आलोक कुमार हूं। ग्रामीण प्रबंधन एवं कल्याण प्रशासन में डिप्लोमाधारी हूं। कई दशकों से पत्रकारिता में जुड़ा हूं। मैं समाज के किनारे रह गये लोगों के बारे में लिखता और पढ़ता हूं। इसमें आप लोग मेरी मदद कर सकते हैं। https://adsense.google.com/adsense/u/0/pub-4394035046473735/myads/sites/preview?url=chingariprimenews.blogspot.com chingariprimenews.com
शनिवार, 17 जनवरी 2026
जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं
जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं
सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया।
दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हुई और न ही डिजिटल मंचों पर कोई खास हलचल दिखी। आज की मीडिया दुनिया क्लिक, ट्रेंड और एल्गोरिदम के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि स्थानीय और क्षेत्रीय प्रिंट पत्रकारिता की मौत चुपचाप हो रही है। शायद इसी कारण यह संकट “सामाजिक स्मृति से मिटते जाने” जैसा महसूस होता है।
यह हालात केवल पटना या बिहार तक सीमित नहीं हैं। देशभर में छोटे और मध्यम अख़बार डिजिटल विज्ञापन शिफ्ट, बढ़ती लागत और बदलती पाठक आदतों के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ जो ज़िम्मेदार, संदर्भयुक्त और ज़मीनी पत्रकारिता खत्म हो रही है, उसकी भरपाई कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं कर सकता।
आज ज़रूरत है कि इस ख़ामोशी को तोड़ा जाए। प्रभावित पत्रकारों के लिए संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास खड़े हों। क्योंकि अगर अख़बार यूँ ही बंद होते रहे, तो सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं रहेगा—लोकतंत्र की स्मृति बचाने का भी होगा
आलोक कुमार
शुक्रवार, 16 जनवरी 2026
6 सांसद ऐसे हैं, सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया
जब विकास के लिए पैसा मौजूद हो, लेकिन ज़मीन पर काम न दिखे—तो सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का होता है.
सांसद निधि: करोड़ों का बजट, लेकिन बिहार में क्यों उठे सवाल?
सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) देश की उन महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल है, जिसके जरिए सांसद अपने-अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार विकास कार्य करा सकते हैं. इस योजना के तहत लोकसभा, राज्यसभा और मनोनीत सांसदों को हर साल ₹5 करोड़ (₹2.5 करोड़ की दो किस्तों में) की राशि मिलती है. यह पैसा सीधे सांसद को नहीं, बल्कि जिला कलेक्टर के माध्यम से स्वीकृत विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है.
एमपीएलएडीएस का उद्देश्य साफ है—पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक ढांचे जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास. योजना में यह भी प्रावधान है कि एससी क्षेत्रों के लिए 15% और एसटी क्षेत्रों के लिए 7.5% राशि खर्च की जाए, वहीं दिव्यांगों के लिए ₹10 लाख तक की सिफारिश संभव है.
कोविड-19 के दौरान यह योजना अस्थायी रूप से निलंबित रही, लेकिन 2021-22 से इसे फिर बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद बिहार से जुड़े आंकड़े अब सियासी बहस का कारण बन गए हैं.
बिहार के 6 सांसद और ‘शून्य खर्च’ का सवाल
18वीं लोकसभा के गठन को लगभग दो साल होने जा रहे हैं, लेकिन बिहार के 40 सांसदों में से 6 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने अब तक सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया. इन सांसदों में मीसा भारती, राजीव प्रताप रूड़ी, शांभवी चौधरी, राजीव रंजन सिंह, संजय जायसवाल और विवेक ठाकुर शामिल हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में बिहार के सांसदों को कुल मिलाकर ₹9.80 करोड़ प्रति सांसद की राशि मिली, लेकिन कुल खर्च महज़ ₹137.69 करोड़ ही हो सका. वहीं, कई सांसदों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया—जैसे अररिया से प्रदीप कुमार सिंह ने लगभग पूरी राशि खर्च कर सभी कार्य पूरे किए.
शांभवी चौधरी का पक्ष
समस्तीपुर से सांसद और देश की सबसे युवा लोकसभा सदस्य शांभवी चौधरी ने इस मुद्दे पर साफ कहा कि सांसद निधि का उपयोग उनका संवैधानिक अधिकार है, और वह किसी दबाव में जल्दबाज़ी में फंड खर्च नहीं करेंगी. उनके अनुसार, विकास कार्यों का चयन पार्टी और एनडीए कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा, ताकि क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिले.
बहस का असली मुद्दा
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एमपीएलएडीएस फंड का समयबद्ध और पारदर्शी उपयोग अब जनविश्वास से जुड़ा सवाल बन चुका है. जब कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तब करोड़ों रुपये का अप्रयुक्त रहना स्वाभाविक रूप से जनता को सोचने पर मजबूर करता है.
आने वाले समय में यही देखा जाना बाकी है कि बिहार के ये सांसद सांसद निधि को किस दिशा में, किन प्राथमिकताओं के साथ और कितनी तेजी से ज़मीन पर उतारते हैं—क्योंकि विकास सिर्फ़ घोषणा से नहीं, अमल से दिखाई देता है.
आलोक कुमार
हमारी पहली इच्छा
हमारी Wishlist और भविष्य की दिशा
Chingari Prime News (https://chingariprimenews.blogspot.com/) केवल एक न्यूज़ ब्लॉग नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार डिजिटल मंच बनने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है। हमारी Wishlist यानी भविष्य की आकांक्षाएँ उसी सोच का प्रतिबिंब हैं, जिनके आधार पर हम पाठकों के लिए बेहतर, विश्वसनीय और प्रभावशाली कंटेंट प्रस्तुत करना चाहते हैं।
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गुरुवार, 15 जनवरी 2026
संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि
“जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है”
जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान
अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए.
हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए.
जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला
जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उपहार दिया है. उन्होंने संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि की स्मृति में “संत फ्रांसिस का विशेष वर्ष” घोषित किया है, जो जनवरी 2027 तक चलेगा.यह फ्रांसिस्कन जयंती वर्ष केवल स्मृति का समय नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर है. 10 जनवरी को पवित्र सीन की अपोस्टोलिक पेनिटेंशरी द्वारा जारी निर्णय के अनुसार, विश्वासी इस अवधि में सामान्य शर्तों—साकारमेन्टल कन्फेशन,यूखरिस्त में सहभागिता पोप की मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना के साथ पूर्ण क्षमा (Plenary Indulgence) प्राप्त कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी भी फ्रांसिस्कन मठ या संत फ्रांसिस को समर्पित तीर्थस्थल की यात्रा करनी होगी.
जो चल नहीं सकते, उनके लिए भी रास्ता खुला है
इस निर्णय की मानवीय संवेदनशीलता उल्लेखनीय है.वृद्ध, रोगी और वे लोग जो गंभीर कारणों से अपने घर से बाहर नहीं जा सकते, वे भी आध्यात्मिक रूप से इस जयंती में सहभागी होकर—अपनी प्रार्थनाएँ, पीड़ा और कष्ट ईश्वर को अर्पित करके—पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकते हैं. यह संदेश स्पष्ट है: ईश्वर का अनुग्रह दूरी या असमर्थता से बंधा नहीं है.
हिंसा और अविश्वास के समय में संत फ्रांसिस की पुकार
निर्णय में आज की दुनिया का यथार्थ चित्रण भी किया गया है—“जब आभासी वास्तविक को प्रभावित कर रहा है, सामाजिक हिंसा सामान्य हो गई है और शांति दिन-ब-दिन दूर होती जा रही है…”ऐसे समय में संत फ्रांसिस का जीवन हमें फिर से आमंत्रित करता है—अस्सीसी के उस गरीब पुरुष की तरह जीने के लिए, जिसने मसीह को अपने जीवन का केंद्र बनाया.
पोप लियो XIV ने फ्रांसिस्कन फैमिली कॉन्फ्रेंस के नाम अपने पत्र में लिखा कि आज के युग में, जो अंतहीन युद्धों, विभाजनों और भय से भरा है, संत फ्रांसिस की वाणी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि शांति के वास्तविक स्रोत की ओर संकेत करती है.उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि—“ईश्वर के साथ शांति, लोगों के बीच शांति और सृष्टि के साथ शांति—ये तीनों एक ही सार्वभौमिक मेल-मिलाप के अविभाज्य आयाम हैं.”
आशा की यात्रा जारी है
जयंती वर्ष भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसका संदेश अभी जीवित है। संत फ्रांसिस का यह विशेष वर्ष कलीसिया और विश्व को याद दिलाता है कि सच्ची शांति न तो शक्ति से आती है, न ही प्रभुत्व से—वह आती है विनम्रता, करुणा और विश्वास से.आज, जब दुनिया थक चुकी है, यही समय है कि हम फिर से तीर्थयात्री बनें—आशा के, शांति के और मानवता के.
आलोक कुमार
बुधवार, 14 जनवरी 2026
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव
मकर संक्रांति: जब सूर्य उत्तरायण होता है और जीवन में उजास उतरता है
सर्द हवाओं के बीच जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, तिल-गुड़ की मिठास हर रिश्ते में घुलने लगती है और सूर्य देव उत्तरायण की यात्रा शुरू करते हैं—तब आता है मकर संक्रांति, एक ऐसा पर्व जो केवल त्योहार नहीं, बल्कि परिवर्तन, सकारात्मकता और नई शुरुआत का प्रतीक है.
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव है, जो धर्म, विज्ञान और प्रकृति—तीनों को एक सूत्र में पिरोता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय दिन के बड़े होने और रातों के छोटे होने का संकेत है, जबकि सांस्कृतिक रूप से यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है.
तिल-गुड़ क्यों कहते हैं ‘मीठा बोलो’?
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है. तिल शरीर को गर्मी देता है और गुड़ ऊर्जा. लेकिन इन दोनों से जुड़ा संदेश केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं—यह सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है। “तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो” का अर्थ है कि पुराने गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों में मिठास घोलो.
पतंगों में उड़ते सपने
छतों पर उड़ती पतंगें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उम्मीदों और सपनों की उड़ान हैं. हर पतंग जैसे कहती है—हौसला बुलंद रखो, डोर थामे रखो और आसमान छूने की कोशिश करते रहो.
कृषि और श्रम का उत्सव
यह पर्व किसानों के लिए भी खास है.नई फसल के आगमन के साथ यह मेहनत के फल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है. इसलिए देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पोंगल, खिचड़ी, उत्तरायण और बिहू जैसे नामों से मनाया जाता है.
संदेश जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है
मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन स्थायी है. जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी नकारात्मकता छोड़कर सकारात्मक राह चुननी चाहिए.
इस मकर संक्रांति पर संकल्प लें—
बीती कड़वाहट को पीछे छोड़ें,
रिश्तों में मिठास भरें,
और अपने सपनों को पतंग की तरह खुली उड़ान दें
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!
आलोक कुमार
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल
जब सुरक्षा के नाम पर पहचान कटघरे में खड़ी हो जाए
बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल
जब सुरक्षा के नाम पर किसी की पहचान पर पहरा लगाया जाने लगे, तब सवाल केवल अपराध का नहीं रहता—वह सीधे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ जाता है. बिहार की ज्वेलरी दुकानों में बुर्का या नकाब पहनकर आने वाली महिलाओं के लिए “No Entry” का आह्वान इसी चिंता को जन्म देता है. यह महज़ एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाला गहरा असर है.
ऑल इंडिया ज्वेलर्स एवं गोल्ड फेडरेशन (AIJGF) की बिहार इकाई के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा दिया गया यह वक्तव्य राज्य के उस सामाजिक ताने-बाने पर अनावश्यक दबाव डालता है, जो पहले से ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है.
सुरक्षा बनाम संदेह: रेखा कहां खिंचनी चाहिए? सुरक्षा की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता. अपराध रोकना राज्य और समाज—दोनों की साझा जिम्मेदारी है. लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी विशेष समुदाय की महिलाओं को संदेह की श्रेणी में खड़ा कर देना न तो तार्किक है और न ही न्यायसंगत.यदि कुछ आपराधिक घटनाओं में नकाब या बुर्का का दुरुपयोग हुआ है, तो क्या इसका समाधान यह है कि पूरे पहनावे को ही अपराध का प्रतीक बना दिया जाए? सवाल यह भी है कि क्या अपराध रोकने का सबसे आसान रास्ता हमेशा कमज़ोर पहचान पर प्रतिबंध ही होता है?
तर्क की कसौटी पर ‘नो एंट्री’ की सोच यदि यही तर्क व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो फिर हेलमेट पहनकर अपराध करने वालों के उदाहरण देकर क्या दोपहिया चालकों के लिए हेलमेट पर ही प्रतिबंध लगा देना उचित होगा? जवाब साफ है—नहीं.अपराध से निपटने के लिए जरूरत होती है कानून के भय, तकनीकी निगरानी, प्रशिक्षित सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस की सक्रियता की, न कि सामाजिक भेदभाव की. पहचान को अपराध से जोड़ देना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक नई समस्या को जन्म देता है.
संविधान क्या कहता है? भारत का संविधान नागरिकों को न केवल अधिकार देता है, बल्कि गरिमा की गारंटी भी देता है.अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है.अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है.किसी महिला के पहनावे को संदेह की दृष्टि से देखना इन दोनों अधिकारों पर सीधा प्रहार है. यह सोच केवल मुस्लिम महिलाओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की जमीन नहीं तैयार करती, बल्कि समाज में धार्मिक वैमनस्य और आपसी अविश्वास को भी बढ़ावा देती है.
खामोश असर, दूरगामी खतरे सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे बयानों से आम नागरिकों के बीच यह संदेश जाता है कि संदेह करना स्वाभाविक है और भेदभाव स्वीकार्य.यही मानसिकता आगे चलकर तानों, सामाजिक बहिष्कार और अंततः कानून-व्यवस्था की चुनौती में बदल जाती है.
संतुलन की ज़रूरत बिहार की पहचान हमेशा से साझी संस्कृति और सामाजिक समरसता रही है। सुरक्षा और सौहार्द के बीच संतुलन बनाए रखना राज्य, समाज और व्यापारिक संगठनों—तीनों की जिम्मेदारी है.जरूरत इस बात की है कि अपराध के खिलाफ कठोर, निष्पक्ष और समान कार्रवाई हो, न कि किसी समुदाय की महिलाओं के पहनावे को कटघरे में खड़ा किया जाए.क्योंकि इतिहास गवाह है—जब पहचान को अपराध से जोड़ दिया जाता है, तब लोकतंत्र शोर नहीं मचाता, लेकिन भीतर ही भीतर घायल हो जाता है.
आलोक कुमार
सोमवार, 12 जनवरी 2026
यात्राओं का मुख्यमंत्री: 21 साल में 15 यात्राएं
सत्ता, संघर्ष और सड़कें: फिर यात्रा पर निकल रहे हैं नीतीश कुमार
10 बार मुख्यमंत्री, 21 साल की सियासत और अब ‘समृद्धि यात्रा’ का नया अध्याय
10 बार मुख्यमंत्री, सबसे लंबा कार्यकाल नीतीश कुमार ने अब तक 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है और वे राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता हैं.उनका पहला कार्यकाल मार्च 2000 में सिर्फ 7 दिनों का रहा. इसके बाद नवंबर 2005 में सत्ता में लौटे और फिर यह सिलसिला लगातार चलता रहा—नवंबर 2005 ,नवंबर 2010, फरवरी 2015,नवंबर 2015,जुलाई 2017,नवंबर 2020,अगस्त 2022,जनवरी 2024नवंबर 2025 (वर्तमान कार्यकाल).इस दौरान उन्होंने एनडीए और महागठबंधन, दोनों के साथ सरकार चलाई—जो बिहार की राजनीति को अलग पहचान देता है।
समृद्धि यात्रा: क्या है मकसद? मुख्यमंत्री की समृद्धि यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है। इस यात्रा के दौरान नीतीश कुमार—राज्य की समृद्धि योजनाओं की समीक्षा करेंगे,जीविका दीदियों से मुलाकात करेंगे,₹10,000 सहायता के बाद रोजगार की प्रगति जानेंगे,सत्ता में भागीदारी और सहयोग के लिए जनता का धन्यवाद करेंगे.सरकार का दावा है कि यह यात्रा विकास, रोजगार और भागीदारी की ज़मीनी हकीकत को परखने का प्रयास है.
यात्राओं का मुख्यमंत्री: 21 साल में 15 यात्राएं नीतीश कुमार को यूं ही “यात्राओं का मुख्यमंत्री” नहीं कहा जाता। अपने लगभग 21 साल के राजनीतिक कार्यकाल में उन्होंने 15 बड़ी यात्राएं की हैं.प्रमुख यात्राएं एक नज़र में: न्याय यात्रा (12 जुलाई 2005) – सत्ता में आने से पहले विकास यात्रा (9 जनवरी 2009) – विकास कार्यों का लेखा-जोखा धन्यवाद यात्रा (17 जून 2009) – लोकसभा जीत के बाद प्रवास यात्रा (25 दिसंबर 2009) – जिलों में रुककर समस्याएं सुनीं विश्वास यात्रा (28 अप्रैल 2010) – जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए सेवा यात्रा (9 नवंबर 2011) – पुनः सरकार बनने के बाद अधिकार यात्रा (19 सितंबर 2012) – विशेष राज्य के दर्जे की मांग संकल्प यात्रा (5 मार्च 2014) – लोकसभा चुनाव से पहले सम्पर्क यात्रा: 13 नवंबर 2015-भेदभावपूर्ण बर्ताव को जनता के समक्ष उठाएंगे निश्चय यात्रा (9 नवंबर 2016) – सात निश्चय योजनाओं की समीक्षा समीक्षा यात्रा (7 दिसंबर 2017) – विकास कार्यों का जमीनी जायजा जल-जीवन-हरियाली यात्रा (3 दिसंबर 2019) – पर्यावरण और चुनावी संदेश समाज सुधार यात्रा (22 दिसंबर 2021) - शराबबंदी की जमीनी स्थिति की समीक्षा करेंगे समाधान यात्रा (5 जनवरी 2023)- सरकारी योजनाओं के बारे में उनकी राय जानना था प्रगति यात्रा (23 दिसंबर 2024 – 30 जनवरी 2025)-लोगों के बीच संवाद करने जा रहे हैं और अब—समृद्धि यात्रा (16 जनवर 2026)-
राजनीति या प्रशासन? दोनों का मिश्रण आलोचक कहते हैं कि ये यात्राएं चुनावी रणनीति होती हैं, जबकि समर्थकों का मानना है कि नीतीश कुमार की सियासत की सबसे बड़ी ताकत जनता से सीधा संवाद है। सच चाहे जो हो, लेकिन यह तय है कि बिहार की राजनीति में कोई भी यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं होती—वह संदेश होती है.
निष्कर्ष: यात्रा जारी है नीतीश कुमार की यह नई समृद्धि यात्रा केवल विकास की समीक्षा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में उनकी निरंतर मौजूदगी का संकेत भी है। सवाल यही है— क्या यह यात्रा बिहार की समृद्धि का नया रास्ता खोलेगी,या आने वाले चुनावों की जमीन तैयार करेगी? जवाब सड़क पर मिलेगा—जहां नीतीश कुमार फिर जनता के बीच होंगे.
आलोक कुमार
रविवार, 11 जनवरी 2026
आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में
“आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में”
एनएसए अजीत डोभाल के बयान ने छेड़ा आज़ादी के इतिहास पर नया विमर्श
डोभाल का कहना है कि भारत को आज़ादी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के दबाव के कारण मिली.यह बयान केवल एक ऐतिहासिक व्याख्या नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्राथमिकताओं को लेकर चली आ रही बहस को नए संदर्भ और नई धार देता है.
INA बनाम अहिंसा: पुराना विवाद, नया संदर्भ अजीत डोभाल के तर्क के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर चले मुकदमे, 1946 का नौसेना विद्रोह और ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर पनपता असंतोष अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए खतरे की घंटी बन गया था.ब्रिटिश सत्ता को यह साफ़ संकेत मिल गया था कि अब भारत पर शासन बनाए रखना न तो सैन्य रूप से संभव है और न ही नैतिक रूप से. इसके उलट, इतिहास का एक बड़ा वर्ग मानता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने देश की जनता को अभूतपूर्व रूप से एकजुट किया. अहिंसा की इस सामूहिक शक्ति ने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को भीतर से खोखला कर दिया.
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और वैचारिक टकराव डोभाल के बयान के बाद सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. समर्थकों का कहना है कि यह बयान नेताजी सुभाष चंद्र बोस और INA के योगदान को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की कोशिश है, जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया.वहीं आलोचकों का आरोप है कि इस तरह के बयान महात्मा गांधी के ऐतिहासिक योगदान को कमतर आंकने की कोशिश करते हैं और आज़ादी के संघर्ष को एक वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाते हैं.
इतिहास: एक व्यक्ति नहीं, एक समग्र संघर्ष हकीकत शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं है. भारत की आज़ादी न तो केवल अहिंसा की देन थी, न ही सिर्फ़ सशस्त्र संघर्ष की। यह एक बहुआयामी आंदोलन था—
गांधी की नैतिक शक्ति,
नेताजी का सैन्य दबाव,
क्रांतिकारियों का बलिदान
और करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आकांक्षा—
इन सबका सम्मिलित परिणाम.
निष्कर्ष: सवाल असहज हैं, लेकिन ज़रूरी अजीत डोभाल का बयान भले ही विवादास्पद हो, लेकिन उसने एक ज़रूरी सवाल फिर सामने रख दिया है—क्या हमने आज़ादी के इतिहास को एक ही चश्मे से देखा है?और क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम उसे बहुआयामी दृष्टि से समझें?इतिहास सिर्फ़ अतीत की कहानी नहीं होता, वह वर्तमान की सोच और भविष्य की दिशा भी तय करता है. शायद इसी कारण यह बहस आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आज़ादी के समय थी.
आलोक कुमार
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पटना.बिहार में 70 हजार प्राथमिक और मध्य विद्यालय हैं.इनमें 1773 विद्यालयों के पास अपना भवन नहीं है.पटना जिले में ही 190 विद्यालय भवनहीन है...
