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India : FCRA 2026: विदेशी फंड पर शिकंजा या सेवा संस्थानों पर संकट?


सवाल सिर्फ चर्च का नहीं, उन करोड़ों भारतीयों का भी है जिन्हें स्कूल, अस्पताल, छात्रावास और सामाजिक सेवाएँ मिलती हैं ।

पटना। विदेशी चंदे और उससे जुड़े संगठनों की निगरानी किसी भी संप्रभु देश के लिए जरूरी है। विदेशी धन का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित के खिलाफ, अवैध गतिविधियों या वित्तीय अनियमितताओं के लिए न हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। लेकिन Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर उठ रही बहस ने एक महत्वपूर्ण सवाल सामने ला दिया है—क्या विदेशी फंड पर निगरानी की प्रक्रिया इतनी कठोर हो सकती है कि उसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जुड़ी संस्थाओं पर भी पड़ने लगे?

FCRA Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य उन परिस्थितियों में विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए व्यवस्था तैयार करना है, जब किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाए, संस्था स्वयं उसे वापस कर दे या उसका पंजीकरण समाप्त हो जाए। प्रस्तावित व्यवस्था में **Designated Authority** की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

यही प्रावधान अब ईसाई संगठनों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के बीच सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।

सिर्फ पंजीकरण नहीं, संपत्ति का भी सवाल

मौजूदा बहस का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र समाप्त होने के बाद विदेशी अंशदान से जुड़ी परिसंपत्तियों के साथ क्या किया जाएगा।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी परिसंपत्तियाँ नामित प्राधिकरण के अधीन आ सकती हैं। प्राधिकरण इन परिसंपत्तियों को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकता है, सरकारी संस्थाओं को हस्तांतरित कर सकता है अथवा निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनका निपटारा कर सकता है। धार्मिक स्थल से जुड़ी परिसंपत्तियों के मामले में उनकी धार्मिक प्रकृति बनाए रखने का भी प्रावधान प्रस्तावित है।

यहीं से ईसाई संस्थाओं की चिंता शुरू होती है। उनका तर्क है कि किसी संस्था की FCRA स्थिति में प्रशासनिक या अनुपालन संबंधी विवाद होने का असर केवल विदेशी धन पर नहीं, बल्कि उन परिसंपत्तियों पर भी पड़ सकता है जिनका इस्तेमाल वर्षों से स्कूल, अस्पताल, छात्रावास, प्रशिक्षण केंद्र या सामाजिक सेवा के लिए होता आया है।

हालांकि सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तावित कानून को पूर्वव्यापी तरीके से लागू नहीं किया जाएगा। हालिया राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में आश्वासन सामने आया है।

धर्मांतरण’ की बहस भी महत्वपूर्ण

FCRA से जुड़ी बहस केवल संपत्ति और विदेशी फंड तक सीमित नहीं है। ईसाई संगठनों के बीच यह चिंता भी है कि धार्मिक गतिविधियों और अवैध धर्मांतरण के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट रहना चाहिए।

भारत में धार्मिक विश्वास रखना, उसका पालन करना और उसके बारे में प्रचार करना संविधान के तहत संरक्षित अधिकारों से जुड़ा विषय है। दूसरी ओर, जबरन, धोखे या प्रलोभन के माध्यम से धर्मांतरण जैसे आरोप अलग कानूनी सवाल हैं।

इसलिए किसी भी कानून की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो **धार्मिक स्वतंत्रता और अवैध गतिविधि के बीच स्पष्ट सीमा** निर्धारित करे।

प्रार्थना, धार्मिक शिक्षा, अपने विश्वास की जानकारी देना और सामाजिक सेवा को स्वतः धर्मांतरण नहीं माना जा सकता। वहीं यदि किसी संस्था के खिलाफ कानून तोड़ने के ठोस प्रमाण हैं तो जांच और कार्रवाई से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

यही संतुलन FCRA की वास्तविक परीक्षा है।

चर्च का सवाल नहीं, सार्वजनिक सेवा का सवाल

भारत में ईसाई समुदाय से जुड़ी अनेक संस्थाएँ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रही हैं। इनके स्कूलों और कॉलेजों में बड़ी संख्या में गैर-ईसाई विद्यार्थी भी पढ़ते हैं। अस्पतालों और क्लीनिकों में इलाज कराने वाले मरीज किसी एक धर्म से नहीं आते। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अनेक संस्थाएँ छात्रावास, स्वास्थ्य सेवा, कौशल प्रशिक्षण और सामाजिक विकास से जुड़े कार्यक्रम चलाती हैं।

इसीलिए FCRA की बहस को केवल 'सरकार बनाम चर्च’के रूप में देखना सही नहीं होगा।

यदि किसी संस्था के विदेशी फंड में गड़बड़ी है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी प्रशासनिक विवाद के कारण संस्था का FCRA प्रमाणपत्र प्रभावित होता है, तो यह भी देखना होगा कि उसका असर उन हजारों विद्यार्थियों, मरीजों और गरीब परिवारों पर न पड़े जो उसकी सेवाओं पर निर्भर हैं।

सेवा का लाभ लेने वाले व्यक्ति का धर्म नहीं पूछा जाता।

कठोर कानून जरूरी, लेकिन पारदर्शी प्रक्रिया भी

सरकार का तर्क है कि विदेशी योगदान की निगरानी राष्ट्रीय हित और वित्तीय पारदर्शिता के लिए जरूरी है। FCRA पोर्टल के अनुसार देश में हजारों संस्थाएँ विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकृत हैं, जबकि बड़ी संख्या में प्रमाणपत्र रद्द या समाप्त भी हो चुके हैं।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार कितनी कठोर कार्रवाई कर सकती है। सवाल यह भी होना चाहिए कि कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और न्यायपूर्ण है।

किस आधार पर पंजीकरण रद्द होगा?

नवीनीकरण क्यों रोका जाएगा?

संस्था को अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलेगा?

अपील की प्रक्रिया क्या होगी?

और सबसे महत्वपूर्ण—किसी परिसंपत्ति पर अंतिम निर्णय लेने से पहले संस्था को कौन-सी कानूनी सुरक्षा मिलेगी?

इन सवालों के स्पष्ट उत्तर कानून और उसके नियमों में होना जरूरी है।

सरकार और संस्थाओं दोनों की जिम्मेदारी

इस बहस में केवल सरकार से सवाल करना पर्याप्त नहीं है। FCRA के तहत काम करने वाली संस्थाओं को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड, विदेशी दान के स्रोत, खर्च और परियोजनाओं के बारे में पूर्ण पारदर्शिता रखनी चाहिए।

यदि किसी संस्था ने कानून का उल्लंघन किया है, विदेशी धन का दुरुपयोग किया है या वित्तीय नियमों को तोड़ा है तो कार्रवाई का विरोध केवल धार्मिक या संस्थागत पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए।

लेकिन सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। धार्मिक, सामाजिक या गैर-सरकारी संस्था—सभी के लिए एक समान पारदर्शिता और अनुपालन मानक लागू हों। कार्रवाई राजनीतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून के आधार पर हो।

आखिर में सवाल आम नागरिक का है

FCRA Amendment Bill, 2026 की बहस को केवल विदेशी फंड की राजनीति के रूप में देखना आसान है। लेकिन इसके प्रभाव का असली पैमाना कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।

अगर किसी स्कूल की वित्तीय व्यवस्था प्रभावित होती है तो सवाल उस स्कूल के धर्म का नहीं, वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य का है।

अगर किसी अस्पताल की गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं तो सवाल संस्था की धार्मिक पहचान का नहीं, इलाज के लिए पहुंचे मरीज का है।

अगर किसी छात्रावास या ग्रामीण सेवा केंद्र की गतिविधियाँ रुकती हैं तो उसका असर उस गरीब परिवार पर पड़ेगा जिसे सरकारी व्यवस्था के बाहर किसी संस्था से मदद मिल रही थी।

इसलिए FCRA को पारदर्शिता का मजबूत कानून जरूर बनना चाहिए, लेकिन भय और अनिश्चितता का माध्यम नहीं।

विदेशी धन पर निगरानी होनी चाहिए। राष्ट्रीय हित की रक्षा होनी चाहिए। वित्तीय अनियमितता पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कानून की प्रक्रिया स्पष्ट, निष्पक्ष और न्यायिक समीक्षा के योग्य हो।

क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि स्कूल किस धर्म की संस्था चलाती है।

सवाल यह है कि उस स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा कौन है।

सवाल यह नहीं है कि अस्पताल किस समुदाय का संगठन चलाता है।

सवाल यह है कि अस्पताल के दरवाजे पर इलाज के लिए खड़ा मरीज कौन है।

और यही FCRA 2026 की सबसे बड़ी कसौटी है—विदेशी फंड पर नियंत्रण मजबूत हो, लेकिन भारत की सार्वजनिक सेवा व्यवस्था कमजोर न हो।

कानून कठोर हो, लेकिन न्यायपूर्ण भी।

निगरानी मजबूत हो, लेकिन पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों की कीमत पर नहीं।


आलोक कुमार

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