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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

Bihar : बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता?

 


बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता? जानिए योजनाओं की जानकारी, दस्तावेज, लाभार्थी चयन, भ्रष्टाचार, डीबीटी, प्रशासनिक निगरानी और पंचायत स्तर की चुनौतियों की पूरी तस्वीर।

बिहार। गरीबों और वंचित परिवारों के जीवन में सुधार लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, बिजली, सड़क, पेयजल और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए हर वर्ष बड़ी राशि खर्च की जाती है। सरकारी आंकड़ों में इन योजनाओं की उपलब्धियां भी दर्ज होती हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है। कहीं पात्र व्यक्ति योजना की जानकारी से वंचित है तो कहीं आवेदन प्रक्रिया में फंस जाता है। कहीं दस्तावेज समस्या बन जाते हैं तो कहीं भुगतान में देरी परेशानी बढ़ाती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार गरीबों के लिए योजनाएं चला रही है या नहीं। सवाल यह है कि सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में इतनी बाधाएं क्यों आती हैं?

जानकारी की कमी सबसे पहली दीवार

किसी भी योजना का लाभ लेने के लिए सबसे पहले उसके बारे में जानकारी होना जरूरी है। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिन्हें यह पता नहीं होता कि वे किस सरकारी योजना के पात्र हैं, आवेदन कहां करना है और कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी हैं।

डिजिटल व्यवस्था के विस्तार के बावजूद इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा हर परिवार तक समान रूप से नहीं पहुंची है। बुजुर्ग, अशिक्षित, दिव्यांग और बेहद गरीब लोगों के लिए ऑनलाइन आवेदन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इसलिए केवल वेबसाइट या मोबाइल एप पर योजना की जानकारी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। पंचायत स्तर पर लोगों को सरल भाषा में जानकारी देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

दस्तावेजों की समस्या से अटकता है लाभ

गरीब परिवारों के लिए दस्तावेजों की प्रक्रिया भी बड़ी चुनौती है। आधार कार्ड, बैंक खाता, राशन कार्ड, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र या अन्य जरूरी दस्तावेजों में किसी तरह की गलती होने पर आवेदन रुक सकता है।

नाम की स्पेलिंग में अंतर, उम्र में गलती या पते में बदलाव जैसी छोटी समस्या कई बार महीनों तक लाभार्थी को परेशान करती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए बार-बार प्रखंड या जिला कार्यालय जाना आसान नहीं होता।

एक मजदूर के लिए सरकारी दफ्तर जाने का अर्थ कई बार एक दिन की मजदूरी गंवाना भी होता है। इसलिए सरकारी प्रक्रिया जितनी सरल होगी, वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच उतनी ही बेहतर होगी।

बिचौलियों की भूमिका क्यों बढ़ती है?

हर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को भ्रष्ट मानना सही नहीं है। लेकिन जहां व्यवस्था जटिल होती है और लाभार्थी को प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती, वहां बिचौलियों की भूमिका बढ़ने की संभावना रहती है।

गरीब व्यक्ति यदि यह नहीं जानता कि आवेदन की वास्तविक फीस क्या है, कौन-सा दस्तावेज जरूरी है और आवेदन की स्थिति कैसे देखी जा सकती है, तो वह दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्रत्येक आवेदन का स्टेटस मोबाइल संदेश, ऑनलाइन पोर्टल या पंचायत स्तर पर उपलब्ध सूचना के माध्यम से बताया जाना चाहिए। इससे लाभार्थी किसी अनावश्यक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा।

लाभार्थियों की सूची में सुधार जरूरी

कई सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों का चयन सूची के आधार पर होता है। अगर सूची पुरानी है या उसमें वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही प्रतिबिंब नहीं है तो जरूरतमंद परिवार योजना से बाहर हो सकते हैं।

गरीबी स्थायी स्थिति नहीं है। किसी परिवार की आय घट सकती है, रोजगार जा सकता है या परिवार में कोई नई जिम्मेदारी आ सकती है। इसलिए पात्रता सूची की समय-समय पर समीक्षा जरूरी है।

पंचायत स्तर पर सूची सार्वजनिक करने और लोगों को आपत्ति दर्ज कराने का अवसर देने से पारदर्शिता बढ़ सकती है। इससे यह भी पता चल सकता है कि वास्तविक जरूरतमंद परिवारों के नाम सूची में हैं या नहीं।

पटना से गांव तक योजना पहुंचाने की चुनौती

राज्य मुख्यालय से योजना की घोषणा करना आसान हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव दूरदराज के गांव तक पहुंचाना प्रशासन के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।

बिहार के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में अधिकारियों और कर्मचारियों पर काम का दबाव, रिक्त पद, भौगोलिक दूरी और विभागों के बीच समन्वय की कमी जैसी समस्याएं योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती हैं।

यही कारण है कि योजना की सफलता का आकलन केवल स्वीकृत राशि या जारी आदेशों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि वास्तविक लाभार्थी तक कितनी जल्दी और कितनी पूरी सहायता पहुंची।

डीबीटी के बावजूद भुगतान की समस्या

सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी के माध्यम से सहायता सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और बिचौलियों की भूमिका कम करने में मदद मिली है।

लेकिन बैंक खाते से जुड़ी तकनीकी समस्या, आधार लिंकिंग, बैंक की दूरी, भुगतान संबंधी त्रुटि या सर्वर की समस्या जैसी परिस्थितियां गरीब परिवार के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं।

पेंशन या छात्रवृत्ति पर निर्भर व्यक्ति के लिए भुगतान में देरी केवल तकनीकी समस्या नहीं है। यह उसके भोजन, इलाज, पढ़ाई या रोजमर्रा के खर्च को प्रभावित कर सकती है।

खर्च नहीं, परिणाम होना चाहिए पैमाना

किसी योजना पर कितना पैसा खर्च हुआ, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि उस खर्च से लोगों की जिंदगी में क्या बदलाव आया।

अगर आवास योजना का घर अधूरा है, नल तो लगा है लेकिन पानी नहीं आता, शौचालय बना है लेकिन इस्तेमाल योग्य नहीं है या छात्रवृत्ति स्वीकृत होने के बाद भी समय पर नहीं मिली, तो केवल कागज पर लक्ष्य पूरा होना पर्याप्त नहीं है।

सरकारी योजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना नागरिक के जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव होना चाहिए।

पंचायतों को बनाना होगा जवाबदेह

गांव के लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके पंचायत क्षेत्र में किस योजना के तहत कितना पैसा आया, कितने लोगों को लाभ मिला और कितना काम पूरा हुआ।

ग्राम सभा को केवल औपचारिक बैठक तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक निगरानी का प्रभावी मंच बनाया जा सकता है। सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को मजबूत करके स्थानीय स्तर पर जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है।

अगर किसी योजना में गड़बड़ी की शिकायत सामने आती है तो उसकी जांच और समाधान की स्पष्ट समयसीमा भी होनी चाहिए।

डिजिटल व्यवस्था के साथ मानवीय सहायता जरूरी

सरकार का डिजिटल होना अच्छी बात है, लेकिन हर गरीब नागरिक डिजिटल विशेषज्ञ नहीं हो सकता। इसलिए ऑनलाइन व्यवस्था के साथ ऑफलाइन सहायता केंद्र भी मजबूत होने चाहिए।

पंचायत भवन, जनसेवा केंद्र, आंगनबाड़ी केंद्र और अन्य स्थानीय संस्थानों के माध्यम से योजनाओं की जानकारी दी जा सकती है। प्रशिक्षित कर्मचारी पात्र लोगों को आवेदन, दस्तावेज और शिकायत प्रक्रिया समझा सकते हैं।

तकनीक का उद्देश्य गरीब को सुविधा देना होना चाहिए, उसे व्यवस्था से और दूर करना नहीं।

गरीब को एहसान नहीं, अधिकार चाहिए

सरकारी योजना का लाभ पाने वाला गरीब व्यक्ति किसी से व्यक्तिगत एहसान नहीं मांग रहा है। वह उस सहायता का हकदार है जिसके लिए सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है।

इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिसमें पात्र व्यक्ति को योजना की जानकारी मिले, आवेदन सरल हो, दस्तावेज की समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर हो और भुगतान समय पर मिले।

बिहार में सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि योजनाओं का लाभ कागज पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे।

बिहार की प्रगति का असली पैमाना बड़े-बड़े आंकड़े नहीं, बल्कि गांव के गरीब परिवार की बदली हुई जिंदगी होनी चाहिए। जब मजदूर को समय पर रोजगार, बुजुर्ग को नियमित पेंशन, बच्चे को छात्रवृत्ति, परिवार को आवास और जरूरतमंद को स्वास्थ्य सुविधा मिलेगी, तभी सरकारी योजनाओं की सफलता मानी जाएगी।

सरकारी योजना की असली मंजिल फाइल नहीं, गरीब का घर है। जब व्यवस्था इस सोच के साथ काम करेगी, तभी बिहार में विकास का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता

 


बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता? जानिए जानकारी के अभाव, दस्तावेजी जटिलता, भ्रष्टाचार, लाभार्थी चयन, प्रशासनिक निगरानी और डीबीटी से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां।

बिहार। गरीबों और वंचित परिवारों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, पेयजल, सड़क, बिजली और सामाजिक सुरक्षा जैसी कई योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं पर हर वर्ष बड़ी राशि खर्च होती है। सरकारी रिपोर्टों में उपलब्धियों के आंकड़े भी सामने आते हैं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब किसी गांव का पात्र परिवार कहता है कि उसे योजना की जानकारी ही नहीं मिली, आवेदन के बावजूद लाभ नहीं मिला या महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।

आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनती है? क्या समस्या योजनाओं की कमी में है या उन्हें जमीन तक पहुंचाने वाली व्यवस्था में?

जानकारी के अभाव में छूट जाते हैं पात्र लोग

सरकारी योजना का लाभ लेने की पहली शर्त है कि व्यक्ति को उसके बारे में जानकारी हो। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिन्हें यह पता नहीं होता कि वे किन योजनाओं के पात्र हैं और आवेदन की प्रक्रिया क्या है।

डिजिटल व्यवस्था ने सरकारी सेवाओं को तेज बनाने की कोशिश की है, लेकिन हर व्यक्ति डिजिटल रूप से सक्षम नहीं है। बुजुर्ग, अशिक्षित, दिव्यांग और अत्यंत गरीब परिवारों के लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज अपलोड करना और आवेदन की स्थिति देखना आसान नहीं होता।

इसलिए केवल वेबसाइट या मोबाइल एप पर जानकारी डाल देना पर्याप्त नहीं है। पंचायत स्तर पर ऐसी व्यवस्था जरूरी है जहां नागरिक को सरल भाषा में बताया जाए कि उसके अधिकार क्या हैं और वह उनका लाभ कैसे ले सकता है।

दस्तावेजों की छोटी गलती बन जाती है बड़ी बाधा

गरीब परिवारों के लिए सरकारी योजनाओं की प्रक्रिया कई बार दस्तावेजों के कारण कठिन हो जाती है। आधार कार्ड, बैंक खाता, राशन कार्ड, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र या अन्य कागजात में किसी तरह की विसंगति होने पर आवेदन रुक सकता है।

नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर, जन्मतिथि की गलती या पते में बदलाव जैसी समस्या भी कई बार लाभार्थी को लंबे समय तक परेशान करती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए बार-बार प्रखंड, अंचल या जिला कार्यालय जाना आसान नहीं होता। मजदूरी छोड़कर सरकारी दफ्तर जाना उसके परिवार की रोज की आय को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में व्यवस्था को नागरिक के लिए आसान बनाने की जरूरत है, न कि नागरिक को व्यवस्था के पीछे दौड़ाने की।

बिचौलियों की भूमिका से बढ़ती है परेशानी

हर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को भ्रष्ट मानना उचित नहीं है। लेकिन जहां लाभार्थी और सरकारी व्यवस्था के बीच अनावश्यक बिचौलियों की भूमिका बढ़ती है, वहां पारदर्शिता कमजोर होने का खतरा रहता है।

गरीब व्यक्ति यदि अपने अधिकार और योजना की वास्तविक प्रक्रिया से अनजान है तो उसकी मजबूरी का फायदा उठाया जा सकता है। यही कारण है कि आवेदन से लेकर स्वीकृति और भुगतान तक प्रत्येक चरण की जानकारी लाभार्थी को सीधे उपलब्ध होनी चाहिए।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब पात्र व्यक्ति को किसी मध्यस्थ पर निर्भर न रहना पड़े।

लाभार्थियों की सूची कितनी सही है?

कई योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान और सूची सबसे महत्वपूर्ण चरण होती है। यदि सूची पुरानी है या उसमें सामाजिक-आर्थिक बदलाव दर्ज नहीं हुए हैं, तो वास्तविक जरूरतमंद परिवार बाहर रह सकते हैं।

किसी परिवार की आर्थिक स्थिति समय के साथ बदल सकती है। कोई परिवार गरीबी में जा सकता है, किसी परिवार का रोजगार छूट सकता है या किसी परिवार में ऐसी परिस्थिति पैदा हो सकती है जिसके कारण उसे सरकारी सहायता की जरूरत हो। इसलिए लाभार्थी सूची की नियमित समीक्षा जरूरी है।

साथ ही, पंचायत स्तर पर सूची को सार्वजनिक करना और आपत्ति दर्ज कराने की सरल व्यवस्था बनाना भी जरूरी है।

पटना से जारी आदेश गांव तक पहुंचना अलग चुनौती

बिहार जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था की अपनी चुनौतियां हैं। राजधानी से किसी योजना का आदेश जारी होना और उसका सही रूप में दूरदराज के गांव तक पहुंचना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

कर्मचारियों की कमी, काम का दबाव, दूरदराज के इलाकों तक पहुंच, विभागों के बीच समन्वय और निगरानी की कमजोरी योजनाओं की गति को प्रभावित कर सकती है।

किसी योजना की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने आवेदन स्वीकृत हुए। यह भी देखना चाहिए कि कितने परिवारों को वास्तविक और समय पर लाभ मिला।

डीबीटी से सुधार, लेकिन तकनीकी अड़चनें भी

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी ने सरकारी सहायता को सीधे बैंक खाते तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। इसका उद्देश्य बिचौलियों की भूमिका कम करना और भुगतान को अधिक पारदर्शी बनाना है।

लेकिन बैंक की दूरी, खाते से जुड़ी समस्या, तकनीकी त्रुटि, आधार संबंधी समस्या या भुगतान में देरी जैसी परेशानियां गरीब परिवार के लिए गंभीर हो सकती हैं।

जिस व्यक्ति के परिवार का खर्च पेंशन, छात्रवृत्ति या किसी सरकारी सहायता पर निर्भर है, उसके लिए भुगतान में देरी केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की समस्या है।

पैसा खर्च होना ही सफलता नहीं

सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल बजट खर्च होना नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि उस खर्च से आम नागरिक के जीवन में कितना बदलाव आया।

यदि आवास योजना का घर अधूरा है, नल लगा है लेकिन पानी नहीं आता, शौचालय बना है लेकिन उपयोगी नहीं है, छात्रवृत्ति स्वीकृत है लेकिन समय पर नहीं मिली या रोजगार योजना में काम चाहने वाले व्यक्ति को पर्याप्त काम नहीं मिला, तो कागजी उपलब्धि को पूर्ण सफलता नहीं कहा जा सकता।

विकास का मतलब आंकड़ों से आगे जाकर जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव है।

पंचायतों को बनाना होगा निगरानी का केंद्र

सरकारी योजनाओं की निगरानी में ग्राम सभा और पंचायतों की भूमिका मजबूत की जानी चाहिए। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके क्षेत्र में किस योजना के तहत कितना धन आया, किन लोगों को लाभ मिला और काम की वास्तविक स्थिति क्या है।

सामाजिक अंकेक्षण को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि जनता की निगरानी का प्रभावी माध्यम बनाया जाना चाहिए। शिकायत दर्ज करने और उसके समाधान की समयसीमा भी स्पष्ट होनी चाहिए।

यदि किसी गरीब व्यक्ति की शिकायत महीनों तक लंबित रहती है तो शिकायत निवारण व्यवस्था का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।

डिजिटल के साथ ऑफलाइन व्यवस्था भी जरूरी

सरकार डिजिटल सेवाओं का विस्तार कर रही है, जो जरूरी भी है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था के साथ सहायता केंद्रों और ऑफलाइन सहयोग को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पंचायत भवन, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र और जनसेवा केंद्रों के माध्यम से योजनाओं की जानकारी सरल भाषा में दी जा सकती है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कर्मी लोगों को आवेदन और दस्तावेज संबंधी प्रक्रिया समझा सकते हैं।

तकनीक गरीब व्यक्ति के लिए सुविधा बने, नई बाधा नहीं—नीतियों का लक्ष्य यही होना चाहिए।

गरीब को एहसान नहीं, अधिकार चाहिए

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक लक्ष्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। पात्र गरीब नागरिक सार्वजनिक संसाधनों से मिलने वाली सहायता का हकदार है। उसे अपने अधिकार के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने की स्थिति में नहीं होना चाहिए।

व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें पात्र व्यक्ति की पहचान हो, उसे योजना की जानकारी मिले, आवेदन सरल हो, दस्तावेज संबंधी समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर हो और भुगतान समय पर मिले।

बिहार में सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। असली चुनौती उनके प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन की है। विकास के बड़े आंकड़े तभी सार्थक होंगे जब उनका असर गांव के गरीब परिवार की रसोई, घर, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजगार में दिखाई देगा।

बिहार की प्रगति का वास्तविक पैमाना यही होना चाहिए कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी महसूस करे कि सरकार की योजना उसके जीवन तक पहुंची है। जब सरकारी योजना कागज से निकलकर जरूरतमंद के घर तक पहुंचेगी, तभी विकास वास्तव में समावेशी और सार्थक कहलाएगा।

आलोक कुमार



बुधवार, 26 अगस्त 2026

Bihar : समान अवसर की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया

 


प्रगति ग्रामीण विकास समिति: ग्रामीण बिहार में सामाजिक बदलाव की एक पहल

 ग्रामीण विकास का अर्थ केवल सड़क, बिजली और भवन बनाना नहीं है। असली विकास तब होता है, जब भूमिहीन परिवार अपने अधिकार जानें, महिलाएं निर्णय लेने में आगे आएं, बच्चों को शिक्षा मिले और वंचित समुदाय अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता हासिल करें। इसी सोच के साथ प्रगति ग्रामीण विकास समिति (PGVS) ग्रामीण बिहार में सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने वाली संस्था के रूप में अपनी भूमिका निभा रही है।

बिहार की ग्रामीण आबादी लंबे समय से गरीबी, भूमिहीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी चुनौतियों से जूझती रही है। सरकारी योजनाओं के बावजूद समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक अधिकार और सुविधाएं पहुंचाना आसान नहीं है। ऐसे में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका केवल सहायता पहुंचाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे समुदायों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक, संगठित और आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

वर्ष 1988 में स्थापित प्रगति ग्रामीण विकास समिति इसी व्यापक उद्देश्य के साथ ग्रामीण और वंचित समुदायों के बीच काम करने वाली संस्था के रूप में सामने आती है। संस्था का पंजीकृत कार्यालय पटना जिले के नौबतपुर में तथा प्रशासनिक कार्यालय दानापुर में बताया गया है। संस्था के अनुसार उसका कार्यक्षेत्र बिहार के 21 जिलों और 52 प्रखंडों तक फैला हुआ है। इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रदीप प्रियदर्शी हैं।

भूमि अधिकार से बदलाव की शुरुआत

ग्रामीण बिहार में जमीन केवल संपत्ति नहीं है। यह आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार है। भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन का अधिकार उनके जीवन की दिशा बदल सकता है। इसी कारण PGVS के प्रमुख कार्यक्षेत्रों में भूमि अधिकार को विशेष स्थान दिया गया है।

संस्था के अनुसार बिहार के 18 जिलों में ‘भूमि अधिकार मोर्चा’ का गठन किया गया है और करीब 1,000 गांवों के वंचित समुदायों को इससे जोड़ने की पहल की गई है। इसका उद्देश्य लोगों को भूमि संबंधी अधिकारों, सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक तथा कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी देना है।

भूमि विवाद या अधिकार से जुड़ी समस्याओं में जानकारी का अभाव अक्सर गरीब परिवारों की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। ऐसे में जागरूकता और सामुदायिक संगठन उन्हें अपनी समस्याओं को उचित मंच पर उठाने की क्षमता प्रदान कर सकते हैं।

महिला अधिकार और नेतृत्व

ग्रामीण विकास की चर्चा महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका परिवार और कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण होने के बावजूद संपत्ति, भूमि और निर्णय लेने के अधिकार में उन्हें कई बार बराबरी नहीं मिल पाती।

PGVS ‘महिला मंच’ के माध्यम से महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और सामुदायिक नेतृत्व में उनकी भागीदारी बढ़ाने पर जोर देती है। इसका व्यापक उद्देश्य महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया की सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करना है।

जब महिलाएं पंचायत, समुदाय और परिवार से जुड़े निर्णयों में अपनी बात मजबूती से रखने लगती हैं, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरे परिवार और समुदाय की सामाजिक सोच में बदलाव की संभावना पैदा होती है।

महादलित समुदाय के सशक्तिकरण पर जोर

बिहार में महादलित समुदाय लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक वंचना का सामना करता रहा है। इनमें मुसहर समुदाय जैसे समूहों की स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रही है। ऐसे समुदायों के लिए केवल सरकारी सहायता पर्याप्त नहीं होती। जरूरी है कि उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी मिले और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व विकसित हो।

PGVS का महादलित समुदायों के बीच काम इसी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। समुदायों को संगठित करना, अधिकारों की जानकारी देना और स्थानीय नेतृत्व विकसित करना उन्हें बाहरी सहायता पर निर्भर रहने के बजाय अपने सवालों के लिए आवाज उठाने में सक्षम बना सकता है।

सामाजिक परिवर्तन तभी स्थायी बनता है, जब समुदाय स्वयं अपनी समस्याओं और समाधानों की प्रक्रिया में भागीदार बने।

शिक्षा से खुलेगा भविष्य का रास्ता

किसी भी ग्रामीण विकास कार्यक्रम की सबसे मजबूत नींव शिक्षा है। वंचित परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच दिलाना केवल रोजगार की संभावनाएं बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चले आ रहे गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन के चक्र को तोड़ने का अवसर भी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक स्थिति, स्कूल तक पहुंच, पारिवारिक जिम्मेदारियां और जागरूकता की कमी बच्चों की शिक्षा में बाधा बन सकती है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सामुदायिक जागरूकता और सहयोग की पहल महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि एक गरीब परिवार का बच्चा शिक्षा हासिल कर अपने पैरों पर खड़ा होता है, तो उसका लाभ केवल उस बच्चे को नहीं मिलता। पूरा परिवार और अगली पीढ़ी भी उससे प्रभावित होती है।

स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छता

ग्रामीण विकास में स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। PGVS के कार्यों में WASH यानी Water, Sanitation and Hygiene से जुड़े कार्यक्रमों का उल्लेख किया जाता है।

दूषित पानी, खुले में शौच, साफ-सफाई की कमी और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का अभाव ग्रामीण समुदायों के लिए गंभीर चुनौती हो सकता है। इसलिए स्वास्थ्य सुधार केवल अस्पताल और दवाइयों तक सीमित नहीं होना चाहिए। सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ शौचालय, हाथ धोने की आदत और स्वच्छ वातावरण भी बीमारी रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

WASH जैसी पहल का वास्तविक उद्देश्य यही है कि समुदाय स्वास्थ्य को केवल बीमारी के बाद इलाज के रूप में नहीं, बल्कि बीमारी से बचाव की जिम्मेदारी के रूप में भी समझे।

डिजिटल साक्षरता की नई जरूरत

समय बदल रहा है और ग्रामीण विकास की चुनौतियां भी बदल रही हैं। आज सरकारी योजनाओं, बैंकिंग, शिक्षा, रोजगार, दस्तावेज और कई सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच तेजी से डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हो रही है।

ऐसे में डिजिटल साक्षरता ग्रामीण सशक्तिकरण का नया आधार बन सकती है। यदि किसी व्यक्ति को ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, सरकारी पोर्टल या आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, तो वह उपलब्ध सुविधाओं से वंचित रह सकता है।

इसलिए ग्रामीण विकास का आधुनिक मॉडल केवल जमीन, शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह सकता। डिजिटल दुनिया में भागीदारी भी अब सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

समुदाय बने बदलाव का केंद्र

PGVS के विभिन्न कार्यक्षेत्रों को एक साथ देखें तो इनमें एक साझा विचार दिखाई देता है—समुदाय की भागीदारी और अधिकार आधारित विकास। भूमि अधिकार, महिला सशक्तिकरण, महादलित नेतृत्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, WASH और डिजिटल साक्षरता जैसे विषय अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इनके केंद्र में ग्रामीण परिवारों की क्षमता को मजबूत करने का लक्ष्य है।

बिहार जैसे बड़े ग्रामीण राज्य में सरकारी व्यवस्था और आम नागरिक के बीच कई स्तरों पर दूरी हो सकती है। गैर-सरकारी संस्थाएं इस दूरी को कम करने में सेतु की भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि किसी भी संस्था की सफलता का मूल्यांकन केवल उसके कार्यक्रमों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता, समुदाय की भागीदारी और वास्तविक दीर्घकालिक परिणामों से किया जाना चाहिए।

बदलाव की राह लंबी है

ग्रामीण बिहार में सामाजिक परिवर्तन कोई एक दिन या एक योजना में पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। भूमिहीनता, गरीबी, सामाजिक असमानता, शिक्षा और रोजगार जैसी समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं। इसलिए इनके समाधान के लिए भी समग्र दृष्टिकोण जरूरी है।

प्रगति ग्रामीण विकास समिति का लगभग चार दशक लंबा सफर इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। यदि अधिकार आधारित सोच, स्थानीय नेतृत्व और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को लगातार मजबूत किया जाए, तो ग्रामीण समाज में स्थायी बदलाव की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

अंततः ग्रामीण विकास की असली कसौटी यह नहीं है कि कितने कार्यक्रम आयोजित हुए, बल्कि यह है कि कितने लोगों की जिंदगी में स्थायी बदलाव आया और कितने वंचित परिवार अपने अधिकारों के लिए स्वयं खड़े होने में सक्षम हुए। प्रगति ग्रामीण विकास समिति जैसी पहलें इसी सवाल को केंद्र में रखकर आगे बढ़ें, तो ग्रामीण बिहार में सामाजिक न्याय, आत्मनिर्भरता और समान अवसर की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया जा सकता है।

आलोक कुमार


Bihar : बांसकोठी ग्रोटो: आस्था, प्रार्थना और आध्यात्मिक शांति का अनोखा केंद्र

 बांसकोठी ग्रोटो: आस्था, प्रार्थना और आध्यात्मिक शांति का अनोखा केंद्र


पटना की भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच एक ऐसा शांत स्थल भी है, जहां कुछ पल ठहरकर इंसान अपनी चिंताओं, उम्मीदों और प्रार्थनाओं को ईश्वर के सामने रख सकता है—बांसकोठी ग्रोटो।

पटना की पहचान केवल ऐतिहासिक इमारतों, गंगा के तट और तेजी से बदलते शहरी जीवन से नहीं है। यह शहर धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक परंपराओं की भी समृद्ध भूमि रहा है। इसी धार्मिक-सांस्कृतिक परिवेश में बांसकोठी ग्रोटो का अपना विशिष्ट महत्व है। शांत वातावरण में स्थित यह स्थल विशेष रूप से ईसाई समुदाय के श्रद्धालुओं के लिए प्रार्थना, ध्यान और माता मरियम के प्रति भक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

ग्रोटो सामान्य रूप से गुफा या गुफानुमा संरचना को कहा जाता है, जहां ईसाई परंपरा में विशेष रूप से माता मरियम की प्रतिमा स्थापित कर प्रार्थना की जाती है। बांसकोठी ग्रोटो भी इसी मरियम भक्ति की परंपरा से जुड़ा स्थल है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय अलग होकर प्रार्थना, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

पटना की ईसाई धार्मिक विरासत भी काफी पुरानी है। बिहार पर्यटन से जुड़े विवरणों में पादरी की हवेली का उल्लेख 1772 से जुड़े ऐतिहासिक रोमन कैथोलिक चर्च के रूप में मिलता है। यह बिहार में ईसाई धार्मिक उपस्थिति की पुरानी विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसी व्यापक परंपरा में चर्चों, विद्यालयों और धार्मिक संस्थानों से जुड़े छोटे-बड़े प्रार्थना केंद्रों का भी अपना महत्व रहा है।

माता मरियम की भक्ति का केंद्र

कैथोलिक परंपरा में माता मरियम को श्रद्धा और सम्मान का विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें विश्वास, विनम्रता, समर्पण और मातृत्व की प्रतीक माना जाता है। इसी कारण दुनिया के अनेक देशों और शहरों में चर्च परिसरों तथा धार्मिक संस्थानों में मरियम के ग्रोटो बनाए जाते हैं।

बांसकोठी ग्रोटो में भी श्रद्धालुओं के लिए प्रार्थना का यही भाव प्रमुख है। यहां मोमबत्ती जलाना, पुष्प अर्पित करना, मौन प्रार्थना करना और परिवार तथा समाज के लिए मंगलकामना करना आस्था की अभिव्यक्ति बन सकता है। किसी के लिए यह धन्यवाद देने का स्थान हो सकता है, किसी के लिए संकट में सहारा और किसी के लिए भविष्य के लिए उम्मीद मांगने का।

इस तरह ग्रोटो यह संदेश देता है कि धार्मिक जीवन केवल बड़े आयोजनों और सामूहिक प्रार्थनाओं तक सीमित नहीं है। कई बार शांत वातावरण में कुछ मिनट की व्यक्तिगत प्रार्थना भी मनुष्य को भीतर से मजबूत बना सकती है।

भागदौड़ के बीच शांति की जरूरत

आज पटना तेजी से फैलता महानगर है। शिक्षा, रोजगार, व्यापार, यातायात और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ भागदौड़ और मानसिक दबाव भी बढ़े हैं। ऐसे समय में शांत धार्मिक स्थल लोगों को कुछ पल रुकने और स्वयं से संवाद करने का अवसर देते हैं।

बांसकोठी ग्रोटो का महत्व इसी दृष्टि से भी समझा जा सकता है। यहां आने वाला व्यक्ति किसी बड़े धार्मिक आयोजन का हिस्सा बने बिना भी प्रार्थना और ध्यान में समय बिता सकता है। पारिवारिक परेशानी, आर्थिक कठिनाई, बीमारी, व्यक्तिगत संकट या भविष्य की चिंता के बीच ऐसे स्थल मन को सांत्वना दे सकते हैं।

धार्मिक स्थलों की शक्ति केवल उनके निर्माण या वास्तुकला में नहीं होती। उनके साथ जुड़ी लोगों की भावनाएं, वर्षों की प्रार्थनाएं और श्रद्धालुओं की स्मृतियां किसी स्थान को विशेष पहचान देती हैं। यही भाव किसी साधारण संरचना को आस्था के केंद्र में बदल देता है।

सामाजिक सद्भाव का संदेश

बांसकोठी ग्रोटो को केवल एक धार्मिक समुदाय के स्थल के रूप में देखने के बजाय पटना की बहुलतावादी संस्कृति के हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित होगा। पटना का इतिहास विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के सह-अस्तित्व से जुड़ा रहा है।

ऐसे स्थल शांति, प्रेम, सेवा और सह-अस्तित्व का संदेश दे सकते हैं। ईसाई परंपरा में प्रार्थना के साथ गरीबों, बीमारों, कमजोरों और जरूरतमंदों की सेवा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए किसी ग्रोटो की धार्मिक पहचान के साथ उसका मानवीय और सामाजिक संदेश भी जुड़ा होता है।

आज जब समाज में कई बार छोटी-छोटी बातों पर दूरी और तनाव पैदा हो जाता है, तब धार्मिक स्थलों से निकलने वाला प्रेम और करुणा का संदेश और महत्वपूर्ण हो जाता है। आस्था यदि मनुष्य को दूसरे मनुष्य के प्रति संवेदनशील बनाती है, तो उसका सामाजिक प्रभाव भी सकारात्मक होता है।

संरक्षण और स्वच्छता भी जरूरी

बांसकोठी ग्रोटो जैसे धार्मिक स्थलों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। साफ-सफाई, हरियाली, पर्याप्त प्रकाश, सुरक्षित पहुंच और शांत वातावरण किसी भी प्रार्थना स्थल के लिए जरूरी हैं। यदि ऐसे स्थलों का व्यवस्थित संरक्षण किया जाए तो वे धार्मिक आस्था के साथ-साथ शहर की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा बन सकते हैं।

हालांकि विकास का अर्थ केवल निर्माण और सुविधाओं का विस्तार नहीं होना चाहिए। ऐसे स्थानों की मूल आध्यात्मिक प्रकृति को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है। अत्यधिक व्यावसायीकरण या अनावश्यक भीड़ किसी शांत प्रार्थना स्थल के वातावरण को प्रभावित कर सकती है। इसलिए विकास का उद्देश्य श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा देना होना चाहिए, स्थान की आत्मा को बदलना नहीं।

नई पीढ़ी के लिए भी संदेश

आज की युवा पीढ़ी तकनीक, सोशल मीडिया और तेज प्रतिस्पर्धा के दौर में जी रही है। ऐसे में आध्यात्मिक स्थान उन्हें कुछ समय डिजिटल दुनिया से दूर होकर आत्मचिंतन का अवसर दे सकते हैं। धार्मिक विश्वास अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन शांति, करुणा, अनुशासन और मानवीय संवेदना जैसे मूल्य सार्वभौमिक हैं।

बांसकोठी ग्रोटो इसी व्यापक अर्थ में नई पीढ़ी को यह संदेश दे सकता है कि जीवन में उपलब्धियों के साथ भीतर की शांति भी जरूरी है। मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, उसे अपने भीतर झांकने और अपनी संवेदनाओं से जुड़ने के लिए समय निकालना चाहिए।

आस्था का शांत संदेश

बांसकोठी ग्रोटो की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह शोर से दूर प्रार्थना की ओर बुलाता है। यहां आने वाला व्यक्ति अपनी चिंताओं को कुछ समय के लिए अलग रखकर ईश्वर के सामने स्वयं को समर्पित करने का अनुभव कर सकता है। किसी के लिए यह धन्यवाद की जगह है, किसी के लिए प्रार्थना की, किसी के लिए आशा की और किसी के लिए सांत्वना की।

पटना जैसे तेजी से बदलते शहर में ऐसे आध्यात्मिक केंद्रों का महत्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है। आधुनिकता और विकास के बीच मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए भी जगह चाहिए। बांसकोठी ग्रोटो इसी जरूरत की याद दिलाता है।

अंततः बांसकोठी ग्रोटो केवल पत्थर, प्रतिमा और प्रार्थना की जगह नहीं है। यह विश्वास, उम्मीद, विनम्रता और शांति का प्रतीक है। इसकी वास्तविक पहचान उन श्रद्धालुओं की भावनाओं में है, जो यहां आकर अपने जीवन की कठिनाइयों, खुशियों और उम्मीदों को ईश्वर के सामने रखते हैं।

ऐसे स्थल किसी भी शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं। बांसकोठी ग्रोटो भी यही संदेश देता है कि विकास की तेज रफ्तार के बीच प्रार्थना, करुणा, शांति और मानवीय संवेदना के लिए भी जगह बची रहनी चाहिए।


आलोक कुमार


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

India : राजनीति में बयानबाज़ी का बढ़ता स्तर और लोकतांत्रिक मर्यादा

 


राजनीति में बयानबाज़ी का बढ़ता स्तर और लोकतांत्रिक मर्यादा

 लोकतंत्र में तीखी आलोचना जरूरी है, लेकिन जब राजनीतिक बहस नीतियों से निकलकर व्यक्तिगत तंज और मेहनतकश लोगों की तुलना तक पहुंच जाए, तो सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं रहता। सवाल यह होता है कि देश की राजनीति जनता के मुद्दों पर बहस कर रही है या सुर्खियां बटोरने के लिए भाषा की सीमाएं पार कर रही है।

भारतीय राजनीति में तीखे बयान, राजनीतिक तंज और आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं। चुनावी राजनीति में नेताओं का एक-दूसरे पर निशाना साधना लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। सत्ता पक्ष विपक्ष की नीतियों पर सवाल उठाता है और विपक्ष सरकार के फैसलों की आलोचना करता है। यही राजनीतिक बहस लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब नीतियों और विचारों की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष लेने लगते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा से जुड़ा कथित बयान कि “गोलगप्पे और सब्जी बेचने वाले भी राहुल गांधी से कहीं ज्यादा समझदार हैं” इसी सवाल को सामने लाता है कि राजनीतिक असहमति की भाषा की मर्यादा आखिर कहां तक होनी चाहिए।

बयान का राजनीतिक संदर्भ समझना भी जरूरी है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की राजनीतिक समझ, उनके वक्तव्यों और नीतिगत दृष्टिकोण पर सवाल उठाती रही है। भाजपा के राजनीतिक विमर्श में राहुल गांधी को कमजोर राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश करना एक स्थापित रणनीति रही है। दूसरी ओर कांग्रेस ऐसे हमलों को व्यक्तिगत राजनीति और जनता से जुड़े वास्तविक सवालों से ध्यान हटाने का प्रयास बताती रही है।

राजनीतिक दलों के बीच यह मतभेद स्वाभाविक है। किसी नेता की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि आलोचना किस भाषा में की जाती है।

गोलगप्पे बेचने वाला या सब्जी बेचने वाला व्यक्ति कोई राजनीतिक मजाक का पात्र नहीं है। वह मेहनत करके अपना परिवार चलाता है। वह सुबह से रात तक बाजार, सड़क, मौसम, महंगाई और ग्राहकों के बदलते व्यवहार से जूझता है। उसके पास शायद राजनीतिक विज्ञान की डिग्री न हो, लेकिन जीवन का अनुभव जरूर होता है।

इसलिए जब किसी मेहनतकश व्यक्ति की तुलना किसी नेता को नीचा दिखाने के लिए की जाती है तो अनजाने में मेहनतकश वर्ग की गरिमा भी राजनीतिक तंज का हिस्सा बन जाती है। किसी नेता की आलोचना करनी है तो उसके फैसलों, बयानों, नीतियों और राजनीतिक प्रदर्शन पर सवाल उठाइए। गरीब या छोटे कारोबारी की रोजी-रोटी को तुलना का हथियार बनाना राजनीतिक बहस को मजबूत नहीं करता।

आज भारतीय राजनीति के सामने असली चुनौती भाषा से कहीं बड़ी है। देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक असमानता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे हैं। बिहार जैसे राज्यों में विकास, पलायन, उद्योग, शिक्षा और रोजगार की समस्याएं लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।

ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि सरकार रोजगार के कितने अवसर पैदा करेगी। शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयां कब पर्याप्त होंगी? किसानों की आय और लागत का संतुलन कैसे बनेगा? युवाओं को दूसरे राज्यों में रोजगार तलाशने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है?

इन सवालों के जवाब की जगह अगर राजनीतिक मंचों और टीवी बहसों में नेताओं की व्यक्तिगत टिप्पणियां ज्यादा जगह लेने लगें तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

राजनीति में व्यंग्य की जगह जरूर है। हास्य और तंज भी राजनीतिक संवाद का हिस्सा हो सकते हैं। विपक्ष की नीतियों पर तीखा हमला भी किया जा सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा का अर्थ यह नहीं कि आलोचना समाप्त कर दी जाए। इसका अर्थ यह है कि आलोचना व्यक्ति के अस्तित्व या सामाजिक पहचान पर नहीं, उसके सार्वजनिक कार्य और विचारों पर केंद्रित हो।

राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाना भाजपा का अधिकार है। उसी तरह कांग्रेस को भाजपा की नीतियों और नेताओं के बयानों पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन दोनों पक्षों से जनता यह अपेक्षा करती है कि आरोप के साथ तथ्य भी हों और आलोचना के साथ वैकल्पिक नीति भी हो।

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन दोनों की मजबूती केवल भाषणों की तीव्रता से नहीं, बल्कि तर्क की गुणवत्ता से तय होती है।

आज सोशल मीडिया ने राजनीतिक बयानबाजी की गति और प्रभाव दोनों बढ़ा दिए हैं। कुछ सेकंड का बयान मिनटों में वायरल हो जाता है। राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को इसका फायदा भी मिलता है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। एक वायरल बयान लाखों लोगों तक पहुंच सकता है और समाज में राजनीतिक संवाद की भाषा को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए राजनीतिक प्रवक्ताओं की भूमिका सिर्फ अपने दल का बचाव करना नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि उनके शब्द लोकतांत्रिक संस्कृति को किस दिशा में ले जा रहे हैं।

क्या राजनीति ऐसी हो जहां हर असहमति को दुश्मनी समझा जाए? या ऐसी हो जहां विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा माना जाए?

यह चुनाव राजनीतिक दलों को करना है।

जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। जब हम केवल विवादित बयानों को महत्व देते हैं और नीतिगत बहस को नजरअंदाज कर देते हैं, तब राजनीतिक दलों को भी पता चलता है कि सुर्खियों में आने का सबसे आसान रास्ता मुद्दों पर गंभीर चर्चा नहीं, बल्कि तीखा बयान है।

इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए मीडिया, राजनीतिक दल और मतदाता—तीनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। मीडिया को बयान के सनसनीखेज हिस्से के बजाय उसके तथ्य और संदर्भ पर सवाल करना चाहिए। दलों को अपने प्रवक्ताओं की भाषा को लेकर आचार-संहिता विकसित करनी चाहिए। और मतदाताओं को भी यह तय करना चाहिए कि वे नेताओं से मनोरंजन चाहते हैं या शासन और नीतियों पर जवाब।

आखिर लोकतंत्र में नेता स्थायी नहीं होते, लेकिन संस्थाएं और राजनीतिक संस्कृति लंबे समय तक रहती हैं। आज सत्ता पक्ष किसी विपक्षी नेता पर व्यक्तिगत हमला करेगा, कल वही भाषा उसके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।

इसलिए राजनीतिक मर्यादा किसी एक दल की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की जरूरत है।

जनता को नेताओं की जुबानी जंग नहीं, अपने जीवन से जुड़े सवालों के ठोस जवाब चाहिए। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास पर बहस जितनी मजबूत होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

राजनीति में शब्द हथियार हो सकते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सोच-समझकर होना चाहिए। व्यक्ति को हराने के लिए अपमान जरूरी नहीं और विरोधी विचार को कमजोर साबित करने के लिए मेहनतकश समाज की गरिमा को राजनीतिक तुलना में घसीटना भी उचित नहीं।

भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत यही होगी कि नेता एक-दूसरे को हराने के लिए भाषा को नीचे न गिराएं, बल्कि अपने तर्क, नीतियों और काम को इतना मजबूत बनाएं कि जनता खुद बेहतर विकल्प चुन सके।


आलोक कुमार


Bihar : लावारिस मरीजों के लिए वार्ड नहीं

 


लावारिस मरीजों के लिए वार्ड नहीं, फिर भी गुरमीत सिंह की सेवा जारी

 जिस पीएमसीएच में रोज हजारों मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां उन मरीजों का दर्द सबसे बड़ा सवाल बन जाता है जिनके सिरहाने अपना कोई नहीं होता। अलग वार्ड नहीं है, परिवार नहीं है, पहचान नहीं है—लेकिन पटना के गुरमीत सिंह हर रात ऐसे बेसहारा मरीजों के बीच पहुंचकर पूछते हैं, “क्या आपको दर्द हो रहा है?”

पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल यानी पीएमसीएच बिहार की राजधानी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सरकारी अस्पताल है। यहां बिहार के अलग-अलग जिलों से मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं। किसी के साथ परिवार के कई सदस्य होते हैं तो कोई अकेला बीमारी से जूझता हुआ अस्पताल पहुंचता है। लेकिन इन सबके बीच एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी पीड़ा सबसे ज्यादा अनदेखी रह जाती है—लावारिस, बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ मरीज।

इन मरीजों के पास न कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी कर सके, न दवा खरीदने वाला और न ही बीमारी के दौरान उनके सिरहाने बैठने वाला अपना। ऐसे मरीजों के लिए अस्पताल की व्यवस्था अपने आप में बड़ी चुनौती बन जाती है।

फिलहाल पीएमसीएच में लावारिस मरीजों के लिए अलग से कोई समर्पित वार्ड मौजूद नहीं है। अस्पताल के मेगा पुनर्विकास और निर्माण कार्य के दौरान पुराने लावारिस एवं कैदी वार्ड का भवन भी तोड़ा जा चुका है। ऐसे में इन मरीजों को सामान्य वार्डों या उपलब्ध वैकल्पिक स्थानों पर इलाज दिया जाता है। इससे इलाज के साथ-साथ उनकी निगरानी, पहचान, सुरक्षा और पुनर्वास की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

यह समस्या केवल अस्पताल के बिस्तर की नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें कोई व्यक्ति बीमार तो है, लेकिन उसके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं है।

यहीं पटना के गुरमीत सिंह की कहानी उम्मीद पैदा करती है।

पिछले दो दशकों से अधिक समय से गुरमीत सिंह बेसहारा मरीजों की सेवा कर रहे हैं। पेशे से कपड़ा कारोबारी गुरमीत सिंह के लिए यह सेवा किसी संस्था का अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी है। हर रात लगभग नौ बजे चिरैयाटांड़ स्थित अपनी रेडीमेड कपड़ों की दुकान से निकलकर वे पीएमसीएच पहुंचते हैं।

अस्पताल जाने से पहले वे मरीजों के लिए भोजन और जरूरत की दवाइयां लेकर निकलते हैं। अस्पताल पहुंचते ही वे मरीजों की स्थिति जानने की कोशिश करते हैं। उनका पहला सवाल अक्सर यही होता है—“क्या आपको दर्द हो रहा है?”

सवाल छोटा है, लेकिन जिस व्यक्ति के पास बीमारी के बीच अपनी बात सुनाने वाला कोई नहीं है, उसके लिए यह बेहद बड़ा सहारा है।

गुरमीत सिंह अकेले नहीं, बल्कि अपने चार भाइयों के सहयोग से वर्षों से इस सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी आय का एक हिस्सा जरूरतमंद मरीजों के भोजन और दवाओं पर खर्च होता है। उन्होंने इस काम को किसी अवसर विशेष तक सीमित नहीं रखा। रात-दर-रात अस्पताल पहुंचना और मरीजों की जरूरत पूरी करने की कोशिश करना उनकी नियमित दिनचर्या बन चुकी है।

मरीज उन्हें कई बार भगवान का दर्जा देते हैं। लेकिन गुरमीत सिंह खुद को किसी असाधारण व्यक्ति के रूप में पेश नहीं करते। उनके लिए यह सिर्फ एक इंसान के दूसरे इंसान के प्रति जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि किसी व्यक्ति का दर्द थोड़ा कम किया जा सकता है तो ऐसा जरूर किया जाना चाहिए।

उनकी सेवा को वर्ष 2016 में लंदन स्थित संस्था की ओर से ‘वर्ल्ड सिख अवॉर्ड’ की ‘सिख्स इन सेवा’ श्रेणी में सम्मान भी मिला। लेकिन किसी पुरस्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण वह भरोसा है जो उन मरीजों के बीच उन्होंने वर्षों में बनाया है जिनके पास अपने नाम के अलावा शायद कुछ भी नहीं है।

गुरमीत सिंह की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाती है। पहली तस्वीर उस व्यवस्था की है जहां बड़े अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं और नए भवनों की जरूरत है, लेकिन बेसहारा मरीजों के लिए समर्पित व्यवस्था अभी भी सवाल बनी हुई है। दूसरी तस्वीर समाज की संवेदना की है, जहां एक व्यक्ति अपनी कमाई और समय का हिस्सा ऐसे लोगों के लिए देता है जिनसे उसका कोई निजी रिश्ता नहीं है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या किसी एक व्यक्ति की सेवा को सरकारी व्यवस्था का विकल्प बनाया जा सकता है?

इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है।

गुरमीत सिंह जैसे संवेदनशील लोग व्यवस्था की कमी को कुछ हद तक भर सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान सरकार और अस्पताल प्रशासन को ही तैयार करना होगा। पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में लावारिस और मानसिक रूप से अस्वस्थ बेघर मरीजों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल होना चाहिए।

अस्पताल में ऐसे मरीज के पहुंचते ही उसकी पहचान, चिकित्सकीय स्थिति और सामाजिक पृष्ठभूमि का दस्तावेजीकरण हो। पुलिस और सामाजिक कल्याण विभाग के साथ समन्वय हो। संभावित परिजनों की तलाश के लिए प्रभावी तंत्र बनाया जाए। जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आश्रय, पुनर्वास केंद्र और संबंधित सामाजिक संस्थाओं से संपर्क कराया जाए।

महिला मरीजों के लिए विशेष सुरक्षा और आश्रय व्यवस्था भी जरूरी है। केवल इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है। इलाज के बाद मरीज जाएगा कहां—यह सवाल भी अस्पताल की जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।

पीएमसीएच का वर्तमान पुनर्निर्माण भविष्य की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए हो रहा है। ऐसे में नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई मरीज केवल इसलिए उपेक्षित न रह जाए क्योंकि उसके साथ कोई रिश्तेदार नहीं है।

अस्पताल की इमारत आधुनिक हो सकती है, मशीनें अत्याधुनिक हो सकती हैं और इलाज की सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की असली संवेदनशीलता तब साबित होगी जब वह उस मरीज के लिए भी उतनी ही जिम्मेदार हो जिसके पास अपना कहने वाला कोई नहीं है।

गुरमीत सिंह हर रात यही याद दिलाते हैं कि इंसानियत के लिए बहुत बड़े पद की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है दर्द को पहचानने वाली नजर और मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ की।

लेकिन अब समय है कि उनकी सेवा को प्रेरणा मानकर व्यवस्था भी आगे बढ़े। लावारिस मरीजों के लिए अलग वार्ड, पहचान की व्यवस्था, सुरक्षित देखभाल और पुनर्वास की स्पष्ट नीति पीएमसीएच की नई व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए।

क्योंकि किसी मरीज का परिवार उसके साथ हो या न हो, इलाज के अधिकार के साथ उसकी इंसानी गरिमा हमेशा उसके साथ होनी चाहिए।

आलोक कुमार

सोमवार, 24 अगस्त 2026

Bihar : दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन

  


किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को आवाज देते हैं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना में आयोजित इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट प्रतियोगिता ने विद्यार्थियों को इसी आवाज को मजबूत करने का मंच दिया।

पटना। आज शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना और परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करना नहीं रह गया है। बदलती दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन और समसामयिक मुद्दों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने पेरेंट-टीचर एसोसिएशन (PTA) के सहयोग से इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट इंग्लिश प्रतियोगिता का आयोजन किया।

प्रतियोगिता में 14 प्रमुख विद्यालयों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। अलग-अलग विद्यालयों से आए प्रतिभागियों ने अपने विचारों को अंग्रेजी भाषा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया और यह दिखाया कि नई पीढ़ी केवल विषयों को पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर विचार करने और तर्क के साथ अपनी बात रखने की क्षमता भी विकसित कर रही है।

प्रतियोगिता को जूनियर और सीनियर—दो श्रेणियों में बांटा गया था। दोनों वर्गों के विषय विद्यार्थियों की उम्र और बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखते हुए चुने गए थे। खास बात यह रही कि विषय ऐसे थे जिन पर केवल पक्ष या विपक्ष में बोलना पर्याप्त नहीं था। प्रतिभागियों को अपने तर्क के पीछे कारण, उदाहरण और विचार प्रस्तुत करने पड़े।

एआई के इस्तेमाल पर जूनियर वर्ग में जोरदार बहस

जूनियर वर्ग का विषय था—“स्कूल के असाइनमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।”

आज जब एआई शिक्षा का हिस्सा तेजी से बनता जा रहा है, तब इस विषय ने विद्यार्थियों को तकनीक के लाभ और उसकी सीमाओं पर सोचने का अवसर दिया। सवाल यह था कि क्या एआई विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता को बढ़ाने वाला उपकरण है या इसके अत्यधिक इस्तेमाल से मौलिक सोच प्रभावित हो सकती है।

विद्यार्थियों ने अपने-अपने पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए और यह साबित किया कि कम उम्र में भी वे तकनीक से जुड़े जटिल प्रश्नों पर गंभीरता से सोच सकते हैं।

जूनियर वर्ग में नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की अक्षिता सागर को प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता चुना गया। सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की कनिष्का मित्तल ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

वहीं नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ की आद्या श्री को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट माइकल्स हाई स्कूल के ऑडिटिक एडेन को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर चुना गया।

सीनियर वर्ग ने उठाया जीवन कौशल का सवाल

सीनियर वर्ग का विषय था—“जीवन कौशल अकादमिक सफलता से अधिक महत्वपूर्ण हैं।”

यह विषय सीधे विद्यार्थियों के भविष्य और सफलता की पारंपरिक धारणा से जुड़ा था। अच्छे अंक और शैक्षणिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन क्या केवल परीक्षा में सफलता ही जीवन में सफलता की गारंटी दे सकती है? निर्णय लेने की क्षमता, संवाद-कौशल, समस्या का समाधान, समय प्रबंधन और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने जैसे जीवन कौशल की भूमिका कितनी बड़ी है?

प्रतिभागियों ने इसी विषय के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा। किसी ने अकादमिक उपलब्धियों के महत्व को रेखांकित किया तो किसी ने जीवन में व्यवहारिक कौशल और मानवीय गुणों को अधिक महत्वपूर्ण बताया।

सीनियर वर्ग में सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता रहीं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की स्नेहा घोष ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ के हर्ष राज ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की हर्षिता सिन्हा को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट कैरेंस हाई स्कूल की प्रतीक्षा राज को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर का पुरस्कार दिया गया।

नोट्रे डेम एकेडमी ने जीती रनिंग ट्रॉफी

प्रतियोगिता की रनिंग ट्रॉफी नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने नाम की। मेजबान विद्यालय के लिए यह उपलब्धि विशेष गौरव का अवसर रही।

विद्यालय की प्राचार्य सिस्टर मैरी नेहा SND ने सभी प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों, निर्णायकों, मुख्य अतिथि और कार्यक्रम समन्वयक श्री देवव्रत के प्रयासों की सराहना की।

उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद-कौशल और आलोचनात्मक चिंतन को लगातार विकसित करने का आह्वान किया। उनके अनुसार, ऐसी प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा सामने रखने के साथ-साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती हैं।

निर्णायकों ने परखी प्रतिभा

प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में पटना वीमेंस कॉलेज के सांख्यिकी विभाग की प्रमुख डॉ. मून, पटना साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. सोवन चक्रवर्ती तथा मनेर हाई स्कूल की पूर्व प्राचार्य डॉ. शगुफ्ता यासमीन शामिल थीं।

मुख्य अतिथि के रूप में रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल के एमडी डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने प्रतियोगिता की सराहना की और आयोजन के लिए सहयोग भी प्रदान किया।

प्रतियोगिता का समन्वय PTA कोषाध्यक्ष श्री देवव्रत ने किया। PTA की पूरी टीम ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग दिया। PTA अध्यक्ष श्रीमती संचिता घोष के साथ श्री संभव गुप्ता, श्रीमती खुशबू चौधरी, श्रीमती श्वेता, श्रीमती सुभुही, श्रीमती चित्रा, मोहम्मद तनवीर, श्री आर.के. झा, मोहम्मद नायर और मोहम्मद मुशीर सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।

ट्रॉफी से आगे की कहानी

किसी डिबेट प्रतियोगिता को केवल पुरस्कारों और ट्रॉफी के नजरिए से देखना उसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना होगा। मंच पर खड़ा विद्यार्थी जब किसी कठिन विषय पर बोलता है, सामने बैठे लोगों के सवालों और तर्कों का सामना करता है तथा अपने विचारों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करता है, तब उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

डिबेट विद्यार्थियों को केवल बोलना नहीं सिखाती। यह उन्हें सुनना, असहमति को समझना और दूसरे पक्ष के तर्क का सम्मान करना भी सिखाती है।

आज सोशल मीडिया के दौर में किसी मुद्दे पर तुरंत राय बना लेना आसान है, लेकिन तथ्य समझकर तर्कपूर्ण राय बनाना कठिन। ऐसे समय में स्कूल स्तर की डिबेट प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों में विचारों की परिपक्वता विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।

नोट्रे डेम एकेडमी की यह पहल इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। जूनियर वर्ग में एआई जैसे आधुनिक विषय पर बहस और सीनियर वर्ग में जीवन कौशल जैसे व्यापक विषय पर विचार-विमर्श ने विद्यार्थियों को किताबों से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया के प्रश्नों से जोड़ने का काम किया।

कक्षा की किताबें ज्ञान का आधार बनाती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को जीवन से जोड़ते हैं।

यही कारण है कि ऐसी प्रतियोगिताएं केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होतीं। मंच पर बोले गए कुछ मिनट किसी विद्यार्थी के भीतर वर्षों तक आत्मविश्वास पैदा कर सकते हैं।

और जब शिक्षा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि सवाल पूछने, तर्क करने, असहमति समझने और अपनी बात जिम्मेदारी से रखने के लिए तैयार करती है, तभी शिक्षा वास्तव में जीवन की तैयारी बनती है।


आलोक कुमार