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महामहिम राज्यपाल सह कुलाधिपति अभियोजन की अनुमति देकर न्याय को शक्ति दें



पटना .निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के पुलिस अधीक्षक दिलीप कुमार मिश्र द्वारा महामहिम के प्रधान सचिव को निगरानी थाना कांड संख्या 10/2015 में नामजद अभियुक्त कुलपति, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा,  डॉ द्विजेंद्र गुप्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 एवं 1988 की धारा 197 दप्रस में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए आरोपित के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (2) सह पठित धारा 13 (1) (डी) 1988 एवं धारा 409, 420, 467, 468, 477 (ए), 34/120 (बी) भादवि के तहत अभियोजन की अनुमति के लिए अनुरोध किया गया है. विदित हो कि श्री द्विजेन्द्र गुप्ता ने लगभग डेढ़ करोड़ रूपए की Public Money का लूट किया है तथा अपने ऊँचे संपर्कों के कारण अब तक क़ानून से बचने का प्रयास करते रहे हैं. महामहिम से सादर प्रार्थना है कि इस मामले में अभियोजन की अनुमति देकर न्याय को शक्ति दें.

शिव प्रकाश राय 
अध्यक्ष  (नागरिक अधिकार मंच, बिहार),
चरित्रवन, धोबीघाट,
बक्सर (बिहार), ८०२१०१ 
मोबाईल नंबर- 9931290702


बिहार के गया में जन्मे दशरथ मांझी

गया। बिहार के गया में जन्मे दशरथ मांझी बहुत गरीब परिवार से थे। सही समय पर डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाने के कारन पत्नी फाल्गुनी देवी का निधन कम उम्र में हो गया था। तभी मांझी ने अकेले ही गेहलौर पहाड़ काट कर रास्ता बनाना शुरू किया। 22 साल बाद मांझी का सपना पूरा हुआ, उसने उस पहाड़ी की छाती चीर के 360 फुट लम्बा, 25 फुट गहरा और 30 फुट मीटर चौड़ा रास्ता बना डाला। पर्वत तोड़ने के बाद शहर से गांव तक की 70 KM दूरी केवल 7 KM रह गयी ।

दशरथ मांझी नाम के एक गरीब आदमी की.दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में बिहार के गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ. वे बिहार के  बहुत निम्न स्तरीय मुसहर जाति से है. उनकी पत्नी का नाम था फाल्गुनी देवी. दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी दुर्घटना की शिकार हुई. उसे तुरंत डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई. शहर उनके गॉंव से ७० किलोमीटर दूर था. वहॉं सब सुविधाए थी.लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था. दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव मेंफाल्गुनी देवी की मौत हो गई. ऐसा प्रसंग किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथमांझी को पछाड़ा. समीप के शहर की ७० किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती है इस दिशा मेंउनका विचार चक्र चलने लगा. उनके ध्यान में आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला पर्वत हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो जाएगी. पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक की सत्तरकिलोमीटर दूरी केवल सात किलोमीटर रह जाती. उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ निश्चय किया.लेकिन काम आसान नहीं था. इसके लिए उन्हें उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम छोडना पड़ता.उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छन्नी, हतोड़ा और फावडा खरीदा. अपनी झोपडी काम के स्थान के पासबनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे. इस काम से उनके परिवार को दुविधाओंका सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को खाली पेट ही काम करना पड़ा. उनके आस-पास सेलोगों का आना-जाना शुरू था. गॉंव में इस काम की चर्चा हो रही थी. सब लोगों ने दशरथ को पागल मानलिया था. उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र आलोचना सहनी पडती थी. लेकिन वे कभी भी अपने निश्चय सेनहीं डिगे. जैसे-जैसे काम में प्रगति होती उनका निश्चिय भी पक्का होता जाता. लगातार बाईस वर्षदिन-रात किए परिश्रम के कारण १९६० में शुरु किया यह असंभव लगने वाला काम १९८२ में पूरा हुआ.उनके अकेले के परिश्रम ने अजिंक्य लगने वाला पर्वत तोडकर ३६० फुट लंबा, २५ फुट ऊँचा और ३० फुटचौडा रास्ता बनाया. इससे गया जिले में के आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का अंतर दस किलोमीटरसे भी कम रह गया.उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी – जिसकी प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम पूरा किया, उस समय उनके पास नहीं थी. लेकिन, गॉंव के लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल दशरथजी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी सफलता की खुशी मनाई. युवक भी चॉंव से इस पर्वतको हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे है. गॉंव वालों ने दशरथ जी को ‘साधुजी’ पदवी दी है.दशरथ जी कहते है, ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वततोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में जलाई. करीब के हजारों लोग अपनी दैनंदिन आवश्यकताओंके लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला दृष्य मुझे दैनंदिनकार्य के लिए प्रेरणा देता था. इस कारण ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’।

आलोक कुमार

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