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फिर जवाबदेही क्यों नहीं?

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  संसद का समय जनता का, खर्च भी जनता का – फिर जवाबदेही क्यों नहीं? नई दिल्ली. लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनता के टैक्स से चलने वाली संसद ही अक्सर ठप पड़ी रहती है. दमन और दीव से निर्दलीय सांसद उमेश पटेल का संसद परिसर में किया गया विरोध इसी बीमार व्यवस्था पर सीधा प्रहार है.उनका सवाल बड़ा सरल है—जब सदन नहीं चलता, तो खर्च जनता क्यों उठाए? सांसदों की जेब से ही इसकी वसूली क्यों न हो?यह सवाल असहज करने वाला है, क्योंकि संसद का एक-एक मिनट करोड़ों रुपये का होता है.जब सत्ता और विपक्ष बहस छोड़कर हंगामा करते हैं, तो यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है. उमेश पटेल का बैनर—“माफी मांगो, सत्ता पक्ष और विपक्ष माफी मांगो”—असल में हर उस करदाता की आवाज़ है, जो संसद टीवी पर हंगामे का तमाशा देखकर खुद को ठगा महसूस करता है. इस बार के सत्र के आंकड़े बताते हैं कि 120 घंटे तय चर्चा में से महज़ 37 घंटे ही बहस हो सकी.बाकी वक्त शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया.नतीजा यह हुआ कि 14 में से 12 विधेयक बिना चर्चा के पारित कर दिए गए.क्या यही है लोकतंत्र की आत्मा? संसद बहस के लिए बनी है, न कि ‘मशीनरी’ की तरह...