मौसम में हो, तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व केवल मतदान तक सीमित हो जाता है।

इसलिए जरूरी है कि विधायक अपने क्षेत्र में नियमित जनसंवाद की व्यवस्था बनाए रखें। जनता से मिलने का समय तय हो, शिकायतों की निगरानी हो और विकास कार्यों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।

जनता को भी केवल चुनाव के दिन जागरूक मतदाता बनने के बजाय पूरे कार्यकाल में सक्रिय नागरिक बने रहना होगा।

प्रशांत किशोर के सामने अलग चुनौती

प्रशांत किशोर के मामले में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजनीति में व्यवस्था परिवर्तन, जनभागीदारी और जनता की भूमिका जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है।

अब उनके पास भाषण और राजनीतिक रणनीति से आगे बढ़कर संस्थागत काम करने का अवसर है।

विधानसभा में उनकी भूमिका यह तय करेगी कि वे अपने राजनीतिक विचारों को कानून, नीति और जनहित के ठोस मुद्दों में कितनी प्रभावी ढंग से बदल पाते हैं।

जनता उनसे यह भी पूछ सकती है कि जिन समस्याओं को उन्होंने चुनावी राजनीति में उठाया, उनके समाधान के लिए सदन में उन्होंने क्या किया।

यही वह बिंदु होगा जहां चुनावी वादा और संवैधानिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी होगी।

असली राजा कौन?

लोकतंत्र में ‘राजा’ शब्द प्रतीकात्मक है। वास्तविक व्यवस्था में न तो जनता राजा है और न विधायक। संविधान सर्वोच्च है और निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान के अधीन काम करते हैं।

फिर भी यदि लोकतंत्र की भाषा में सवाल पूछा जाए कि सत्ता का मालिक कौन है, तो जवाब जनता ही होगी।

विधायक को सत्ता जनता से मिलती है। पद जनता देती है। जनादेश जनता देती है और अगले चुनाव में फैसला भी जनता ही करती है।

इसलिए चुनाव जीतने के बाद किसी जनप्रतिनिधि को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता का शासक नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।

बांकीपुर की जनता ने प्रशांत किशोर को अवसर दिया है। अब बारी उनकी है कि वे इस जनादेश को विधानसभा की कार्यवाही, सवालों, नीतियों और जमीन पर दिखाई देने वाले काम में बदलें।

चुनाव में जनता ने उन्हें प्रतिनिधि बनाया है; अब उन्हें साबित करना होगा कि वे जनता को सत्ता से दूर करने नहीं, बल्कि जनता की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने आए हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, जीत के बाद जनता के प्रति जवाबदेह बने रहने में है।

क्योंकि चुनाव के दिन जनता पांच साल के लिए अपना प्रतिनिधि चुनती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी निगरानी और सवाल पूछने का अधिकार पांच साल के लिए समाप्त नहीं होता।

चुनाव में राजा जनता होती है। नतीजे के बाद भी राजा जनता ही रहनी चाहिए—और विधायक को यह याद रखना चाहिए कि वह दरबार का राजा नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।


आलोक कुमार

Bihar : कोसी का कहर

 

कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म

छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं।

18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई।

सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा?

छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट

कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। आयोग की प्रारंभिक अवधि मार्च 2010 तक निर्धारित थी। इसके बाद अवधि बढ़ाई गई और चौथा विस्तार 31 मार्च 2012 तक हुआ।

इसके बावजूद रिपोर्ट तत्काल सामने नहीं आई। करीब छह वर्ष बाद, 1 अगस्त 2014 को आयोग की रिपोर्ट बिहार विधानसभा में रखी गई।

यहीं पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है—जिस त्रासदी के कारणों की जांच जल्द पूरी करने की जरूरत थी, उसकी रिपोर्ट सामने आने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

रिपोर्ट में निगरानी व्यवस्था की कमियों, बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका, चेतावनी व्यवस्था और कटाव निरोधक कार्यों की मॉनिटरिंग जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए गए। अभियंताओं की क्षमता और तैनाती तथा पूर्व में कराए गए कटाव निरोधक कार्यों की जांच की जरूरत का भी उल्लेख किया गया।

लेकिन रिपोर्ट के बाद कार्रवाई कितनी हुई? किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? कितनों पर विभागीय या कानूनी कार्रवाई हुई? जनता को इसका स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब कितना मिला?

यही वह अंतर है जहां जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई के बीच की दूरी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है।

18 साल बाद भी बाढ़ के पुराने जख्म

कोसी की त्रासदी केवल 2008 की घटना नहीं है। इसके निशान आज भी बुनियादी ढांचे और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देते हैं।

मधेपुरा के चौसा प्रखंड में धनेशपुर चौक से मोरसंडा गोठ बस्ती की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलों की समस्या लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी का कारण रही है। मरम्मत के बाद भी बाढ़ में संरचनाओं के क्षतिग्रस्त होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पुल टूटता है, कहीं डायवर्सन बनता है और फिर अगली बाढ़ पुराने संकट को वापस ले आती है।

सवाल यह नहीं कि कोसी में बाढ़ क्यों आती है। सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में हर वर्ष बाढ़ का खतरा रहता है, वहां स्थायी और टिकाऊ बुनियादी ढांचा क्यों नहीं तैयार किया जाता?

बाढ़ के समय नाव लोगों की मजबूरी बन जाती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना कठिन हो जाता है। किसानों की फसल और बाजार तक पहुंच दोनों प्रभावित होते हैं।

पुनर्वास की अधूरी कहानी

आपदा के बाद राहत तत्काल जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन स्थायी पुनर्वास ही प्रभावित परिवारों को सामान्य जीवन में लौटाता है। यही वजह है कि पुनर्वास योजनाओं की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण सवालों में शामिल होनी चाहिए।

मधेपुरा में 2 लाख 36 हजार 632 घरों के प्रभावित होने और करीब एक लाख घरों के निर्माण की योजना से जुड़ी जानकारी सामने आई थी। लेकिन योजना बंद होने तक लगभग एक चौथाई घर ही बन पाने की बात कही गई। यदि उपलब्ध आंकड़े सही हैं, तो यह पुनर्वास की गति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

आपदा के बाद वर्षों तक यदि परिवार पक्के घर की प्रतीक्षा करता रहे तो राहत का अर्थ अधूरा रह जाता है। पुनर्वास सिर्फ मकान बनाने की योजना नहीं है। इसमें सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए।

मुआवजे के आंकड़े भी पूछते हैं सवाल

मृतकों के परिजनों को सहायता देने के लिए सरकार ने विभिन्न मदों में मुआवजे और अनुदान की व्यवस्था की थी। लेकिन मधेपुरा से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में आधिकारिक तौर पर 272 मौतें दर्ज होने और 181 मृतकों के परिवारों को सरकारी अनुदान मिलने की बात सामने आती है।

यदि ये आंकड़े सही हैं तो सवाल बेहद सीधा है—बाकी परिवारों को सहायता क्यों नहीं मिली?

आपदा में मृतकों की संख्या केवल सरकारी आंकड़ा नहीं होती। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, एक घर और कई अधूरे सपने होते हैं। इसलिए मुआवजे की सूची, भुगतान की स्थिति और लंबित मामलों का सार्वजनिक विवरण होना चाहिए।

यदि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों या लाभुकों की संख्या अलग है, तो प्रशासन को उन आंकड़ों का मिलान भी सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।

आपदा सिर्फ पानी से नहीं बनती

कोसी ने यह भी सिखाया कि आपदा का प्रभाव केवल प्राकृतिक कारणों से तय नहीं होता। कमजोर निगरानी, लचर प्रशासन, निर्णय में देरी, खराब निर्माण, अधूरी योजनाएं और जवाबदेही की कमी किसी प्राकृतिक संकट को लंबे सामाजिक संकट में बदल सकती हैं।

18 अगस्त 2008 को पानी आया और बहुत कुछ बहा ले गया। लेकिन पानी उतरने के बाद भी हजारों परिवारों का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कहीं सड़क नहीं बनी, कहीं पुल का स्थायी समाधान नहीं हुआ, कहीं पुनर्वास अधूरा रहा और कहीं मुआवजे का सवाल लंबित रहा।

अब श्रद्धांजलि नहीं, सार्वजनिक हिसाब चाहिए

18 वर्ष बाद कोसी को केवल त्रासदी की बरसी पर याद करना पर्याप्त नहीं है। अब पुराने वादों और योजनाओं का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।

सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए—

  • 2008 की त्रासदी के कारणों पर जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या कार्रवाई हुई?

  • कितने अधिकारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हुई?

  • पुनर्वास के लिए कितने घर स्वीकृत हुए और कितने वास्तव में बने?

  • कितने परिवारों को मुआवजा मिला और कितने मामले अभी लंबित हैं?

  • टूटे और जर्जर पुलों की स्थायी मरम्मत के लिए क्या समयबद्ध योजना है?

  • भविष्य की बाढ़ से निपटने के लिए चेतावनी और निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत हुई है?

कोसी के लोगों को फिर केवल आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें योजनाओं की स्थिति, खर्च हुए धन और लंबित काम का सार्वजनिक हिसाब चाहिए।

क्योंकि आपदा का पानी उतर जाता है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी नहीं उतरती।

18 अगस्त 2008 की त्रासदी को 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब समय है कि कोसी के पुराने जख्मों पर सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि ठोस काम दिखाई दे।

कोसी का पानी भले उतर गया हो, लेकिन कोसी के सवाल आज भी ऊंचे हैं।


आलोक कुमार

सोमवार, 17 अगस्त 2026

India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?


क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है?

20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा।

यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है?

लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे

लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक्रिया पर पड़ा।

सबसे चिंताजनक आंकड़ा प्रश्नकाल को लेकर सामने आता है। PRS के अनुसार लोकसभा में प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय का केवल लगभग 1 प्रतिशत ही चल पाया। राज्यसभा में भी प्रश्नकाल करीब 12 प्रतिशत समय तक ही चल सका।

प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और इन सवाल-जवाबों के माध्यम से सरकारी नीतियों और योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

यदि प्रश्नकाल ही लगातार बाधित होता रहे, तो सरकार से जवाब मांगने का यह संवैधानिक-लोकतांत्रिक मंच कमजोर पड़ता है।

राज्यसभा ने अपेक्षाकृत अधिक काम किया, लेकिन तस्वीर फिर भी चिंताजनक

राज्यसभा ने लोकसभा की तुलना में अधिक समय काम किया। उसने करीब 37.4 घंटे काम किया, जो निर्धारित समय का लगभग 33 प्रतिशत था। फिर भी इसका अर्थ है कि निर्धारित समय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाया।

सरकार की ओर से उत्पादकता के अलग आंकड़े भी सामने आए हैं—लोकसभा के लिए करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा के लिए लगभग 39 प्रतिशत। अलग-अलग गणना पद्धतियों के कारण इन आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।

लेकिन आंकड़ा चाहे 15 प्रतिशत हो या 19 प्रतिशत, 33 प्रतिशत हो या 39 प्रतिशत—बड़ी तस्वीर एक ही है: संसद के पास उपलब्ध समय का बहुत बड़ा हिस्सा सार्थक कामकाज में नहीं बदल पाया।

फिर 12 विधेयक कैसे पारित हुए?

यहीं इस सत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

सत्र की शुरुआत में 30 विधेयक लंबित थे। सत्र के दौरान 13 नए विधेयक पेश किए गए और 12 विधेयक पारित हुए। इसके बावजूद सत्र के अंत में 31 विधेयक लंबित रह गए।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—जब संसद के पास बहस के लिए सीमित समय था, तब विधायी काम इतनी तेजी से कैसे हुआ?

यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

कानून बनाना जरूरी है, लेकिन कानून की गुणवत्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संसद में किसी विधेयक पर चर्चा का उद्देश्य केवल सांसदों को बोलने का अवसर देना नहीं होता। चर्चा के दौरान विधेयक की कमियां सामने आती हैं, संभावित प्रभावों पर विचार होता है, संशोधन सुझाए जाते हैं और सरकार को अपने प्रस्ताव का पक्ष स्पष्ट करना पड़ता है।

कानून बनाना और कानून पर बहस करना अलग बातें हैं

संसद कोई ऐसी मशीन नहीं है जहां विधेयक आए और मतदान के बाद कानून बन जाए।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधेयक पर विचार, बहस, संशोधन और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। कई बार विपक्ष की आपत्ति सरकार को किसी प्रावधान को बेहतर बनाने के लिए मजबूर कर सकती है। संसदीय समितियां भी विधेयकों की विस्तृत जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

यदि चर्चा का समय कम हो जाए, तो कानून की कमियां सदन के रिकॉर्ड पर आने की संभावना भी घटती है।

यही कारण है कि किसी विधेयक का पारित हो जाना अपने आप में संसदीय लोकतंत्र की पूरी सफलता नहीं माना जा सकता।

सवाल यह है कि कानून बनने से पहले उस पर कितनी गंभीरता से विचार हुआ?

व्यवधान की राजनीति किसका नुकसान करती है?

संसद में हंगामे को लेकर सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराता है। विपक्ष दूसरी ओर आरोप लगाता है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है।

दोनों पक्षों के अपने राजनीतिक तर्क हो सकते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है—संसद का समय जनता का समय है।

संसद की कार्यवाही बाधित होने का मतलब केवल कुछ घंटे कम काम होना नहीं है। इसका असर प्रश्नकाल, विधायी चर्चा, निजी सदस्य कार्य, शून्यकाल और अन्य संसदीय गतिविधियों पर पड़ता है।

संसद चलाने की लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। यदि प्रति मिनट खर्च का अनुमान लगाया जाए, तो व्यवधान की आर्थिक कीमत भी बड़ी हो सकती है। लेकिन संसद के समय का सबसे बड़ा नुकसान केवल पैसे में नहीं मापा जा सकता।

लोकतंत्र में खोया हुआ बहस का समय वापस नहीं आता।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है

संसद के व्यवधान के लिए केवल विपक्ष को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं है।

सरकार के पास बहुमत है, उसके पास विधायी एजेंडा है और संसदीय कार्य संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करे और विपक्ष को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर दे।

यदि सरकार बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कर सकती है, तब भी लोकतांत्रिक वैधता केवल संख्या से नहीं आती। कानून जितना व्यापक प्रभाव डालता है, उस पर चर्चा की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।

दूसरी ओर विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर विरोध का उद्देश्य संसद को अनिश्चितकाल तक रोकना नहीं होना चाहिए।

सरकार को जवाबदेह बनाना और संसद को निष्क्रिय कर देना—दो अलग-अलग रणनीतियां हैं।

विपक्ष को ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें सरकार से कठिन सवाल भी पूछे जाएं और सदन की कार्यवाही भी चलती रहे।

सबसे बड़ा नुकसान जनता का

संसद में प्रश्नकाल नहीं चलता तो उसका असर आम नागरिक तक पहुंचता है।

किसी क्षेत्र में अस्पताल की समस्या हो, सड़क की स्थिति खराब हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो, किसानों की परेशानी हो, शिक्षा व्यवस्था में कमी हो या किसी सरकारी योजना का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा हो—इन मुद्दों को सांसद संसद में उठाते हैं।

जब सदन नहीं चलता, तो ऐसे सवाल रिकॉर्ड पर आने का अवसर भी कम हो जाता है।

इसी तरह जब किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर पर्याप्त बहस नहीं होती, तो जनता यह समझने का अवसर खो देती है कि कानून में क्या बदलाव किए जा रहे हैं और उनका प्रभाव किस पर पड़ेगा।

संसद में शोर केवल टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला राजनीतिक दृश्य नहीं है। उसके पीछे जनता की आवाज और जनता के सवाल भी दब सकते हैं।

अब जरूरी है संसदीय आत्ममंथन

2026 का मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है।

19 बैठकें। लोकसभा का लगभग 17.5 घंटे काम। राज्यसभा का करीब 37.4 घंटे काम। प्रश्नकाल का बेहद सीमित संचालन और इसके बावजूद 12 विधेयकों का पारित होना।

यह आंकड़े संसद की उत्पादकता से आगे जाकर उसकी कार्यशैली पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विधेयक पर्याप्त चर्चा और संसदीय जांच के बाद आगे बढ़ें। विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध का तरीका लोकतांत्रिक संवाद को पूरी तरह बंद न कर दे। संसद अध्यक्षों और सभापति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है कि सदन में व्यवधान कम हो और सदस्यों को नियमों के भीतर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।

क्योंकि संसद केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। वह केवल विपक्ष की भी नहीं है।

संसद जनता की है।

इसलिए सरकार से कठिन सवाल पूछे जाएं। विपक्ष तीखा विरोध करे। विधेयकों पर व्यापक चर्चा हो। असहमति को जगह मिले। लेकिन अंततः संसद चले।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कानून बनने से पहले जनता के प्रतिनिधियों को उस पर बोलने, सवाल करने, संशोधन सुझाने और सरकार को जवाबदेह बनाने का पर्याप्त अवसर मिले।

अगर विधेयक पास होते रहें, लेकिन बहस का समय लगातार घटता जाए, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—विचार-विमर्श—कमजोर पड़ सकती है।

और संसद की असली ताकत केवल उसके पारित कानूनों की संख्या में नहीं, बल्कि उन कानूनों पर हुई गंभीर बहस में दिखाई देती है।


आलोक कुमार