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Bihar : चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

 


चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

चुनाव के दौरान जनता राजा बन जाती है और उम्मीदवार रंक। लेकिन जैसे ही नतीजे आते हैं, तस्वीर पलट जाती है—रंक राजा बन जाता है और जनता फिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि के दरबार में खड़ी दिखाई देती है। लोकतंत्र की असली चुनौती इसी उलटफेर को रोकने की है।

लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि चुनाव के दौरान जिस जनता के दरवाजे पर नेता सिर झुकाकर पहुंचते हैं, वही जनता चुनाव परिणाम के बाद अक्सर अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती नजर आती है। वोट मांगते समय जनता सर्वोपरि होती है, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत बढ़ जाती है।

यही सवाल आज बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक के रूप में शपथ लेना उनके राजनीतिक सफर का नया अध्याय है। राजनीति और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर बैठकर विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे।

रणनीतिकार से ‘माननीय’ बनने का यह सफर केवल पद परिवर्तन नहीं है। इसके साथ संवैधानिक अधिकार, संसदीय जिम्मेदारी और जनता के प्रति जवाबदेही भी जुड़ जाती है।

चुनाव जीतना अंत नहीं, शुरुआत है

किसी भी उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जिम्मेदारी का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत होता है।

जनता ने किसी प्रतिनिधि को विधानसभा इसलिए नहीं भेजा कि वह केवल सदन की कार्यवाही में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। उससे अपेक्षा होती है कि वह क्षेत्र की समस्याओं को विधानसभा में उठाए, सरकार से सवाल पूछे, नीतियों पर बहस करे और जनता की आवाज को सत्ता तक पहुंचाए।

विधायक बनने के बाद प्रशांत किशोर के सामने भी यही कसौटी होगी।

बांकीपुर के मतदाताओं ने उन्हें जो जनादेश दिया है, वह अब उनके लिए राजनीतिक पूंजी से ज्यादा जिम्मेदारी है। सड़क, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, शहरी सुविधाएं और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दे अब केवल चुनावी भाषणों के विषय नहीं रहेंगे। इन पर काम और जवाब दोनों देना होगा।

विधायक के पास अधिकार हैं, लेकिन जनता के ऊपर नहीं

विधायक को सदन में जनता के मुद्दे उठाने, प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने और कानून निर्माण की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार मिलता है। राज्य के बजट और वित्तीय प्रस्तावों पर विधानसभा की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका होती है।

विधायक का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के विधायक भी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं और विपक्ष के विधायक भी।

सदन में मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकार प्रतिनिधि को जनता से ऊपर रखने के लिए नहीं होते। उनका उद्देश्य यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना अनुचित दबाव या भय के अपने विचार रख सकें और सार्वजनिक हित के मुद्दे उठा सकें।

यानी अधिकार जितने बड़े हैं, जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

क्या चुनाव के बाद भी जनता राजा रहती है?

यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—क्या चुनाव जीतने के बाद भी जनता राजा बनी रहती है?

संवैधानिक दृष्टि से जवाब स्पष्ट है—हाँ।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम स्रोत जनता है। विधायक जनता द्वारा चुना जाता है और उसका कार्यकाल सीमित होता है। वह स्थायी शासक नहीं है। अगले चुनाव में वही जनता उसके काम का मूल्यांकन कर सकती है।

लेकिन राजनीतिक व्यवहार में तस्वीर कई बार अलग दिखाई देती है।

चुनाव के दौरान उम्मीदवार घर-घर जाते हैं। मतदाताओं के सामने अपनी योजनाएं रखते हैं। हाथ जोड़ते हैं, समर्थन मांगते हैं और कहते हैं कि वे जनता की सेवा करने आए हैं।

परिणाम आने के बाद वही नागरिक किसी प्रमाणपत्र, सड़क, नाली, पेंशन, रोजगार, अस्पताल या सरकारी योजना से जुड़ी समस्या लेकर जनप्रतिनिधि के कार्यालय के चक्कर लगाता है।

यह बदलाव लोकतंत्र की भावना के लिए गंभीर सवाल है।

जनता से दूरी लोकतंत्र को कमजोर करती है

जनप्रतिनिधि और जनता के बीच दूरी बढ़ने का मतलब केवल राजनीतिक दूरी नहीं है। इससे लोकतंत्र की जवाबदेही कमजोर होती है।

यदि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि से मिलने में कठिनाई हो, यदि शिकायतों का जवाब न मिले, यदि चुनाव के दौरान किए गए वादों की समीक्षा न हो और यदि पांच साल तक संवाद केवल चुनावी मौसम में हो, तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व केवल मतदान तक सीमित हो जाता है।

इसलिए जरूरी है कि विधायक अपने क्षेत्र में नियमित जनसंवाद की व्यवस्था बनाए रखें। जनता से मिलने का समय तय हो, शिकायतों की निगरानी हो और विकास कार्यों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।

जनता को भी केवल चुनाव के दिन जागरूक मतदाता बनने के बजाय पूरे कार्यकाल में सक्रिय नागरिक बने रहना होगा।

प्रशांत किशोर के सामने अलग चुनौती

प्रशांत किशोर के मामले में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजनीति में व्यवस्था परिवर्तन, जनभागीदारी और जनता की भूमिका जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है।

अब उनके पास भाषण और राजनीतिक रणनीति से आगे बढ़कर संस्थागत काम करने का अवसर है।

विधानसभा में उनकी भूमिका यह तय करेगी कि वे अपने राजनीतिक विचारों को कानून, नीति और जनहित के ठोस मुद्दों में कितनी प्रभावी ढंग से बदल पाते हैं।

जनता उनसे यह भी पूछ सकती है कि जिन समस्याओं को उन्होंने चुनावी राजनीति में उठाया, उनके समाधान के लिए सदन में उन्होंने क्या किया।

यही वह बिंदु होगा जहां चुनावी वादा और संवैधानिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी होगी।

असली राजा कौन?

लोकतंत्र में ‘राजा’ शब्द प्रतीकात्मक है। वास्तविक व्यवस्था में न तो जनता राजा है और न विधायक। संविधान सर्वोच्च है और निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान के अधीन काम करते हैं।

फिर भी यदि लोकतंत्र की भाषा में सवाल पूछा जाए कि सत्ता का मालिक कौन है, तो जवाब जनता ही होगी।

विधायक को सत्ता जनता से मिलती है। पद जनता देती है। जनादेश जनता देती है और अगले चुनाव में फैसला भी जनता ही करती है।

इसलिए चुनाव जीतने के बाद किसी जनप्रतिनिधि को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता का शासक नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।

बांकीपुर की जनता ने प्रशांत किशोर को अवसर दिया है। अब बारी उनकी है कि वे इस जनादेश को विधानसभा की कार्यवाही, सवालों, नीतियों और जमीन पर दिखाई देने वाले काम में बदलें।

चुनाव में जनता ने उन्हें प्रतिनिधि बनाया है; अब उन्हें साबित करना होगा कि वे जनता को सत्ता से दूर करने नहीं, बल्कि जनता की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने आए हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, जीत के बाद जनता के प्रति जवाबदेह बने रहने में है।

क्योंकि चुनाव के दिन जनता पांच साल के लिए अपना प्रतिनिधि चुनती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी निगरानी और सवाल पूछने का अधिकार पांच साल के लिए समाप्त नहीं होता।

चुनाव में राजा जनता होती है। नतीजे के बाद भी राजा जनता ही रहनी चाहिए—और विधायक को यह याद रखना चाहिए कि वह दरबार का राजा नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।


आलोक कुमार

Bihar : कोसी का कहर

 

कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म

छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं।

18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई।

सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा?

छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट

कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। आयोग की प्रारंभिक अवधि मार्च 2010 तक निर्धारित थी। इसके बाद अवधि बढ़ाई गई और चौथा विस्तार 31 मार्च 2012 तक हुआ।

इसके बावजूद रिपोर्ट तत्काल सामने नहीं आई। करीब छह वर्ष बाद, 1 अगस्त 2014 को आयोग की रिपोर्ट बिहार विधानसभा में रखी गई।

यहीं पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है—जिस त्रासदी के कारणों की जांच जल्द पूरी करने की जरूरत थी, उसकी रिपोर्ट सामने आने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

रिपोर्ट में निगरानी व्यवस्था की कमियों, बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका, चेतावनी व्यवस्था और कटाव निरोधक कार्यों की मॉनिटरिंग जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए गए। अभियंताओं की क्षमता और तैनाती तथा पूर्व में कराए गए कटाव निरोधक कार्यों की जांच की जरूरत का भी उल्लेख किया गया।

लेकिन रिपोर्ट के बाद कार्रवाई कितनी हुई? किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? कितनों पर विभागीय या कानूनी कार्रवाई हुई? जनता को इसका स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब कितना मिला?

यही वह अंतर है जहां जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई के बीच की दूरी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है।

18 साल बाद भी बाढ़ के पुराने जख्म

कोसी की त्रासदी केवल 2008 की घटना नहीं है। इसके निशान आज भी बुनियादी ढांचे और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देते हैं।

मधेपुरा के चौसा प्रखंड में धनेशपुर चौक से मोरसंडा गोठ बस्ती की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलों की समस्या लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी का कारण रही है। मरम्मत के बाद भी बाढ़ में संरचनाओं के क्षतिग्रस्त होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पुल टूटता है, कहीं डायवर्सन बनता है और फिर अगली बाढ़ पुराने संकट को वापस ले आती है।

सवाल यह नहीं कि कोसी में बाढ़ क्यों आती है। सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में हर वर्ष बाढ़ का खतरा रहता है, वहां स्थायी और टिकाऊ बुनियादी ढांचा क्यों नहीं तैयार किया जाता?

बाढ़ के समय नाव लोगों की मजबूरी बन जाती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना कठिन हो जाता है। किसानों की फसल और बाजार तक पहुंच दोनों प्रभावित होते हैं।

पुनर्वास की अधूरी कहानी

आपदा के बाद राहत तत्काल जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन स्थायी पुनर्वास ही प्रभावित परिवारों को सामान्य जीवन में लौटाता है। यही वजह है कि पुनर्वास योजनाओं की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण सवालों में शामिल होनी चाहिए।

मधेपुरा में 2 लाख 36 हजार 632 घरों के प्रभावित होने और करीब एक लाख घरों के निर्माण की योजना से जुड़ी जानकारी सामने आई थी। लेकिन योजना बंद होने तक लगभग एक चौथाई घर ही बन पाने की बात कही गई। यदि उपलब्ध आंकड़े सही हैं, तो यह पुनर्वास की गति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

आपदा के बाद वर्षों तक यदि परिवार पक्के घर की प्रतीक्षा करता रहे तो राहत का अर्थ अधूरा रह जाता है। पुनर्वास सिर्फ मकान बनाने की योजना नहीं है। इसमें सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए।

मुआवजे के आंकड़े भी पूछते हैं सवाल

मृतकों के परिजनों को सहायता देने के लिए सरकार ने विभिन्न मदों में मुआवजे और अनुदान की व्यवस्था की थी। लेकिन मधेपुरा से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में आधिकारिक तौर पर 272 मौतें दर्ज होने और 181 मृतकों के परिवारों को सरकारी अनुदान मिलने की बात सामने आती है।

यदि ये आंकड़े सही हैं तो सवाल बेहद सीधा है—बाकी परिवारों को सहायता क्यों नहीं मिली?

आपदा में मृतकों की संख्या केवल सरकारी आंकड़ा नहीं होती। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, एक घर और कई अधूरे सपने होते हैं। इसलिए मुआवजे की सूची, भुगतान की स्थिति और लंबित मामलों का सार्वजनिक विवरण होना चाहिए।

यदि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों या लाभुकों की संख्या अलग है, तो प्रशासन को उन आंकड़ों का मिलान भी सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।

आपदा सिर्फ पानी से नहीं बनती

कोसी ने यह भी सिखाया कि आपदा का प्रभाव केवल प्राकृतिक कारणों से तय नहीं होता। कमजोर निगरानी, लचर प्रशासन, निर्णय में देरी, खराब निर्माण, अधूरी योजनाएं और जवाबदेही की कमी किसी प्राकृतिक संकट को लंबे सामाजिक संकट में बदल सकती हैं।

18 अगस्त 2008 को पानी आया और बहुत कुछ बहा ले गया। लेकिन पानी उतरने के बाद भी हजारों परिवारों का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कहीं सड़क नहीं बनी, कहीं पुल का स्थायी समाधान नहीं हुआ, कहीं पुनर्वास अधूरा रहा और कहीं मुआवजे का सवाल लंबित रहा।

अब श्रद्धांजलि नहीं, सार्वजनिक हिसाब चाहिए

18 वर्ष बाद कोसी को केवल त्रासदी की बरसी पर याद करना पर्याप्त नहीं है। अब पुराने वादों और योजनाओं का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।

सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए—

  • 2008 की त्रासदी के कारणों पर जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या कार्रवाई हुई?

  • कितने अधिकारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हुई?

  • पुनर्वास के लिए कितने घर स्वीकृत हुए और कितने वास्तव में बने?

  • कितने परिवारों को मुआवजा मिला और कितने मामले अभी लंबित हैं?

  • टूटे और जर्जर पुलों की स्थायी मरम्मत के लिए क्या समयबद्ध योजना है?

  • भविष्य की बाढ़ से निपटने के लिए चेतावनी और निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत हुई है?

कोसी के लोगों को फिर केवल आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें योजनाओं की स्थिति, खर्च हुए धन और लंबित काम का सार्वजनिक हिसाब चाहिए।

क्योंकि आपदा का पानी उतर जाता है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी नहीं उतरती।

18 अगस्त 2008 की त्रासदी को 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब समय है कि कोसी के पुराने जख्मों पर सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि ठोस काम दिखाई दे।

कोसी का पानी भले उतर गया हो, लेकिन कोसी के सवाल आज भी ऊंचे हैं।


आलोक कुमार

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