मध्यम वर्ग की चुप्पी और सिस्टम की जिम्मेदारी: क्या अब भी अनसुनी रहेगी उसकी आवाज़?
भारत का मध्यम वर्ग हमेशा से देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ माना गया है. न वह सड़कों पर उतरकर आंदोलन करता है, न ही सत्ता के गलियारों में अपनी आवाज़ बुलंद करता है. उसकी सबसे बड़ी पहचान है—मेहनत, अनुशासन और धैर्य। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस धैर्य को अब भी चुप्पी समझा जाता रहेगा?
आज का मध्यम वर्ग एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही हैं, लेकिन राहत और सम्मान लगातार कम होते जा रहे हैं। महंगाई, टैक्स का बोझ, शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत—ये सभी मिलकर उसकी कमर तोड़ रहे हैं.
मेहनत करने वाला वर्ग, लेकिन सबसे कम सुना गया
मध्यम वर्ग वह तबका है जो हर महीने ईमानदारी से टैक्स देता है, बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज़ लेता है, बीमा और बचत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है और फिर भी खुद को “सुविधाभोगी” कहे जाने का शिकार बनता है.सरकारी योजनाओं की बात हो या सब्सिडी की—अधिकतर योजनाएँ या तो बेहद गरीब वर्ग के लिए होती हैं या फिर बड़े उद्योगों के लिए.मध्यम वर्ग अक्सर इन दोनों के बीच पिसता हुआ नजर आता है.वह न तो इतनी गरीबी में है कि सीधी सहायता मिले, और न ही इतना संपन्न कि महंगाई से अछूता रह सके.
महंगाई की मार और सीमित आय
पिछले कुछ वर्षों में महंगाई ने मध्यम वर्ग के घरेलू बजट को पूरी तरह बदल दिया है. रसोई गैस, दूध, दाल, सब्ज़ी, स्कूल फीस, ट्रांसपोर्ट और स्वास्थ्य खर्च—सब कुछ महंगा हुआ है, लेकिन वेतन उसी रफ्तार से नहीं बढ़ा. नौकरीपेशा लोगों के लिए वेतन वृद्धि अब अनिश्चित होती जा रही है.निजी क्षेत्र में छंटनी का डर और सरकारी नौकरियों की कमी ने हालात और कठिन बना दिए हैं.
टैक्स देने वाला, लेकिन फैसलों से दूर
लोकतंत्र में मध्यम वर्ग को सबसे जागरूक मतदाता माना जाता है, लेकिन नीतिगत फैसलों में उसकी वास्तविक भागीदारी बेहद सीमित है.वह टैक्स देता है, नियमों का पालन करता है, फिर भी उसकी समस्याएँ अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती हैं.इनकम टैक्स में राहत की माँग वर्षों से उठती रही है, लेकिन महंगाई के अनुपात में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता.
चुप्पी का मतलब सहमति नहीं
मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी मजबूरी उसकी चुप्पी है. वह विरोध नहीं करता, क्योंकि उसे डर है कि सिस्टम से टकराने का मतलब और कठिनाइयाँ हो सकता है.लेकिन चुप रहना सहमत होना नहीं होता—यह जिम्मेदारियों और सीमित विकल्पों का परिणाम है.आज आवश्यकता है कि नीति-निर्माता इस चुप्पी को गंभीर संकेत की तरह समझें.
डिजिटल मीडिया और नई आवाज़
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने मध्यम वर्ग को अपनी बात रखने का नया माध्यम दिया है.ब्लॉग, न्यूज़ पोर्टल और सोशल मीडिया के जरिए अब वह सवाल पूछ रहा है और तथ्यों के साथ अपनी बात रख रहा है.चिंगारी प्राइम न्यूज जैसे मंच इसी जरूरत से जन्म लेते हैं—जहाँ आम आदमी की आवाज़ बिना सनसनी, केवल तथ्य और संतुलन के साथ सामने रखी जा सके.
समाधान की दिशा
मध्यम वर्ग को केवल टैक्स देने वाले वर्ग के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण के साझेदार के रूप में देखना होगा.जरूरी कदम:महंगाई के अनुरूप टैक्स ढाँचे में सुधार,शिक्षा और स्वास्थ्य में वास्तविक राहत,रोजगार और आय सुरक्षा पर ठोस नीति,यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का भी प्रश्न है.
निष्कर्ष
मध्यम वर्ग आज भी सिस्टम के खिलाफ खड़ा नहीं है.वह सड़कों पर नहीं उतरता.वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी मेहनत की क़ीमत समझी जाए और उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए.अगर समय रहते इस वर्ग की आवाज़ नहीं सुनी गई, तो यह चुप्पी गहरे असंतोष में बदल सकती है—और तब सवाल केवल मध्यम वर्ग का नहीं, पूरे सिस्टम की स्थिरता का होगा.
आलोक कुमार
