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एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस

युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे

पटना के सामाजिक और धार्मिक जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जो किसी पद, पहचान या नाम के मोहताज नहीं होते। ऐसे ही एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सच्ची सेवा और निष्ठा के लिए किसी विशेष मंच या प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने अपने कर्म, व्यवहार और त्याग से जो पहचान बनाई, वह उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वे संत मेरी स्कूल में क्रिसमस मिलन समारोह का आयोजन करते थे। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने और आपसी प्रेम व भाईचारे को बढ़ाने का माध्यम होता था। उनके नेतृत्व में ये कार्यक्रम अनुशासन, सादगी और समर्पण का उदाहरण बनते थे।

पटना के बांकीपुर क्षेत्र में ईसाई समुदाय के लिए बनी पैरिश थ्रिफ्ट एवं क्रेडिट सोसाइटी में उन्होंने पदेन सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई। यह संस्था आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता के लिए कार्य करती थी। जोसेफ फ्रांसिस ने यहां भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ सेवा दी। उनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक कार्य करना नहीं था, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।

उनका जुड़ाव संत विंसेंट डी पौल सोसाइटी से भी रहा। जब यह सोसाइटी कोलकाता से पटना आई, तब उन्होंने कुर्जी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। इसके बाद वे पटना पार्टिकुलर काउंसिल और पटना सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष बने। उनकी कार्यशैली इतनी प्रभावशाली थी कि उन्हें नेशनल काउंसिल का सदस्य भी बनाया गया। यह उनकी योग्यता, नेतृत्व क्षमता और सेवा भावना का प्रमाण है।

जोसेफ फ्रांसिस कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (सीआरएस) पटना में भी कार्यरत थे। यह संस्था गरीबों और जरूरतमंदों के लिए राहत कार्य करती है। यहां उन्होंने पूरी निष्ठा से काम किया, लेकिन परिस्थितियों ने एक कठिन मोड़ ले लिया। जेसुइट फादर रॉबर्ट डानहु के निधन के बाद, जब ब्रदर बर्नड सिंह अध्यक्ष बने, तो उनके कार्यकाल में सीआरएस को बंद कर दिया गया।

इस दौरान जोसेफ फ्रांसिस एक कठिन परिस्थिति में आ गए। वे अपनी नौकरी छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन उन पर घरेलू जांच की प्रक्रिया चलाने की बात कही गई। अपनी बेदाग छवि को बनाए रखने के लिए उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और नैतिकता को दर्शाता है। आर्थिक संकट के बावजूद उन्होंने कभी भी कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने हर परिस्थिति को धैर्य और विश्वास के साथ स्वीकार किया।

उनका पारिवारिक जीवन भी धार्मिक और सेवाभाव से प्रेरित था। उनके एक पुत्र नेपाल में जेसुइट ब्रदर हैं और एक संतान सिस्टर के रूप में सेवा कर रही हैं। उनकी एक बेटी संत जेवियर हाई स्कूल में शिक्षिका थीं। हालांकि, उनके परिवार को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब उनकी बेटी को एक साजिश के तहत गिरफ्तार करा दिया गया। यह घटना किसी भी परिवार को तोड़ सकती थी, लेकिन जोसेफ फ्रांसिस ने इसे भी धैर्य और विश्वास के साथ सहन किया।

उन्होंने अपने जीवन की हर पीड़ा और संघर्ष को प्रभु येसु ख्रीस्त को समर्पित कर दिया। उन्होंने कभी किसी के प्रति शिकायत या आरोप नहीं लगाया। उनका यह विश्वास और धैर्य उन्हें एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करता है।

जीवन के अंतिम दिनों में वे बीमार पड़े, लेकिन एक बार स्वस्थ भी हुए। अंततः लंबी बीमारी के बाद शनिवार को उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था के समान थे, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

उनकी अंतिम विदाई की तैयारियां भी पूरे सम्मान के साथ की जा रही हैं। राजन क्लेमेंट साह ने जानकारी दी कि 4 मई को दोपहर 3 बजे प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में पवित्र मिस्सा अर्पित किया जाएगा। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार कुर्जी कब्रिस्तान में किया जाएगा। फिलहाल उनका पार्थिव शरीर कुर्जी मोहल्ला में दर्शनार्थ रखा गया है, जहां लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं।

जोसेफ फ्रांसिस का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और विश्वास में होती है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम और आस्था बनाए रखना ही सबसे बड़ी शक्ति है। वे भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके आदर्श और उनके कार्य सदैव लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।

आलोक कुमार

टीम अनुभव और युवा प्रतिभा का संतुलित मिश्रण है

 सबसे बड़ी चर्चा युवा खिलाड़ी नंदिनी शर्मा के पहली बार टीम में चयन को लेकर है

Board of Control for Cricket in India ने इंग्लैंड में 12 जून 2026 से शुरू होने वाले ICC Women's T20 World Cup 2026 के लिए 15 सदस्यीय भारतीय महिला टीम की घोषणा कर दी है। इस टीम की कमान अनुभवी ऑलराउंडर Harmanpreet Kaur के हाथों में होगी, जबकि स्टार बल्लेबाज़ Smriti Mandhana को उप-कप्तान बनाया गया है। यह टीम अनुभव और युवा प्रतिभा का संतुलित मिश्रण है, जिससे भारत को इस बार खिताब जीतने की प्रबल दावेदार माना जा रहा है।

घोषित टीम में Shafali Verma, Jemimah Rodrigues, भारती फुलमाली, Deepti Sharma, Richa Ghosh (विकेटकीपर), श्री चरणी, Yastika Bhatia (विकेटकीपर), नंदिनी शर्मा, Arundhati Reddy, Renuka Singh Thakur, क्रांति गौड़, Shreyanka Patil और Radha Yadav शामिल हैं। इस टीम में हर विभाग में गहराई दिखाई देती है, जो इंग्लैंड की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।


इस चयन की सबसे बड़ी चर्चा युवा खिलाड़ी नंदिनी शर्मा के पहली बार टीम में चयन को लेकर है। उन्होंने Women's Premier League 2026 में Delhi Capitals के लिए शानदार प्रदर्शन कर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। उनकी बल्लेबाज़ी और फील्डिंग दोनों ही प्रभावशाली रही हैं, जिससे उन्हें इस बड़े मंच पर मौका मिला है। यह चयन भारतीय टीम में नई ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा।

दूसरी ओर, Yastika Bhatia और Radha Yadav की वापसी भी चर्चा का विषय है। यस्तिका अपनी तकनीकी रूप से मजबूत बल्लेबाज़ी के लिए जानी जाती हैं, जबकि राधा यादव एक उपयोगी ऑलराउंडर के रूप में टीम को संतुलन देती हैं। राधा की वापसी विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि वह पिछले कुछ समय से T20 अंतरराष्ट्रीय टीम से बाहर थीं, लेकिन घरेलू और फ्रैंचाइज़ी क्रिकेट में उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें फिर से टीम में जगह दिलाई।

राधा यादव का इंग्लैंड में पिछला रिकॉर्ड भी उनके चयन के पक्ष में जाता है। उन्होंने इंग्लैंड दौरे के दौरान भारत की T20I सीरीज़ जीत में अहम भूमिका निभाई थी और छह विकेट लेकर टीम की सफलता में योगदान दिया था। इसके अलावा, Royal Challengers Bangalore के लिए WPL 2026 में उनके प्रदर्शन ने भी उनकी उपयोगिता साबित की। उन्होंने न केवल गेंद से बल्कि बल्ले से भी टीम के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा सामने आई।


हालांकि, टीम चयन में कुछ बड़े नामों की गैरमौजूदगी ने भी सवाल खड़े किए हैं। Harleen Deol, Amanjot Kaur और Sneh Rana को टीम में शामिल नहीं किया गया है, जबकि काश्वी गौतम चोट के कारण बाहर हैं। इन खिलाड़ियों का हालिया प्रदर्शन अच्छा रहा है, ऐसे में उनका चयन न होना चयनकर्ताओं की रणनीति पर बहस को जन्म देता है। यह साफ है कि टीम मैनेजमेंट ने वर्तमान फॉर्म, फिटनेस और टीम संयोजन को प्राथमिकता दी है।

भारतीय टीम की ताकत उसकी बल्लेबाज़ी और ऑलराउंडरों की गहराई में नज़र आती है। Smriti Mandhana और Shafali Verma की ओपनिंग जोड़ी तेज शुरुआत देने में सक्षम है, जबकि मध्यक्रम में Harmanpreet Kaur और Jemimah Rodrigues जैसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ मौजूद हैं। विकेटकीपिंग में Richa Ghosh और Yastika Bhatia का विकल्प टीम को अतिरिक्त मजबूती देता है।

गेंदबाज़ी विभाग में Renuka Singh Thakur और Arundhati Reddy जैसी तेज गेंदबाज़ों के साथ स्पिन में Radha Yadav और Shreyanka Patil की मौजूदगी टीम को संतुलित बनाती है। इंग्लैंड की पिचों पर स्विंग और सीम मूवमेंट का फायदा उठाने के लिए यह आक्रमण काफी प्रभावी हो सकता है।

कुल मिलाकर, भारतीय महिला टीम इस बार संतुलित, प्रतिस्पर्धी और आत्मविश्वास से भरी हुई नजर आती है। ICC Women's T20 World Cup में भारत का अब तक का प्रदर्शन अच्छा रहा है, लेकिन खिताब जीतने का सपना अभी अधूरा है। इस बार टीम के पास अनुभव, युवा जोश और सही संयोजन है, जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत इतिहास रचने में सफल हो सकता है।


आलोक कुमार

स्वर्ग-नरक का डर: आस्था या शोषण?

 धरती पर रहने वाला मनुष्य हमेशा से वर्गों में बंटा रहा है—उच्च, मध्यम और निम्न

धरती पर रहने वाला मनुष्य हमेशा से वर्गों में बंटा रहा है—उच्च, मध्यम और निम्न। यह विभाजन केवल आर्थिक या सामाजिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और धार्मिक स्तर पर भी दिखाई देता है। जिस तरह जीवन में भेदभाव है, उसी तरह मृत्यु के बाद की दुनिया—जिसे हम “परलोक” कहते हैं—उसे भी तीन भागों में बाँट दिया गया है: स्वर्गलोक, शोधक अग्निलोक (पर्गेटरी) और नरकलोक। कहा जाता है कि यह सब मनुष्य के कर्मों के आधार पर तय होता है।

लेकिन सवाल यह है—क्या सच में ऐसा है? या फिर यह एक ऐसी अवधारणा है जिसे समाज में डर और नियंत्रण बनाए रखने के लिए गढ़ा गया है?

धर्मग्रंथों, पुरोहितों, मौलवियों और पादरियों के माध्यम से हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि यदि हम अच्छे कर्म करेंगे तो स्वर्ग मिलेगा, और यदि बुरे कर्म करेंगे तो नरक की यातना झेलनी पड़ेगी। यह विचार सुनने में सरल और नैतिक लगता है, लेकिन जब यही विचार डर का रूप ले लेता है, तब यह खतरनाक हो जाता है।

आज के वैज्ञानिक युग में, जब मनुष्य चाँद तक पहुँच चुका है, अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रहा है, तब भी स्वर्ग और नरक का कोई भौतिक प्रमाण नहीं मिला है। चंद्रमा पर कदम रखने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने भी “स्वर्ग का द्वार” या “नरक की अग्नि” नहीं देखी। इसका अर्थ यह नहीं कि आस्था गलत है, बल्कि यह दर्शाता है कि ये अवधारणाएँ वैज्ञानिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब इन प्रतीकों का उपयोग लोगों को डराने और उनसे लाभ कमाने के लिए किया जाता है।

एक छोटे से गाँव की कल्पना कीजिए। वहाँ एक गरीब परिवार रहता है। परिवार का मुखिया—पिता—कड़ी मेहनत करता है, लेकिन जीवनभर गरीबी से नहीं निकल पाता। एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है। घर में शोक का माहौल है, और उसका बेटा अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए चिंतित है।

यहीं से शुरू होता है “धार्मिक मार्गदर्शन” के नाम पर शोषण।

गाँव का एक पंडित आता है और कहता है, “अगर तुमने सही विधि से कर्मकांड नहीं किया, तो तुम्हारे पिता की आत्मा भटकती रहेगी, और उन्हें स्वर्ग नहीं मिलेगा।”

बेटा डर जाता है। वह पहले ही दुख में है, अब उसे यह डर भी सता रहा है कि कहीं उसके पिता को नरक में यातना न झेलनी पड़े।

पंडित उसे तरह-तरह के अनुष्ठान बताता है—दान, पूजा, हवन, ब्राह्मण भोज—और हर चीज के साथ जुड़ी होती है एक “दक्षिणा”।

गरीब बेटा अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है, कर्ज लेता है, लेकिन सब कुछ करता है—सिर्फ इस उम्मीद में कि उसके पिता को स्वर्ग मिल जाए।

यही कहानी किसी दूसरे रूप में अन्य धर्मों में भी दिखाई देती है। ईसाई समुदाय में भी मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना, मिस्सा (Mass) और दान की परंपरा है। कुछ जगहों पर यह धारणा बनाई जाती है कि विशेष प्रार्थना या चढ़ावे के माध्यम से आत्मा को “शोधक अग्नि” से निकालकर स्वर्ग में पहुँचाया जा सकता है।

यहाँ समस्या प्रार्थना या आस्था में नहीं है। समस्या तब है जब इसे एक “लेन-देन” बना दिया जाता है—जैसे स्वर्ग का टिकट पैसे से खरीदा जा सकता हो।

धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को सही रास्ता दिखाना था—सत्य, प्रेम, करुणा और न्याय की ओर ले जाना। लेकिन जब धर्म का उपयोग भय पैदा करने और आर्थिक लाभ कमाने के लिए होने लगे, तब वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है।

यह कहना गलत होगा कि सभी धार्मिक गुरु या पादरी ऐसे होते हैं। बहुत से लोग ईमानदारी से समाज की सेवा करते हैं, लोगों को सही मार्ग दिखाते हैं। लेकिन कुछ लोग, जो धर्म की आड़ में पाखंड फैलाते हैं, पूरे धार्मिक तंत्र को बदनाम कर देते हैं।

आज जरूरत है जागरूकता की।

जरूरत है यह समझने की कि—

क्या हम जो कर रहे हैं, वह हमारी आस्था से प्रेरित है या हमारे डर से?

अगर कोई कहता है कि “पैसा दो, तभी स्वर्ग मिलेगा”, तो यह सवाल उठाना जरूरी है।

अगर कोई गरीब व्यक्ति अपने परिवार की जरूरतों को छोड़कर केवल डर के कारण धार्मिक कर्मकांड पर खर्च कर रहा है, तो यह सोचने की बात है।

सच्ची श्रद्धा वह होती है जिसमें दिखावा नहीं होता, और न ही कोई लेन-देन।

सच्चा धर्म वह है जो इंसान को इंसानियत सिखाए, न कि डर के माध्यम से उसे कमजोर बनाए।

अंत में, स्वर्ग और नरक कहीं दूर आकाश या धरती के नीचे नहीं हैं।

वे हमारे कर्मों और हमारे समाज में ही मौजूद हैं।

जब हम किसी की मदद करते हैं, न्याय करते हैं, प्रेम और करुणा दिखाते हैं—वहीं स्वर्ग है।

और जब हम किसी का शोषण करते हैं, डर फैलाते हैं, या अन्याय करते हैं—वहीं नरक है।

इसलिए जरूरी है कि हम आस्था रखें, लेकिन आंख बंद करके नहीं—बल्कि समझ और विवेक के साथ।

आलोक कुमार

पत्रकारिता और लोकतंत्र के मूल्यों से गहराई से जुड़ा

तीन मई का महत्व विश्व स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता और लोकतंत्र के मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ 


वर्ष
का हर दिन अपने भीतर किसी न किसी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या सामाजिक महत्व को समेटे होता है। 3 मई भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण दिन है, जो विश्व स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता और लोकतंत्र के मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह दिन मुख्य रूप से विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा भी 3 मई से जुड़ी कई ऐतिहासिक घटनाएँ और प्रेरणादायक प्रसंग इस दिन को खास बनाते हैं।

सबसे पहले बात करते हैं विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की, जो 3 मई को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी। इस दिन का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करना, पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करना और उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि देना है, जिन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपनी जान गंवाई। लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक, मीडिया का दायित्व होता है कि वह समाज को सही और निष्पक्ष जानकारी प्रदान करे। ऐसे में प्रेस की स्वतंत्रता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है।

आज के समय में जब सूचना का प्रवाह अत्यंत तेज हो गया है, तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि पत्रकार बिना किसी दबाव या भय के सच्चाई को सामने ला सकें। कई देशों में आज भी पत्रकारों को सेंसरशिप, धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में 3 मई का दिन हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि समाज की जरूरत भी है।

इसके अलावा, 3 मई का दिन कई ऐतिहासिक घटनाओं का भी साक्षी रहा है। उदाहरण के तौर पर, 3 मई 1939 को सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की थी। यह संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक नई विचारधारा और संघर्ष की दिशा को दर्शाता था। सुभाष चंद्र बोस का यह कदम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।

3 मई को ही 1913 में भारत की पहली पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था, जिसे दादा साहेब फाल्के ने बनाया था। यह घटना भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस फिल्म ने भारतीय फिल्म उद्योग की नींव रखी, जो आज विश्व के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक है।

इसके साथ ही, 3 मई को कई महान व्यक्तित्वों का जन्म और निधन भी हुआ है। यह दिन हमें उनके योगदान को याद करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करता है। इतिहास के पन्नों में दर्ज इन घटनाओं और व्यक्तित्वों के कारण 3 मई का महत्व और भी बढ़ जाता है।

सामाजिक दृष्टिकोण से भी यह दिन महत्वपूर्ण है। यह हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को समझने और उसकी रक्षा के लिए जागरूक रहने की प्रेरणा देता है। एक स्वस्थ समाज वही होता है, जहाँ लोग अपने विचारों को खुलकर व्यक्त कर सकें और जहाँ मीडिया स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके। 3 मई हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने समाज में इन मूल्यों को सही तरीके से लागू कर पा रहे हैं या नहीं।

शैक्षणिक और जागरूकता के स्तर पर भी इस दिन का विशेष महत्व है। विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों और संस्थानों में इस दिन संगोष्ठियों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के महत्व के बारे में बताया जाता है। इससे नई पीढ़ी में जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।

अंततः, 3 मई केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता, सच्चाई और जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना अनिवार्य है। साथ ही, यह हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, 3 मई का महत्व बहुआयामी है—यह ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है। हमें इस दिन के महत्व को समझते हुए न केवल इसे मनाना चाहिए, बल्कि इसके संदेश को अपने जीवन में भी अपनाना चाहिए।


आलोक कुमार

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  प्रशिक्षण के बाद Apprenticeship और अनुभव रोजगार में कितने महत्वपूर्ण हैं? कौशल प्रमाणपत्र से नौकरी तक पहुंचने में अप्रेंटिसशिप की अहम भूमि...