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शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार