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सोमवार, 31 अगस्त 2026

Bihar : गांव की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसान है?

 


गांव की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसान है? अस्पताल पास होने के बावजूद इलाज क्यों दूर है?


गांव की महिला के लिए अस्पताल की दूरी सिर्फ किलोमीटर में नहीं मापी जाती। असली दूरी तब सामने आती है, जब उसे इलाज के लिए किसी के साथ की जरूरत पड़े, आने-जाने का पैसा जुटाना पड़े, महिला डॉक्टर का इंतजार करना पड़े और अपनी निजी बीमारी बताने में संकोच करना पड़े। सवाल यह है कि स्वास्थ्य केंद्र गांव के पास पहुंचा है, लेकिन क्या स्वास्थ्य सुविधा भी गांव की महिला तक सचमुच पहुंची है?

पटना। ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या से तय नहीं होता। सरकार की योजनाएं गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का प्रयास करती हैं, लेकिन किसी महिला के लिए इलाज वास्तव में कितना आसान है, यह उसके रोजमर्रा के अनुभव से समझा जा सकता है।

घर से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना, परिवार से समय निकालना, आने-जाने का खर्च जुटाना, डॉक्टर से अपनी समस्या खुलकर बताना, जांच करवाना और दवा मिलने तक की पूरी प्रक्रिया उसके लिए कितनी सहज है—यही स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा है।

ग्रामीण परिवारों में महिलाएं अक्सर पति, बच्चों, बुजुर्गों और घर के दूसरे सदस्यों की देखभाल को प्राथमिकता देती हैं। खेत-मजदूरी या घरेलू काम की जिम्मेदारी भी उनके हिस्से में होती है। ऐसे में अपनी बीमारी के लिए समय निकालना कई बार सबसे कठिन काम बन जाता है।

अस्पताल पास है, फिर भी इलाज दूर क्यों?

किसी गांव से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कुछ किलोमीटर की दूरी पर हो सकता है। लेकिन क्या हर महिला अकेले वहां जा सकती है?

कई ग्रामीण महिलाओं को अस्पताल जाने के लिए पति, भाई, बेटे या किसी अन्य परिवार के सदस्य पर निर्भर रहना पड़ सकता है। सार्वजनिक परिवहन नियमित नहीं हो तो निजी वाहन या ऑटो का खर्च अलग चिंता बन जाता है।

गर्भवती महिला, बुजुर्ग महिला या गंभीर बीमारी से परेशान महिला के लिए यह परेशानी और बढ़ जाती है।

बरसात में खराब सड़क, जलजमाव और परिवहन की समस्या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच को और कठिन बना सकती है।

इसलिए स्वास्थ्य सुविधा की उपलब्धता को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि गांव के आसपास कोई स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है। असली सवाल यह है कि जरूरत पड़ने पर महिला वहां कितनी आसानी और कितने खर्च में पहुंच सकती है।

अपनी बीमारी बताना भी कई बार चुनौती

महिलाओं की कई स्वास्थ्य समस्याएं निजी और संवेदनशील होती हैं। मासिक धर्म, प्रजनन स्वास्थ्य, गर्भावस्था, प्रसव के बाद की समस्या या शरीर से जुड़ी दूसरी परेशानियों पर बात करते समय उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल चाहिए।

यदि महिला को लगे कि उसकी बात ध्यान से नहीं सुनी जाएगी या उसकी गोपनीयता नहीं रहेगी, तो वह अपनी समस्या पूरी तरह बताने से बच सकती है।

यही कारण है कि महिला डॉक्टर और प्रशिक्षित महिला स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

लेकिन केवल महिला डॉक्टर की मौजूदगी ही पर्याप्त नहीं है। परामर्श के लिए सुरक्षित जगह, जांच के दौरान गोपनीयता और स्वास्थ्यकर्मियों का संवेदनशील व्यवहार भी उतना ही जरूरी है।

बीमारी को टालना कब भारी पड़ जाता है?

ग्रामीण महिलाओं में अपनी बीमारी को लंबे समय तक नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं।

किसी महिला को लगता है कि बीमारी मामूली है। कोई सोचती है कि पहले घर का काम पूरा हो जाए। किसी को इलाज के खर्च की चिंता होती है। किसी के पास अस्पताल जाने के लिए साथ चलने वाला व्यक्ति नहीं होता।

लेकिन स्वास्थ्य समस्या को लगातार टालने से स्थिति गंभीर हो सकती है।

खून की कमी, पोषण संबंधी समस्याएं, मासिक धर्म से जुड़ी परेशानियां, गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं और प्रसव के बाद की समस्याएं समय पर जांच और उपचार की मांग करती हैं।

इसलिए स्वास्थ्य जागरूकता का अर्थ केवल बीमारी के बारे में जानकारी देना नहीं है। महिलाओं को यह भरोसा भी देना होगा कि अपनी बीमारी के लिए समय पर इलाज लेना जरूरी है और इसके लिए उन्हें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।

गर्भवती महिलाओं के लिए व्यवस्था की असली परीक्षा

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण पैमाना गर्भवती महिलाओं की देखभाल भी है।

गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच, आवश्यक परीक्षण, पोषण संबंधी सलाह, दवाएं और प्रसव के समय सुरक्षित स्वास्थ्य सुविधा जरूरी होती है।

लेकिन यदि किसी महिला को हर जांच के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़े, कई घंटे इंतजार करना पड़े या आने-जाने के लिए बार-बार पैसे जुटाने पड़ें, तो कागज पर उपलब्ध सुविधा व्यवहार में कठिन बन सकती है।

सरकारी योजना की सफलता तब मानी जानी चाहिए जब उसका लाभ महिला तक समय पर पहुंचे—सिर्फ तब नहीं जब योजना का रिकॉर्ड किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज हो।

आशा कार्यकर्ता गांव और अस्पताल के बीच महत्वपूर्ण कड़ी

गांवों में आशा कार्यकर्ता और दूसरे सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वे गर्भवती महिलाओं की पहचान, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित करने और स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क कराने में मदद कर सकती हैं।

लेकिन उनसे अपेक्षा तभी प्रभावी परिणाम दे सकती है जब उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन, सहयोग और काम करने के लिए जरूरी समय मिले।

स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अस्पताल की चारदीवारी में देखने के बजाय गांव के स्तर से मजबूत करना होगा।

जांच और दवा नहीं मिली तो सुविधा अधूरी

मान लीजिए कोई महिला किसी स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच गई। डॉक्टर ने जांच लिख दी, लेकिन जांच की सुविधा वहां उपलब्ध नहीं है। उसे दूसरे अस्पताल भेज दिया गया।

वहां पहुंचने के लिए फिर पैसा, समय और साथ जाने वाले व्यक्ति की जरूरत होगी।

इसी तरह डॉक्टर ने दवा लिख दी, लेकिन सरकारी केंद्र पर दवा उपलब्ध नहीं है तो महिला को निजी दुकान से खरीदनी पड़ सकती है।

गरीब परिवार के लिए यह अतिरिक्त खर्च इलाज में देरी का कारण बन सकता है।

इसलिए स्वास्थ्य सुविधा का मतलब केवल डॉक्टर की उपलब्धता नहीं है। डॉक्टर, जांच, दवा और रेफरल—इन चारों के बीच तालमेल जरूरी है।

सम्मानजनक व्यवहार भी इलाज का हिस्सा

किसी महिला के अस्पताल जाने का अनुभव वहां के व्यवहार से भी तय होता है।

यदि उसकी समस्या को गंभीरता से सुना जाए, उसे प्रक्रिया समझाई जाए और उसके साथ सम्मान से व्यवहार किया जाए तो उसका स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा बढ़ता है।

इसके उलट यदि उसे डांट मिले, उसकी बात बीच में रोक दी जाए या उसकी निजी समस्या को सार्वजनिक तरीके से पूछा जाए, तो वह अगली बार अस्पताल जाने से बच सकती है।

इसलिए स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल दवा और उपकरणों से नहीं, बल्कि व्यवहार और सम्मान से भी होना चाहिए।

सिर्फ भवन बनाने से आसान नहीं होगा इलाज

ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा को वास्तव में आसान बनाने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।

स्वास्थ्य केंद्र तक बेहतर सड़क और परिवहन, पर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी, महिला डॉक्टर या प्रशिक्षित महिला स्वास्थ्यकर्मी, जरूरी दवाओं और जांच की उपलब्धता, स्वच्छ शौचालय, सुरक्षित प्रतीक्षालय और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था—इन सभी को एक साथ मजबूत करना जरूरी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योजनाओं की सफलता केवल आंकड़ों से नहीं, महिलाओं के अनुभव से मापी जाए।

क्या महिला समय पर डॉक्टर तक पहुंच पाई?

क्या उसकी जांच हुई?

क्या उसे आवश्यक दवा मिली?

क्या उसकी बात गोपनीयता और सम्मान के साथ सुनी गई?

क्या उसे इलाज के अगले चरण की जानकारी मिली?

और क्या पैसे, दूरी या परिवार की परिस्थितियों के कारण उसका इलाज बीच में नहीं छूटा?

इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि गांव की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा वास्तव में कितनी आसान है।

ग्रामीण महिला का स्वास्थ्य केवल उसका निजी मामला नहीं है। उसका स्वास्थ्य पूरे परिवार और समुदाय के स्वास्थ्य से जुड़ा है।

इसलिए लक्ष्य सिर्फ गांव के पास अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र बनाना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें महिला बीमारी छिपाने के बजाय समय पर बताए, इलाज टालने के बजाय स्वास्थ्य केंद्र जाए और अस्पताल पहुंचने के बाद उसे किसी अतिरिक्त सामाजिक या आर्थिक बाधा का सामना न करना पड़े।

आखिर स्वास्थ्य सुविधा की असली दूरी अस्पताल से गांव तक नहीं, बल्कि जरूरतमंद महिला से इलाज मिलने तक की दूरी है। यही दूरी कम करना ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।






आलोक कुमार

Bihar: सरकारी अस्पतालों में मरीज और व्यवस्था के बीच की दूरी


सरकारी अस्पतालों में मरीज और व्यवस्था के बीच की दूरी: इलाज से पहले क्यों शुरू हो जाती है मरीज की परीक्षा?


सरकारी अस्पताल में मरीज बीमारी लेकर पहुंचता है, लेकिन कई बार इलाज शुरू होने से पहले ही उसे कतार, पंजीकरण, जांच, दवा और जानकारी की ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ता है कि सवाल उठता है—क्या अस्पताल की व्यवस्था मरीज को राहत देने के लिए बनी है या मरीज को व्यवस्था के मुताबिक ढलने के लिए?

पटना। बिहार में सरकारी अस्पतालों का ढांचा लगातार विस्तार की बात करता है। नए भवन, आधुनिक उपकरण, मुफ्त या कम लागत वाली दवाएं, जांच की सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन किसी अस्पताल की असली तस्वीर उसके भवन या मशीनों से नहीं, बल्कि उस मरीज से समझी जा सकती है जो इलाज की उम्मीद लेकर वहां पहुंचता है।

पंजीकरण काउंटर से लेकर ओपीडी की कतार, जांच केंद्र से दवा वितरण केंद्र और डॉक्टर के कमरे के बाहर इंतजार तक—यही वे जगहें हैं जहां मरीज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच की वास्तविक दूरी दिखाई देती है।

अस्पताल गरीब परिवारों का सबसे बड़ा सहारा

सरकारी अस्पतालों पर सबसे अधिक निर्भरता गरीब और निम्न-मध्यम आय वर्ग के परिवारों की होती है। निजी अस्पतालों की फीस, जांच का खर्च, दवाओं की कीमत और भर्ती का खर्च हर परिवार के बजट में नहीं आता।

इसलिए सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाला व्यक्ति केवल इलाज नहीं चाहता। वह चाहता है कि उसे समय पर डॉक्टर मिले, जरूरी जांच हो, दवा मिले और उसकी बीमारी को गंभीरता से समझा जाए।

समस्या तब पैदा होती है जब मरीज अस्पताल में पहुंच तो जाता है, लेकिन इलाज की प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाती है कि बीमारी के साथ-साथ उसे व्यवस्था की परेशानी भी झेलनी पड़ती है।

अस्पताल पहुंचना ही पहली चुनौती

बिहार के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवा की पहली समस्या कई बार अस्पताल की दूरी होती है। गांव से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या बड़े अस्पताल तक पहुंचने में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं।

गंभीर मरीज के लिए यह समस्या और बड़ी हो जाती है। एंबुलेंस जैसी सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद हर जरूरतमंद व्यक्ति तक उनकी पहुंच कितनी आसान है, यह सवाल जमीन पर जाकर ही समझा जा सकता है।

अस्पताल पहुंचने के बाद भी मरीज की परीक्षा खत्म नहीं होती। पंजीकरण, ओपीडी, डॉक्टर से परामर्श, जांच, रिपोर्ट और फिर रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास लौटना—एक सामान्य इलाज की प्रक्रिया कई बार घंटों या कई चरणों में बदल जाती है।

बुजुर्ग, गर्भवती महिला, दिव्यांग और गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह इंतजार विशेष रूप से कठिन होता है।

कतार सिर्फ समय नहीं लेती, भरोसा भी कम करती है

सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ इस बात का संकेत भी है कि लोग इन सेवाओं पर भरोसा करते हैं और बड़ी संख्या में उनका उपयोग कर रहे हैं। लेकिन यही भीड़ अस्पताल की क्षमता पर दबाव डालती है।

एक डॉक्टर के सामने यदि लगातार मरीजों की लंबी कतार हो तो प्रत्येक मरीज को पर्याप्त समय देना मुश्किल हो जाता है। मरीज चाहता है कि डॉक्टर उसकी पूरी बात सुने, पुराने इलाज के बारे में पूछे और जांच रिपोर्ट को समझाए।

दूसरी ओर डॉक्टर पर भी बड़ी संख्या में मरीज देखने का दबाव होता है।

यहीं से एक ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें चिकित्सा व्यवस्था ‘मरीज को समझने’ के बजाय ‘मरीज को आगे बढ़ाने’ की प्रक्रिया जैसी दिखाई देने लगती है।

इस समस्या का समाधान केवल डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट, तकनीकी कर्मचारी, सफाईकर्मी और दूसरे सहायक कर्मचारियों की पर्याप्त उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।

मुफ्त इलाज तभी प्रभावी है जब सुविधा वास्तव में मिले

सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या कम लागत वाले उपचार की व्यवस्था गरीब परिवारों के लिए बड़ी राहत है। लेकिन मुफ्त इलाज का अर्थ केवल डॉक्टर की फीस न होना नहीं है।

यदि डॉक्टर ने जांच लिखी, लेकिन जांच के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़े, मशीन खराब हो या तकनीकी कर्मचारी उपलब्ध न हो, तो मरीज के लिए इलाज की लागत बढ़ जाती है।

इसी तरह आवश्यक दवा अस्पताल में उपलब्ध नहीं होने पर मरीज को बाहर से दवा खरीदनी पड़ सकती है।

गरीब परिवार के लिए कुछ सौ रुपये की अतिरिक्त दवा भी बड़ा आर्थिक बोझ हो सकती है। यही वह बिंदु है जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता और उसकी वास्तविक उपयोगिता के बीच अंतर दिखाई देता है।

डिजिटल व्यवस्था सुविधा है या नई बाधा?

स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण, डिजिटल रिकॉर्ड और कंप्यूटरीकृत सेवाओं से प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की उम्मीद है।

लेकिन तकनीक तभी सुविधा बनती है जब उसके पीछे मजबूत आधारभूत ढांचा मौजूद हो।

इंटरनेट की समस्या, बिजली की बाधा, कंप्यूटर की खराबी या प्रशिक्षित कर्मचारी की कमी डिजिटल व्यवस्था को धीमा कर सकती है।

इसके अलावा ग्रामीण और बुजुर्ग मरीजों के लिए डिजिटल प्रक्रिया हमेशा आसान नहीं होती। इसलिए तकनीक को मरीज की मदद करने वाला माध्यम बनाना जरूरी है, न कि ऐसी बाधा जो उसे किसी कर्मचारी की मदद लेने के लिए मजबूर कर दे।

अस्पताल की सफाई भी इलाज का हिस्सा है

किसी अस्पताल की गुणवत्ता केवल डॉक्टर, दवा और मशीन से तय नहीं होती।

स्वच्छ वार्ड, साफ शौचालय, सुरक्षित पेयजल, पर्याप्त बैठने की जगह, कचरा प्रबंधन और संक्रमण नियंत्रण जैसी सुविधाएं भी मरीज के उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

नया भवन बना देना आसान हो सकता है, लेकिन उसे लगातार साफ और व्यवस्थित रखना रोजमर्रा की जिम्मेदारी है।

इसलिए अस्पतालों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वहां कितना पैसा खर्च हुआ या कितने नए उपकरण लगाए गए। यह भी देखा जाना चाहिए कि उन सुविधाओं का मरीज को वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।

मरीज की शिकायत का जवाब कौन देगा?

स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीज की आवाज सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए। यदि दवा नहीं मिली, जांच में अनावश्यक देरी हुई, किसी कर्मचारी ने दुर्व्यवहार किया या किसी सेवा में समस्या आई तो मरीज को यह स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए कि शिकायत कहां दर्ज करनी है।

केवल शिकायत पेटी या हेल्पलाइन का बोर्ड लगा देना पर्याप्त नहीं है।

जरूरी है कि शिकायत दर्ज होने के बाद उसकी निगरानी हो, जिम्मेदारी तय हो और मरीज को समाधान की जानकारी मिले।

इसी तरह अस्पतालों की सफलता का मूल्यांकन केवल मरीजों की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि मरीज ने कितनी देर इंतजार किया, कितनी बार अस्पताल आना पड़ा, जांच कितनी जल्दी हुई और उपचार पूरा कराने में उसे कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

सुधार की शुरुआत मरीज की यात्रा से हो

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बजट, भवन और नई योजनाएं जरूरी हैं। लेकिन इन सबसे अधिक जरूरी है मरीज के अनुभव को व्यवस्था के केंद्र में रखना।

अस्पताल में प्रवेश से लेकर इलाज पूरा होने तक मरीज की पूरी यात्रा को सरल बनाया जाना चाहिए।

पंजीकरण और कतार व्यवस्था बेहतर हो, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों, जरूरी दवाओं और जांचों की नियमित व्यवस्था हो, साफ-सफाई की निगरानी हो और शिकायतों का समयबद्ध समाधान किया जाए—इन उपायों का असर सीधे मरीज पर दिखाई देगा।

सरकारी अस्पताल केवल सरकारी भवन नहीं हैं। वे उस नागरिक के भरोसे का केंद्र हैं जो बीमारी के समय राज्य की ओर देखता है।

इसलिए किसी अस्पताल की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वहां कितनी योजनाएं चल रही हैं, कितने भवन बने हैं या कितने उपकरण लगाए गए हैं। असली सवाल यह है कि एक सामान्य मरीज वहां पहुंचकर कितनी आसानी से, कितने सम्मान के साथ और कितने समय में इलाज पा रहा है।

मरीज और व्यवस्था के बीच की दूरी अस्पताल की दीवारों से नहीं बनती। यह दूरी प्रक्रियाओं, व्यवहार, संसाधनों और जवाबदेही से बनती है।

अगर स्वास्थ्य व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य मरीज को राहत देना है, तो हर अस्पताल और हर स्वास्थ्य नीति के सामने एक सवाल हमेशा रहना चाहिए—

मरीज को सबसे ज्यादा परेशानी कहां हो रही है और उस परेशानी को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है?

यही सवाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल आंकड़ों और योजनाओं से निकालकर जनसरोकार की जमीन पर ला सकता है।


आलोक कुमार

रविवार, 30 अगस्त 2026

Bihar : एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

 


एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

पटना। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चाय में एक चम्मच चीनी कम की जाए या ज्यादा। बचत जरूरी है, मितव्ययिता भी जरूरी है और संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब देश और समाज के सामने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति जैसे गंभीर सवाल खड़े हों, तब पत्रकारिता का दायरा केवल व्यक्तिगत बचत की सलाह तक सीमित नहीं रह सकता।

पत्रकार रूबिका लियाकत की ओर से एक चम्मच चीनी बचाने की बात कही गई है। इस सलाह को बचत के सामान्य संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के संदर्भ में इससे कहीं बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या मीडिया जनता की छोटी-छोटी बचत पर बात करने के साथ-साथ उन बड़ी नीतियों और व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जिनका सीधा असर करोड़ों परिवारों की आय और खर्च पर पड़ता है?

यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता की असली भूमिका सामने आती है।

पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है

पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है।

सरकार कोई योजना घोषित करती है तो पत्रकार का सवाल होना चाहिए कि योजना का लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा। बजट में शिक्षा के लिए राशि बढ़ती है तो सवाल होना चाहिए कि स्कूलों में उसका असर दिखाई क्यों नहीं देता। किसानों के लिए योजनाएं बनती हैं तो यह देखना जरूरी है कि किसान की लागत और आय में वास्तविक बदलाव कितना आया।

अगर बेरोजगारी पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं तो पत्रकार को रोजगार के आंकड़ों, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करनी चाहिए।

किसी नेता ने क्या कहा, यह खबर हो सकती है; लेकिन उसने जो कहा, वह सच कितना है—यह पत्रकारिता का बड़ा सवाल है।

स्टूडियो से बाहर निकलने की जरूरत

आज मीडिया का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो, डिजिटल स्क्रीन और सोशल मीडिया की तेज रफ्तार के बीच काम कर रहा है। कुछ मिनटों की बहस में कई बड़े मुद्दे उठते हैं और अगले दिन कोई नया मुद्दा उनकी जगह ले लेता है।

समस्या यह है कि जमीनी पत्रकारिता में समय लगता है।

किसी गांव में सरकारी योजना की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वहां जाना पड़ता है। लाभार्थियों से बात करनी पड़ती है। सरकारी दस्तावेज देखने पड़ते हैं। अधिकारियों से सवाल पूछने पड़ते हैं और कई बार अलग-अलग स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करनी पड़ती है।

यही मेहनत खबर को केवल बयान से रिपोर्ट में बदलती है।

कैमरे के सामने जोर से बोलना आसान हो सकता है, लेकिन दस्तावेज के आधार पर सत्ता से कठिन सवाल पूछना पत्रकारिता की असली परीक्षा है।

जनता की छोटी बचत और बड़ी आर्थिक परेशानी

एक परिवार अगर चीनी, बिजली, पानी या किसी अन्य घरेलू खर्च में थोड़ी बचत करता है तो निश्चित रूप से उसके बजट पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ऐसी बचत से परिवार की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो जाएगा?

यदि परिवार की आय सीमित है और खाद्य पदार्थ, शिक्षा, इलाज, किराया, परिवहन तथा खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो समस्या केवल खर्च कम करने की नहीं है।

यहां पत्रकारिता को व्यापक तस्वीर सामने रखनी चाहिए।

एक किसान को खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर कितना खर्च करना पड़ रहा है? उसकी फसल किस कीमत पर बिक रही है? एक बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कितना पैसा खर्च कर रहा है? एक गरीब परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज के बावजूद दवाओं पर कितना खर्च कर रहा है?

ये वे सवाल हैं जिनका जवाब जनता के घरेलू बजट से जुड़ा है।

सत्ता से सवाल पूछना सरकार विरोध नहीं

सरकार से सवाल पूछना अक्सर राजनीतिक विरोध के रूप में देखा जाने लगता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।

पत्रकार का काम सरकार का विरोध करना नहीं है। लेकिन उसका काम सरकार की घोषणाओं और नीतियों की स्वतंत्र जांच करना जरूर है।

अगर कोई सरकारी योजना सफल है तो पत्रकार को उसकी सफलता भी दिखानी चाहिए। अगर किसी योजना में कमी है तो उस कमी को भी सामने लाना चाहिए।

इसी तरह विपक्ष के दावों की भी जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खबर किस राजनीतिक पक्ष के पक्ष में जा रही है। पैमाना यह होना चाहिए कि तथ्य क्या कहते हैं।

आर्थिक और राजनीतिक दबाव की चुनौती

मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव की चर्चा नई नहीं है। विज्ञापन, कारोबारी हित, दर्शकों की संख्या, डिजिटल ट्रैफिक और राजनीतिक संबंधों का प्रभाव पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।

लेकिन इन चुनौतियों के बीच पत्रकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बनी रहती है।

हर खबर में सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता नहीं है। उसी तरह हर सरकारी दावे को बिना जांच स्वीकार कर लेना भी पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवाल तथ्य आधारित होना चाहिए। आलोचना करनी हो तो प्रमाण के साथ करनी चाहिए। आरोप लगाना हो तो संबंधित पक्ष का जवाब भी लेना चाहिए।

बेबाक पत्रकारिता और जिम्मेदार पत्रकारिता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

सोशल मीडिया के दौर में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी

आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल से वीडियो बनाकर सूचना साझा कर सकता है। सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना का खतरा भी बढ़ा है।

यही कारण है कि पेशेवर पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

पत्रकार को वायरल दावे को खबर बनाने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। तस्वीर पुरानी है या नई, बयान पूरा है या काटकर प्रस्तुत किया गया है, आंकड़ा किस स्रोत से आया है और सरकारी दावा जमीन पर कितना सही है—इन सबकी जांच जरूरी है।

तेज खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीय खबर है।

स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका

बड़ी राष्ट्रीय खबरों के बीच स्थानीय समस्याएं अक्सर दब जाती हैं। लेकिन आम नागरिक के जीवन पर सबसे सीधा असर स्थानीय प्रशासन, स्कूल, अस्पताल, सड़क, राशन, बिजली, पानी, रोजगार और कृषि व्यवस्था का होता है।

इसलिए स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की पहली पंक्ति है।

किसी गांव के स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, किसी अस्पताल में दवा नहीं है, किसी किसान को भुगतान नहीं मिला या किसी सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचा—ये खबरें छोटी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है।

पत्रकारिता को शोर नहीं, पड़ताल चाहिए

आज खबरों की दुनिया में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। क्लिक, व्यू और वायरल होने की होड़ में कभी-कभी गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, पड़ताल में है।

एक अच्छी रिपोर्ट किसी सरकारी फाइल और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच का अंतर दिखा सकती है। एक खोजी रिपोर्ट वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी सामने ला सकती है। एक स्थानीय रिपोर्ट किसी अधिकारी को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है।

यही पत्रकारिता की सामाजिक उपयोगिता है।

असली सवाल चीनी नहीं, पत्रकारिता की मिठास है

एक चम्मच चीनी बचाने की सलाह पर बहस अपनी जगह हो सकती है। बचत की आदत परिवार के बजट के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन पत्रकारिता के सामने इससे कहीं बड़ा सवाल है।

क्या हम जनता की आवाज को उतनी ही मजबूती से लिख रहे हैं, जितनी मजबूती से सत्ता के बयान प्रसारित करते हैं?

क्या हम किसान की लागत पूछ रहे हैं? क्या हम बेरोजगार युवा की बेचैनी समझ रहे हैं? क्या हम सरकारी स्कूल और अस्पताल की वास्तविक स्थिति देख रहे हैं? क्या हम योजनाओं के आंकड़ों के पीछे छिपी जमीनी सच्चाई तलाश रहे हैं?

पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाज को यह बताना नहीं कि उसे अपनी चाय कितनी मीठी रखनी चाहिए। पत्रकारिता को यह भी पूछना होगा कि उसके जीवन में महंगाई, बेरोजगारी और असमानता की कड़वाहट क्यों बढ़ रही है।

क्योंकि अगर पत्रकार सवाल पूछना छोड़ दे, अगर मीडिया सत्ता से जवाब मांगना बंद कर दे और अगर खबर केवल बयान दोहराने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

एक चम्मच चीनी बचाने से चाय की मिठास बदल सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मिठास तभी बचेगी जब पत्रकारिता सच बोलने और सत्ता से सवाल पूछने का साहस बचाए रखे।


आलोक कुमार


Bihar : छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

 

छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जमीन का आकार भले छोटा हो, लेकिन परिवार की आय, भोजन और रोजगार का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा होता है। ऐसे किसानों के लिए खेती की सफलता केवल अच्छे बीज और खाद पर निर्भर नहीं करती। सबसे जरूरी जरूरत है—समय पर, पर्याप्त और किफायती सिंचाई

बारिश सामान्य रही तो किसान की उम्मीद बढ़ती है, लेकिन मानसून में देरी, लंबे सूखे अंतराल या जरूरत से ज्यादा बारिश पूरी फसल की योजना बिगाड़ सकती है। बड़े किसान किसी हद तक निजी नलकूप, पंपसेट या अन्य साधनों से इस जोखिम को संभाल लेते हैं। छोटे किसान के पास ऐसे विकल्प सीमित होते हैं।

इसलिए सिंचाई का सवाल केवल खेत में पानी पहुंचाने का विषय नहीं है। यह किसान की लागत, फसल के चुनाव, उत्पादन, जोखिम और अंततः उसकी आय से सीधे जुड़ा हुआ है।

बारिश पर निर्भरता अब भी बड़ी मजबूरी

बिहार में मानसून कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। खरीफ मौसम में धान सहित कई फसलों के लिए बारिश की भूमिका बड़ी होती है। लेकिन बारिश कब होगी, कितनी होगी और कितने अंतराल पर होगी, इसका भरोसा किसान के पास नहीं होता।

कई बार लगातार बारिश से खेतों में जलभराव हो जाता है तो कभी बारिश रुकने से फसल को तत्काल पानी की जरूरत पड़ती है। ऐसी स्थिति में जिसके पास अपनी सिंचाई व्यवस्था नहीं है, उसे दूसरे किसान के नलकूप या पंपसेट पर निर्भर रहना पड़ता है।

यहीं से खेती की लागत बढ़ने लगती है। किसान को पानी खरीदना पड़ सकता है, पंप किराये पर लेना पड़ सकता है और खेत तक पानी पहुंचाने के लिए अतिरिक्त पाइप या मजदूरी का खर्च उठाना पड़ सकता है।

निजी नलकूप हर छोटे किसान की पहुंच में नहीं

ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूप और पंपसेट सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन हैं। लेकिन इन्हें स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी चाहिए। बोरिंग, पंप, पाइप, बिजली कनेक्शन और रखरखाव पर होने वाला खर्च छोटे किसान के लिए बड़ा निवेश हो सकता है।

जिस किसान के पास सीमित जमीन है, उसके सामने यह सवाल रहता है कि महंगे सिंचाई उपकरण पर पैसा लगाने से उसकी लागत कितनी बढ़ेगी और निवेश की भरपाई कब होगी।

यही कारण है कि कई छोटे किसान आसपास के किसानों की सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। इससे पानी की उपलब्धता और कीमत दोनों उनके नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

डीजल पंप खेती को महंगा बनाते हैं

जहां कृषि बिजली की पर्याप्त सुविधा नहीं है, वहां डीजल पंप किसानों के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनते हैं। लेकिन डीजल, मशीन किराया, ऑपरेटर की मजदूरी और खेत तक पानी पहुंचाने का खर्च मिलकर सिंचाई को महंगा बना सकता है।

समस्या तब और गंभीर होती है जब एक ही फसल में कई बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। हर बार किसान को अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। अगर उसी समय बाजार में फसल का भाव कमजोर हो जाए तो किसान की आय पर दोहरा दबाव पड़ता है।

इसलिए सिंचाई नीति में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि पानी उपलब्ध है या नहीं। यह भी देखना होगा कि किसान को वह पानी कितनी लागत पर मिल रहा है।

बिजली कनेक्शन से आगे की जरूरत

ग्रामीण इलाकों में बिजली का विस्तार हुआ है, लेकिन कृषि के लिए बिजली की उपलब्धता और उसकी नियमितता अलग विषय है। किसान को जिस समय खेत में पानी की जरूरत हो, उसी समय बिजली उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।

यदि बिजली अनियमित हो या सिंचाई के लिए सुविधाजनक समय पर उपलब्ध न हो तो किसान को वैकल्पिक रूप से डीजल पंप का सहारा लेना पड़ सकता है।

इसलिए कृषि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल कनेक्शन की संख्या से नहीं होना चाहिए। विश्वसनीय आपूर्ति, उचित समय और कम लागत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

नहर बनी तो क्या अंतिम खेत तक पानी पहुंचा?

नहरें बिहार में सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। जहां नहरों से पर्याप्त पानी मिलता है, वहां किसान निजी पंप और डीजल पर निर्भरता कम कर सकता है।

लेकिन किसी नहर का निर्माण हो जाना और उसके अंतिम छोर तक नियमित पानी पहुंचना दो अलग बातें हैं। रखरखाव की कमी, गाद जमा होना, टूट-फूट या स्थानीय स्तर पर वितरण की समस्या के कारण कई बार उपलब्ध पानी का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।

इसलिए सरकारी सिंचाई परियोजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि कितने खेतों को नियमित और पर्याप्त पानी मिल रहा है।

सामुदायिक सिंचाई छोटे किसानों के लिए उपयोगी मॉडल

छोटे किसान अकेले महंगा नलकूप या सोलर पंप लगाने में सक्षम नहीं हो सकते। ऐसे में सामुदायिक सिंचाई व्यवस्था एक व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।

गांव के किसानों का समूह मिलकर सामुदायिक नलकूप, सोलर पंप या छोटी सिंचाई परियोजना चला सकता है। उपकरण का खर्च साझा किया जा सकता है और पानी के उपयोग के आधार पर शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।

इस मॉडल की सफलता के लिए पारदर्शिता जरूरी है। किस किसान को कब पानी मिलेगा, कितना शुल्क लगेगा और खराब उपकरण की मरम्मत कौन कराएगा—इन सभी सवालों के स्पष्ट नियम होने चाहिए।

सौर ऊर्जा से घट सकता है सिंचाई का खर्च

सौर ऊर्जा आधारित पंप ग्रामीण सिंचाई के लिए संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है या डीजल पर खर्च अधिक होता है, वहां सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

लेकिन छोटे किसानों के लिए शुरुआती निवेश अब भी चुनौती है। इसलिए केवल व्यक्तिगत सोलर पंप पर जोर देने के बजाय सामुदायिक सोलर सिंचाई मॉडल पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

साथ ही भूजल के अत्यधिक दोहन से बचना जरूरी है। सस्ता पानी उपलब्ध कराने की कोशिश ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में भूजल स्तर गंभीर रूप से प्रभावित हो।

पुराने जलस्रोतों का पुनर्जीवन क्यों जरूरी?

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब, आहर-पईन और अन्य पारंपरिक जलस्रोत कभी स्थानीय जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। इनके संरक्षण और पुनर्जीवन से बारिश के पानी को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और सिंचाई के लिए स्थानीय संसाधन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

वर्षा जल संचयन और खेतों में पानी रोकने की व्यवस्था भी छोटे किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे सिंचाई का दबाव कम करने के साथ-साथ पानी की बर्बादी रोकने में भी मदद मिलेगी।

सिंचाई बेहतर होगी तो फसल का विकल्प भी बढ़ेगा

सिंचाई की अनिश्चितता किसान के फसल चुनाव को भी प्रभावित करती है। जिस किसान को पानी की गारंटी नहीं है, वह अधिक जोखिम वाली या अधिक पानी मांगने वाली फसल लेने से बच सकता है।

अगर नियमित सिंचाई उपलब्ध हो तो किसान सब्जियों, दलहन, तेलहन और अन्य मूल्यवान फसलों की ओर भी बढ़ सकता है। इससे खेती से आय बढ़ाने की संभावना बन सकती है।

हालांकि फसल विविधीकरण के साथ बाजार, भंडारण और उचित कीमत की व्यवस्था भी जरूरी है। केवल पानी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा।

सिंचाई का मतलब किसान की आर्थिक सुरक्षा

छोटे किसान के लिए सिंचाई की समस्या इसलिए बड़ी है क्योंकि उसके पास पानी, पूंजी और बाजार—तीनों पर सीमित नियंत्रण होता है। बारिश पर अत्यधिक निर्भरता खेती को जोखिमपूर्ण बनाती है और निजी सिंचाई व्यवस्था कई बार उसकी लागत बढ़ा देती है।

इस चुनौती का समाधान केवल नए नलकूप लगाने में नहीं है। अंतिम खेत तक पानी पहुंचाना, कृषि बिजली को भरोसेमंद बनाना, नहरों का प्रभावी रखरखाव, पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण, सामुदायिक सिंचाई, सौर ऊर्जा और भूजल प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

किसान के खेत में सही समय पर पानी पहुंचना केवल कृषि सुविधा नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक सुरक्षा है। जब किसान को हर फसल के लिए आसमान की ओर देखने की मजबूरी कम होगी, तब खेती अधिक सुरक्षित होगी।

बिहार के कृषि भविष्य का असली सवाल यही है—क्या ऐसी सिंचाई व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें छोटे किसान भी बिना अत्यधिक कर्ज और अतिरिक्त लागत के समय पर अपने खेत तक पानी पहुंचा सकें?

अगर इसका जवाब हां में देना है, तो सिंचाई को केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि किसान की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत के रूप में देखना होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल

बिहार के किसानों की लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ती दूरी: खेत में मेहनत किसान की, कीमत तय करने की ताकत किसकी?

पटना। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल है। गांवों कीबड़ी आबादी खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी, मंडी कारोबार और उससे जुड़े छोटे व्यवसायों पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन, सब्जियां और फल जैसी फसलें किसानों की आय का प्रमुख साधन हैं। लेकिन कृषि की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फसल पैदा करने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसान को मिलने वाला बाजार भाव कई बार उसकी उम्मीद के अनुरूप नहीं होता।

यही अंतर बिहार के किसान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। खेती में जोखिम किसान का है, मौसम का असर किसान झेलता है, उत्पादन की लागत किसान उठाता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी कीमत तय करने की ताकत अक्सर उसके हाथ में नहीं रहती।

बीज से बाजार तक बढ़ता खर्च

आज खेती पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। खेत की जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, कृषि मशीनरी और फसल को बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। जिन किसानों के पास अपनी मशीन या सिंचाई का साधन नहीं है, उनके लिए लागत और बढ़ जाती है।

इसके अलावा प्राकृतिक जोखिम भी कम नहीं हुए हैं। कभी अत्यधिक बारिश, कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी फसल में रोग किसानों की पूरी गणित बिगाड़ देते हैं। किसान पहले से यह निश्चित नहीं कर सकता कि मौसम उसके साथ कितना सहयोग करेगा।

छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति और कठिन है। सीमित पूंजी के कारण उन्हें खेती के लिए कई बार उधार लेना पड़ता है। फसल तैयार होने के बाद कर्ज चुकाने, अगली फसल की तैयारी करने और परिवार का खर्च चलाने का दबाव सामने होता है। ऐसे में बाजार भाव कम होने के बावजूद किसान अपनी उपज रोककर रखने की स्थिति में नहीं होता।

फसल तैयार होते ही क्यों गिर जाता है किसान का विकल्प?

किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय वह होता है जब फसल बाजार में पहुंचती है। यदि उस समय कीमत अच्छी है तो उसकी पूरी साल की मेहनत कुछ हद तक सफल हो सकती है। लेकिन कीमत गिर गई तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।

इसका एक बड़ा कारण भंडारण की सीमित सुविधा है। जिसके पास पर्याप्त गोदाम या सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था नहीं है, वह लंबे समय तक फसल रोक नहीं सकता। उसे जल्दी बिक्री करनी पड़ती है।

यहीं किसान की मजबूरी उसकी सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करती है।

शहर में उपभोक्ता किसी कृषि उत्पाद के लिए अधिक कीमत चुका सकता है, लेकिन खेत से निकलने वाली वही उपज किसान को अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है। परिवहन, छंटाई, पैकेजिंग, थोक कारोबार और खुदरा बिक्री के अलग-अलग खर्च इसमें जुड़ते हैं। सवाल यह है कि इस पूरी मूल्य-श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी कैसे बढ़ाई जाए?

केवल बिचौलिये को दोष देना समाधान नहीं

किसानों को कम कीमत मिलने की चर्चा होते ही बिचौलियों का नाम सामने आता है। लेकिन समस्या को केवल बिचौलियों तक सीमित करना कृषि बाजार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

असल सवाल यह है कि किसान के पास विकल्प कितने हैं।

यदि किसान के आसपास कई खरीदार हों, उसे अलग-अलग बाजारों के भाव की जानकारी हो, उसकी उपज रखने के लिए गोदाम हो और परिवहन की सुविधा उपलब्ध हो, तो वह बेहतर कीमत के लिए बातचीत कर सकता है।

इसके विपरीत यदि गांव में एक-दो खरीदार ही उपलब्ध हैं और किसान के पास फसल रखने की सुविधा नहीं है, तो उसकी स्थिति कमजोर हो जाती है। इसलिए कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ किसान की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है।

एमएसपी की घोषणा और वास्तविक बिक्री में अंतर

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। लेकिन किसी फसल का एमएसपी घोषित होना और प्रत्येक किसान का अपनी पूरी उपज उस कीमत पर बेच पाना अलग-अलग बातें हैं।

किसान के लिए वास्तविक सुरक्षा तभी बनेगी जब खरीद व्यवस्था उसके नजदीक हो, खरीद प्रक्रिया स्पष्ट हो और भुगतान समय पर मिले। सरकारी खरीद केंद्रों की पहुंच, उनकी सक्रियता और खरीद की समयबद्धता इसलिए महत्वपूर्ण है।

बिहार में किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है जिसमें सरकारी खरीद का लाभ केवल कागज पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से खेत और गांव तक पहुंचे।

मक्का और सब्जी उत्पादकों की परेशानी अलग

मक्का जैसे उत्पादों के किसानों को बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। वहीं सब्जी उत्पादकों की समस्या और भी संवेदनशील है क्योंकि उनकी फसल जल्दी खराब हो सकती है।

टमाटर, फूलगोभी, भिंडी और हरी सब्जियों की कीमत किसी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने पर अचानक गिर सकती है। किसान के सामने ऐसी स्थिति में मुश्किल विकल्प होता है—कम कीमत पर बेच दे या फसल खराब होने का खतरा उठाए।

इस समस्या का समाधान केवल अधिक उत्पादन नहीं है। ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, ग्रेडिंग सेंटर, प्रसंस्करण इकाइयां और स्थानीय खाद्य उद्योग विकसित करने की जरूरत है। इससे किसान को अपनी उपज तुरंत बेचने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

एफपीओ से बढ़ सकती है किसानों की ताकत

एक छोटा किसान अकेले बाजार में बड़ी मात्रा में उपज बेचने वाले कारोबारी से बराबरी की बातचीत नहीं कर पाता। लेकिन कई किसान मिलकर किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ बनाएं तो स्थिति बदल सकती है।

सामूहिक खरीद से इनपुट की लागत कम करने, सामूहिक बिक्री से बेहतर कीमत प्राप्त करने और ग्रेडिंग-पैकेजिंग जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ती है।

हालांकि केवल एफपीओ बना देना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें बाजार की जानकारी, प्रशिक्षित प्रबंधन, कार्यशील पूंजी और बड़े खरीदारों से सीधे संपर्क की जरूरत है।

मोबाइल पर भाव की जानकारी से आगे बढ़ना होगा

आज किसान के हाथ में मोबाइल फोन है। अलग-अलग बाजारों की कीमतों की जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो सकती है। लेकिन सूचना तभी उपयोगी है जब किसान उसके आधार पर वास्तविक व्यापारिक निर्णय ले सके।

किसान को यह पता होना चाहिए कि उसकी उपज की कीमत अलग-अलग बाजारों में कितनी है, वहां तक परिवहन का खर्च कितना आएगा और किस खरीदार से बेहतर सौदा संभव है।

इसलिए भविष्य की कृषि व्यवस्था में डिजिटल जानकारी को डिजिटल बाजार और वास्तविक बिक्री व्यवस्था से जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

कृषि नीति का अंतिम पैमाना किसान की शुद्ध आय हो

कृषि विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सभी खर्च निकालने के बाद उसके पास कितना पैसा बचा।

यदि उत्पादन बढ़ता है लेकिन लागत भी उसी गति से बढ़ती है और किसान की शुद्ध आय नहीं बढ़ती, तो कृषि विकास अधूरा माना जाएगा।

बिहार में कृषि नीति को किसान की वास्तविक आय से जोड़ने की जरूरत है। सस्ती सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, सामूहिक खरीद, बेहतर ग्रामीण सड़क, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और पारदर्शी बाजार व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।

किसान को सिर्फ उत्पादक नहीं, बाजार का भागीदार बनाना होगा

बिहार के किसान की चुनौती केवल खेत तक सीमित नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि फसल बाजार तक पहुंचने के बाद उसके पास कितने विकल्प हैं।

किसान को केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसे लागत कम करने, जोखिम घटाने और बेहतर कीमत प्राप्त करने के साधन भी देने होंगे।

अगर किसान के पास भंडारण की सुविधा हो, बाजार की सही जानकारी हो, कई खरीदारों तक पहुंच हो और सामूहिक रूप से बिक्री करने की क्षमता हो तो उसकी सौदेबाजी मजबूत होगी।

आखिरकार कृषि की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खेत से कितनी फसल निकली। सवाल यह होना चाहिए कि उस फसल से किसान की शुद्ध आय कितनी बढ़ी

बिहार के कृषि भविष्य के लिए यही सबसे बड़ा सवाल है—क्या ऐसी बाजार व्यवस्था तैयार की जा सकती है जिसमें किसान अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर न हो, बल्कि सही समय और सही कीमत चुनने के लिए उसके पास पर्याप्त विकल्प हों?

कृषि तभी टिकाऊ बनेगी जब खेत की मेहनत का उचित हिस्सा किसान की जेब तक पहुंचे।


आलोक कुमार

शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bengal : एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।

 Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद मां Sweta Ancel का सवाल- ‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’


पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 28 मई से 28 अगस्त तक तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अपने बेटे Aadvik Hilarian को खो चुकी मां Sweta Ancel के लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है। बेटे की मौत के तीन महीने पूरे होने पर Sweta Ancel ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा और नाराजगी व्यक्त करते हुए न्याय की मांग दोहराई है।

उनका कहना है कि घटना के बाद समय गुजरता गया, लेकिन उनके परिवार के लिए जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। एक मां ने अपना बच्चा खो दिया, एक परिवार की दुनिया उजड़ गई और अब भी उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर उनके बेटे की मौत की जिम्मेदारी कब तय होगी और उन्हें न्याय कब मिलेगा?

Sweta Ancel की सार्वजनिक अपील ने एक बार फिर इस मामले को बच्चों की सुरक्षा, स्कूल प्रशासन की जवाबदेही और जांच की गति जैसे महत्वपूर्ण सवालों के केंद्र में ला दिया है।

तीन महीने बाद भी मां के सवाल कायम

किसी माता-पिता के लिए बच्चे को खोने का दर्द शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। Sweta Ancel के लिए भी तीन महीने बीत जाना किसी राहत का संकेत नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे घटना के बाद धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया, जबकि उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है।

उनकी पीड़ा का सबसे बड़ा हिस्सा यही है कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता, लेकिन वह चाहती हैं कि उसकी मौत के पीछे यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

स्कूल प्रबंधन पर कथित लापरवाही के आरोप

Aadvik Hilarian की मां ने स्कूल प्रबंधन और घटना के समय स्विमिंग पूल में मौजूद बताए गए शिक्षकों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल Ravi Victor तथा Vikash Gaitano, Alfred Simon और Natal नामक शिक्षकों की भूमिका की जांच और कार्रवाई की मांग की है।

मां का आरोप है कि यदि बच्चे की निगरानी और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सावधानी बरती जाती तो शायद हादसे को रोका जा सकता था।

हालांकि, इन आरोपों को फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी तभी तय हो सकती है जब सक्षम जांच एजेंसी तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच करे।

इस मामले में स्कूल प्रबंधन और संबंधित शिक्षकों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पूरी तस्वीर एकतरफा न रहे।

स्विमिंग पूल में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत और उसके परिवार के दुख तक सीमित नहीं है। यदि किसी स्कूल परिसर में स्विमिंग पूल संचालित किया जाता है तो वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था होना बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषकर बच्चों के मामले में कुछ मिनट भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए ऐसे हादसे के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि घटना कैसे हुई। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि उस समय सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या था, बच्चों की निगरानी कौन कर रहा था, आपात स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और बचाव के लिए उपलब्ध संसाधन पर्याप्त थे या नहीं।

‘सब कुछ फिर सामान्य कैसे हो गया?’

Sweta Ancel की सार्वजनिक पीड़ा में एक सवाल बार-बार सामने आता है—जिस परिवार ने अपना बच्चा खो दिया, उसके लिए सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन बाकी दुनिया फिर सामान्य कैसे हो गई?

उनके अनुसार स्कूल की गतिविधियां सामान्य रूप से चल रही हैं। यही स्थिति उनके दर्द को और गहरा करती है।

एक मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस जगह से उसका बच्चा वापस नहीं लौटा, वहां कुछ समय बाद रोजमर्रा की गतिविधियां फिर शुरू हो जाएं।

हालांकि किसी संस्था की गतिविधियों का जारी रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जांच या कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

पुलिस और प्रशासन से जवाब की उम्मीद

Sweta Ancel ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि तीन महीने बीतने के बाद भी उन्हें वह न्याय नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रही हैं।

उनका मूल सवाल सीधा है—

एक बच्चे की मौत की जिम्मेदारी आखिर कब तय होगी?

ऐसे मामलों में परिवार को केवल जांच की सूचना ही नहीं, बल्कि जांच की प्रगति और कानूनी प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना भी जरूरी है।

निष्पक्ष जांच का अर्थ यह भी है कि सभी पक्षों के बयान लिए जाएं, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच हो और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्य स्थापित किए जाएं।

एक मां की लड़ाई अब बच्चों की सुरक्षा का सवाल

Sweta Ancel ने संकेत दिया है कि वह अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई जारी रखेंगी। उनका संघर्ष अब केवल व्यक्तिगत न्याय की मांग नहीं रह गया है। इससे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्यापक सवाल भी उठते हैं।

क्या स्कूलों में स्विमिंग पूल के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित निगरानीकर्मी होते हैं?

क्या बच्चों की संख्या के अनुपात में निगरानी की व्यवस्था रहती है?

क्या आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध होती है?

क्या कर्मचारियों को बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सुरक्षा नियम केवल कागज पर हैं या वास्तव में उनका पालन भी होता है?

इन सवालों का जवाब केवल इसी मामले के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संस्थानों के लिए जरूरी है जहां बच्चों को खेल, तैराकी या अन्य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है।

न्याय के साथ व्यवस्था में सुधार भी जरूरी

किसी बच्चे की मौत के बाद परिवार के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण मांग होती है। लेकिन ऐसी घटनाओं से व्यवस्था को भी सीख लेनी चाहिए।

यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।

स्कूलों में नियमित सुरक्षा ऑडिट, प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और बच्चों की गतिविधियों की उचित निगरानी जैसे कदम हादसों का जोखिम कम कर सकते हैं।

‘Justice for Aadvik’ की मांग

तीन महीने बाद भी Sweta Ancel की सबसे बड़ी मांग वही है—Justice for Aadvik

एक मां अपने बेटे को वापस नहीं ला सकती। लेकिन वह यह जरूर चाहती है कि उसके बच्चे की मौत को भुला न दिया जाए और यदि किसी की लापरवाही या चूक सामने आती है तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

इस मामले में सबसे जरूरी है कि भावनाओं और आरोपों से अलग निष्पक्ष जांच तथा तथ्यात्मक निष्कर्ष सामने आएं।

आखिर किसी परिवार को न्याय तभी मिलेगा जब यह स्पष्ट हो कि घटना में वास्तव में क्या हुआ, उस समय सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, किसकी क्या जिम्मेदारी थी और जांच में कौन-से तथ्य सामने आए।

निष्कर्ष

Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद उनकी मां का सवाल आज भी वही है—‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’

यह सवाल एक मां के व्यक्तिगत दर्द से निकला है, लेकिन इसके भीतर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा मुद्दा भी छिपा है।

जांच निष्पक्ष हो, सभी पक्षों को सुना जाए, तथ्य सामने आएं और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी साबित होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो—यही इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा है।

एक बच्चे की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। लेकिन उसकी मौत से व्यवस्था यह सुनिश्चित जरूर कर सकती है कि भविष्य में किसी दूसरे माता-पिता को ऐसा सवाल न पूछना पड़े—

“मेरे बच्चे के साथ ऐसा क्यों हुआ और न्याय कब मिलेगा?”

Justice for Aadvik — एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।


आलोक कुमार

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार