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India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?


क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है?

20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा।

यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है?

लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे

लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक्रिया पर पड़ा।

सबसे चिंताजनक आंकड़ा प्रश्नकाल को लेकर सामने आता है। PRS के अनुसार लोकसभा में प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय का केवल लगभग 1 प्रतिशत ही चल पाया। राज्यसभा में भी प्रश्नकाल करीब 12 प्रतिशत समय तक ही चल सका।

प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और इन सवाल-जवाबों के माध्यम से सरकारी नीतियों और योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

यदि प्रश्नकाल ही लगातार बाधित होता रहे, तो सरकार से जवाब मांगने का यह संवैधानिक-लोकतांत्रिक मंच कमजोर पड़ता है।

राज्यसभा ने अपेक्षाकृत अधिक काम किया, लेकिन तस्वीर फिर भी चिंताजनक

राज्यसभा ने लोकसभा की तुलना में अधिक समय काम किया। उसने करीब 37.4 घंटे काम किया, जो निर्धारित समय का लगभग 33 प्रतिशत था। फिर भी इसका अर्थ है कि निर्धारित समय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाया।

सरकार की ओर से उत्पादकता के अलग आंकड़े भी सामने आए हैं—लोकसभा के लिए करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा के लिए लगभग 39 प्रतिशत। अलग-अलग गणना पद्धतियों के कारण इन आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।

लेकिन आंकड़ा चाहे 15 प्रतिशत हो या 19 प्रतिशत, 33 प्रतिशत हो या 39 प्रतिशत—बड़ी तस्वीर एक ही है: संसद के पास उपलब्ध समय का बहुत बड़ा हिस्सा सार्थक कामकाज में नहीं बदल पाया।

फिर 12 विधेयक कैसे पारित हुए?

यहीं इस सत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

सत्र की शुरुआत में 30 विधेयक लंबित थे। सत्र के दौरान 13 नए विधेयक पेश किए गए और 12 विधेयक पारित हुए। इसके बावजूद सत्र के अंत में 31 विधेयक लंबित रह गए।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—जब संसद के पास बहस के लिए सीमित समय था, तब विधायी काम इतनी तेजी से कैसे हुआ?

यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

कानून बनाना जरूरी है, लेकिन कानून की गुणवत्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संसद में किसी विधेयक पर चर्चा का उद्देश्य केवल सांसदों को बोलने का अवसर देना नहीं होता। चर्चा के दौरान विधेयक की कमियां सामने आती हैं, संभावित प्रभावों पर विचार होता है, संशोधन सुझाए जाते हैं और सरकार को अपने प्रस्ताव का पक्ष स्पष्ट करना पड़ता है।

कानून बनाना और कानून पर बहस करना अलग बातें हैं

संसद कोई ऐसी मशीन नहीं है जहां विधेयक आए और मतदान के बाद कानून बन जाए।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधेयक पर विचार, बहस, संशोधन और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। कई बार विपक्ष की आपत्ति सरकार को किसी प्रावधान को बेहतर बनाने के लिए मजबूर कर सकती है। संसदीय समितियां भी विधेयकों की विस्तृत जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

यदि चर्चा का समय कम हो जाए, तो कानून की कमियां सदन के रिकॉर्ड पर आने की संभावना भी घटती है।

यही कारण है कि किसी विधेयक का पारित हो जाना अपने आप में संसदीय लोकतंत्र की पूरी सफलता नहीं माना जा सकता।

सवाल यह है कि कानून बनने से पहले उस पर कितनी गंभीरता से विचार हुआ?

व्यवधान की राजनीति किसका नुकसान करती है?

संसद में हंगामे को लेकर सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराता है। विपक्ष दूसरी ओर आरोप लगाता है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है।

दोनों पक्षों के अपने राजनीतिक तर्क हो सकते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है—संसद का समय जनता का समय है।

संसद की कार्यवाही बाधित होने का मतलब केवल कुछ घंटे कम काम होना नहीं है। इसका असर प्रश्नकाल, विधायी चर्चा, निजी सदस्य कार्य, शून्यकाल और अन्य संसदीय गतिविधियों पर पड़ता है।

संसद चलाने की लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। यदि प्रति मिनट खर्च का अनुमान लगाया जाए, तो व्यवधान की आर्थिक कीमत भी बड़ी हो सकती है। लेकिन संसद के समय का सबसे बड़ा नुकसान केवल पैसे में नहीं मापा जा सकता।

लोकतंत्र में खोया हुआ बहस का समय वापस नहीं आता।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है

संसद के व्यवधान के लिए केवल विपक्ष को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं है।

सरकार के पास बहुमत है, उसके पास विधायी एजेंडा है और संसदीय कार्य संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करे और विपक्ष को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर दे।

यदि सरकार बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कर सकती है, तब भी लोकतांत्रिक वैधता केवल संख्या से नहीं आती। कानून जितना व्यापक प्रभाव डालता है, उस पर चर्चा की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।

दूसरी ओर विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर विरोध का उद्देश्य संसद को अनिश्चितकाल तक रोकना नहीं होना चाहिए।

सरकार को जवाबदेह बनाना और संसद को निष्क्रिय कर देना—दो अलग-अलग रणनीतियां हैं।

विपक्ष को ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें सरकार से कठिन सवाल भी पूछे जाएं और सदन की कार्यवाही भी चलती रहे।

सबसे बड़ा नुकसान जनता का

संसद में प्रश्नकाल नहीं चलता तो उसका असर आम नागरिक तक पहुंचता है।

किसी क्षेत्र में अस्पताल की समस्या हो, सड़क की स्थिति खराब हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो, किसानों की परेशानी हो, शिक्षा व्यवस्था में कमी हो या किसी सरकारी योजना का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा हो—इन मुद्दों को सांसद संसद में उठाते हैं।

जब सदन नहीं चलता, तो ऐसे सवाल रिकॉर्ड पर आने का अवसर भी कम हो जाता है।

इसी तरह जब किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर पर्याप्त बहस नहीं होती, तो जनता यह समझने का अवसर खो देती है कि कानून में क्या बदलाव किए जा रहे हैं और उनका प्रभाव किस पर पड़ेगा।

संसद में शोर केवल टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला राजनीतिक दृश्य नहीं है। उसके पीछे जनता की आवाज और जनता के सवाल भी दब सकते हैं।

अब जरूरी है संसदीय आत्ममंथन

2026 का मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है।

19 बैठकें। लोकसभा का लगभग 17.5 घंटे काम। राज्यसभा का करीब 37.4 घंटे काम। प्रश्नकाल का बेहद सीमित संचालन और इसके बावजूद 12 विधेयकों का पारित होना।

यह आंकड़े संसद की उत्पादकता से आगे जाकर उसकी कार्यशैली पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विधेयक पर्याप्त चर्चा और संसदीय जांच के बाद आगे बढ़ें। विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध का तरीका लोकतांत्रिक संवाद को पूरी तरह बंद न कर दे। संसद अध्यक्षों और सभापति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है कि सदन में व्यवधान कम हो और सदस्यों को नियमों के भीतर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।

क्योंकि संसद केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। वह केवल विपक्ष की भी नहीं है।

संसद जनता की है।

इसलिए सरकार से कठिन सवाल पूछे जाएं। विपक्ष तीखा विरोध करे। विधेयकों पर व्यापक चर्चा हो। असहमति को जगह मिले। लेकिन अंततः संसद चले।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कानून बनने से पहले जनता के प्रतिनिधियों को उस पर बोलने, सवाल करने, संशोधन सुझाने और सरकार को जवाबदेह बनाने का पर्याप्त अवसर मिले।

अगर विधेयक पास होते रहें, लेकिन बहस का समय लगातार घटता जाए, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—विचार-विमर्श—कमजोर पड़ सकती है।

और संसद की असली ताकत केवल उसके पारित कानूनों की संख्या में नहीं, बल्कि उन कानूनों पर हुई गंभीर बहस में दिखाई देती है।


आलोक कुमार

India : धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?

 धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?


क्या किसी राज्य को ‘चर्च-मुक्त’ बनाने की मांग धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से टकराती है?

ओडिशा।भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में धर्म का कोई स्थान नहीं होगा, बल्कि यह है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना आधिकारिक धर्म नहीं मानता और नागरिकों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में जब किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसा नारा सामने आता है, तो यह केवल राजनीतिक बयान नहीं रह जाता। इसके साथ संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ जाते हैं।

भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की नींव संविधान लागू होने के समय से ही मौजूद थी। संविधान की प्रस्तावना में 1976 के 42वें संविधान संशोधन के बाद ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द स्पष्ट रूप से जोड़ा गया। हालांकि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और सभी नागरिकों के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी पहले से ही संविधान का हिस्सा थी।

भारत में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अनेक अन्य धार्मिक समुदाय अपनी-अपनी आस्था और परंपराओं के साथ रहते हैं। यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की विशेष पहचान है। इसलिए किसी धार्मिक समुदाय या उसकी संस्थाओं को राज्य से पूरी तरह बाहर करने की मांग को संविधान की कसौटी पर परखना आवश्यक हो जाता है।

अनुच्छेद 25 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण या निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के साथ-साथ संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन इस अधिकार पर कानून द्वारा उचित सीमाएं लगाई जा सकती हैं।

इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को धर्म मानने की स्वतंत्रता है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी धार्मिक संस्था की गतिविधि कानून का उल्लंघन करती है, तो सरकार जांच और कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

इसी तरह अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है।

यहीं से ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक परीक्षण शुरू होता है।

चर्च की आलोचना और ईसाई समुदाय की स्वतंत्रता अलग विषय

किसी चर्च की संस्था, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, किसी व्यक्ति के आचरण या किसी कथित अवैध गतिविधि की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था में की जा सकती है। कोई भी धार्मिक संस्था कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी संस्था पर कानून तोड़ने, जबरन धर्मांतरण या किसी अन्य अपराध का आरोप है, तो उसके खिलाफ निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए।

लेकिन किसी संस्था की आलोचना और पूरे धार्मिक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाना एक ही बात नहीं है।

यदि ‘चर्च-मुक्त’ का अर्थ यह है कि किसी राज्य में चर्च भवन, ईसाई उपासना या ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियां ही समाप्त कर दी जाएं, तो यह प्रश्न सीधे धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ जाएगा।

दूसरी ओर, यदि नारे का आशय केवल उन गतिविधियों पर रोक लगाने से है जिन्हें कानून अवैध मानता है, तो उसका संवैधानिक मूल्यांकन अलग होगा। इसलिए किसी भी नारे को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ, उद्देश्य और वास्तविक कार्रवाई के प्रस्ताव से समझना जरूरी है।

क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध है?

भारतीय धर्मनिरपेक्षता को धर्म-विरोध के रूप में समझना सही नहीं होगा। भारतीय मॉडल में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता मिलती है और राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करने का संवैधानिक दायित्व निभाता है।

साथ ही, राज्य सामाजिक सुधार, सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक संस्थाओं से संबंधित कुछ गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक संस्थाओं की आलोचना नहीं की जा सकती।

लेकिन यही सिद्धांत सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

यदि किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त’ की मांग को केवल इसलिए स्वीकार्य मान लिया जाए क्योंकि वह एक खास धार्मिक संस्था के खिलाफ है, तो यही कसौटी अन्य धर्मों के मामलों में भी लागू करनी पड़ेगी। कल्पना कीजिए कि कोई ‘मंदिर-मुक्त राज्य’, ‘मस्जिद-मुक्त राज्य’ या ‘गुरुद्वारा-मुक्त राज्य’ बनाने का नारा लगाए। क्या ऐसी मांग को केवल राजनीतिक नारा कहकर छोड़ दिया जाएगा?

धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परीक्षा यही है कि पसंद और नापसंद के आधार पर संवैधानिक सिद्धांत न बदलें।

कानून का शासन सबसे ऊपर

किसी भी धार्मिक संस्था के खिलाफ शिकायत है तो उसका समाधान कानून के माध्यम से होना चाहिए। जांच हो, प्रमाण जुटाए जाएं, दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो और निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए।

यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का रास्ता है।

किसी समुदाय की सामूहिक धार्मिक पहचान को निशाना बनाना और किसी विशिष्ट अपराध या अवैध गतिविधि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना दो अलग-अलग बातें हैं। संविधान व्यक्ति को अधिकार देता है, लेकिन राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह कानून का समान रूप से पालन कराए।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त’ जैसे नारों पर बहस करते समय यह पूछा जाना चाहिए कि वास्तव में मांग किस चीज की है—किसी अवैध गतिविधि पर कार्रवाई की, किसी संस्था की जांच की, या किसी धार्मिक समुदाय की सार्वजनिक और धार्मिक उपस्थिति को समाप्त करने की?

इन सवालों के जवाब के बिना किसी नारे को पूरी तरह संवैधानिक या असंवैधानिक घोषित करना जल्दबाजी होगी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी सीमा है

लोकतंत्र में राजनीतिक नारे और तीखी आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। किसी विचार से असहमति व्यक्त करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन संविधान में एक अधिकार का अस्तित्व दूसरे नागरिकों के अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं करता।

इसीलिए सार्वजनिक बहस में शब्दों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना तथ्य और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए। पूरे समुदाय को अपराधी या राष्ट्रविरोधी बताना न केवल सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है, बल्कि संवैधानिक समानता और गरिमा के सिद्धांतों के सामने भी गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

ओडिशा के संदर्भ में असली सवाल

‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक मूल्यांकन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात इसका वास्तविक आशय है। यदि उद्देश्य किसी विशेष गैरकानूनी गतिविधि को रोकना है, तो सरकार कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है। यदि उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, तो पारदर्शिता और कानूनी जांच की मांग लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकती है।

लेकिन यदि लक्ष्य किसी धार्मिक समुदाय को उसकी आस्था, पूजा या धार्मिक पहचान के कारण राज्य के सार्वजनिक जीवन से बाहर करना है, तो यह संविधान के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सिद्धांतों से गंभीर टकराव पैदा करेगा।

भारत की शक्ति इस बात में नहीं है कि यहां केवल एक प्रकार की आस्था दिखाई दे। भारत की शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग आस्थाओं वाले लोग एक ही संविधान के तहत नागरिक के रूप में समान अधिकारों के साथ रह सकें।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ हो या किसी अन्य धार्मिक समुदाय को हटाने का नारा—उसकी संवैधानिकता का पैमाना एक ही होना चाहिए: क्या मांग कानून के शासन, समानता और नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करती है?

अंततः भारत का संविधान किसी धर्म के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने के बजाय नागरिकों के अधिकारों और कानून के शासन की रक्षा करता है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना हो सकती है, जांच हो सकती है और कानून तोड़ने पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को केवल उसकी पहचान के आधार पर समाप्त करने का विचार भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की मूल भावना से मेल नहीं खाता।

इसलिए बहस ‘चर्च-मुक्त’ या ‘चर्च-समर्थक’ होने की नहीं, बल्कि ‘संविधान-सम्मत’ होने की होनी चाहिए।

भारत का रास्ता किसी धर्म को मिटाने का नहीं, बल्कि कानून के सामने सभी को समान रखने का रास्ता है। यही धर्मनिरपेक्षता की असली कसौटी और भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।


आलोक कुमार

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