✦ Latest News Loading...

सोमवार, 17 अगस्त 2026

India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?


क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है?

20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा।

यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है?

लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे

लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक्रिया पर पड़ा।

सबसे चिंताजनक आंकड़ा प्रश्नकाल को लेकर सामने आता है। PRS के अनुसार लोकसभा में प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय का केवल लगभग 1 प्रतिशत ही चल पाया। राज्यसभा में भी प्रश्नकाल करीब 12 प्रतिशत समय तक ही चल सका।

प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और इन सवाल-जवाबों के माध्यम से सरकारी नीतियों और योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

यदि प्रश्नकाल ही लगातार बाधित होता रहे, तो सरकार से जवाब मांगने का यह संवैधानिक-लोकतांत्रिक मंच कमजोर पड़ता है।

राज्यसभा ने अपेक्षाकृत अधिक काम किया, लेकिन तस्वीर फिर भी चिंताजनक

राज्यसभा ने लोकसभा की तुलना में अधिक समय काम किया। उसने करीब 37.4 घंटे काम किया, जो निर्धारित समय का लगभग 33 प्रतिशत था। फिर भी इसका अर्थ है कि निर्धारित समय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाया।

सरकार की ओर से उत्पादकता के अलग आंकड़े भी सामने आए हैं—लोकसभा के लिए करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा के लिए लगभग 39 प्रतिशत। अलग-अलग गणना पद्धतियों के कारण इन आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।

लेकिन आंकड़ा चाहे 15 प्रतिशत हो या 19 प्रतिशत, 33 प्रतिशत हो या 39 प्रतिशत—बड़ी तस्वीर एक ही है: संसद के पास उपलब्ध समय का बहुत बड़ा हिस्सा सार्थक कामकाज में नहीं बदल पाया।

फिर 12 विधेयक कैसे पारित हुए?

यहीं इस सत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

सत्र की शुरुआत में 30 विधेयक लंबित थे। सत्र के दौरान 13 नए विधेयक पेश किए गए और 12 विधेयक पारित हुए। इसके बावजूद सत्र के अंत में 31 विधेयक लंबित रह गए।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—जब संसद के पास बहस के लिए सीमित समय था, तब विधायी काम इतनी तेजी से कैसे हुआ?

यह सवाल केवल सरकार से नहीं, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

कानून बनाना जरूरी है, लेकिन कानून की गुणवत्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संसद में किसी विधेयक पर चर्चा का उद्देश्य केवल सांसदों को बोलने का अवसर देना नहीं होता। चर्चा के दौरान विधेयक की कमियां सामने आती हैं, संभावित प्रभावों पर विचार होता है, संशोधन सुझाए जाते हैं और सरकार को अपने प्रस्ताव का पक्ष स्पष्ट करना पड़ता है।

कानून बनाना और कानून पर बहस करना अलग बातें हैं

संसद कोई ऐसी मशीन नहीं है जहां विधेयक आए और मतदान के बाद कानून बन जाए।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विधेयक पर विचार, बहस, संशोधन और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। कई बार विपक्ष की आपत्ति सरकार को किसी प्रावधान को बेहतर बनाने के लिए मजबूर कर सकती है। संसदीय समितियां भी विधेयकों की विस्तृत जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

यदि चर्चा का समय कम हो जाए, तो कानून की कमियां सदन के रिकॉर्ड पर आने की संभावना भी घटती है।

यही कारण है कि किसी विधेयक का पारित हो जाना अपने आप में संसदीय लोकतंत्र की पूरी सफलता नहीं माना जा सकता।

सवाल यह है कि कानून बनने से पहले उस पर कितनी गंभीरता से विचार हुआ?

व्यवधान की राजनीति किसका नुकसान करती है?

संसद में हंगामे को लेकर सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराता है। विपक्ष दूसरी ओर आरोप लगाता है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचती है।

दोनों पक्षों के अपने राजनीतिक तर्क हो सकते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है—संसद का समय जनता का समय है।

संसद की कार्यवाही बाधित होने का मतलब केवल कुछ घंटे कम काम होना नहीं है। इसका असर प्रश्नकाल, विधायी चर्चा, निजी सदस्य कार्य, शून्यकाल और अन्य संसदीय गतिविधियों पर पड़ता है।

संसद चलाने की लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। यदि प्रति मिनट खर्च का अनुमान लगाया जाए, तो व्यवधान की आर्थिक कीमत भी बड़ी हो सकती है। लेकिन संसद के समय का सबसे बड़ा नुकसान केवल पैसे में नहीं मापा जा सकता।

लोकतंत्र में खोया हुआ बहस का समय वापस नहीं आता।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है

संसद के व्यवधान के लिए केवल विपक्ष को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं है।

सरकार के पास बहुमत है, उसके पास विधायी एजेंडा है और संसदीय कार्य संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करे और विपक्ष को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर दे।

यदि सरकार बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कर सकती है, तब भी लोकतांत्रिक वैधता केवल संख्या से नहीं आती। कानून जितना व्यापक प्रभाव डालता है, उस पर चर्चा की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।

दूसरी ओर विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर विरोध का उद्देश्य संसद को अनिश्चितकाल तक रोकना नहीं होना चाहिए।

सरकार को जवाबदेह बनाना और संसद को निष्क्रिय कर देना—दो अलग-अलग रणनीतियां हैं।

विपक्ष को ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें सरकार से कठिन सवाल भी पूछे जाएं और सदन की कार्यवाही भी चलती रहे।

सबसे बड़ा नुकसान जनता का

संसद में प्रश्नकाल नहीं चलता तो उसका असर आम नागरिक तक पहुंचता है।

किसी क्षेत्र में अस्पताल की समस्या हो, सड़क की स्थिति खराब हो, बेरोजगारी का मुद्दा हो, किसानों की परेशानी हो, शिक्षा व्यवस्था में कमी हो या किसी सरकारी योजना का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा हो—इन मुद्दों को सांसद संसद में उठाते हैं।

जब सदन नहीं चलता, तो ऐसे सवाल रिकॉर्ड पर आने का अवसर भी कम हो जाता है।

इसी तरह जब किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर पर्याप्त बहस नहीं होती, तो जनता यह समझने का अवसर खो देती है कि कानून में क्या बदलाव किए जा रहे हैं और उनका प्रभाव किस पर पड़ेगा।

संसद में शोर केवल टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला राजनीतिक दृश्य नहीं है। उसके पीछे जनता की आवाज और जनता के सवाल भी दब सकते हैं।

अब जरूरी है संसदीय आत्ममंथन

2026 का मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है।

19 बैठकें। लोकसभा का लगभग 17.5 घंटे काम। राज्यसभा का करीब 37.4 घंटे काम। प्रश्नकाल का बेहद सीमित संचालन और इसके बावजूद 12 विधेयकों का पारित होना।

यह आंकड़े संसद की उत्पादकता से आगे जाकर उसकी कार्यशैली पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विधेयक पर्याप्त चर्चा और संसदीय जांच के बाद आगे बढ़ें। विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध का तरीका लोकतांत्रिक संवाद को पूरी तरह बंद न कर दे। संसद अध्यक्षों और सभापति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है कि सदन में व्यवधान कम हो और सदस्यों को नियमों के भीतर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।

क्योंकि संसद केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। वह केवल विपक्ष की भी नहीं है।

संसद जनता की है।

इसलिए सरकार से कठिन सवाल पूछे जाएं। विपक्ष तीखा विरोध करे। विधेयकों पर व्यापक चर्चा हो। असहमति को जगह मिले। लेकिन अंततः संसद चले।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कानून बनने से पहले जनता के प्रतिनिधियों को उस पर बोलने, सवाल करने, संशोधन सुझाने और सरकार को जवाबदेह बनाने का पर्याप्त अवसर मिले।

अगर विधेयक पास होते रहें, लेकिन बहस का समय लगातार घटता जाए, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—विचार-विमर्श—कमजोर पड़ सकती है।

और संसद की असली ताकत केवल उसके पारित कानूनों की संख्या में नहीं, बल्कि उन कानूनों पर हुई गंभीर बहस में दिखाई देती है।


आलोक कुमार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/