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शनिवार, 6 जून 2026

Bihar : जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें-----

 गणित की यूनिवर्सिटी, इतिहास की राजनीति और बिहार का शिक्षा संकट: बयान से उठे बड़े सवाल

"जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें, तो उम्मीद होती है कि वे भविष्य का रास्ता दिखाएंगे। लेकिन जब शिक्षा पर दिया गया बयान ही बहस और विवाद का विषय बन जाए, तो सवाल सिर्फ बयान का नहीं, बल्कि सोच और तैयारी का भी बन जाता है।"

बिहार की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के एक बयान को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बिहार में भविष्य में फिजिक्स, मैथमेटिक्स, केमिस्ट्री और आर्किटेक्चर जैसे विषयों के विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएंगे। उनका उद्देश्य शायद बिहार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का था, लेकिन बयान के शब्दों ने राजनीतिक विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया।

सोशल मीडिया पर इस बयान के बाद तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने मुख्यमंत्री की अकादमिक समझ पर सवाल उठाए, जबकि विपक्ष ने इसे बिहार के नेतृत्व की "शिक्षा संबंधी जानकारी की कमी" का उदाहरण बताया। कुछ पोस्टों में तो यहां तक लिखा गया कि "बिहार का दुर्भाग्य है कि यहां मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मूर्ख मंत्री शासन कर रहे हैं।"

हालांकि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन किसी भी राजनीतिक बहस को तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखना अधिक उचित होता है।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि बिहार ज्ञान की भूमि है, लेकिन यहां गणित का विश्वविद्यालय नहीं है। उन्होंने ओडिशा और अहमदाबाद जैसे स्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में भी विशिष्ट विषयों पर आधारित संस्थानों की स्थापना की जाएगी। उनके बयान का मूल उद्देश्य राज्य में उच्च शिक्षा के विस्तार की घोषणा करना था।

लेकिन विपक्षी नेताओं और शिक्षा विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि दुनिया में कहीं भी "फिजिक्स यूनिवर्सिटी" या "केमिस्ट्री यूनिवर्सिटी" जैसी अवधारणा सामान्य रूप से नहीं होती। विश्वविद्यालयों में इन विषयों के विभाग होते हैं, स्वतंत्र विश्वविद्यालय नहीं। इसी तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकांश विश्वविद्यालय बहुविषयक (Multidisciplinary) होते हैं, जिनमें विज्ञान, कला, वाणिज्य और तकनीकी विषयों के अलग-अलग संकाय संचालित होते हैं।

तेजस्वी यादव और आरजेडी के समर्थकों ने भी इस बयान को मुद्दा बनाया। उनका कहना है कि बिहार की वास्तविक समस्या विश्वविद्यालयों की संख्या नहीं, बल्कि मौजूदा संस्थानों की खराब स्थिति है। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं, परीक्षा सत्र नियमित नहीं हैं और शोध गतिविधियां अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं।

दरअसल, विवाद का केंद्र यह नहीं है कि बिहार में नए संस्थान बनने चाहिए या नहीं। लगभग हर व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि राज्य को अधिक गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की आवश्यकता है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या विषयों के नाम पर अलग-अलग विश्वविद्यालय स्थापित करने की अवधारणा व्यावहारिक है और क्या सरकार के पास इसके लिए कोई स्पष्ट खाका मौजूद है।

बिहार ऐतिहासिक रूप से शिक्षा का केंद्र रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया भर के विद्यार्थियों को आकर्षित किया था। आज भी राज्य में बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र हैं, लेकिन उच्च शिक्षा और शोध के बेहतर अवसरों के लिए उन्हें दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेशों का रुख करना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल संस्थानों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता और संसाधनों की भी है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। बिहार में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच हर बयान राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। विपक्ष मुख्यमंत्री के बयान को उनकी योग्यता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, जबकि सत्तापक्ष इसे विकास के विजन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। सोशल मीडिया ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहां तथ्य और व्यंग्य अक्सर एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या जनता केवल शब्दों की गलती पर ध्यान दे या फिर उस बड़े उद्देश्य पर भी विचार करे जिसके तहत नए संस्थानों की बात कही गई है। यदि सरकार वास्तव में विज्ञान, गणित, वास्तुकला और शोध के लिए विशेष केंद्र स्थापित करना चाहती है, तो यह स्वागत योग्य पहल हो सकती है। दुनिया के कई देशों में विशिष्ट शोध संस्थान और केंद्र मौजूद हैं जो किसी खास विषय में विशेषज्ञता विकसित करते हैं। हालांकि उन्हें विश्वविद्यालय कहना या न कहना अलग बहस का विषय हो सकता है।

दूसरी ओर, विपक्ष का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि बिहार को सबसे पहले अपने मौजूदा शिक्षा ढांचे को मजबूत करना चाहिए। अगर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी रहे, शोध के लिए पर्याप्त संसाधन न हों और छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहें, तो नए संस्थानों की घोषणा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह सकती है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। यह बहस किसी एक नेता या दल तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा यह है कि क्या बिहार आने वाले वर्षों में शिक्षा और शोध के क्षेत्र में फिर से अपनी ऐतिहासिक पहचान हासिल कर पाएगा।

अंततः, किसी भी राजनीतिक बयान का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसके पीछे की नीयत और उसके बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। जनता को भी यह देखना होगा कि विवादों और कटाक्षों के बीच शिक्षा सुधार की वास्तविक दिशा क्या है। क्योंकि बिहार को आज सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग बहसों से अधिक जरूरत बेहतर स्कूलों, मजबूत विश्वविद्यालयों, सक्षम शिक्षकों और शोध आधारित शिक्षा व्यवस्था की है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि बयान में कौन-सा शब्द गलत था; वह यह देखेगा कि शिक्षा के क्षेत्र में वास्तव में कितना परिवर्तन हुआ।

आलोक कुमार

India : राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं

            क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? 

क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? क्या अहिंसा के रास्ते पर चलकर सरकारों को नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है? यदि इसका उत्तर खोजना हो, तो एक नाम सामने आता है— पी. वी. राजगोपाल। जिन्हें देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में लोग सम्मानपूर्वक "राजा जी" कहकर संबोधित करते हैं। राजगोपाल पीवी का पूरा नाम राजगोपाल पुथन वीटिल है।उनका जन्म 6 जून 1948 को हुआ है। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हजारों कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और शुभचिंतक उन्हें हार्दिक बधाई दे रहे हैं तथा उनके संघर्षपूर्ण जीवन को याद कर रहे हैं।

राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों लोगों की आशा, संघर्ष और अधिकारों की कहानी है, जिनकी आवाज़ लंबे समय तक सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाई। उन्होंने अपने जीवन को गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा, सत्याग्रह और मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। यही कारण है कि उनका नाम आज "जल, जंगल, जमीन" के संघर्ष का पर्याय बन चुका है।

एकता परिषद के संस्थापक के रूप में राजगोपाल जी ने देश के आदिवासियों, दलितों, भूमिहीन किसानों और वंचित समुदायों को संगठित किया। उन्होंने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि अधिकार मांगने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करने की चीज़ है। उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों ने भारत के सामाजिक इतिहास में नई इबारत लिखी।

साल 2007 में शुरू हुआ जनादेश 2007 इसी संघर्ष की एक ऐतिहासिक कड़ी था। ग्वालियर से दिल्ली तक लगभग 350 किलोमीटर की पदयात्रा में 18 राज्यों से आए करीब 25 हजार आदिवासी और भूमिहीन लोग शामिल हुए। यह केवल एक मार्च नहीं था, बल्कि उन लोगों की पुकार थी जो वर्षों से भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार नीति लागू कराना, भूमि विवादों के त्वरित समाधान की व्यवस्था करना और भूमिहीनों को उनका अधिकार दिलाना था। आंदोलन की ताकत इतनी प्रभावशाली थी कि केंद्र सरकार को राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद के गठन की घोषणा करनी पड़ी और वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का आश्वासन देना पड़ा।

लेकिन जब वादे पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरे, तब राजाजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक बार फिर अहिंसा के मार्ग को चुना और वर्ष 2012 में जन सत्याग्रह 2012 का नेतृत्व किया। इस बार लगभग 50 हजार लोग न्याय की मांग लेकर दिल्ली की ओर बढ़े। यह दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक जन आंदोलनों में से एक माना गया। आंदोलनकारियों के दिल्ली पहुंचने से पहले ही सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने आगरा में प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की और एक ऐतिहासिक 10 सूत्रीय समझौता हुआ। इस समझौते में राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का मसौदा तैयार करने और भूमिहीन परिवारों को आवासीय भूमि उपलब्ध कराने का वादा किया गया।

राजाजी का संघर्ष केवल भूमि अधिकार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह समझा कि जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल आजीविका का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, संस्कृति और अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है। इसी सोच के साथ जन आंदोलन 2016 की शुरुआत हुई। इस अभियान ने औद्योगिक परियोजनाओं और तथाकथित विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन के खिलाफ आवाज़ उठाई। साथ ही महिलाओं को भूमि स्वामित्व का अधिकार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। इस आंदोलन ने भूमि अधिकारों को जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के वैश्विक विमर्श से जोड़ने का कार्य किया।

राजाजी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने संघर्ष को कभी हिंसा का रूप नहीं लेने दिया। उनके आंदोलनों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि गांधीजी के सत्याग्रह की शक्ति आज भी जीवित है। बिना एक पत्थर उठाए, बिना किसी टकराव के, लाखों लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं और व्यवस्था को संवेदनशील बना सकते हैं।

उनके साथ वर्षों तक काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं के लिए राजाजी केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, शिक्षक और प्रेरणास्रोत हैं। पिछले 25 वर्षों से उनके साथ जुड़े लोगों का मानना है कि उन्होंने उन्हें केवल आंदोलन करना नहीं सिखाया, बल्कि इंसानियत, करुणा और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीना भी सिखाया।

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए एक कार्यकर्ता की भावनाएं कुछ इस प्रकार हैं— "पिछले 25 वर्षों से मुझे आपके उस प्रेरणादायक सफर का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है जो गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा और मानवता की सेवा पर आधारित है। भूमि अधिकारों के आंदोलन के माध्यम से न्याय, समानता और वंचितों के सशक्तिकरण के प्रति आपका समर्पण हम सबके लिए प्रेरणा रहा है। इस विशेष दिन पर मैं आपके उत्तम स्वास्थ्य, शांति और आपके महान मिशन को आगे बढ़ाने की शक्ति की कामना करता हूं। आने वाली पीढ़ियों के लिए आपका जीवन आशा, संघर्ष और एकता की मिसाल बना रहे।"

आज जब पूरा देश विकास, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है, तब राजाजी का जीवन हमें याद दिलाता है कि असली विकास वही है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज़ सुनी जाए। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि सम्मान, पहचान और जीवन का आधार होती है।

राजाजी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। उनका जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को न्याय, अहिंसा और मानवाधिकारों के लिए निरंतर प्रेरित करता रहे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है

                         जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है। यह केवल जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और जीवन के बुनियादी अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। दशकों से हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। वे सरकारी जमीन, परती भूमि, सड़क किनारे या दूसरों की जमीन पर अस्थायी आशियाना बनाकर जीवन गुजारने को मजबूर हैं। ऐसे लोगों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर जन संगठन एकता परिषद लंबे समय से संघर्ष करता रहा है। जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसी कड़ी में एकता परिषद बिहार के कार्यकर्ताओं ने राज्य के सभी 38 जिलों में आवासीय भूमिहीन परिवारों का सर्वेक्षण कराया। सर्वे के आधार पर हजारों परिवारों की सूची तैयार कर संबंधित प्रखंडों के अंचल कार्यालयों में आवेदन जमा किए गए। संगठन का दावा है कि इन आवेदनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और अधिकांश मामलों में भूमिहीन परिवार आज भी सरकारी सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हाल के दिनों में इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा पैदा कर दी है। राज्य के नए भू-सुधार एवं राजस्व मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने पदभार संभालने के बाद भूमिहीनों से जुड़े मामलों की समीक्षा की है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अंचल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गलत जानकारी सरकार तक न पहुंचे। साथ ही अंचल अधिकारियों को यह भी स्पष्ट रूप से बताने को कहा गया है कि उनके क्षेत्र में कोई आवासीय भूमिहीन परिवार बचा है या नहीं।

सरकार की दृष्टि से देखें तो यह निर्देश पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास माना जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र में वास्तव में भूमिहीन परिवार हैं तो उनकी पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। वहीं यदि गलत आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं तो इससे नीति निर्माण प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार जमीनी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहती है।

लेकिन एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता विजय गोरैया इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका आरोप है कि यह आदेश आवासीय भूमिहीनों के खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकता है। उनका कहना है कि जब पहले से ही संगठन द्वारा व्यापक सर्वेक्षण कर भूमिहीन परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी जा चुकी है, तब यह कहना कि किसी अंचल में एक भी भूमिहीन नहीं है, वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे पहले दिए गए आवेदनों और सर्वेक्षण रिपोर्टों को फिर से अंचल अधिकारियों तथा मंत्री तक पहुंचाएं और अपने क्षेत्रों के भूमिहीन परिवारों की अद्यतन जानकारी लिखित रूप में भेजें।

बिहार में आवासीय भूमिहीनों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की प्रतीक्षा सूची में लगभग 20 हजार से अधिक ऐसे परिवार चिन्हित किए गए हैं जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है। हालांकि सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी सर्वेक्षणों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कई परिवार ऐसे हैं जो विभिन्न कारणों से सरकारी सूची में शामिल नहीं हो पाते और योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। मुख्यमंत्री वास स्थल क्रय सहायता योजना उनमें प्रमुख है। इस योजना के तहत भूमिहीन और वास-स्थल विहीन परिवारों को जमीन खरीदने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। पहले यह सहायता राशि 60 हजार रुपये थी, जिसे बढ़ाकर अब एक लाख रुपये प्रति लाभार्थी कर दिया गया है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में सरकारी भूमि उपलब्ध है, वहां राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा भूमि बंदोबस्ती और पर्चा वितरण की प्रक्रिया भी चलाई जाती है।

फिर भी सवाल यह है कि यदि योजनाएं मौजूद हैं तो हजारों परिवार आज भी भूमि और आवास से वंचित क्यों हैं?इसका उत्तर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, जमीन की उपलब्धता, सर्वेक्षण की खामियों और स्थानीय स्तर पर होने वाली देरी में छिपा हुआ है। कई बार पात्र परिवारों का नाम सूची में नहीं जुड़ पाता, तो कई बार कागजी प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि लोग वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं।

आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वास्तविक समाधान खोजने की है। सरकार, प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी परिवार केवल इसलिए बेघर न रहे क्योंकि उसका नाम किसी सूची में नहीं है या उसका आवेदन किसी कार्यालय की फाइलों में दबा पड़ा है।

भूमिहीनों का सवाल केवल एक सरकारी योजना का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। यदि बिहार को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो हर परिवार को रहने के लिए सुरक्षित जमीन और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना होगा। यही किसी भी कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी पहचान होती है।

आलोक कुमार

शुक्रवार, 5 जून 2026

Bihar : मेरा भारत, ग्रीन भारत

 मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण के युवा सहभागिता विषय पर संत लौरेंस स्कूल चुहड़ी में भव्य कार्यक्रम आयोजित


बेतिया।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर माय भारत (My Bharat) के तत्वावधान में संत लौरेंस स्कूल, चुहड़ी में "मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण हेतु युवा सहभागिता" विषय पर एक व्यापक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं युवाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता तथा प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिला युवा अधिकारी, माय भारत, पश्चिम चम्पारण श्री शशांक मित्तल, यूथ आइकन बिहार श्री आदित्य कुमार मधुकर तथा विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसके पश्चात विद्यालय परिवार की ओर से अतिथियों का बुके एवं अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। छात्राओं द्वारा प्रस्तुत स्वागत गान ने कार्यक्रम के वातावरण को और भी गरिमामय बना दिया।

अपने संबोधन में जिला युवा अधिकारी श्री शशांक मित्तल ने पर्यावरण संरक्षण को मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को जीवन का अधिकार प्राप्त है और स्वच्छ, स्वस्थ तथा सुरक्षित पर्यावरण इस अधिकार का अभिन्न अंग है। उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं उपस्थित लोगों को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई तथा प्रकृति के संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विद्यालय परिसर में विभिन्न रचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक गतिविधियों का आयोजन किया गया। इनमें शपथ ग्रहण समारोह, चित्रांकन प्रतियोगिता, पेंटिंग प्रतियोगिता, भाषण प्रतियोगिता तथा "एक छात्र – एक पौधा" अभियान प्रमुख रहे। इन कार्यक्रमों में विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता एवं प्रतिबद्धता का परिचय दिया। 


मुख्य अतिथि श्री शशांक मित्तल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे, तो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से पौधारोपण को एक अभियान के रूप में अपनाने का आह्वान किया।

विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह ने अपने प्रेरणादायक संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण मानव जीवन गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। बढ़ता तापमान, जल संकट तथा पर्यावरणीय असंतुलन आने वाली पीढ़ियों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यदि आज हम प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इसलिए प्रत्येक छात्र-छात्रा को एक पौधा लगाकर उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करने का संकल्प लेना चाहिए।

कार्यक्रम में उपस्थित यूथ आइकन बिहार श्री आदित्य कुमार मधुकर ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज का युवा केवल अपने करियर तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि युवाओं की ऊर्जा और सकारात्मक सोच बड़े से बड़े परिवर्तन का आधार बन सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों से पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण तथा प्लास्टिक मुक्त समाज के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि "पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ" केवल एक नारा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प है।

भाषण प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने "मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण हेतु युवा सहभागिता" विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा युवाओं की भूमिका पर प्रभावशाली वक्तव्य दिए। वहीं चित्रकला एवं पेंटिंग प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए पर्यावरण संरक्षण, हरित भारत और स्वच्छ पृथ्वी जैसे विषयों पर आकर्षक चित्र एवं पोस्टर तैयार किए।

अतिथियों ने विद्यार्थियों द्वारा तैयार चित्रकला, पोस्टर एवं पेंटिंग प्रदर्शनी का अवलोकन किया और उनकी रचनात्मकता की सराहना की। प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया गया। पेंटिंग प्रतियोगिता में अर्जुन कुमार, शालू कुमारी, आदेश कुमार, सत्यम कुमार तथा शिवानी कुमारी विजेता घोषित किए गए। वहीं भाषण प्रतियोगिता में शाहिल कुमार, सिद्धार्थ कुमार एवं समीर गुप्ता ने उत्कृष्ट प्रस्तुति देकर पुरस्कार प्राप्त किया। सभी विजेताओं को जिला युवा अधिकारी श्री शशांक मित्तल द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय के लगभग सौ विद्यार्थियों के बीच पौधों का वितरण किया गया, ताकि वे अपने घरों एवं आसपास के क्षेत्रों में पौधारोपण कर सकें। इसके बाद सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने संयुक्त रूप से पौधारोपण किया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षक श्री आकाश सेंसिल ने किया। वहीं सुश्री प्रियंका कुमारी, सुश्री सोनाली राजेश सहित विद्यालय के अन्य शिक्षकों ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा कहा कि पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश केवल विद्यालय तक सीमित न रहकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता, जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी का प्रेरक अभियान सिद्ध हुआ। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि यदि युवा वर्ग पर्यावरण संरक्षण के लिए संकल्पित हो जाए, तो एक हरित, स्वच्छ और सुरक्षित भारत का सपना अवश्य साकार हो सकता है।

आलोक कुमार

World : खिलाड़ी से विश्वविजेता कोच बनने तक का सफर

 एंडी फ्लावर : खिलाड़ी से विश्वविजेता कोच बनने तक का सफर

क्रिकेट के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो खिलाड़ी के रूप में जितने सफल होते हैं, उससे कहीं अधिक ऊंचाई वे कोच के रूप में प्राप्त करते हैं। जिम्बाब्वे के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर-बल्लेबाज Andy Flower उन्हीं चुनिंदा महान हस्तियों में शामिल हैं। क्रिकेट जगत में आज उनकी पहचान केवल एक शानदार बल्लेबाज या कप्तान की नहीं, बल्कि ऐसे कोच की है जिसने अनेक टीमों को सफलता की राह दिखाई और कई प्रतिष्ठित ट्रॉफियां जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एंडी फ्लावर का जन्म 28 अप्रैल 1968 को जिम्बाब्वे में हुआ था। खिलाड़ी के रूप में उन्होंने जिम्बाब्वे क्रिकेट को नई पहचान दिलाई। अपनी तकनीकी दक्षता, धैर्य और नेतृत्व क्षमता के कारण वे लंबे समय तक जिम्बाब्वे टीम की रीढ़ बने रहे। उस दौर में जब जिम्बाब्वे जैसी छोटी टीम विश्व क्रिकेट में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब फ्लावर ने बल्ले और कप्तानी दोनों से टीम को मजबूती प्रदान की।

हालांकि, क्रिकेट प्रेमियों के बीच उनकी वास्तविक लोकप्रियता तब और बढ़ी जब उन्होंने कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2007 में वे इंग्लैंड क्रिकेट टीम के साथ जुड़े और धीरे-धीरे मुख्य कोच के पद तक पहुंचे। उनकी कोचिंग में इंग्लैंड ने वह उपलब्धियां हासिल कीं जिनकी कल्पना भी लंबे समय तक नहीं की गई थी। वर्ष 2010 में इंग्लैंड ने टी-20 विश्व कप जीतकर इतिहास रचा। यह इंग्लैंड के क्रिकेट इतिहास का पहला आईसीसी सीमित ओवरों का विश्व खिताब था। इस जीत ने एंडी फ्लावर को विश्व क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली कोचों की सूची में स्थापित कर दिया।

इंग्लैंड की सफलता यहीं नहीं रुकी। उनकी कोचिंग में टीम ने 2009, 2010-11 और 2013 की प्रतिष्ठित एशेज श्रृंखलाएं जीतीं। विशेष रूप से 2010-11 में ऑस्ट्रेलिया की धरती पर मिली एशेज विजय को क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। इसके साथ ही इंग्लैंड पहली बार टेस्ट क्रिकेट में विश्व की नंबर-1 टीम बनी। यह उपलब्धि किसी भी कोच के लिए गौरव की बात होती है।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सफलता के बाद एंडी फ्लावर ने दुनिया भर की फ्रेंचाइजी लीगों में अपनी कोचिंग क्षमता का लोहा मनवाया। आधुनिक क्रिकेट में टी-20 लीगों का महत्व तेजी से बढ़ा है और इन लीगों में जीत हासिल करना आसान नहीं माना जाता। अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों को एकजुट कर विजेता टीम बनाना किसी भी कोच के लिए बड़ी चुनौती होती है। फ्लावर ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया।

वर्ष 2021 में उन्होंने पाकिस्तान सुपर लीग में मुल्तान सुल्तांस को उसका पहला खिताब दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कप्तान मोहम्मद रिजवान और कोच एंडी फ्लावर की जोड़ी ने टीम को नई दिशा दी। इसके बाद वर्ष 2022 में इंग्लैंड की द हंड्रेड प्रतियोगिता में ट्रेंट रॉकेट्स को चैंपियन बनाया। यह साबित करता है कि वे केवल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट ही नहीं, बल्कि नए प्रारूपों में भी समान रूप से सफल हैं।

साल 2023 में संयुक्त अरब अमीरात की इंटरनेशनल लीग टी-20 के उद्घाटन संस्करण में गल्फ जायंट्स ने खिताब जीता। इस सफलता के पीछे भी एंडी फ्लावर का रणनीतिक कौशल देखने को मिला। उद्घाटन सीजन में किसी टीम को चैंपियन बनाना विशेष उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि सभी टीमें लगभग समान स्तर से शुरुआत करती हैं।

वर्ष 2024 में कैरेबियन प्रीमियर लीग में सेंट लूसिया किंग्स ने अपना पहला खिताब जीता। लंबे समय से सफलता की प्रतीक्षा कर रही इस टीम को एंडी फ्लावर ने विजेता बनाया। इस उपलब्धि ने उनके करियर में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों में विभिन्न परिस्थितियों और संस्कृतियों के बीच सफलता प्राप्त करना उनकी असाधारण कोचिंग क्षमता का प्रमाण है।

भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए भी एंडी फ्लावर कोई अपरिचित नाम नहीं हैं। इंडियन प्रीमियर लीग में उन्होंने लखनऊ सुपर जायंट्स को लगातार प्लेऑफ तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के मुख्य कोच बने। खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को बढ़ाना, दबाव की स्थिति में सही निर्णय लेना और डेटा आधारित रणनीति बनाना उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

एंडी फ्लावर की सफलता का रहस्य केवल तकनीकी ज्ञान नहीं है। वे खिलाड़ियों के मनोविज्ञान को समझने में भी माहिर हैं। आधुनिक क्रिकेट में केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि मानसिक मजबूती भी उतनी ही आवश्यक होती है। फ्लावर खिलाड़ियों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर संवाद स्थापित करते हैं और उनकी क्षमताओं को निखारने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि उनके साथ काम करने वाले कई खिलाड़ी अपने करियर के सर्वश्रेष्ठ दौर से गुजरे हैं।

आज क्रिकेट जगत में एंडी फ्लावर को एक ऐसे कोच के रूप में देखा जाता है जो किसी भी टीम की सोच और संस्कृति को बदल सकता है। जिम्बाब्वे का यह पूर्व कप्तान इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, अनुभव और नेतृत्व क्षमता के बल पर कोई व्यक्ति खिलाड़ी से कहीं अधिक सफल कोच बन सकता है। उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और यह साबित करती हैं कि महान कोच वही होता है जो खिलाड़ियों के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें विजेता बनने की राह दिखाए।

आलोक कुमार

Bihar : पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को नई ऊर्जा

             "इस एक फैसले ने पूरे सिस्टम में हलचल मचा दी है..."


कटिहार जिले के समेली प्रखंड में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर युवाओं ने ऐसा संकल्प लिया, जिसने पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को नई ऊर्जा दे दी। सैकड़ों पौधे लगाने और उनकी देखभाल का प्रण लेकर युवाओं ने यह संदेश दिया कि प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की है। मेरा युवा भारत (युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार) तथा यूथ पावर स्वयंसेवी संगठन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने क्षेत्र में पर्यावरण जागरूकता का नया अध्याय लिख दिया।

नेहरू सेवा सदन पुस्तकालय, भरेली के प्रांगण में आयोजित कार्यक्रम में युवाओं, स्वयंसेवकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली। कार्यक्रम का आयोजन मेरा युवा भारत, कटिहार के जिला युवा अधिकारी नीरज कुमार झा के दिशा-निर्देश में किया गया, जबकि इसकी अध्यक्षता यूथ पावर संगठन के अध्यक्ष हरि प्रसाद मंडल ने की।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, मलहरिया सेवा केंद्र की संचालिका वीके प्रभा दीदी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने कहा कि “मेरी धरती, मेरा दायित्व” केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन का मूल मंत्र होना चाहिए। बढ़ता प्रदूषण, घटते वन क्षेत्र और बदलते मौसम का चक्र इस बात का संकेत है कि यदि अब भी हम नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण जागरूकता रैली भी निकाली गई, जिसका नेतृत्व माय भारत स्वयंसेविका कृति भारती तथा कुर्सेला के स्वयंसेवक अजीत कुमार ने किया। रैली में युवाओं ने “सांसे हो रही कम, आओ पेड़ लगाएं हम”, “पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ”, “जल बचाओ, जीवन बचाओ”, “प्लास्टिक को ना कहें, धरती को हां कहें” और “धरती का श्रृंगार, पेड़-पौधे और हरियाली अपार” जैसे नारों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया।

रैली के दौरान ग्रामीणों को पौधारोपण, जल संरक्षण और प्लास्टिक प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी दी गई। युवाओं ने लोगों से अपील की कि वे केवल पौधे लगाकर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी न समझें, बल्कि उनकी नियमित देखभाल भी सुनिश्चित करें ताकि वे भविष्य में विशाल वृक्ष बनकर पर्यावरण को संतुलित रखने में योगदान दे सकें।

कार्यक्रम में उप मुखिया चंदन कुमार, सुमित कुमार, लक्ष्मी कुमारी, निशू कुमारी, वीके अमन, छोटू कुमार, विजय कुमार, नीरज कुमार पासवान, दिवाकर कुमार राय, अभिनव कुमार, शिवेंद्र कुमार और बंटी कुमार सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाने पर जोर दिया और अधिक से अधिक पौधे लगाने का आह्वान किया।

इस अवसर पर महोगनी, पॉपलर, शीशम, कटहल, जामुन, कदम, सखुआ, बरगद, नीम, आम और लीची जैसे सैकड़ों पौधे लगाने का संकल्प लिया गया। इन वृक्षों से न केवल हरियाली बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराने में भी मदद मिलेगी।

विश्व पर्यावरण दिवस पर लिया गया यह संकल्प केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संदेश देकर गया कि जब युवा जागरूक होकर आगे बढ़ते हैं तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नई शुरुआत होती है। समेली के युवाओं का यह अभियान आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा।

आलोक कुमार

India : परंपरा, सम्मान और बदलता समय

            "जो खबर आपको टीवी पर नहीं दिखाई गई, उसका पूरा सच अब सामने आ चुका है..."


भारत
की विविध सांस्कृतिक परंपराओं में आदिवासी समाज की रीति-रिवाज एक अलग ही आत्मा लिए हुए हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल और झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में प्रचलित मेहमानों के पैर धोकर स्वागत करने की परंपरा इसी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का उदाहरण है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें अतिथि को देवतुल्य माना जाता है।

सदियों से आदिवासी समुदाय अपने मेहमानों का स्वागत विनम्रता और सम्मान के साथ करते आए हैं। किसी अतिथि के घर आने पर उसके पैर धोना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि वह व्यक्ति उनके लिए आदरणीय है। यह परंपरा समाज में आपसी विश्वास, प्रेम और आत्मीयता को मजबूत करती रही है। ग्रामीण जीवन में यह सम्मान का सर्वोच्च रूप माना जाता था।

हाल के दिनों में जब कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का इसी तरह स्वागत किया गया, तो इस पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसे आदिवासी संस्कृति और परंपरा का सम्मान बताया, जबकि कुछ ने बदलते सामाजिक परिवेश में ऐसी प्रथाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए। बहस का केंद्र यह रहा कि क्या आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति के पैर धोकर सम्मान व्यक्त करना उचित है, या सम्मान के अन्य तरीके अपनाए जाने चाहिए।

इस विषय को समझने के लिए परंपरा और वर्तमान समय दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। किसी भी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान उसके रीति-रिवाजों में बसती है। इन्हें केवल बाहरी नजरिए से देखकर आंकना उचित नहीं होगा। वहीं दूसरी ओर, समय के साथ समाज में समानता, गरिमा और सहभागिता के नए विचार भी विकसित हुए हैं। ऐसे में कई परंपराएं नए रूप में सामने आ रही हैं, ताकि उनकी मूल भावना बनी रहे और बदलते दौर की संवेदनशीलताओं का भी सम्मान हो।                                                    

असल प्रश्न यह नहीं है कि परंपरा सही है या गलत। महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी परंपरा का निर्वहन स्वेच्छा, सम्मान और सांस्कृतिक समझ के साथ हो। यदि किसी समुदाय के लोग अपनी परंपरा को गर्व के साथ निभाते हैं, तो उसका सम्मान होना चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि किसी प्रकार का सामाजिक दबाव या असमानता उसमें न झलके।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। आदिवासी समाज की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से व्यक्त होता है। बदलते समय में आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं की आत्मा को समझें, उनका सम्मान करें और उन्हें ऐसे रूप में आगे बढ़ाएं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सके।

आलोक कुमार