सत्ता सिर्फ जीत का नाम नहीं
पटना .बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का परिवार सिर्फ एक राजनीतिक घराना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की उस लंबी लड़ाई का प्रतीक रहा है जिसने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया. परंतु हालिया चुनावी झटका इस विशाल परिवार में गहरी दरारें उभारता दिख रहा है—ऐसी दरारें, जिनके संकेत वर्षों से भीतर ही भीतर पनप रहे थे. लालू प्रसाद और राबड़ी देवी—यह जोड़ी बिहार की राजनीति में ‘कठोर निर्णय’ और ‘मां-की ममता’ का असाधारण संगम मानी जाती है. एक ओर लालू की जन-नेतृत्व क्षमता, दूसरी ओर राबड़ी देवी की सादगी पर आधारित राजनीतिक उपस्थिति—इन दोनों ने मिलकर बिहार में एक वैकल्पिक राजनीति धारा तैयार की.परंतु नेतृत्व जब अगली पीढ़ी की ओर बढ़ा, तो परिवार की विविधता एकता पर भारी पड़ने लगीं. पुत्रियाँ: त्याग, मौन और विद्रोह की तीन छवियाँ मीसा भारती हमेशा पार्टी की वैचारिक धुरी के रूप में सामने आईं, लेकिन लोकसभा में दो लगातार हारों ने उनके राजनीतिक ग्राफ को धूमिल किया.रोहिणी आचार्य—वही बेटी जिन्होंने पिता को किडनी देकर देशभर में मिसाल कायम की—अब राजनीति से दूर जाने का फैसला कर चुकी हैं। यह निर्णय सिर्फ व्य...