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6 सांसद ऐसे हैं, सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया

जब विकास के लिए पैसा मौजूद हो, लेकिन ज़मीन पर काम न दिखे—तो सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का होता है.


सांसद निधि: करोड़ों का बजट, लेकिन बिहार में क्यों उठे सवाल?

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) देश की उन महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल है, जिसके जरिए सांसद अपने-अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार विकास कार्य करा सकते हैं. इस योजना के तहत लोकसभा, राज्यसभा और मनोनीत सांसदों को हर साल ₹5 करोड़ (₹2.5 करोड़ की दो किस्तों में) की राशि मिलती है. यह पैसा सीधे सांसद को नहीं, बल्कि जिला कलेक्टर के माध्यम से स्वीकृत विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है.

एमपीएलएडीएस का उद्देश्य साफ है—पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक ढांचे जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास. योजना में यह भी प्रावधान है कि एससी क्षेत्रों के लिए 15% और एसटी क्षेत्रों के लिए 7.5% राशि खर्च की जाए, वहीं दिव्यांगों के लिए ₹10 लाख तक की सिफारिश संभव है.

कोविड-19 के दौरान यह योजना अस्थायी रूप से निलंबित रही, लेकिन 2021-22 से इसे फिर बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद बिहार से जुड़े आंकड़े अब सियासी बहस का कारण बन गए हैं.

बिहार के 6 सांसद और ‘शून्य खर्च’ का सवाल

18वीं लोकसभा के गठन को लगभग दो साल होने जा रहे हैं, लेकिन बिहार के 40 सांसदों में से 6 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने अब तक सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया. इन सांसदों में मीसा भारती, राजीव प्रताप रूड़ी, शांभवी चौधरी, राजीव रंजन सिंह, संजय जायसवाल और विवेक ठाकुर शामिल हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में बिहार के सांसदों को कुल मिलाकर ₹9.80 करोड़ प्रति सांसद की राशि मिली, लेकिन कुल खर्च महज़ ₹137.69 करोड़ ही हो सका. वहीं, कई सांसदों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया—जैसे अररिया से प्रदीप कुमार सिंह ने लगभग पूरी राशि खर्च कर सभी कार्य पूरे किए.

शांभवी चौधरी का पक्ष

समस्तीपुर से सांसद और देश की सबसे युवा लोकसभा सदस्य शांभवी चौधरी ने इस मुद्दे पर साफ कहा कि सांसद निधि का उपयोग उनका संवैधानिक अधिकार है, और वह किसी दबाव में जल्दबाज़ी में फंड खर्च नहीं करेंगी. उनके अनुसार, विकास कार्यों का चयन पार्टी और एनडीए कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा, ताकि क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिले.

बहस का असली मुद्दा

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एमपीएलएडीएस फंड का समयबद्ध और पारदर्शी उपयोग अब जनविश्वास से जुड़ा सवाल बन चुका है. जब कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तब करोड़ों रुपये का अप्रयुक्त रहना स्वाभाविक रूप से जनता को सोचने पर मजबूर करता है.

आने वाले समय में यही देखा जाना बाकी है कि बिहार के ये सांसद सांसद निधि को किस दिशा में, किन प्राथमिकताओं के साथ और कितनी तेजी से ज़मीन पर उतारते हैं—क्योंकि विकास सिर्फ़ घोषणा से नहीं, अमल से दिखाई देता है.   

आलोक कुमार                                                                                                                        

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