महिलाओं को संसद में जगह कब?
जिस देश में महिलाएं पंचायत से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी क्षमता साबित कर रही हैं, वहां संसद में उनकी हिस्सेदारी अब भी इतनी कम क्यों है? महिला आरक्षण कानून बन चुका है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ महिलाओं को कब मिलेगा? जवाब सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि जनगणना, परिसीमन और चुनावी प्रक्रिया की उस कड़ी में छिपा है, जो 2026 में और महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का सवाल नया नहीं है। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं को पुरुषों के समान मतदान का अधिकार मिला और वे चुनाव लड़कर संसद तथा विधानसभाओं तक पहुंचती रही हैं। लेकिन सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं पहुंच पाया है। यही वजह है कि महिला आरक्षण को केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के सवाल के रूप में देखना जरूरी है।
2023 में संसद ने संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित किया। इसे आम तौर पर महिला आरक्षण कानून कहा जाता है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का संवैधानिक प्रावधान किया गया। लेकिन इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका प्रभाव तत्काल अगले चुनाव से शुरू नहीं हुआ। आरक्षण को लागू करने के लिए पहले एक निश्चित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होनी है।
2023 का कानून क्या कहता है?
महिला आरक्षण कानून के अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए हिस्सा निर्धारित किया जाएगा। आरक्षित सीटों का निर्धारण परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा होगा।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है—परिसीमन आखिर है क्या?
परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों के पुनर्निर्धारण से है। जनसंख्या में बदलाव के बाद यह तय किया जाता है कि किस क्षेत्र से कितने मतदाता प्रतिनिधित्व करेंगे और राज्यों को लोकसभा में कितनी सीटें मिलेंगी। संविधान में परिसीमन की व्यवस्था जनगणना से जुड़ी हुई है।
2023 के महिला आरक्षण कानून में प्रावधान किया गया कि आरक्षण उस कानून के लागू होने के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रभावी होगा। इसलिए कानून बनने और सीटों पर आरक्षण लागू होने के बीच एक संवैधानिक प्रक्रिया रखी गई।
फिर 2026 में क्या बदल रहा है?
2026 में परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार ने कई विधायी प्रस्ताव संसद में पेश किए हैं। अप्रैल 2026 में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक पेश किए गए। इन प्रस्तावों का उद्देश्य लोकसभा की सीटों के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया का रास्ता तैयार करना है।
प्रस्तावित बदलावों में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रावधान भी शामिल है। इससे आने वाले वर्षों में संसद का आकार वर्तमान 543 निर्वाचित सीटों से काफी बड़ा हो सकता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि 2026 में विधेयक पेश होना और महिला आरक्षण का तत्काल लागू हो जाना एक ही बात नहीं है।
महिला आरक्षण के वास्तविक क्रियान्वयन के लिए परिसीमन की प्रक्रिया और उससे जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था निर्णायक होगी।
आज लोकसभा में महिलाओं की स्थिति क्या है?
18वीं लोकसभा में 74 महिला सांसद चुनी गई थीं, जो कुल सदस्यों का लगभग 14 प्रतिशत है। यह आंकड़ा 17वीं लोकसभा की 78 महिला सांसदों की तुलना में भी थोड़ा कम था। यानी महिला आरक्षण कानून बनने के बावजूद वर्तमान लोकसभा में अभी 33 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व नहीं है।
यही स्थिति इस बहस को महत्वपूर्ण बनाती है। कानून ने भविष्य के लिए एक संवैधानिक लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन वर्तमान संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी उस लक्ष्य से काफी नीचे है।
इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाएं राजनीति में कमजोर हैं। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने बड़ी संख्या में महिला जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ा है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटों का आरक्षण किया गया था।
लेकिन राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति में तस्वीर अलग रही है।
क्या केवल आरक्षण से समस्या हल हो जाएगी?
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संसद में सीट आरक्षित होना महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का एक बड़ा कदम है, लेकिन यह पूरी समस्या का समाधान नहीं है।
राजनीतिक दलों के भीतर टिकट वितरण, चुनाव लड़ने का खर्च, संगठनात्मक अवसर, राजनीतिक प्रशिक्षण, परिवार और समाज का समर्थन तथा चुनावी हिंसा और दबाव जैसे अनेक मुद्दे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित करते हैं।
यदि किसी महिला को आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का अवसर मिलता है, लेकिन पार्टी संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका सीमित रहती है, तो प्रतिनिधित्व की संख्या बढ़ने के बावजूद वास्तविक राजनीतिक सशक्तीकरण अधूरा रह सकता है।
इसलिए महिला आरक्षण को संख्या बढ़ाने के साथ-साथ नेतृत्व विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।
परिसीमन का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
परिसीमन केवल महिलाओं की सीटों का सवाल नहीं है। इसका संबंध पूरे संघीय ढांचे से है। 2026 में प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था में राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के वितरण में बदलाव की संभावना है। PRS के विश्लेषण के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटों में वृद्धि तथा कुछ दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी में बदलाव की संभावना बताई गई है।
इसलिए परिसीमन पर चर्चा केवल “महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें कब मिलेंगी” तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें राज्यों के प्रतिनिधित्व, जनसंख्या नियंत्रण, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व जैसे बड़े प्रश्न भी जुड़े हैं।
महिलाओं को संसद में जगह कब मिलेगी?
इसका सबसे ईमानदार जवाब है—तुरंत नहीं, बल्कि निर्धारित संवैधानिक और चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद।
2023 का कानून बन चुका है, लेकिन उसका प्रभाव परिसीमन और उससे जुड़ी प्रक्रिया से बंधा हुआ है। 2026 में परिसीमन को आगे बढ़ाने वाले विधायी कदम इस बहस को नई गति दे रहे हैं, लेकिन प्रस्तावित विधेयकों और अंतिम लागू कानून के बीच अंतर समझना जरूरी है।
इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “महिला आरक्षण कानून बना या नहीं?” बल्कि यह होना चाहिए कि उस कानून को पारदर्शी, समयबद्ध और निष्पक्ष तरीके से लागू कब किया जाएगा।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी अधिक प्रतिनिधिक कही जाएगी, जब संसद में समाज की आधी आबादी की आवाज भी पर्याप्त मजबूती से सुनाई दे। महिलाएं केवल मतदाता नहीं हैं, वे नीति बनाने वाली नागरिक भी हैं। वे गांव की पंचायत चला सकती हैं, राज्य का नेतृत्व कर सकती हैं, अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकती हैं और देश की सुरक्षा तथा विज्ञान के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा सकती हैं।
फिर संसद में उनका प्रतिनिधित्व सीमित क्यों रहे?
महिला आरक्षण का असली उद्देश्य केवल कुछ सीटों पर महिलाओं को बैठाना नहीं होना चाहिए। इसका लक्ष्य ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें महिलाओं को टिकट, नेतृत्व, निर्णय और नीति-निर्माण—हर स्तर पर समान अवसर मिले।
2026 का परिसीमन इसी दिशा में एक निर्णायक मोड़ बन सकता है। अब जिम्मेदारी संसद, राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की है कि महिला आरक्षण केवल संविधान की किताब में दर्ज प्रावधान बनकर न रह जाए, बल्कि आने वाली लोकसभा में महिलाओं की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी का रास्ता खोले।
क्योंकि लोकतंत्र में आधी आबादी की आवाज जितनी मजबूत होगी, संसद भी उतनी ही अधिक प्रतिनिधिक होगी।
आलोक कुमार