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शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

UPI ने कैसे बदल दी भारत की पेमेंट व्यवस्था?

 

UPI ने कैसे बदल दी भारत की पेमेंट व्यवस्था?

कभी छोटी-सी खरीदारी के लिए जेब में नकद रखना जरूरी था, फिर एटीएम और कार्ड का दौर आया। आज एक मोबाइल फोन और QR कोड से चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबार तक भुगतान हो रहा है। आखिर UPI ने भारत की भुगतान व्यवस्था को इतना तेजी से कैसे बदल दिया?

भारत में भुगतान व्यवस्था में पिछले एक दशक में जितना बदलाव आया है, उसमें Unified Payments Interface यानी UPI की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। UPI को 2016 में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी NPCI ने शुरू किया। इसका उद्देश्य अलग-अलग बैंक खातों और भुगतान प्रणालियों के बीच ऐसा साझा डिजिटल ढांचा तैयार करना था, जिससे पैसे भेजना और प्राप्त करना आसान हो सके। UPI का पायलट लॉन्च 11 अप्रैल 2016 को हुआ था।

आज UPI केवल पैसे भेजने का माध्यम नहीं है। यह भारत की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।

नकद से मोबाइल तक का सफर

UPI से पहले भी भारत में डिजिटल भुगतान मौजूद था। NEFT, RTGS और IMPS जैसे माध्यमों से बैंक खातों के बीच पैसे भेजे जाते थे। कार्ड और मोबाइल वॉलेट भी इस्तेमाल होते थे। लेकिन इन प्रणालियों में अलग-अलग प्रक्रियाएं, ऐप और विवरण की जरूरत पड़ सकती थी।

UPI ने इस अनुभव को काफी सरल बना दिया। एक UPI ऐप में कई बैंक खातों को जोड़ा जा सकता है और बैंक खाते से सीधे भुगतान किया जा सकता है। NPCI के अनुसार UPI तत्काल बैंक-टू-बैंक भुगतान की सुविधा देता है और P2P तथा व्यापारी भुगतान दोनों को समर्थन करता है।

यही सरलता इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

अब किसी दुकानदार को भुगतान करने के लिए बैंक खाते की लंबी जानकारी लिखने की जरूरत नहीं होती। QR कोड स्कैन किया, राशि दर्ज की और UPI PIN से भुगतान पूरा किया।

छोटे दुकानदारों के लिए बड़ा बदलाव

UPI की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों में से एक है छोटे कारोबारियों तक डिजिटल भुगतान की पहुंच।

पहले छोटे दुकानदारों के लिए कार्ड मशीन लगाना हमेशा आसान या सस्ता नहीं था। लेकिन QR कोड आधारित भुगतान ने डिजिटल लेनदेन को छोटे व्यापारियों तक पहुंचाने में मदद की।

चाय की दुकान, सब्जी विक्रेता, किराना दुकान, ऑटो चालक, रेहड़ी-पटरी वाला या छोटा स्थानीय व्यवसाय—कई जगह ग्राहक सीधे मोबाइल से भुगतान कर सकता है।

इस बदलाव ने डिजिटल भुगतान को केवल बड़े मॉल और ऑनलाइन खरीदारी तक सीमित नहीं रहने दिया।

UPI की असली ताकत: इंटरऑपरेबिलिटी

UPI की एक महत्वपूर्ण विशेषता interoperability है। इसका मतलब है कि अलग-अलग बैंक और UPI ऐप एक साझा भुगतान व्यवस्था के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं।

उपयोगकर्ता को केवल इस वजह से भुगतान व्यवस्था बदलने की जरूरत नहीं पड़ती कि सामने वाले व्यक्ति का बैंक अलग है।

यही विशेषता UPI को पारंपरिक बैंक ट्रांसफर से अलग अनुभव देती है।

NPCI के अनुसार UPI में उपयोगकर्ता एक ही ऐप के माध्यम से कई बैंक खातों तक पहुंच बना सकता है। साथ ही virtual payment address और QR आधारित भुगतान जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

आंकड़े बताते हैं बदलाव की कहानी

UPI का विस्तार कितना बड़ा हो चुका है, इसका अंदाजा इसके लेनदेन आंकड़ों से लगाया जा सकता है।

NPCI के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में UPI पर लगभग 23.20 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹29.90 लाख करोड़ था। उस महीने UPI पर 720 बैंक लाइव थे।

यह केवल डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता का आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि मोबाइल आधारित भुगतान अब भारत के आर्थिक जीवन में किस स्तर तक प्रवेश कर चुका है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में UPI को भारत के retail payment landscape में प्रमुख परिवर्तनकारी माध्यम बताया है। 2023-24 में कुल retail payment volume में UPI की हिस्सेदारी 79.6 प्रतिशत थी।

छोटे भुगतान भी डिजिटल हो गए

UPI ने भुगतान की एक और पुरानी धारणा बदली—कि डिजिटल भुगतान केवल बड़ी रकम के लिए उपयोगी है।

अब कुछ रुपये की चाय, नाश्ता, पानी की बोतल या स्थानीय यात्रा का भुगतान भी डिजिटल माध्यम से किया जा सकता है।

इससे नकद रखने की जरूरत कम हुई और छोटे व्यापारियों के लिए भुगतान प्राप्त करने के नए विकल्प खुले।

यही कारण है कि UPI केवल बैंकिंग तकनीक नहीं बल्कि दैनिक जीवन की भुगतान आदत में बदलाव बन गया है।

बैंकिंग और फिनटेक का नया रिश्ता

UPI ने बैंकों के साथ-साथ fintech कंपनियों के लिए भी नया अवसर पैदा किया।

विभिन्न ऐप ने भुगतान के अनुभव को आसान बनाने, QR भुगतान, बिल भुगतान, ऑटो-पेमेंट और दूसरी सुविधाओं को एक ही डिजिटल अनुभव में जोड़ने की कोशिश की।

NPCI के आंकड़े बताते हैं कि UPI ecosystem में कई बैंक और ऐप सक्रिय हैं। अगस्त 2025 के उपलब्ध आंकड़ों में PhonePe, Google Pay और Paytm जैसे ऐप बड़े transaction volumes के साथ दिखाई देते हैं।

इससे स्पष्ट है कि UPI ने केवल बैंकिंग को डिजिटल नहीं किया, बल्कि पूरे fintech ecosystem को विस्तार दिया।

ग्रामीण भारत के लिए क्या बदला?

UPI का प्रभाव शहरों तक सीमित नहीं है। स्मार्टफोन और इंटरनेट की उपलब्धता बढ़ने के साथ छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल बढ़ा है।

हालांकि डिजिटल भुगतान की पहुंच अभी समान नहीं है। इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्मार्टफोन की उपलब्धता, डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा की जानकारी जैसे मुद्दे अब भी महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए डिजिटल भुगतान का अगला चरण केवल transaction बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कम डिजिटल क्षमता वाले नागरिक भी सुरक्षित तरीके से इसका उपयोग कर सकें।

UPI ने महिलाओं और परिवारों की वित्तीय सुविधा भी बढ़ाई

मोबाइल भुगतान ने परिवारों के भीतर पैसे भेजने की प्रक्रिया भी आसान की है। घर से दूर रहने वाले सदस्य कुछ सेकंड में पैसे भेज सकते हैं।

छोटे व्यवसाय करने वाली महिलाएं भी ग्राहकों से सीधे डिजिटल भुगतान प्राप्त कर सकती हैं। इससे नकद संभालने और खुले पैसे की समस्या कम हो सकती है।

लेकिन यहां भी डिजिटल साक्षरता जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल UPI इस्तेमाल करना आना पर्याप्त नहीं है; उसे PIN, OTP, QR और fraud calls के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए।

सुविधा के साथ साइबर जोखिम

UPI ने भुगतान आसान किया है, लेकिन आसान भुगतान का अर्थ जोखिम समाप्त होना नहीं है।

सबसे बड़ी समस्या है social engineering fraud। ठग अक्सर बैंक अधिकारी, ग्राहक सेवा प्रतिनिधि या किसी परिचित व्यक्ति के रूप में सामने आकर PIN, OTP या payment approval हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।

इसलिए यह समझना जरूरी है कि पैसा प्राप्त करने के लिए आम तौर पर UPI PIN डालने की जरूरत नहीं होती। NPCI भी उपयोगकर्ताओं को UPI PIN साझा न करने की सलाह देता है।

डिजिटल भुगतान की सफलता के साथ डिजिटल सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ी है।

अगला चरण क्या होगा?

UPI लगातार विकसित हो रहा है। UPI Lite, offline payment जैसी सुविधाओं ने कम राशि और सीमित connectivity वाले उपयोग मामलों को संबोधित करने की कोशिश की है। RBI ने भी digital payments को अधिक व्यापक और सुविधाजनक बनाने के लिए offline payment frameworks को आगे बढ़ाया है।

UPI की अंतरराष्ट्रीय पहुंच भी बढ़ रही है। NPCI की UPI One World व्यवस्था विदेशी यात्रियों को भारत में UPI आधारित भुगतान की सुविधा देने के लिए बनाई गई है और NPCI के अनुसार यह भारत में 700 मिलियन से अधिक QR तक भुगतान की सुविधा देती है।

इससे UPI का भविष्य केवल भारत के भीतर डिजिटल भुगतान तक सीमित नहीं दिखाई देता।

निष्कर्ष

UPI ने भारत की payment व्यवस्था को केवल तेज नहीं किया, बल्कि भुगतान की आदत ही बदल दी

पहले नकद, फिर कार्ड और मोबाइल वॉलेट के बाद भारत ने एक ऐसे interoperable digital payment system को बड़े पैमाने पर अपनाया जिसमें बैंक खाता, मोबाइल और QR कोड आम नागरिक के लिए भुगतान का साधन बन गए।

इस बदलाव की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि डिजिटल भुगतान अब केवल महानगरों की सुविधा नहीं रहा। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

लेकिन आगे की चुनौती भी स्पष्ट है—डिजिटल भुगतान जितना बढ़ेगा, उतनी ही मजबूत साइबर सुरक्षा, उपभोक्ता जागरूकता और डिजिटल समावेशन की जरूरत होगी।

UPI ने भारत को cashless नहीं बनाया है, लेकिन उसने भारत को तेजी से “less-cash” अर्थव्यवस्था की ओर जरूर धकेला है।

और शायद यही UPI की सबसे बड़ी कहानी है—इसने बैंकिंग को मोबाइल तक नहीं पहुंचाया, बल्कि मोबाइल को रोजमर्रा की बैंकिंग का हिस्सा बना दिया।

आलोक कुमार