India : क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती


33 साल का इंतजार, हजारों घंटे की मेहनत और आखिरकार टीम इंडिया की टेस्ट कैप—सारांश जैन ने साबित कर दिया कि क्रिकेट में प्रतिभा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

हर खिलाड़ी 19 या 21 साल की उम्र में टीम इंडिया नहीं पहुंचता। कुछ सपनों को 33 साल तक पसीने, संघर्ष और इंतजार की आग में तपना पड़ता है। सारांश जैन की कहानी यही बताती है कि क्रिकेट में सफलता का कोई तय कैलेंडर नहीं होता। प्रतिभा, धैर्य और निरंतर प्रदर्शन यदि साथ हों, तो मंजिल देर से सही, लेकिन मिलती जरूर है।

भारतीय क्रिकेट में पिछले कुछ वर्षों से कम उम्र के खिलाड़ियों की सफलता सबसे बड़ी चर्चा का विषय रही है। 18-19 साल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखते हैं और उन्हें भविष्य का सुपरस्टार घोषित कर दिया जाता है। यह बदलते दौर की वास्तविकता भी है, क्योंकि आधुनिक क्रिकेट में फिटनेस, आक्रामकता और तेजी से प्रदर्शन करने की अपेक्षा बढ़ गई है। लेकिन इसी माहौल में जब 33 वर्षीय मध्य प्रदेश के ऑलराउंडर सारांश जैन को पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिलती है, तो यह केवल एक खिलाड़ी के चयन की खबर नहीं रहती, बल्कि भारतीय क्रिकेट की सोच और व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करने वाली घटना बन जाती है।

सारांश जैन का चयन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय क्रिकेट में घरेलू प्रदर्शन का मूल्य अब भी कायम है। लंबे समय तक रणजी ट्रॉफी और अन्य घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार शानदार प्रदर्शन करने वाले इस खिलाड़ी ने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। 54 प्रथम श्रेणी मैचों में 188 विकेट और 2,223 रन किसी भी ऑलराउंडर के लिए उत्कृष्ट रिकॉर्ड माना जाएगा। दो शतक और 14 अर्धशतक यह साबित करते हैं कि वे केवल गेंद से ही नहीं, बल्कि बल्ले से भी टीम के लिए संकटमोचक साबित हो सकते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता केवल आंकड़े नहीं, बल्कि निरंतरता रही है। भारतीय घरेलू क्रिकेट में ऐसे कई खिलाड़ी मिल जाएंगे जिन्होंने एक या दो सीजन शानदार खेले, लेकिन लगातार कई वर्षों तक प्रदर्शन बनाए रखना हर किसी के बस की बात नहीं होती। सारांश ने यही किया। हर सीजन खुद को बेहतर बनाया और चयनकर्ताओं के सामने अपनी दावेदारी मजबूत करते रहे।

हाल के श्रीलंका दौरे पर इंडिया-ए टीम के लिए उनका प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ। नाबाद 70 रन और छह विकेट लेकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बड़े मंच पर भी वे दबाव को अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं। वहीं 2025-26 रणजी सीजन में 518 रन और 30 विकेट लेकर उन्होंने यह संदेश दिया कि उनका चयन किसी सहानुभूति का परिणाम नहीं, बल्कि प्रदर्शन का पुरस्कार है।

सारांश जैन की कहानी केवल क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक परिवार का संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास भी जुड़ा हुआ है। उनके पिता सुबोध जैन स्वयं रणजी क्रिकेटर रहे, लेकिन जब सारांश अपने करियर की नींव रख रहे थे, तब पिता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने बेटे का मनोबल टूटने नहीं दिया। दूसरी ओर, उनके बड़े भाई ने अपने क्रिकेट करियर को पीछे छोड़कर सारांश के सपनों को प्राथमिकता दी। किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, इसका यह जीवंत उदाहरण है।

आज के समय में खेलों में त्वरित सफलता की मानसिकता विकसित हो चुकी है। यदि कोई खिलाड़ी दो-तीन वर्षों में राष्ट्रीय टीम तक नहीं पहुंचता, तो उसे लगभग भुला दिया जाता है। सोशल मीडिया और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में सारांश जैन का चयन युवा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक संदेश है कि देर से मिलने वाली सफलता भी उतनी ही मूल्यवान होती है जितनी जल्दी मिलने वाली।


भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू ढांचा रहा है। रणजी ट्रॉफी, दलीप ट्रॉफी, ईरानी कप और इंडिया-ए जैसी प्रतियोगिताएं वर्षों से ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करती रही हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। यदि इन प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को अवसर नहीं मिलेगा, तो घरेलू क्रिकेट का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगेगा। सारांश जैन का चयन इस व्यवस्था में खिलाड़ियों का विश्वास और मजबूत करता है।

यह चयन चयनकर्ताओं की सोच में संतुलन का भी संकेत देता है। भारतीय क्रिकेट में युवा खिलाड़ियों को अवसर देना आवश्यक है, लेकिन अनुभव की उपेक्षा करना भी उचित नहीं। टेस्ट क्रिकेट विशेष रूप से ऐसा प्रारूप है जिसमें तकनीक, धैर्य और मानसिक मजबूती की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। ऐसे में लंबे घरेलू अनुभव वाले खिलाड़ी टीम को संतुलन प्रदान कर सकते हैं।

हालांकि चयन के बाद असली चुनौती अब शुरू होती है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट घरेलू क्रिकेट से कहीं अधिक कठिन है। यहां हर गेंद की परीक्षा होती है, हर गलती की कीमत चुकानी पड़ती है और हर प्रदर्शन पूरे देश की निगाहों में होता है। लेकिन जिस खिलाड़ी ने 33 वर्षों तक अपने सपने को जिंदा रखा हो और लगातार मेहनत की हो, उसके लिए दबाव कोई नई बात नहीं होगी। उनका अनुभव और परिपक्वता भारतीय टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

सारांश जैन की कहानी भारतीय युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश छोड़ती है। आज की पीढ़ी अक्सर सफलता में थोड़ी देरी होते ही निराश हो जाती है। लेकिन जीवन और खेल दोनों में हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। किसी को मंजिल जल्दी मिलती है, किसी को देर से; महत्वपूर्ण यह है कि प्रयास कभी बंद न हों। मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास अंततः अपना परिणाम देते हैं।

यह कहानी यह भी याद दिलाती है कि प्रतिभा की पहचान केवल उम्र से नहीं होनी चाहिए। कई बार अनुभव वह परिपक्वता देता है जो युवा जोश से भी अधिक प्रभावी साबित होती है। क्रिकेट जैसे लंबे प्रारूप वाले खेल में यही अनुभव कई बार मैच का परिणाम बदल देता है।

अंततः, 33 वर्ष की उम्र में मिला पहला टेस्ट कॉल केवल सारांश जैन की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह भारतीय घरेलू क्रिकेट की विश्वसनीयता, परिवार के त्याग, वर्षों की मेहनत और अटूट धैर्य की जीत है। जब भी कोई युवा खिलाड़ी अपने सपनों को अधूरा समझकर निराश होगा, उसे सारांश जैन की यह कहानी जरूर याद रखनी चाहिए। क्योंकि सपनों की कोई उम्र नहीं होती—उन्हें पूरा करने का साहस, निरंतर मेहनत और सही समय पर मिलने वाला अवसर ही उनकी असली पहचान बनता है।

आलोक कुमार

India: जंतर-मंतर की गूंज: क्या विपक्षी एकजुटता से बदलेगी देश की राजनीति?

जंतर-मंतर आंदोलन के बाद वाम दलों ने विपक्षी एकजुटता को नई दिशा देने का संकेत दिया है। सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक तालमेल शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों पर देशव्यापी जनआंदोलन का रूप ले पाएगा, या फिर यह केवल बैठकों और बयानों तक सीमित रह जाएगा?

नई दिल्ली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) [CPI(ML)] के शीर्ष नेताओं की बैठक केवल एक औपचारिक राजनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत भी है, जिसमें छात्र-युवा आंदोलन, रोजगार, शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं।

सीपीआई(एमएल) के केंद्रीय कार्यालय चारु भवन में आयोजित इस बैठक में तीनों दलों के नेताओं ने सबसे पहले कॉमरेड चारु मजूमदार की 54वीं शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्षी एकजुटता पर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जंतर-मंतर आंदोलन को मिली ऐतिहासिक सफलता को बताया गया। वाम दलों ने कहा कि छात्र-युवा संगठनों और CJP के नेतृत्व में चले आंदोलन ने जिस साहस, रचनात्मकता और दृढ़ता का परिचय दिया, उसने केंद्र सरकार को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक के लिए मजबूर कर दिया। नेताओं का मानना है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनदबाव की ताकत का उदाहरण है।

तीनों दलों ने सरकार से मांग की कि जंतर-मंतर समझौते का पूरी तरह सम्मान किया जाए और आंदोलन में शामिल छात्रों तथा युवाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई तुरंत बंद की जाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता।

बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि जंतर-मंतर का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ है। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाना, युवाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना तथा भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता सुनिश्चित करना अब आगे की लड़ाई के प्रमुख मुद्दे होंगे।

वाम दलों ने केवल छात्र राजनीति तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ट्रेड यूनियन, किसान, खेत मजदूर और महिला संगठनों के बीच भी व्यापक समन्वय बढ़ाने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, निजीकरण और कॉरपोरेट प्रभाव के कारण आम जनता पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में संगठित जनआंदोलन की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।

बैठक में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग भी दोहराई गई। वाम नेताओं का कहना है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़े बिना लोकतंत्र को पूर्ण रूप से प्रतिनिधिक नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही तीनों दलों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों पर कथित हमलों के विरुद्ध साझा संघर्ष को और तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया।

हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी राजनीतिक बयान या आंदोलन का अंतिम मूल्यांकन जनता करती है। वाम दलों की यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह आने वाले समय में छात्र आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों और चुनावी राजनीति में उनके प्रदर्शन से तय होगा। केवल साझा बयान पर्याप्त नहीं होंगे; जमीनी स्तर पर व्यापक जनसंपर्क, वैकल्पिक नीतियां और सतत आंदोलन ही उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को मजबूत कर सकते हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन ने यह संकेत अवश्य दिया है कि यदि युवाओं के मुद्दे, शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर व्यापक सामाजिक समर्थन बनता है, तो उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब देखना यह है कि यह एकजुटता केवल बैठकों और प्रस्तावों तक सीमित रहती है या वास्तव में देशव्यापी जनआंदोलन का रूप लेती है।

लोकतंत्र में असहमति, संवाद और जनभागीदारी ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि राजनीतिक दल जनता के वास्तविक मुद्दों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ते हैं, तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनकर रह जाता है, तो जनता का विश्वास फिर से जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए आने वाले महीनों में वाम दलों की इस नई रणनीति की असली परीक्षा मैदान में होगी, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं में।

आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...