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Bihar : जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें-----

 गणित की यूनिवर्सिटी, इतिहास की राजनीति और बिहार का शिक्षा संकट: बयान से उठे बड़े सवाल

"जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें, तो उम्मीद होती है कि वे भविष्य का रास्ता दिखाएंगे। लेकिन जब शिक्षा पर दिया गया बयान ही बहस और विवाद का विषय बन जाए, तो सवाल सिर्फ बयान का नहीं, बल्कि सोच और तैयारी का भी बन जाता है।"

बिहार की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के एक बयान को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बिहार में भविष्य में फिजिक्स, मैथमेटिक्स, केमिस्ट्री और आर्किटेक्चर जैसे विषयों के विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएंगे। उनका उद्देश्य शायद बिहार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का था, लेकिन बयान के शब्दों ने राजनीतिक विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया।

सोशल मीडिया पर इस बयान के बाद तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने मुख्यमंत्री की अकादमिक समझ पर सवाल उठाए, जबकि विपक्ष ने इसे बिहार के नेतृत्व की "शिक्षा संबंधी जानकारी की कमी" का उदाहरण बताया। कुछ पोस्टों में तो यहां तक लिखा गया कि "बिहार का दुर्भाग्य है कि यहां मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मूर्ख मंत्री शासन कर रहे हैं।"

हालांकि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन किसी भी राजनीतिक बहस को तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखना अधिक उचित होता है।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि बिहार ज्ञान की भूमि है, लेकिन यहां गणित का विश्वविद्यालय नहीं है। उन्होंने ओडिशा और अहमदाबाद जैसे स्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में भी विशिष्ट विषयों पर आधारित संस्थानों की स्थापना की जाएगी। उनके बयान का मूल उद्देश्य राज्य में उच्च शिक्षा के विस्तार की घोषणा करना था।

लेकिन विपक्षी नेताओं और शिक्षा विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि दुनिया में कहीं भी "फिजिक्स यूनिवर्सिटी" या "केमिस्ट्री यूनिवर्सिटी" जैसी अवधारणा सामान्य रूप से नहीं होती। विश्वविद्यालयों में इन विषयों के विभाग होते हैं, स्वतंत्र विश्वविद्यालय नहीं। इसी तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकांश विश्वविद्यालय बहुविषयक (Multidisciplinary) होते हैं, जिनमें विज्ञान, कला, वाणिज्य और तकनीकी विषयों के अलग-अलग संकाय संचालित होते हैं।

तेजस्वी यादव और आरजेडी के समर्थकों ने भी इस बयान को मुद्दा बनाया। उनका कहना है कि बिहार की वास्तविक समस्या विश्वविद्यालयों की संख्या नहीं, बल्कि मौजूदा संस्थानों की खराब स्थिति है। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं, परीक्षा सत्र नियमित नहीं हैं और शोध गतिविधियां अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं।

दरअसल, विवाद का केंद्र यह नहीं है कि बिहार में नए संस्थान बनने चाहिए या नहीं। लगभग हर व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि राज्य को अधिक गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की आवश्यकता है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या विषयों के नाम पर अलग-अलग विश्वविद्यालय स्थापित करने की अवधारणा व्यावहारिक है और क्या सरकार के पास इसके लिए कोई स्पष्ट खाका मौजूद है।

बिहार ऐतिहासिक रूप से शिक्षा का केंद्र रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया भर के विद्यार्थियों को आकर्षित किया था। आज भी राज्य में बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र हैं, लेकिन उच्च शिक्षा और शोध के बेहतर अवसरों के लिए उन्हें दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेशों का रुख करना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल संस्थानों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता और संसाधनों की भी है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। बिहार में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच हर बयान राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। विपक्ष मुख्यमंत्री के बयान को उनकी योग्यता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, जबकि सत्तापक्ष इसे विकास के विजन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। सोशल मीडिया ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहां तथ्य और व्यंग्य अक्सर एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या जनता केवल शब्दों की गलती पर ध्यान दे या फिर उस बड़े उद्देश्य पर भी विचार करे जिसके तहत नए संस्थानों की बात कही गई है। यदि सरकार वास्तव में विज्ञान, गणित, वास्तुकला और शोध के लिए विशेष केंद्र स्थापित करना चाहती है, तो यह स्वागत योग्य पहल हो सकती है। दुनिया के कई देशों में विशिष्ट शोध संस्थान और केंद्र मौजूद हैं जो किसी खास विषय में विशेषज्ञता विकसित करते हैं। हालांकि उन्हें विश्वविद्यालय कहना या न कहना अलग बहस का विषय हो सकता है।

दूसरी ओर, विपक्ष का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि बिहार को सबसे पहले अपने मौजूदा शिक्षा ढांचे को मजबूत करना चाहिए। अगर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी रहे, शोध के लिए पर्याप्त संसाधन न हों और छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहें, तो नए संस्थानों की घोषणा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह सकती है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। यह बहस किसी एक नेता या दल तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा यह है कि क्या बिहार आने वाले वर्षों में शिक्षा और शोध के क्षेत्र में फिर से अपनी ऐतिहासिक पहचान हासिल कर पाएगा।

अंततः, किसी भी राजनीतिक बयान का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसके पीछे की नीयत और उसके बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। जनता को भी यह देखना होगा कि विवादों और कटाक्षों के बीच शिक्षा सुधार की वास्तविक दिशा क्या है। क्योंकि बिहार को आज सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग बहसों से अधिक जरूरत बेहतर स्कूलों, मजबूत विश्वविद्यालयों, सक्षम शिक्षकों और शोध आधारित शिक्षा व्यवस्था की है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि बयान में कौन-सा शब्द गलत था; वह यह देखेगा कि शिक्षा के क्षेत्र में वास्तव में कितना परिवर्तन हुआ।

आलोक कुमार

India : राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं

            क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? 

क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? क्या अहिंसा के रास्ते पर चलकर सरकारों को नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है? यदि इसका उत्तर खोजना हो, तो एक नाम सामने आता है— पी. वी. राजगोपाल। जिन्हें देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में लोग सम्मानपूर्वक "राजा जी" कहकर संबोधित करते हैं। राजगोपाल पीवी का पूरा नाम राजगोपाल पुथन वीटिल है।उनका जन्म 6 जून 1948 को हुआ है। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हजारों कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और शुभचिंतक उन्हें हार्दिक बधाई दे रहे हैं तथा उनके संघर्षपूर्ण जीवन को याद कर रहे हैं।

राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों लोगों की आशा, संघर्ष और अधिकारों की कहानी है, जिनकी आवाज़ लंबे समय तक सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाई। उन्होंने अपने जीवन को गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा, सत्याग्रह और मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। यही कारण है कि उनका नाम आज "जल, जंगल, जमीन" के संघर्ष का पर्याय बन चुका है।

एकता परिषद के संस्थापक के रूप में राजगोपाल जी ने देश के आदिवासियों, दलितों, भूमिहीन किसानों और वंचित समुदायों को संगठित किया। उन्होंने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि अधिकार मांगने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करने की चीज़ है। उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों ने भारत के सामाजिक इतिहास में नई इबारत लिखी।

साल 2007 में शुरू हुआ जनादेश 2007 इसी संघर्ष की एक ऐतिहासिक कड़ी था। ग्वालियर से दिल्ली तक लगभग 350 किलोमीटर की पदयात्रा में 18 राज्यों से आए करीब 25 हजार आदिवासी और भूमिहीन लोग शामिल हुए। यह केवल एक मार्च नहीं था, बल्कि उन लोगों की पुकार थी जो वर्षों से भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार नीति लागू कराना, भूमि विवादों के त्वरित समाधान की व्यवस्था करना और भूमिहीनों को उनका अधिकार दिलाना था। आंदोलन की ताकत इतनी प्रभावशाली थी कि केंद्र सरकार को राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद के गठन की घोषणा करनी पड़ी और वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का आश्वासन देना पड़ा।

लेकिन जब वादे पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरे, तब राजाजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक बार फिर अहिंसा के मार्ग को चुना और वर्ष 2012 में जन सत्याग्रह 2012 का नेतृत्व किया। इस बार लगभग 50 हजार लोग न्याय की मांग लेकर दिल्ली की ओर बढ़े। यह दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक जन आंदोलनों में से एक माना गया। आंदोलनकारियों के दिल्ली पहुंचने से पहले ही सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने आगरा में प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की और एक ऐतिहासिक 10 सूत्रीय समझौता हुआ। इस समझौते में राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का मसौदा तैयार करने और भूमिहीन परिवारों को आवासीय भूमि उपलब्ध कराने का वादा किया गया।

राजाजी का संघर्ष केवल भूमि अधिकार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह समझा कि जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल आजीविका का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, संस्कृति और अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है। इसी सोच के साथ जन आंदोलन 2016 की शुरुआत हुई। इस अभियान ने औद्योगिक परियोजनाओं और तथाकथित विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन के खिलाफ आवाज़ उठाई। साथ ही महिलाओं को भूमि स्वामित्व का अधिकार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। इस आंदोलन ने भूमि अधिकारों को जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के वैश्विक विमर्श से जोड़ने का कार्य किया।

राजाजी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने संघर्ष को कभी हिंसा का रूप नहीं लेने दिया। उनके आंदोलनों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि गांधीजी के सत्याग्रह की शक्ति आज भी जीवित है। बिना एक पत्थर उठाए, बिना किसी टकराव के, लाखों लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं और व्यवस्था को संवेदनशील बना सकते हैं।

उनके साथ वर्षों तक काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं के लिए राजाजी केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, शिक्षक और प्रेरणास्रोत हैं। पिछले 25 वर्षों से उनके साथ जुड़े लोगों का मानना है कि उन्होंने उन्हें केवल आंदोलन करना नहीं सिखाया, बल्कि इंसानियत, करुणा और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीना भी सिखाया।

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए एक कार्यकर्ता की भावनाएं कुछ इस प्रकार हैं— "पिछले 25 वर्षों से मुझे आपके उस प्रेरणादायक सफर का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है जो गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा और मानवता की सेवा पर आधारित है। भूमि अधिकारों के आंदोलन के माध्यम से न्याय, समानता और वंचितों के सशक्तिकरण के प्रति आपका समर्पण हम सबके लिए प्रेरणा रहा है। इस विशेष दिन पर मैं आपके उत्तम स्वास्थ्य, शांति और आपके महान मिशन को आगे बढ़ाने की शक्ति की कामना करता हूं। आने वाली पीढ़ियों के लिए आपका जीवन आशा, संघर्ष और एकता की मिसाल बना रहे।"

आज जब पूरा देश विकास, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है, तब राजाजी का जीवन हमें याद दिलाता है कि असली विकास वही है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज़ सुनी जाए। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि सम्मान, पहचान और जीवन का आधार होती है।

राजाजी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। उनका जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को न्याय, अहिंसा और मानवाधिकारों के लिए निरंतर प्रेरित करता रहे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है

                         जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है। यह केवल जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और जीवन के बुनियादी अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। दशकों से हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। वे सरकारी जमीन, परती भूमि, सड़क किनारे या दूसरों की जमीन पर अस्थायी आशियाना बनाकर जीवन गुजारने को मजबूर हैं। ऐसे लोगों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर जन संगठन एकता परिषद लंबे समय से संघर्ष करता रहा है। जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसी कड़ी में एकता परिषद बिहार के कार्यकर्ताओं ने राज्य के सभी 38 जिलों में आवासीय भूमिहीन परिवारों का सर्वेक्षण कराया। सर्वे के आधार पर हजारों परिवारों की सूची तैयार कर संबंधित प्रखंडों के अंचल कार्यालयों में आवेदन जमा किए गए। संगठन का दावा है कि इन आवेदनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और अधिकांश मामलों में भूमिहीन परिवार आज भी सरकारी सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हाल के दिनों में इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा पैदा कर दी है। राज्य के नए भू-सुधार एवं राजस्व मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने पदभार संभालने के बाद भूमिहीनों से जुड़े मामलों की समीक्षा की है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अंचल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गलत जानकारी सरकार तक न पहुंचे। साथ ही अंचल अधिकारियों को यह भी स्पष्ट रूप से बताने को कहा गया है कि उनके क्षेत्र में कोई आवासीय भूमिहीन परिवार बचा है या नहीं।

सरकार की दृष्टि से देखें तो यह निर्देश पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास माना जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र में वास्तव में भूमिहीन परिवार हैं तो उनकी पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। वहीं यदि गलत आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं तो इससे नीति निर्माण प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार जमीनी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहती है।

लेकिन एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता विजय गोरैया इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका आरोप है कि यह आदेश आवासीय भूमिहीनों के खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकता है। उनका कहना है कि जब पहले से ही संगठन द्वारा व्यापक सर्वेक्षण कर भूमिहीन परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी जा चुकी है, तब यह कहना कि किसी अंचल में एक भी भूमिहीन नहीं है, वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे पहले दिए गए आवेदनों और सर्वेक्षण रिपोर्टों को फिर से अंचल अधिकारियों तथा मंत्री तक पहुंचाएं और अपने क्षेत्रों के भूमिहीन परिवारों की अद्यतन जानकारी लिखित रूप में भेजें।

बिहार में आवासीय भूमिहीनों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की प्रतीक्षा सूची में लगभग 20 हजार से अधिक ऐसे परिवार चिन्हित किए गए हैं जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है। हालांकि सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी सर्वेक्षणों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कई परिवार ऐसे हैं जो विभिन्न कारणों से सरकारी सूची में शामिल नहीं हो पाते और योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। मुख्यमंत्री वास स्थल क्रय सहायता योजना उनमें प्रमुख है। इस योजना के तहत भूमिहीन और वास-स्थल विहीन परिवारों को जमीन खरीदने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। पहले यह सहायता राशि 60 हजार रुपये थी, जिसे बढ़ाकर अब एक लाख रुपये प्रति लाभार्थी कर दिया गया है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में सरकारी भूमि उपलब्ध है, वहां राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा भूमि बंदोबस्ती और पर्चा वितरण की प्रक्रिया भी चलाई जाती है।

फिर भी सवाल यह है कि यदि योजनाएं मौजूद हैं तो हजारों परिवार आज भी भूमि और आवास से वंचित क्यों हैं?इसका उत्तर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, जमीन की उपलब्धता, सर्वेक्षण की खामियों और स्थानीय स्तर पर होने वाली देरी में छिपा हुआ है। कई बार पात्र परिवारों का नाम सूची में नहीं जुड़ पाता, तो कई बार कागजी प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि लोग वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं।

आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वास्तविक समाधान खोजने की है। सरकार, प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी परिवार केवल इसलिए बेघर न रहे क्योंकि उसका नाम किसी सूची में नहीं है या उसका आवेदन किसी कार्यालय की फाइलों में दबा पड़ा है।

भूमिहीनों का सवाल केवल एक सरकारी योजना का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। यदि बिहार को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो हर परिवार को रहने के लिए सुरक्षित जमीन और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना होगा। यही किसी भी कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी पहचान होती है।

आलोक कुमार

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