बिहार में बिजली पहुंची, लेकिन बिजली की गुणवत्ता का सवाल बाकी
बिहार के गांवों में बिजली पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अब विकास की अगली कसौटी केवल कनेक्शन की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि लोगों को कितनी नियमित, स्थिर और गुणवत्तापूर्ण बिजली मिल रही है।
बिहार में पिछले कुछ वर्षों में बिजली की तस्वीर निश्चित रूप से बदली है। गांवों तक बिजली पहुंची, घरों तक कनेक्शन पहुंचे और बिजली आपूर्ति का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ा। अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ते बिहार की यह तस्वीर विकास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन क्या केवल बिजली का कनेक्शन पहुंच जाना ही बिजली व्यवस्था की सफलता है? असली सवाल अब यह है कि बिजली कितनी नियमित, कितनी स्थिर और कितनी गुणवत्तापूर्ण मिल रही है?
ग्रामीण बिहार में बिजली की पहुंच ने सामाजिक और आर्थिक जीवन को बदला है। बच्चों की पढ़ाई के लिए लालटेन और ढिबरी पर निर्भरता कम हुई। किसानों के लिए सिंचाई की संभावनाएं बढ़ीं। छोटी दुकानों, आटा चक्कियों, वेल्डिंग, सिलाई, मोबाइल रिपेयरिंग और दूसरे छोटे कारोबारों को ऊर्जा का आधार मिला। घरों में पंखे, कूलर, फ्रिज और दूसरे विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा। यानी बिजली अब केवल रोशनी का माध्यम नहीं रही, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत बन गई है।
लेकिन जैसे-जैसे बिजली पर निर्भरता बढ़ी है, वैसे-वैसे बिजली की गुणवत्ता का सवाल भी महत्वपूर्ण हुआ है। कई इलाकों में उपभोक्ताओं की शिकायत रहती है कि बिजली आती-जाती रहती है। कभी लो-वोल्टेज की समस्या, कभी अचानक हाई वोल्टेज, कभी ट्रिपिंग और कभी लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने की परेशानी सामने आती है। ऐसी स्थिति में बिजली का कनेक्शन मौजूद होने के बावजूद उसका वास्तविक लाभ सीमित हो जाता है।
सबसे गंभीर समस्याओं में वोल्टेज में उतार-चढ़ाव शामिल है। ग्रामीण क्षेत्रों में जब वोल्टेज स्थिर नहीं रहता, तो पंखे, मोटर, फ्रिज, टीवी, कंप्यूटर और दूसरे विद्युत उपकरणों पर असर पड़ सकता है। किसानों के लिए सिंचाई पंप चलाना मुश्किल हो सकता है। छोटे कारोबारियों के लिए मशीनों का संचालन प्रभावित होता है। बिजली की गुणवत्ता खराब होने का सीधा असर ग्रामीण परिवारों की जेब पर भी पड़ता है, क्योंकि उपकरण खराब होने पर मरम्मत या नया उपकरण खरीदने का खर्च बढ़ जाता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने गांवों या घरों में कनेक्शन पहुंचा। सवाल यह भी होना चाहिए कि 24 घंटे में कितने घंटे गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध है, कितनी बार कटौती होती है और शिकायत का समाधान कितनी जल्दी होता है।
बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण परिवारों की जीवनशैली बदल रही है और कृषि तथा छोटे कारोबारों में विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में वितरण व्यवस्था पर बढ़ता भार नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। ट्रांसफॉर्मर की क्षमता, तारों की स्थिति, फीडर की क्षमता और स्थानीय वितरण नेटवर्क की मजबूती अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
कई बार समस्या बिजली उत्पादन की नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की होती है। बिजली उपलब्ध होने के बावजूद यदि ट्रांसफॉर्मर पर अधिक भार है, लाइन में तकनीकी समस्या है या वितरण नेटवर्क पर्याप्त मजबूत नहीं है, तो उपभोक्ता तक गुणवत्तापूर्ण बिजली नहीं पहुंच पाएगी। इसलिए बिजली व्यवस्था को केवल उत्पादन और कनेक्शन के आंकड़ों से देखने के बजाय अंतिम उपभोक्ता के अनुभव से देखना होगा।
ग्रामीण बिहार में कृषि बिजली का प्रश्न भी इसी से जुड़ा हुआ है। किसान को सिंचाई के लिए बिजली चाहिए, लेकिन केवल बिजली का कनेक्शन पर्याप्त नहीं है। उसे उस समय बिजली चाहिए जब खेत में पानी की जरूरत हो। वोल्टेज इतना होना चाहिए कि मोटर ठीक से चल सके और आपूर्ति इतनी स्थिर हो कि सिंचाई बाधित न हो। यदि बिजली के उतार-चढ़ाव से मोटर खराब हो जाए या बार-बार बंद हो जाए, तो किसान के लिए बिजली सुविधा के बजाय अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकती है।
छोटे कारोबारों के लिए भी यही स्थिति है। गांव में कोई व्यक्ति आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकान, साइबर कैफे, डिजिटल सेवा केंद्र या छोटी उत्पादन इकाई चलाता है तो उसकी आय सीधे बिजली की उपलब्धता से जुड़ी होती है। बार-बार बिजली कटने या वोल्टेज की समस्या से काम रुकता है, ग्राहक प्रभावित होते हैं और कारोबार की लागत बढ़ती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिशें भी प्रभावित होती हैं।
इसलिए अब बिहार को बिजली पहुंचाने की उपलब्धि से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण बिजली के दौर में प्रवेश करना होगा। इसके लिए वितरण नेटवर्क को मजबूत करना, जरूरत के अनुसार ट्रांसफॉर्मर की क्षमता बढ़ाना, जर्जर तारों और उपकरणों को बदलना तथा फॉल्ट की सूचना पर तेजी से कार्रवाई सुनिश्चित करना जरूरी है।
साथ ही बिजली कंपनियों को उपभोक्ता शिकायतों के आंकड़ों को केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सुधार का आधार बनाना चाहिए। किस इलाके में सबसे ज्यादा लो-वोल्टेज की शिकायत है? कहां ट्रांसफॉर्मर बार-बार खराब होता है? किस फीडर पर सबसे अधिक ट्रिपिंग होती है? किन गांवों में निर्धारित समय से अधिक कटौती होती है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाएं तो व्यवस्था की जवाबदेही बढ़ेगी।
बिजली की गुणवत्ता का सवाल सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है। शहर में रहने वाले उपभोक्ता के पास खराब बिजली व्यवस्था के विकल्प अपेक्षाकृत अधिक हो सकते हैं, लेकिन गांव में रहने वाले परिवार के लिए विकल्प सीमित होते हैं। यदि ग्रामीण युवा ऑनलाइन पढ़ाई करना चाहता है, कोई महिला घर से डिजिटल काम करना चाहती है, कोई दुकानदार अपना कारोबार बढ़ाना चाहता है या किसान सिंचाई करना चाहता है, तो स्थिर बिजली उसकी बुनियादी जरूरत है।
बिहार ने अंधेरे से उजाले की लंबी दूरी तय की है। अब अगली मंजिल सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि “बिजली पहुंच गई”, बल्कि यह होनी चाहिए कि “बिजली भरोसेमंद हो गई।”
कनेक्शन देना सरकार की जिम्मेदारी का अंत नहीं, शुरुआत है। असली विकास तब माना जाएगा जब गांव के घर में बल्ब जलने के साथ पंखा स्थिर गति से चले, किसान की मोटर भरोसे के साथ चले, दुकानदार की मशीन बिना डर के चले और विद्यार्थी बिना बिजली कटने की चिंता के पढ़ सके।
बिहार में बिजली पहुंची है, अब बिजली की गुणवत्ता पहुंचाने की बारी है। क्योंकि विकास की असली रोशनी तार से नहीं, भरोसेमंद आपूर्ति से पैदा होती है।
आलोक कुमार
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