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सोमवार, 24 अगस्त 2026

Bihar : सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना

 


यहां भी होता है... यह जगह होती है... मौका मिलना चाहिए। लेकिन जब मौका मिला तो नतीजा सामने है—पटना प्रेस क्लब!

पत्रकारिता का काम सिर्फ खबर लिखना नहीं है। पत्रकारिता का असली अर्थ है—सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना। लेकिन जब सवाल अपने ही पेशे की किसी संस्था से जुड़ा हो, तब पत्रकार के सामने सबसे कठिन परीक्षा होती है। पटना प्रेस क्लब का मामला इसी परीक्षा की तरह सामने आता है।

पत्रकार मित्र प्रशांत झा ने मुझे भी पटना प्रेस क्लब की सदस्यता दिलाई थी। उस दौर में बड़ी संख्या में पत्रकारों को सदस्य बनाया गया। सदस्यता के नाम पर पत्रकारों से राशि ली गई। उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक छह सौ से अधिक सदस्य बनाए गए थे और सदस्यता शुल्क के रूप में करीब छह लाख रुपये जमा होने की बात सामने आई है।

यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—उस पैसे का हिसाब कहां है?

जिस प्रेस क्लब की कल्पना पत्रकारों के लिए एक साझा मंच के रूप में की गई थी, वह पत्रकारों को संवाद, बैठक, कार्यक्रम और पेशेवर गतिविधियों के लिए एक स्थायी जगह उपलब्ध करा सकता था। लेकिन क्लब की औपचारिक शुरुआत से पहले ही विवाद, अंदरूनी खींचतान और पद-प्रतिष्ठा की राजनीति ने पूरे प्रयास को कमजोर कर दिया।

एक संस्था का निर्माण केवल भवन, कमरे या फर्नीचर से नहीं होता। संस्था विश्वास से बनती है। और पत्रकारों ने सदस्यता शुल्क देकर उसी विश्वास में अपना योगदान दिया था।

अगर क्लब नहीं चल सका तो सवाल यह नहीं है कि राजनीति किसने की और किसे पद मिला। सबसे पहले सवाल यह है कि सदस्यों से लिया गया पैसा कहां गया?

किस बैंक खाते में रकम जमा हुई?

कुल कितनी राशि जमा हुई?

किसके पास उस राशि की जिम्मेदारी थी?

उसमें से कितना पैसा खर्च हुआ?

किस मद में खर्च हुआ?

किसने खर्च की अनुमति दी?

आज उस खाते में कितनी राशि उपलब्ध है?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी आरोप या प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों से मिलना चाहिए।

पत्रकारों की रकम कोई मामूली बात नहीं

एक पत्रकार की कमाई अक्सर बहुत बड़ी नहीं होती। फिर भी जब पत्रकार किसी संस्था के लिए सदस्यता शुल्क देता है तो वह उम्मीद करता है कि उसका पैसा उसी संस्था के उद्देश्य पर खर्च होगा।

अगर छह सौ से अधिक पत्रकारों से लगभग छह लाख रुपये जमा हुए थे, तो प्रत्येक रुपये का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। रकम कम हो या ज्यादा, सवाल पारदर्शिता का है।

अगर तत्कालीन पदाधिकारी यह कहते हैं कि पैसा नियमों के अनुसार खर्च हुआ, तो खर्च का विवरण सामने रखा जाना चाहिए। अगर राशि अभी भी सुरक्षित है, तो खाते और वर्तमान स्थिति की जानकारी दी जानी चाहिए। और यदि क्लब उस उद्देश्य से संचालित नहीं हो सका जिसके लिए सदस्यता ली गई थी, तो सदस्यों की राशि वापसी पर भी विचार होना चाहिए।

सवाल उठाना आरोप लगाना नहीं है। सवाल का जवाब मांगना जवाबदेही मांगना है।

भवन किसके लिए था?

सरकार की ओर से पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब जैसी व्यवस्था खड़ी करने का उद्देश्य यही होना चाहिए कि पत्रकारों को अपनी गतिविधियों के लिए एक स्वतंत्र और सुविधाजनक मंच मिले।

लेकिन अगर भवन या जमीन उपलब्ध होने के बावजूद संस्था सक्रिय नहीं हो पाती, तो यह केवल पत्रकारों की विफलता नहीं है। यह संस्थागत व्यवस्था की भी विफलता है।

बिहार के दूसरे हिस्सों में भी प्रेस क्लब भवनों के निर्माण और उनके उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बिहारशरीफ के प्रेस क्लब भवन के लंबे समय तक बंद रहने की खबरें इसी बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं—भवन बनाना आसान है, संस्था चलाना कठिन।

पटना में तो सवाल और भी गंभीर है।

भवन किसके लिए था—पत्रकारों के लिए या पद और प्रभाव की राजनीति के लिए?

सदस्यता किसलिए ली गई थी—पत्रकारों को सुविधा देने के लिए या सिर्फ सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए?

और सबसे बड़ा सवाल—

पत्रकारों के पैसे का हिसाब कौन देगा?

सरकार भी अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करे

मामला केवल क्लब के तत्कालीन पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि पत्रकारों के लिए उपलब्ध कराई गई जमीन, भवन या अन्य संसाधनों की वर्तमान स्थिति क्या है।

क्या वह संपत्ति अभी भी पत्रकारों के हित में उपयोग हो रही है?

अगर नहीं, तो उसके उपयोग में क्या बाधा है?

क्या क्लब का कोई वैधानिक या पंजीकृत ढांचा था?

सदस्यता राशि का लेखा-जोखा किस संस्था या व्यक्ति के पास था?

क्या कभी इसका ऑडिट हुआ?

अगर नहीं हुआ तो क्यों नहीं?

इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।

यह भी जरूरी है कि इस पूरे मामले को व्यक्तिगत आरोपों की लड़ाई न बनाया जाए। किसी व्यक्ति पर बिना दस्तावेज आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक संस्था, पत्रकारों की सदस्यता और उनसे ली गई रकम के मामले में पारदर्शिता की मांग पूरी तरह जायज है।

पत्रकार दूसरों से सवाल पूछता है

पत्रकार हर दिन नेताओं से पूछता है—पैसा कहां खर्च हुआ?

सरकार से पूछता है—योजना का लाभ किसे मिला?

अधिकारी से पूछता है—फाइल क्यों रुकी?

संस्था से पूछता है—चंदे का हिसाब कहां है?

तो फिर जब सवाल पत्रकारों की अपनी संस्था से जुड़ता है, तब वही कसौटी क्यों नहीं लागू होनी चाहिए?

पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल दूसरों की जवाबदेही से नहीं, अपनी जवाबदेही से भी बनती है।

अगर पटना प्रेस क्लब का सपना टूट गया तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। अगर आपसी राजनीति के कारण संस्था आगे नहीं बढ़ सकी तो उस अनुभव से सीखना चाहिए। लेकिन पत्रकारों से जमा की गई रकम का हिसाब उससे अलग और प्राथमिक सवाल है।

क्लब नहीं चला—कोई बात नहीं।

क्लब की राजनीति नहीं चली—यह भी मान लिया।

व्यवस्था विफल हुई—उसकी भी समीक्षा हो सकती है।

लेकिन पत्रकारों की जमा पूंजी का क्या हुआ?

यही वह सवाल है जिसे किसी शटर के पीछे बंद नहीं किया जा सकता।

जरूरत है कि सदस्यता राशि, बैंक खाते, खर्च और वर्तमान वित्तीय स्थिति का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। यदि रकम लौटाने योग्य है तो सदस्यों को लौटाने की प्रक्रिया तय हो। यदि किसी वैध खर्च का दावा है तो उसका दस्तावेज सामने आए।

क्योंकि प्रेस क्लब किसी व्यक्ति, पद या गुट की संपत्ति नहीं होता। वह पत्रकार समुदाय के भरोसे से बनता है।

और भरोसे की सबसे पहली शर्त है—हिसाब।

इसलिए मांग सीधी है—

क्लब का हिसाब दीजिए।

सदस्यता राशि का हिसाब दीजिए।

भवन और संसाधनों की वर्तमान स्थिति बताइए।

और अगर दस्तावेज यह साबित करते हैं कि पत्रकारों की रकम वापस की जानी चाहिए, तो—

पत्रकारों की रकम लौटाइए।

क्योंकि प्रेस क्लब का शटर बंद हो सकता है, लेकिन पत्रकारों के सवालों पर शटर नहीं लगाया जा सकता।


आलोक कुमार