India : आवाज अक्सर इन संस्थाओं के माध्यम से सामने आती है

 


कानूनी शिकंजे के साए में सिमटते एनजीओ: क्या एफआईआर के डर से सामाजिक सरोकार पीछे छूट रहे हैं?

क्या सामाजिक काम करने वाला संगठन अब किसी कार्यक्रम से पहले यह सोचने को मजबूर है कि उसकी गतिविधि कहीं कानूनी विवाद का कारण तो नहीं बन जाएगी? अगर ऐसा डर बढ़ रहा है, तो इसका असर केवल एनजीओ पर नहीं, बल्कि समाज के उन लोगों पर भी पड़ सकता है जिनकी आवाज अक्सर इन संस्थाओं के माध्यम से सामने आती है।

गैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ लंबे समय से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, बाल अधिकार, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, रोजगार, साक्षरता और सामाजिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में अनेक संस्थाएं सरकार और आम नागरिकों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती हैं।

लेकिन पिछले कुछ समय से सामाजिक क्षेत्र में यह सवाल चर्चा का विषय बनता रहा है कि क्या कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का बढ़ता दबाव कुछ संगठनों की सार्वजनिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है? क्या किसी कार्यक्रम, अभियान या सार्वजनिक वक्तव्य को लेकर एफआईआर या जांच की आशंका सामाजिक संस्थाओं को अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर कर सकती है?

इस सवाल को समझने के लिए भावनाओं के बजाय संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।

साक्षरता दिवस और विनोबा जयंती का संदेश

8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षा और साक्षरता के महत्व के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना है। ग्रामीण और वंचित समुदायों के बीच शिक्षा को लेकर काम करने वाले संगठनों के लिए यह दिन जनजागरूकता का अवसर बन सकता है।

इसी तरह 11 सितंबर को आचार्य विनोबा भावे की जयंती मनाई जाती है। भूदान आंदोलन, ग्राम स्वराज, अहिंसा और सामाजिक समरसता से जुड़े उनके विचार आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

ऐसे अवसरों पर एनजीओ जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा शिविर, विचार गोष्ठी, बच्चों के लिए गतिविधियां और ग्रामीण संवाद आयोजित कर सकते हैं। लेकिन किसी संस्था का इन अवसरों पर कार्यक्रम नहीं करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह कानूनी कार्रवाई से डर रही है।

किसी संगठन की प्राथमिकताएं उसके उद्देश्य, बजट, कर्मचारियों और कार्यक्षेत्र के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं।

हर चुप्पी को डर से जोड़ना सही नहीं

यह समझना जरूरी है कि कोई सामान्य कानूनी नियम एनजीओ को साक्षरता दिवस या विनोबा भावे की जयंती मनाने के लिए बाध्य नहीं करता। इसलिए किसी संस्था द्वारा कार्यक्रम नहीं करने को सीधे एफआईआर के भय से जोड़ना उचित निष्कर्ष नहीं होगा।

कई छोटे संगठन सीमित संसाधनों के कारण बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर पाते। कुछ संस्थाएं केवल शिक्षा, स्वास्थ्य या किसी विशेष सामाजिक मुद्दे पर काम करती हैं। कुछ का कार्यक्षेत्र इतना सीमित होता है कि वे राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय दिवसों पर अलग कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय अपनी नियमित गतिविधियों को ही प्राथमिकता देती हैं।

इसलिए सामाजिक संगठनों की निष्क्रियता के हर उदाहरण के पीछे कानूनी भय को कारण मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन कानूनी दबाव की चिंता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता

दूसरी तरफ यह भी सच है कि एनजीओ को अनेक कानूनी और प्रशासनिक नियमों का पालन करना पड़ता है। वित्तीय रिकॉर्ड, ऑडिट, रिपोर्टिंग, आय-व्यय का हिसाब, पंजीकरण और जहां लागू हो वहां विदेशी अंशदान से जुड़े नियमों का पालन करना संस्था की जिम्मेदारी है।

विशेष रूप से विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए एफसीआरए यानी Foreign Contribution Regulation Act के तहत निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक है। नियमों का उल्लंघन होने पर जांच या कानूनी कार्रवाई होना व्यवस्था का हिस्सा है।

समस्या तब पैदा हो सकती है जब नियमों की जटिलता और कार्रवाई की आशंका ईमानदारी से काम करने वाले छोटे संगठनों में भी इतनी अधिक चिंता पैदा कर दे कि वे सार्वजनिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगें।

यहां कानून और भय के बीच अंतर करना जरूरी है।

जवाबदेही जरूरी, लेकिन डर का माहौल नहीं

एनजीओ को जवाबदेही से मुक्त नहीं रखा जा सकता। यदि किसी संस्था में वित्तीय अनियमितता है, धन का दुरुपयोग होता है या कानून का उल्लंघन किया जाता है, तो जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन दूसरी तरफ केवल इसलिए सामाजिक गतिविधियों को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए कि कोई संस्था सरकार की किसी नीति पर सवाल उठा रही है या किसी सामाजिक समस्या को सार्वजनिक मंच पर उठा रही है।

लोकतंत्र में सवाल पूछना और सामाजिक समस्याओं पर संवाद करना नागरिक समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। कानून का उद्देश्य अनियमितताओं को रोकना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक गतिविधियों को हतोत्साहित करना।

एफआईआर का डर कितना प्रभाव डाल सकता है?

एफआईआर स्वयं दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होती। किसी शिकायत या आरोप के बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती है और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अधिकार होता है।

फिर भी छोटे सामाजिक संगठनों के लिए किसी कानूनी विवाद का सामना करना आसान नहीं होता। सीमित आर्थिक संसाधन, कानूनी सलाह की कमी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता उनके लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।

यदि किसी सामाजिक कार्यकर्ता को लगे कि सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने, लोगों को जागरूक करने या किसी स्थानीय समस्या को उठाने से अनावश्यक विवाद पैदा हो सकता है, तो वह स्वाभाविक रूप से सावधानी बरत सकता है।

यही वह बिंदु है जहां सामाजिक क्षेत्र में विश्वास का वातावरण महत्वपूर्ण हो जाता है।

एनजीओ समाज और सरकार के बीच सेतु

एनजीओ की भूमिका सरकार का विकल्प बनना नहीं है। लेकिन वे उन इलाकों और समुदायों तक पहुंच सकते हैं जहां सरकारी योजनाओं की जानकारी या सेवाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पातीं।

एक अच्छा सामाजिक संगठन लोगों को उनके अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी देता है, शिक्षा को बढ़ावा देता है और स्थानीय समस्याओं को सामने लाता है। कई बार यही संस्थाएं प्रशासन और जनता के बीच संवाद का माध्यम भी बनती हैं।

यदि ऐसे संगठनों में लगातार भय का वातावरण पैदा हो, तो इसका असर उनके काम की गति पर पड़ सकता है। इसका नुकसान अंततः गरीब, अशिक्षित, ग्रामीण और वंचित समुदायों को हो सकता है।

जरूरत है भरोसे और पारदर्शिता की

समाधान न तो एनजीओ को कानून से ऊपर रखने में है और न ही हर सामाजिक गतिविधि को संदेह की नजर से देखने में।

जरूरत इस बात की है कि सामाजिक संस्थाओं के लिए नियम स्पष्ट हों, अनुपालन की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी हो तथा गलती और जानबूझकर किए गए उल्लंघन के बीच अंतर किया जाए। संस्थाओं को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड, गतिविधियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए।

सरकार और प्रशासन की ओर से भी यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि कानून का पालन कराने और वैध सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के बीच संतुलन कायम रखा जाएगा।

सामाजिक सरोकार पीछे नहीं छूटने चाहिए

साक्षरता दिवस हो या विनोबा भावे की जयंती—ऐसे अवसर समाज को शिक्षा, समानता, ग्राम विकास और सामाजिक जिम्मेदारी पर सोचने का मौका देते हैं। एनजीओ इन विषयों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन उनकी भूमिका तभी प्रभावी होगी जब कानून और नागरिक समाज के बीच भरोसा बना रहे।

सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि एनजीओ कार्यक्रम क्यों नहीं कर रहे। असली सवाल यह है कि क्या सामाजिक संस्थाओं को नियमों का पालन करते हुए भी निर्भय होकर जनहित के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है?

कानून जरूरी है, पारदर्शिता जरूरी है और जवाबदेही भी जरूरी है। लेकिन सामाजिक सरोकारों के लिए विश्वास, संवाद और जिम्मेदार स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि डर सामाजिक पहल पर हावी हो गया, तो कमजोर आवाजों को सामने लाने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।


आलोक कुमार

India : ग्रामीण इलाकों में पेयजल की समस्या क्यों बनी हुई है?

 


ग्रामीण इलाकों में पेयजल की समस्या क्यों बनी हुई है?

गांव में नल लग गया, लेकिन क्या पानी भी नियमित आने लगा? यही सवाल आज ग्रामीण पेयजल व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई सामने लाता है।

भारत को गांवों का देश कहा जाता है। गांवों की पहचान खेत, खलिहान, तालाब, पोखर, कुएं और प्राकृतिक जलस्रोतों से रही है। इसके बावजूद देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में आज भी लोगों को पीने के साफ पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। कहीं गर्मी शुरू होते ही हैंडपंप सूख जाते हैं, कहीं पानी में आयरन, फ्लोराइड या आर्सेनिक जैसी अशुद्धियां मिलती हैं और कहीं पाइपलाइन बिछ जाने के बाद भी घरों के नल तक नियमित पानी नहीं पहुंचता।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पेयजल जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है, तो ग्रामीण इलाकों में इसकी समस्या आखिर खत्म क्यों नहीं हो पा रही है?

पानी की कमी से ज्यादा बड़ी समस्या जल प्रबंधन की

ग्रामीण पेयजल संकट को केवल पानी की कमी के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे जल प्रबंधन की कमजोरी भी एक बड़ी वजह है। गांवों में कभी तालाब, कुएं, आहर, पइन और पोखर वर्षा के पानी को रोकने और जरूरत के समय उसका उपयोग करने के महत्वपूर्ण साधन हुआ करते थे।

समय के साथ इनमें से कई जलस्रोत उपेक्षा का शिकार हो गए। कहीं तालाबों पर अतिक्रमण हो गया, कहीं गाद भरने से उनकी जलधारण क्षमता घट गई और कहीं वर्षों से सफाई नहीं हुई। जब बारिश का पानी गांव में रुकने के बजाय बहकर बाहर चला जाता है, तो भूजल को पर्याप्त मात्रा में दोबारा भरने का अवसर नहीं मिलता। इसका सीधा असर गर्मी के दिनों में दिखाई देता है।

भूजल पर बढ़ती निर्भरता

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के लिए लंबे समय से हैंडपंप और बोरवेल पर निर्भरता रही है। यह व्यवस्था कई जगह उपयोगी साबित हुई, लेकिन समस्या तब बढ़ती है जब जमीन के नीचे से लगातार पानी निकाला जाता है और उसके पुनर्भरण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती।

बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने के लिए सोख्ता, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, छोटे जलाशय और अन्य स्थानीय उपाय पर्याप्त स्तर पर नहीं अपनाए जाते। नतीजा यह होता है कि भूजल स्तर नीचे जाता रहता है और गर्मी में कई हैंडपंप पानी देना कम या बंद कर देते हैं।

बाढ़ वाले क्षेत्रों में भी क्यों होता है पानी का संकट?

बिहार जैसे राज्यों में यह समस्या और भी विरोधाभासी दिखाई देती है। कई इलाकों में बारिश और बाढ़ के दौरान चारों तरफ पानी नजर आता है, लेकिन वही पानी पीने के योग्य नहीं होता।

बाढ़ के दौरान गंदा पानी कुओं, चापाकलों और दूसरे जलस्रोतों को दूषित कर सकता है। जलजमाव के कारण संक्रमण और जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। बाढ़ समाप्त होने के कुछ समय बाद जब सतही पानी कम होता है, तब साफ पेयजल की उपलब्धता एक अलग चुनौती बन जाती है।

इसलिए पानी की अधिकता और पानी की कमी दोनों को अलग-अलग समस्या मानने के बजाय पूरे जलचक्र के रूप में समझने की जरूरत है।

पाइपलाइन बिछना ही पर्याप्त नहीं

ग्रामीण क्षेत्रों में नल के माध्यम से पानी पहुंचाने की योजनाओं का विस्तार निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम है। अनेक गांवों में घरों तक पाइपलाइन और नल कनेक्शन पहुंचे हैं। लेकिन किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि कितने नल लगाए गए।

असल सवाल यह है कि नल में पानी कितने दिन आता है, पानी की गुणवत्ता कैसी है और व्यवस्था खराब होने पर उसकी मरम्मत कितनी जल्दी होती है।

कई जगह मोटर खराब होने, बिजली की समस्या, पाइपलाइन में रिसाव या टंकी से जुड़ी तकनीकी खराबी के कारण जलापूर्ति प्रभावित हो जाती है। यदि ऐसी खराबियों को ठीक करने में लंबा समय लगे, तो कागज पर मौजूद सुविधा ग्रामीण परिवार के लिए वास्तविक सुविधा नहीं बन पाती।

पानी की गुणवत्ता भी बड़ी चुनौती

पेयजल की समस्या केवल पानी की मात्रा से जुड़ी नहीं है। साफ दिखाई देने वाला पानी हमेशा स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं।

कुछ क्षेत्रों में भूजल में आयरन, फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य तत्वों की समस्या सामने आती रही है। ऐसे पानी का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए ग्रामीण जल योजनाओं में पानी की नियमित गुणवत्ता जांच को भी उतनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए जितनी पानी पहुंचाने को दी जाती है।

हर गांव में लोगों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उनके इलाके के पानी की गुणवत्ता कैसी है और यदि पानी में कोई समस्या है तो उसका सुरक्षित विकल्प क्या उपलब्ध है।

रखरखाव की कमी क्यों बनती है समस्या?

किसी भी जल योजना की वास्तविक परीक्षा उसके निर्माण के बाद शुरू होती है। हैंडपंप खराब होने पर उसे कौन ठीक करेगा? पानी की टंकी की सफाई कितनी नियमित होगी? पाइपलाइन में लीकेज होने पर शिकायत कहां दर्ज होगी? मोटर खराब होने पर उसे कितने समय में बदला जाएगा?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। कई योजनाएं शुरुआत में अच्छी तरह काम करती हैं, लेकिन कुछ समय बाद रखरखाव की कमी के कारण उनकी उपयोगिता घटने लगती है।

पानी का संकट महिलाओं और बच्चों पर भारी

ग्रामीण पेयजल संकट का सबसे बड़ा असर अक्सर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। जब घर के पास पानी उपलब्ध नहीं होता, तो परिवार की महिलाओं को दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। इसमें रोज का काफी समय और श्रम खर्च होता है।

कई जगह बच्चों को भी पानी लाने के काम में मदद करनी पड़ती है। इसका असर उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसलिए पेयजल की समस्या केवल पानी की समस्या नहीं है। इसका संबंध महिलाओं के समय, बच्चों की शिक्षा, परिवार के स्वास्थ्य और पूरे ग्रामीण विकास से है।

समाधान के लिए गांव को बनाना होगा केंद्र

ग्रामीण पेयजल समस्या का स्थायी समाधान केवल नई पाइपलाइन बिछाने से नहीं होगा। गांव के पुराने तालाब, पोखर, कुएं, आहर और पइन जैसे जलस्रोतों को बचाना और पुनर्जीवित करना होगा।

बारिश के पानी को गांव में रोकने की व्यवस्था करनी होगी। पंचायत स्तर पर यह देखा जाना चाहिए कि एक वर्ष में कितना पानी उपलब्ध होता है, कितना उपयोग किया जाता है और भविष्य की जरूरत कितनी है। इसी आधार पर स्थानीय जल प्रबंधन की योजना तैयार की जा सकती है।

इसके साथ ही ग्रामीण लोगों की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। पंचायत, स्वयं सहायता समूह, स्थानीय समितियां, युवा और ग्रामीण परिवार मिलकर जलस्रोतों और जलापूर्ति व्यवस्था की निगरानी कर सकते हैं।

विकास की पहली शर्त है सुरक्षित पानी

ग्रामीण भारत का विकास केवल सड़क, बिजली, भवन और इंटरनेट से पूरा नहीं होगा। जब तक प्रत्येक परिवार को हर मौसम में पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं होगा, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी।

नल लग जाना उपलब्धि का पहला कदम है, अंतिम लक्ष्य नहीं। अंतिम लक्ष्य तब पूरा होगा जब गांव के लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े, खराब हैंडपंप महीनों बंद न रहें, दूषित पानी पीने की मजबूरी न हो और जलापूर्ति व्यवस्था की जिम्मेदारी स्पष्ट हो।

पानी केवल एक सरकारी सुविधा नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान का आधार है। ग्रामीण पेयजल संकट का समाधान तभी संभव है, जब जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, पानी की गुणवत्ता, नियमित रखरखाव और जनभागीदारी—इन सभी को एक साथ जोड़ा जाए।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में बिजली पहुंची, लेकिन बिजली की गुणवत्ता का सवाल बाकी

 


बिहार में बिजली पहुंची, लेकिन बिजली की गुणवत्ता का सवाल बाकी

बिहार के गांवों में बिजली पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अब विकास की अगली कसौटी केवल कनेक्शन की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि लोगों को कितनी नियमित, स्थिर और गुणवत्तापूर्ण बिजली मिल रही है।

बिहार में पिछले कुछ वर्षों में बिजली की तस्वीर निश्चित रूप से बदली है। गांवों तक बिजली पहुंची, घरों तक कनेक्शन पहुंचे और बिजली आपूर्ति का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ा। अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ते बिहार की यह तस्वीर विकास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन क्या केवल बिजली का कनेक्शन पहुंच जाना ही बिजली व्यवस्था की सफलता है? असली सवाल अब यह है कि बिजली कितनी नियमित, कितनी स्थिर और कितनी गुणवत्तापूर्ण मिल रही है?

ग्रामीण बिहार में बिजली की पहुंच ने सामाजिक और आर्थिक जीवन को बदला है। बच्चों की पढ़ाई के लिए लालटेन और ढिबरी पर निर्भरता कम हुई। किसानों के लिए सिंचाई की संभावनाएं बढ़ीं। छोटी दुकानों, आटा चक्कियों, वेल्डिंग, सिलाई, मोबाइल रिपेयरिंग और दूसरे छोटे कारोबारों को ऊर्जा का आधार मिला। घरों में पंखे, कूलर, फ्रिज और दूसरे विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा। यानी बिजली अब केवल रोशनी का माध्यम नहीं रही, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत बन गई है।

लेकिन जैसे-जैसे बिजली पर निर्भरता बढ़ी है, वैसे-वैसे बिजली की गुणवत्ता का सवाल भी महत्वपूर्ण हुआ है। कई इलाकों में उपभोक्ताओं की शिकायत रहती है कि बिजली आती-जाती रहती है। कभी लो-वोल्टेज की समस्या, कभी अचानक हाई वोल्टेज, कभी ट्रिपिंग और कभी लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने की परेशानी सामने आती है। ऐसी स्थिति में बिजली का कनेक्शन मौजूद होने के बावजूद उसका वास्तविक लाभ सीमित हो जाता है।

सबसे गंभीर समस्याओं में वोल्टेज में उतार-चढ़ाव शामिल है। ग्रामीण क्षेत्रों में जब वोल्टेज स्थिर नहीं रहता, तो पंखे, मोटर, फ्रिज, टीवी, कंप्यूटर और दूसरे विद्युत उपकरणों पर असर पड़ सकता है। किसानों के लिए सिंचाई पंप चलाना मुश्किल हो सकता है। छोटे कारोबारियों के लिए मशीनों का संचालन प्रभावित होता है। बिजली की गुणवत्ता खराब होने का सीधा असर ग्रामीण परिवारों की जेब पर भी पड़ता है, क्योंकि उपकरण खराब होने पर मरम्मत या नया उपकरण खरीदने का खर्च बढ़ जाता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने गांवों या घरों में कनेक्शन पहुंचा। सवाल यह भी होना चाहिए कि 24 घंटे में कितने घंटे गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध है, कितनी बार कटौती होती है और शिकायत का समाधान कितनी जल्दी होता है।

बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण परिवारों की जीवनशैली बदल रही है और कृषि तथा छोटे कारोबारों में विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में वितरण व्यवस्था पर बढ़ता भार नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। ट्रांसफॉर्मर की क्षमता, तारों की स्थिति, फीडर की क्षमता और स्थानीय वितरण नेटवर्क की मजबूती अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

कई बार समस्या बिजली उत्पादन की नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की होती है। बिजली उपलब्ध होने के बावजूद यदि ट्रांसफॉर्मर पर अधिक भार है, लाइन में तकनीकी समस्या है या वितरण नेटवर्क पर्याप्त मजबूत नहीं है, तो उपभोक्ता तक गुणवत्तापूर्ण बिजली नहीं पहुंच पाएगी। इसलिए बिजली व्यवस्था को केवल उत्पादन और कनेक्शन के आंकड़ों से देखने के बजाय अंतिम उपभोक्ता के अनुभव से देखना होगा।

ग्रामीण बिहार में कृषि बिजली का प्रश्न भी इसी से जुड़ा हुआ है। किसान को सिंचाई के लिए बिजली चाहिए, लेकिन केवल बिजली का कनेक्शन पर्याप्त नहीं है। उसे उस समय बिजली चाहिए जब खेत में पानी की जरूरत हो। वोल्टेज इतना होना चाहिए कि मोटर ठीक से चल सके और आपूर्ति इतनी स्थिर हो कि सिंचाई बाधित न हो। यदि बिजली के उतार-चढ़ाव से मोटर खराब हो जाए या बार-बार बंद हो जाए, तो किसान के लिए बिजली सुविधा के बजाय अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकती है।

छोटे कारोबारों के लिए भी यही स्थिति है। गांव में कोई व्यक्ति आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकान, साइबर कैफे, डिजिटल सेवा केंद्र या छोटी उत्पादन इकाई चलाता है तो उसकी आय सीधे बिजली की उपलब्धता से जुड़ी होती है। बार-बार बिजली कटने या वोल्टेज की समस्या से काम रुकता है, ग्राहक प्रभावित होते हैं और कारोबार की लागत बढ़ती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिशें भी प्रभावित होती हैं।

इसलिए अब बिहार को बिजली पहुंचाने की उपलब्धि से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण बिजली के दौर में प्रवेश करना होगा। इसके लिए वितरण नेटवर्क को मजबूत करना, जरूरत के अनुसार ट्रांसफॉर्मर की क्षमता बढ़ाना, जर्जर तारों और उपकरणों को बदलना तथा फॉल्ट की सूचना पर तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना जरूरी है।

साथ ही बिजली कंपनियों को उपभोक्ता शिकायतों के आंकड़ों को केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सुधार का आधार बनाना चाहिए। किस इलाके में सबसे ज्यादा लो-वोल्टेज की शिकायत है? कहां ट्रांसफॉर्मर बार-बार खराब होता है? किस फीडर पर सबसे अधिक ट्रिपिंग होती है? किन गांवों में निर्धारित समय से अधिक कटौती होती है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाएं तो व्यवस्था की जवाबदेही बढ़ेगी।

बिजली की गुणवत्ता का सवाल सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है। शहर में रहने वाले उपभोक्ता के पास खराब बिजली व्यवस्था के विकल्प अपेक्षाकृत अधिक हो सकते हैं, लेकिन गांव में रहने वाले परिवार के लिए विकल्प सीमित होते हैं। यदि ग्रामीण युवा ऑनलाइन पढ़ाई करना चाहता है, कोई महिला घर से डिजिटल काम करना चाहती है, कोई दुकानदार अपना कारोबार बढ़ाना चाहता है या किसान सिंचाई करना चाहता है, तो स्थिर बिजली उसकी बुनियादी जरूरत है।

बिहार ने अंधेरे से उजाले की लंबी दूरी तय की है। अब अगली मंजिल सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि “बिजली पहुंच गई”, बल्कि यह होनी चाहिए कि “बिजली भरोसेमंद हो गई।”

कनेक्शन देना सरकार की जिम्मेदारी का अंत नहीं, शुरुआत है। असली विकास तब माना जाएगा जब गांव के घर में बल्ब जलने के साथ पंखा स्थिर गति से चले, किसान की मोटर भरोसे के साथ चले, दुकानदार की मशीन बिना डर के चले और विद्यार्थी बिना बिजली कटने की चिंता के पढ़ सके।

बिहार में बिजली पहुंची है, अब बिजली की गुणवत्ता पहुंचाने की बारी है। क्योंकि विकास की असली रोशनी तार से नहीं, भरोसेमंद आपूर्ति से पैदा होती है।


आलोक कुमार

India : आवाज अक्सर इन संस्थाओं के माध्यम से सामने आती है

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