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Bihar : बिहार में बिजली पहुंची, लेकिन बिजली की गुणवत्ता का सवाल बाकी

 


बिहार में बिजली पहुंची, लेकिन बिजली की गुणवत्ता का सवाल बाकी

बिहार के गांवों में बिजली पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अब विकास की अगली कसौटी केवल कनेक्शन की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि लोगों को कितनी नियमित, स्थिर और गुणवत्तापूर्ण बिजली मिल रही है।

बिहार में पिछले कुछ वर्षों में बिजली की तस्वीर निश्चित रूप से बदली है। गांवों तक बिजली पहुंची, घरों तक कनेक्शन पहुंचे और बिजली आपूर्ति का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ा। अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ते बिहार की यह तस्वीर विकास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन क्या केवल बिजली का कनेक्शन पहुंच जाना ही बिजली व्यवस्था की सफलता है? असली सवाल अब यह है कि बिजली कितनी नियमित, कितनी स्थिर और कितनी गुणवत्तापूर्ण मिल रही है?

ग्रामीण बिहार में बिजली की पहुंच ने सामाजिक और आर्थिक जीवन को बदला है। बच्चों की पढ़ाई के लिए लालटेन और ढिबरी पर निर्भरता कम हुई। किसानों के लिए सिंचाई की संभावनाएं बढ़ीं। छोटी दुकानों, आटा चक्कियों, वेल्डिंग, सिलाई, मोबाइल रिपेयरिंग और दूसरे छोटे कारोबारों को ऊर्जा का आधार मिला। घरों में पंखे, कूलर, फ्रिज और दूसरे विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा। यानी बिजली अब केवल रोशनी का माध्यम नहीं रही, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत बन गई है।

लेकिन जैसे-जैसे बिजली पर निर्भरता बढ़ी है, वैसे-वैसे बिजली की गुणवत्ता का सवाल भी महत्वपूर्ण हुआ है। कई इलाकों में उपभोक्ताओं की शिकायत रहती है कि बिजली आती-जाती रहती है। कभी लो-वोल्टेज की समस्या, कभी अचानक हाई वोल्टेज, कभी ट्रिपिंग और कभी लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने की परेशानी सामने आती है। ऐसी स्थिति में बिजली का कनेक्शन मौजूद होने के बावजूद उसका वास्तविक लाभ सीमित हो जाता है।

सबसे गंभीर समस्याओं में वोल्टेज में उतार-चढ़ाव शामिल है। ग्रामीण क्षेत्रों में जब वोल्टेज स्थिर नहीं रहता, तो पंखे, मोटर, फ्रिज, टीवी, कंप्यूटर और दूसरे विद्युत उपकरणों पर असर पड़ सकता है। किसानों के लिए सिंचाई पंप चलाना मुश्किल हो सकता है। छोटे कारोबारियों के लिए मशीनों का संचालन प्रभावित होता है। बिजली की गुणवत्ता खराब होने का सीधा असर ग्रामीण परिवारों की जेब पर भी पड़ता है, क्योंकि उपकरण खराब होने पर मरम्मत या नया उपकरण खरीदने का खर्च बढ़ जाता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने गांवों या घरों में कनेक्शन पहुंचा। सवाल यह भी होना चाहिए कि 24 घंटे में कितने घंटे गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध है, कितनी बार कटौती होती है और शिकायत का समाधान कितनी जल्दी होता है।

बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण परिवारों की जीवनशैली बदल रही है और कृषि तथा छोटे कारोबारों में विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में वितरण व्यवस्था पर बढ़ता भार नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। ट्रांसफॉर्मर की क्षमता, तारों की स्थिति, फीडर की क्षमता और स्थानीय वितरण नेटवर्क की मजबूती अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

कई बार समस्या बिजली उत्पादन की नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की होती है। बिजली उपलब्ध होने के बावजूद यदि ट्रांसफॉर्मर पर अधिक भार है, लाइन में तकनीकी समस्या है या वितरण नेटवर्क पर्याप्त मजबूत नहीं है, तो उपभोक्ता तक गुणवत्तापूर्ण बिजली नहीं पहुंच पाएगी। इसलिए बिजली व्यवस्था को केवल उत्पादन और कनेक्शन के आंकड़ों से देखने के बजाय अंतिम उपभोक्ता के अनुभव से देखना होगा।

ग्रामीण बिहार में कृषि बिजली का प्रश्न भी इसी से जुड़ा हुआ है। किसान को सिंचाई के लिए बिजली चाहिए, लेकिन केवल बिजली का कनेक्शन पर्याप्त नहीं है। उसे उस समय बिजली चाहिए जब खेत में पानी की जरूरत हो। वोल्टेज इतना होना चाहिए कि मोटर ठीक से चल सके और आपूर्ति इतनी स्थिर हो कि सिंचाई बाधित न हो। यदि बिजली के उतार-चढ़ाव से मोटर खराब हो जाए या बार-बार बंद हो जाए, तो किसान के लिए बिजली सुविधा के बजाय अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकती है।

छोटे कारोबारों के लिए भी यही स्थिति है। गांव में कोई व्यक्ति आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकान, साइबर कैफे, डिजिटल सेवा केंद्र या छोटी उत्पादन इकाई चलाता है तो उसकी आय सीधे बिजली की उपलब्धता से जुड़ी होती है। बार-बार बिजली कटने या वोल्टेज की समस्या से काम रुकता है, ग्राहक प्रभावित होते हैं और कारोबार की लागत बढ़ती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिशें भी प्रभावित होती हैं।

इसलिए अब बिहार को बिजली पहुंचाने की उपलब्धि से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण बिजली के दौर में प्रवेश करना होगा। इसके लिए वितरण नेटवर्क को मजबूत करना, जरूरत के अनुसार ट्रांसफॉर्मर की क्षमता बढ़ाना, जर्जर तारों और उपकरणों को बदलना तथा फॉल्ट की सूचना पर तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना जरूरी है।

साथ ही बिजली कंपनियों को उपभोक्ता शिकायतों के आंकड़ों को केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सुधार का आधार बनाना चाहिए। किस इलाके में सबसे ज्यादा लो-वोल्टेज की शिकायत है? कहां ट्रांसफॉर्मर बार-बार खराब होता है? किस फीडर पर सबसे अधिक ट्रिपिंग होती है? किन गांवों में निर्धारित समय से अधिक कटौती होती है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाएं तो व्यवस्था की जवाबदेही बढ़ेगी।

बिजली की गुणवत्ता का सवाल सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है। शहर में रहने वाले उपभोक्ता के पास खराब बिजली व्यवस्था के विकल्प अपेक्षाकृत अधिक हो सकते हैं, लेकिन गांव में रहने वाले परिवार के लिए विकल्प सीमित होते हैं। यदि ग्रामीण युवा ऑनलाइन पढ़ाई करना चाहता है, कोई महिला घर से डिजिटल काम करना चाहती है, कोई दुकानदार अपना कारोबार बढ़ाना चाहता है या किसान सिंचाई करना चाहता है, तो स्थिर बिजली उसकी बुनियादी जरूरत है।

बिहार ने अंधेरे से उजाले की लंबी दूरी तय की है। अब अगली मंजिल सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि “बिजली पहुंच गई”, बल्कि यह होनी चाहिए कि “बिजली भरोसेमंद हो गई।”

कनेक्शन देना सरकार की जिम्मेदारी का अंत नहीं, शुरुआत है। असली विकास तब माना जाएगा जब गांव के घर में बल्ब जलने के साथ पंखा स्थिर गति से चले, किसान की मोटर भरोसे के साथ चले, दुकानदार की मशीन बिना डर के चले और विद्यार्थी बिना बिजली कटने की चिंता के पढ़ सके।

बिहार में बिजली पहुंची है, अब बिजली की गुणवत्ता पहुंचाने की बारी है। क्योंकि विकास की असली रोशनी तार से नहीं, भरोसेमंद आपूर्ति से पैदा होती है।


आलोक कुमार

Bihar : गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां

 


गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां

गांव से शहर जाने वाले मजदूरों के सामने रोजगार की अनिश्चितता, समय पर मजदूरी न मिलना, सुरक्षित आवास की कमी, स्वास्थ्य जोखिम, सामाजिक सुरक्षा और परिवार से दूरी जैसी कई चुनौतियां होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक काम की व्यवस्था करना जरूरी है।

पटना। गांव की पगडंडी से निकलकर जब कोई मजदूर शहर की ओर जाता है, तो उसके साथ केवल एक छोटा-सा बैग नहीं होता। उसके कंधे पर पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। आंखों में बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत, बेटी की शादी, बुजुर्ग माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का सपना होता है। वह गांव इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे अपना घर पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि घर में उसके श्रम के बदले पर्याप्त आमदनी का रास्ता नहीं बन पाता।

बिहार जैसे राज्यों में गांव से शहर की ओर मजदूरों का जाना कोई नई घटना नहीं है। वर्षों से लाखों परिवारों की अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा प्रवासी मजदूरी पर टिका हुआ है। लेकिन पलायन की तस्वीर अक्सर इतनी भर दिखाई जाती है कि मजदूर शहर गया, काम किया और पैसा घर भेज दिया। इसके पीछे छिपी वास्तविक चुनौतियों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।

रोजगार मिलने की गारंटी नहीं

शहर पहुंचते ही मजदूर को स्थायी नौकरी मिल जाए, यह जरूरी नहीं है। बहुत से प्रवासी मजदूर ठेकेदारों या बिचौलियों के माध्यम से निर्माण स्थल, फैक्टरी, होटल, गोदाम, ईंट-भट्ठे और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम तलाशते हैं।

आज काम मिला तो मजदूरी मिली, कल काम नहीं मिला तो आमदनी भी नहीं। दूसरी तरफ शहर में रहने का खर्च लगातार चलता रहता है। किराया, भोजन, आने-जाने का खर्च और मोबाइल जैसी जरूरतों के लिए पैसा चाहिए, चाहे उस दिन काम मिले या नहीं।

यही वजह है कि शहर में काम करने वाला मजदूर अक्सर रोजगार के साथ-साथ रोजगार की निरंतरता की चिंता भी करता है।

समय पर मजदूरी मिलना भी चुनौती

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के सामने कई बार सबसे बड़ी समस्या मजदूरी के भुगतान को लेकर होती है। काम पूरा होने के बाद भुगतान के लिए कई दिनों या हफ्तों तक इंतजार करना पड़ सकता है।

बाहर से आए मजदूर के पास स्थानीय स्तर पर मजबूत सामाजिक नेटवर्क नहीं होता। उसे यह भी डर रहता है कि ज्यादा सवाल पूछने या शिकायत करने पर अगली बार काम न मिले।

मजदूरी में देरी का सीधा असर उसके परिवार पर पड़ता है। गांव में घर चलाने के लिए भेजे जाने वाले पैसे रुक जाते हैं। बच्चों की फीस, राशन, दवा और खेती से जुड़े खर्च प्रभावित होने लगते हैं।

रहने के लिए सुरक्षित जगह कहां मिले?

शहर में मजदूरों के लिए सस्ता और सुरक्षित आवास मिलना आसान नहीं है। कई मजदूर छोटे कमरों में कई लोगों के साथ रहते हैं। कहीं झुग्गी में रहना पड़ता है तो कहीं निर्माणाधीन इमारत के आसपास अस्थायी ठिकाना बनाना पड़ता है।

स्वच्छ पानी, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। काम की जगह और रहने की जगह के बीच लंबी दूरी होने पर आने-जाने का खर्च भी बढ़ जाता है।

कम आय वाले मजदूर के लिए आवास की समस्या केवल सुविधा का सवाल नहीं है। यह उसकी आय, स्वास्थ्य और परिवार की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।

स्वास्थ्य और कार्यस्थल की सुरक्षा

मजदूर की जिंदगी की एक और बड़ी चुनौती स्वास्थ्य और सुरक्षा है। निर्माण कार्य, फैक्टरी, सड़क निर्माण, भारी सामान उठाने और मशीनों के आसपास काम करने में दुर्घटना का खतरा बना रहता है।

लंबे समय तक काम करने से शारीरिक थकान और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। गर्मी, बारिश, धूल, प्रदूषण और असुरक्षित कार्यस्थल में लगातार काम करना शरीर पर भारी पड़ता है।

दुर्घटना होने पर समस्या और गंभीर हो जाती है। मजदूर घायल हुआ तो कुछ समय के लिए उसकी कमाई बंद हो सकती है, जबकि परिवार का खर्च चलता रहता है। ऐसे समय में इलाज का खर्च और आय का नुकसान दोनों परिवार पर दबाव डाल सकते हैं।

शहर में सामाजिक पहचान का संकट

प्रवासी मजदूरों की सामाजिक असुरक्षा भी कम गंभीर समस्या नहीं है। गांव में व्यक्ति को लोग पहचानते हैं। पड़ोसी, पंचायत, स्थानीय दुकानदार और रिश्तेदार उसके सामाजिक जीवन का हिस्सा होते हैं। शहर में पहुंचने के बाद वही व्यक्ति अक्सर केवल एक श्रमिक बनकर रह जाता है।

स्थानीय प्रशासन, अस्पताल, बैंक, स्कूल और सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाने में उसे कठिनाई हो सकती है। भाषा, दस्तावेज, स्थानीय जानकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी की कमी उसके लिए अतिरिक्त बाधा बन जाती है।

इसलिए प्रवासी मजदूर के लिए शहर केवल रोजगार की नई जगह नहीं, बल्कि एक पूरी तरह नया सामाजिक वातावरण भी होता है।

परिवार से दूरी की कीमत

कई मजदूर अकेले शहर में रहते हैं और उनका परिवार गांव में रहता है। बाहर कमाने वाला व्यक्ति पैसे भेजता है, लेकिन बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और खेती की जिम्मेदारी पीछे छूटे परिवार पर आ जाती है।

दूसरी स्थिति में पूरा परिवार शहर चला जाता है। तब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। बार-बार जगह बदलने के कारण उनकी शिक्षा की निरंतरता टूट सकती है।

महिलाओं के लिए भी शहर में नए वातावरण के साथ तालमेल बैठाना आसान नहीं होता। सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सुविधा और बच्चों की देखभाल जैसी जरूरतें परिवार के सामने नई चुनौतियां खड़ी करती हैं।

बिचौलियों की भूमिका पर सवाल

मजदूर और काम देने वाले के बीच बिचौलियों या ठेकेदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। रोजगार दिलाने के नाम पर कई स्तर के लोग शामिल हो जाएं तो मजदूर की वास्तविक मजदूरी और उसके हाथ में आने वाली रकम के बीच अंतर पैदा हो सकता है।

कई मजदूर काम शुरू करते समय काम के घंटे, भुगतान की तारीख, अतिरिक्त काम की मजदूरी और रहने की व्यवस्था जैसी बातों की पूरी जानकारी नहीं ले पाते। इसकी एक वजह यह भी है कि उनके सामने तत्काल काम पाने की जरूरत होती है।

इसलिए रोजगार व्यवस्था में पारदर्शिता और लिखित शर्तों की जानकारी मजदूरों के हित में महत्वपूर्ण हो सकती है।

शहरों के विकास में मजदूरों का योगदान

इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद प्रवासी मजदूर शहरों की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। सड़कें, पुल, मकान, बाजार, फैक्ट्रियां, होटल और अनेक सेवाएं उनके श्रम से चलती हैं।

शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन्हीं हाथों को अक्सर सबसे कम सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए मजदूर को केवल सस्ता श्रम मानना उसके योगदान को कम करके आंकना है।

सवाल यह नहीं है कि मजदूर गांव छोड़कर शहर क्यों जाता है। सवाल यह है कि शहर पहुंचने के बाद उसके साथ कैसा व्यवहार होता है?

यदि मजदूर देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है, तो उसे सुरक्षित कार्यस्थल, समय पर मजदूरी, सम्मानजनक आवास, स्वास्थ्य सुविधा, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।

गांव में रोजगार के विकल्प भी जरूरी

शहर की समस्याओं का समाधान केवल शहर में नहीं है। गांवों में रोजगार के स्थायी अवसर पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।

कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, छोटे उद्योग, ग्रामीण निर्माण, हस्तशिल्प और कौशल आधारित सेवाओं को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार बढ़ाया जा सकता है।

जब गांव के मजदूर के सामने एक से अधिक विकल्प होंगे, तब उसका शहर जाना मजबूरी के बजाय उसकी पसंद और आर्थिक रणनीति का हिस्सा बन सकता है।

किसी मजदूर का शहर जाना अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब उसके श्रम की कीमत कम और उसकी मजबूरी की कीमत ज्यादा हो जाती है।

गांव का मजदूर केवल मजदूरी करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अपने परिवार, गांव और देश की अर्थव्यवस्था को संभालने वाला नागरिक है। उसके संघर्ष को आंकड़ों के पीछे छिपाने के बजाय उसकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन हाथों को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार मिलना ही सच्चे विकास की पहचान होगी।

आलोक कुमार

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

 


ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है।

पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश?

पलायन को केवल बेरोजगारी का परिणाम मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन कई कारणों का मिला-जुला परिणाम है। रोजगार की कमी निश्चित रूप से इसका बड़ा कारण है, लेकिन इसके साथ मजदूरी का स्तर, काम की निरंतरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जुड़ी हुई है।

खेती से पूरे परिवार का गुजारा क्यों मुश्किल हो रहा है?

ग्रामीण बिहार में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आजीविका का आधार है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खेती से पूरे परिवार का साल भर गुजारा करना कठिन होता जा रहा है। जमीन का आकार छोटा है, खेती की लागत बढ़ रही है और सिंचाई की सुविधा हर क्षेत्र में समान नहीं है। ऐसे में खेती से होने वाली आमदनी और परिवार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जाता है।

यही अंतर ग्रामीण युवाओं को दूसरे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है। गांव में यदि किसी युवक को महीने में कुछ दिनों का ही काम मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में उसे लगातार काम और अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिल सकती है, तो उसका बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए हर पलायन को केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा। कई युवा आज पलायन को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखते हैं।

मजबूरी का पलायन और अवसर की तलाश अलग है

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मजबूरी में किया गया पलायन और अवसर की तलाश में किया गया पलायन एक जैसा नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर दूसरे शहर में नौकरी करता है, बेहतर वेतन पाता है और परिवार का जीवन स्तर ऊपर उठाता है, तो इसे आर्थिक गतिशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि कोई मजदूर गांव में काम न मिलने के कारण असुरक्षित परिस्थितियों में दूसरे राज्य जाता है, अस्थायी जगह पर रहता है और मजदूरी या काम की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

ग्रामीण बिहार के सामने चुनौती यह है कि यहां लोगों के पास रोजगार चुनने के विकल्प कितने हैं। अगर विकल्प केवल बाहर जाने का है, तो यह विकास की कमजोरी को दिखाता है।

पढ़ाई के बाद भी गांव में रोजगार क्यों नहीं?

ग्रामीण युवाओं की एक बड़ी समस्या स्थानीय स्तर पर कौशल के अनुरूप रोजगार का अभाव है। शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच दूरी अब भी दिखाई देती है।

कई युवा डिग्री या तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन यदि उनके आसपास उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें पटना, दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद या अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता है।

इसका असर केवल उस युवक पर नहीं पड़ता। गांव की युवा श्रमशक्ति बाहर चली जाती है। इससे स्थानीय बाजार, छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होती है।

परिवार के लिए प्रवासी मजदूर की कमाई कितनी महत्वपूर्ण है?

पलायन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ता है। घर में अक्सर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं। खेती और घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बुजुर्गों के कंधों पर आ जाता है।

दूसरी तरफ बाहर कमाने गया व्यक्ति परिवार को पैसे भेजता है। इसी आय से बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का खर्च, खेती में निवेश और मकान जैसी जरूरतें पूरी होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी मजदूर केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लंबे समय तक परिवार से दूर रहने की कीमत भी होती है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जीवन में दूरी का असर दिखाई देता है। प्रवासी श्रमिकों को काम की असुरक्षा, दुर्घटना, बीमारी, मजदूरी में देरी और रहने की खराब परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

गांव में रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में ऐसे रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को केवल मजबूरी में बाहर न जाना पड़े?

इसका जवाब केवल सरकारी नौकरियों में नहीं है। गांवों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, छोटे विनिर्माण केंद्र, हस्तशिल्प और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

यदि किसान अपनी उपज को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय गांव या प्रखंड स्तर पर उसका प्रसंस्करण कर सके, तो स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय और रोजगार दोनों पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह ग्रामीण युवाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए, जिसके बाद बाजार में वास्तविक रोजगार उपलब्ध हो। इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, ड्राइविंग, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में मांग के अनुरूप कौशल विकास किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और इंटरनेट भी रोजगार से जुड़े हैं

ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते समय बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क, बिजली, इंटरनेट, बैंकिंग और बाजार तक आसान पहुंच किसी भी छोटे व्यवसाय के लिए जरूरी है।

जब किसी गांव तक बाजार पहुंचेगा, तभी वहां व्यवसाय खड़ा करने की संभावना बढ़ेगी। जब व्यवसाय बढ़ेगा, तभी स्थानीय रोजगार पैदा होगा। इसलिए ग्रामीण विकास को केवल सड़क बनाने या भवन तैयार करने तक सीमित करने के बजाय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पलायन रोकना नहीं, सुरक्षित विकल्प देना जरूरी

सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर व्यक्ति को अपने गांव में ही रोक दिया जाए। देश के भीतर रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आर्थिक विकास का हिस्सा भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी, शोषण और असुरक्षा का पर्याय बन जाता है।

इसलिए जरूरत ऐसे ग्रामीण आर्थिक मॉडल की है, जिसमें गांव का युवा चाहे तो गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कर सके और चाहे तो बाहर जाकर अपनी प्रतिभा और कौशल के अनुरूप बेहतर अवसर हासिल कर सके।

ग्रामीण बिहार के पलायन को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे एक परिवार की जरूरत, एक किसान की आर्थिक मजबूरी, एक युवा की महत्वाकांक्षा और बेहतर भविष्य का सपना छिपा है।

पलायन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है; मजबूरी वाले पलायन को अवसर में बदलना समाधान है। बिहार के गांवों को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जहां रोजगार के लिए घर छोड़ना मजबूरी न हो और बाहर जाना केवल बेहतर अवसर चुनने का फैसला हो। विकल्प होना ही वास्तविक विकास की निशानी है।

आलोक कुमार

Bihar : ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

 


ग्रामीण बिहार में इंटरनेट है, लेकिन डिजिटल सुविधा कितनी?

पटना। बिहार के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। जिस मोबाइल फोन को कभी केवल बातचीत का माध्यम माना जाता था, वही आज बैंक, बाजार, शिक्षा, सरकारी सेवा, रोजगार और मनोरंजन की खिड़की बन चुका है। गांव का युवा ऑनलाइन फॉर्म भर रहा है, किसान मौसम और मंडी की जानकारी खोज रहा है, विद्यार्थी वीडियो के जरिए पढ़ाई कर रहा है और परिवार का कोई सदस्य मोबाइल से पैसे भेज रहा है।

लेकिन इस बदलाव के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच जाने का मतलब डिजिटल सुविधा पहुंच जाना भी है?

इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से लगभग 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे और 6,31,834 गांवों में 4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध बताई गई। इसी अवधि में बिहार में 4G/5G बेस ट्रांसीवर स्टेशनों की संख्या 1,26,048 दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का विस्तार हुआ है। लेकिन नेटवर्क की मौजूदगी और डिजिटल सशक्तिकरण एक ही बात नहीं है।

मोबाइल है, लेकिन डिजिटल क्षमता कितनी?

ग्रामीण बिहार में स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता डिजिटल रूप से सक्षम है।

क्या हर ग्रामीण स्वयं सरकारी वेबसाइट पर आवेदन कर सकता है? क्या हर बुजुर्ग ऑनलाइन पेंशन की स्थिति देख सकता है? क्या किसान डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकता है? क्या विद्यार्थी इंटरनेट पर सही और विश्वसनीय जानकारी पहचान सकता है?

यहीं डिजिटल विभाजन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है।

पहले डिजिटल डिवाइड का अर्थ केवल इंटरनेट उपलब्ध होने या न होने से लगाया जाता था। अब इसमें डिवाइस की उपलब्धता, इंटरनेट की गुणवत्ता, डिजिटल साक्षरता, भाषा, डेटा का खर्च और ऑनलाइन सेवाओं को समझने की क्षमता भी शामिल है।

इसलिए गांव में मोबाइल नेटवर्क पहुंच जाना डिजिटल क्रांति की शुरुआत है, उसका अंतिम पड़ाव नहीं।

भारतनेट की चुनौती: कनेक्शन से उपयोग तक

ग्रामीण कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए भारतनेट जैसी परियोजनाओं पर काम किया गया है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना और उसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, डिजिटल बैंकिंग और रोजगार जैसी सेवाओं को बढ़ावा देना है।

दिसंबर 2025 के सरकारी जवाब के अनुसार बिहार की 8,340 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत कवर करने की योजना थी।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि फाइबर गांव तक पहुंचा या नहीं।

सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है।

क्या पंचायत भवन में इंटरनेट वास्तव में काम करता है? क्या स्कूल में डिजिटल कनेक्टिविटी का इस्तेमाल हो रहा है? क्या स्वास्थ्य केंद्र ऑनलाइन सेवाओं से जुड़ा है? क्या ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड की सुविधा पहुंच रही है?

यदि फाइबर बिछ गया लेकिन नागरिक को तेज और भरोसेमंद सेवा नहीं मिली, तो कनेक्टिविटी का वास्तविक लाभ अधूरा रहेगा।

इंटरनेट की स्पीड भी विकास का हिस्सा

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद धीमी स्पीड और बार-बार नेटवर्क टूटने की समस्या कई लोगों के लिए बड़ी परेशानी हो सकती है।

ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान वीडियो रुक जाए, सरकारी पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न हो, वीडियो कॉल टूट जाए या डिजिटल भुगतान के समय कनेक्शन विफल हो जाए तो इंटरनेट मौजूद होने के बावजूद सुविधा प्रभावी नहीं रहती।

इसलिए डिजिटल विकास को केवल कितने गांव जुड़े के आंकड़े से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि वहां इंटरनेट की गुणवत्ता कैसी है और नागरिक उसका कितना प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं।

डिजिटल बैंकिंग ने बदली तस्वीर, लेकिन जोखिम भी बढ़ा

डिजिटल भुगतान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार को बदला है। बैंक जाने के बजाय मोबाइल से पैसे भेजना, भुगतान करना और खाते से जुड़ी कई जानकारियां हासिल करना आसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी लिंक, नकली कस्टमर केयर नंबर, ओटीपी मांगने वाले ठग और गलत डिजिटल भुगतान की घटनाएं किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

इसलिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल मोबाइल से भुगतान करना सीखना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि ओटीपी और पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करना है और साइबर धोखाधड़ी होने पर शिकायत कहां करनी है।

सरकारी सेवा ऑनलाइन, तो सहायता भी जरूरी

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना समय और संसाधन बचा सकता है। आवेदन, प्रमाणपत्र, पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार और भूमि संबंधी कई प्रक्रियाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं।

लेकिन जिस व्यक्ति को स्मार्टफोन चलाने में परेशानी है या जिसे अंग्रेजी भाषा समझने में कठिनाई होती है, उसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था सुविधा के बजाय नई बाधा बन सकती है।

ऐसे में कॉमन सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

गांव का डिजिटल सेवा केंद्र केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने और प्रिंट निकालने की जगह न होकर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां नागरिक को प्रक्रिया समझाई जाए और उसे सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी भी दी जाए।

भाषा भी डिजिटल पहुंच की दीवार

ग्रामीण बिहार के बहुत से नागरिक हिंदी और स्थानीय भाषाओं में अधिक सहज हैं। यदि सरकारी वेबसाइट या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जटिल भाषा में हो तो इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद नागरिक दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो सकता है।

डिजिटल शासन तभी प्रभावी होगा जब सरकारी सेवाओं का इंटरफेस सरल भाषा, आसान प्रक्रिया और मोबाइल-अनुकूल व्यवस्था के साथ तैयार किया जाए।

किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तकनीकी शब्दावली का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल भागीदारी

डिजिटल सुविधा का लाभ परिवार के हर सदस्य तक पहुंचना जरूरी है। कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही व्यक्ति के पास होता है। इससे महिलाओं और बुजुर्गों की डिजिटल स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

यदि किसी महिला को बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य या सरकारी योजना की जानकारी के लिए हमेशा परिवार के किसी दूसरे सदस्य पर निर्भर रहना पड़े तो इसे पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

बुजुर्गों के लिए भी ऐसी डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है जिनमें कम चरण हों और सहायता आसानी से उपलब्ध हो।

असली डिजिटल विकास कैसे मापा जाए?

अब डिजिटल विकास को केवल टावर, फाइबर और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल होने चाहिए—

  • कितने ग्रामीण स्वयं ऑनलाइन सरकारी सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं?

  • कितने विद्यार्थी इंटरनेट से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं?

  • कितने किसान डिजिटल माध्यम से बाजार और कृषि संबंधी जानकारी हासिल कर रहे हैं?

  • कितने परिवार सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग कर पा रहे हैं?

  • कितने सरकारी संस्थान वास्तव में डिजिटल सेवाएं दे रहे हैं?

  • इंटरनेट से ग्रामीणों का समय, यात्रा और खर्च कितना कम हुआ है?

यही सवाल बताएंगे कि कनेक्टिविटी वास्तव में सुविधा में बदल रही है या नहीं।

गांव को केवल उपभोक्ता नहीं, डिजिटल उत्पादक बनाना होगा

ग्रामीण बिहार को सिर्फ इंटरनेट का उपभोक्ता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गांव के युवा डिजिटल रोजगार, ऑनलाइन कारोबार और ई-कॉमर्स से जुड़ सकते हैं। महिलाएं अपने बनाए उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचा सकती हैं। किसान बाजार भाव और खरीदारों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यदि युवा गांव में बैठकर डिजिटल सेवा उपलब्ध करा सके, महिला अपने उत्पाद बेच सके और किसान सही बाजार सूचना प्राप्त कर सके, तभी इंटरनेट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत बनेगा।

निष्कर्ष

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन कनेक्टिविटी को सुविधा और सुविधा को सशक्तिकरण में बदलना अभी बाकी है।

फाइबर और मोबाइल नेटवर्क के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, बेहतर नेटवर्क गुणवत्ता, स्थानीय भाषा में सरकारी सेवाएं और भरोसेमंद डिजिटल सहायता केंद्रों पर भी ध्यान देना होगा।

डिजिटल क्रांति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि गांव में मोबाइल पर कितने सिग्नल दिखाई देते हैं।

असली सफलता तब होगी जब गांव का सामान्य नागरिक बिना अनावश्यक बिचौलिए के सरकारी सेवा ले सके, सुरक्षित डिजिटल भुगतान कर सके, अपने बच्चे की ऑनलाइन पढ़ाई में मदद कर सके, बाजार से जुड़ सके और इंटरनेट को अपनी आय तथा जीवन की गुणवत्ता सुधारने का साधन बना सके।

ग्रामीण बिहार में इंटरनेट पहुंच चुका है; अब चुनौती यह है कि डिजिटल सुविधा भी हर वर्ग और हर घर तक वास्तव में पहुंचे।


आलोक कुमार

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