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शुक्रवार, 29 मई 2026

India : एक संपूर्ण पुरोहित का दायित्व निभाकर प्रभु के घर जाने वाले पुरोहित बन गए

 

डॉ. फादर पीटर लूर्डेस: एक महान दूरदर्शी, शिक्षाविद् और मनोवैज्ञानिक का जीवन सफर

एक प्रख्यात सेल्सियन पुरोहित, मनोवैज्ञानिक, असाधारण शिक्षाविद् और सेल्सियन कॉलेज सोनादा (Salesian College Sonada) के पूर्व प्राचार्य डॉ. फादर पीटर लूर्डेस का 28 मई 2026 को कोलकाता के पार्क क्लिनिक अस्पताल में निधन हो गया। वह 101 वर्ष के थे। उनके निधन से न केवल सेल्सियन समुदाय में बल्कि शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में भी एक युग का अंत हो गया है। उनका संपूर्ण जीवन ज्ञान की खोज, आध्यात्मिक साधना और मानवता की निःस्वार्थ सेवा को समर्पित रहा।

अंतिम विदाई और मानवता के लिए आखिरी उपहार

फादर लूर्डेस के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए कोलकाता के नीतिका चैपल (Nitika Chapel) में एक विदाई प्रार्थना सभा (Requiem Mass) का आयोजन किया गया। यह वही स्थान था जहाँ फादर लूर्डेस ने वर्ष 1989 से अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। इस प्रार्थना सभा की अध्यक्षता सेल्सियन प्रोविंशियल फादर सुनील केरकेट्टा ने की। इस भावुक क्षण में बड़ी संख्या में सेल्सियन बंधु, पादरी, धार्मिक नेता, उनके पूर्व छात्र और उनके प्रशंसक इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए।

चर्च के वरिष्ठ नेताओं और उनके सहयोगियों ने फादर लूर्डेस के जीवन के अंतिम और सबसे बड़े फैसले की सराहना की। फादर लूर्डेस ने चिकित्सा विज्ञान और अनुसंधान (Medical Education and Research) के विकास में योगदान देने के उद्देश्य से स्वेच्छा से एक वसीयत तैयार की थी, जिसमें उन्होंने अपने शरीर को चिकित्सा अध्ययन के लिए दान करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके जीवन का यह अंतिम कार्य उनके उस दर्शन को दर्शाता है जिसमें उन्होंने हमेशा पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर दूसरों की सेवा करने का संदेश दिया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, चैपल सेवा के तुरंत बाद उनके पार्थिव शरीर को कोलकाता के कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज (Calcutta National Medical College) को सौंप दिया गया।

ऐतिहासिक शैक्षणिक योगदान और नेतृत्व

फादर पीटर लूर्डेस ने भारत के शैक्षणिक इतिहास में कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए। वह दार्जिलिंग में स्थित प्रसिद्ध सेल्सियन कॉलेज सोनादा के पहले भारतीय मूल के प्राचार्य (First Indian-born Principal) बने। उन्होंने वर्ष 1967 से 1970 तक इस पद पर अपनी सेवाएं दीं। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने कॉलेज के शैक्षणिक स्तर को मजबूत करने के साथ-साथ उसकी देहाती (Pastoral) और सामाजिक भूमिका को भी नया विस्तार दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संस्थान की शिक्षा भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से गहराई से जुड़ी हो।

इसके बाद, उन्होंने पुणे स्थित नेशनल वोकेशन सर्विस सेंटर (National Vocation Service Centre) में कार्यक्रम निदेशक (Programme Director) और मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यहाँ काम करते हुए, वे पादरियों, धार्मिक नेताओं और आम लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण और आध्यात्मिक गठन (Psychological Formation and Training) के क्षेत्र में एक अग्रणी (Pioneer) बनकर उभरे। उन्होंने मनोविज्ञान को अध्यात्म के साथ जोड़कर देखने का एक नया दृष्टिकोण समाज के सामने रखा।

साहित्यिक योगदान और विचार

एक उत्कृष्ट लेखक और विचारक के रूप में, फादर लूर्डेस ने देहाती मनोविज्ञान (Pastoral Psychology) और आध्यात्मिक गठन के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया। उनके लेखन ने अनगिनत लोगों को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया। उनके द्वारा लिखी गई कुछ सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें निम्नलिखित हैं:

द ह्यूमन फेस ऑफ क्लर्जी (1989): इस पुस्तक में उन्होंने धार्मिक नेताओं के मानवीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर गहराई से प्रकाश डाला।

द हेम ऑफ हिज गारमेंट (1996): यह पुस्तक आध्यात्मिक चिकित्सा और आंतरिक शांति के विषयों पर आधारित है।

वाह जीसस (2014): आधुनिक संदर्भों में ईसा मसीह के संदेशों को सरल और प्रेरक तरीके से प्रस्तुत करने वाली एक अनूठी रचना।

द क्लैश (2016): मानव मन के अंतर्विरोधों और उनके समाधानों को उजागर करती एक वैचारिक पुस्तक।

कोरोना महामारी के दौरान प्रेरणादायक लचीलापन

फादर पीटर लूर्डेस न केवल बौद्धिक रूप से बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी बेहद जुझारू व्यक्ति थे। उनके इस अद्भुत लचीलेपन और जीवंतता का उदाहरण कोरोना महामारी (COVID-19 Pandemic) के दौरान देखने को मिला। वर्ष 2020 में, 94 वर्ष की आयु में वे इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हो गए थे। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने कोरोना को मात दी।

इस बीमारी से ठीक होने के तुरंत बाद, 15 अगस्त 2020 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने पूरे उत्साह के साथ भारतीय तिरंगा फहराया। उनकी इस तस्वीर और जज्बे ने देश के लाखों लोगों को कठिन समय में उम्मीद और साहस की प्रेरणा दी।

प्रारंभिक जीवन और उच्च शिक्षा

फादर पीटर लूर्डेस का जन्म 19 मार्च 1926 को हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। वर्ष 1937 में, वे लिलुआ स्थित डॉन बॉस्को स्कूल (Don Bosco School, Liluah) के छात्रों के पहले बैच का हिस्सा बने थे। यहीं से उनके भीतर सेल्सियन मूल्यों और मानव सेवा के बीज बोए गए।

अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने ज्ञान की खोज में देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों का रुख किया:

उन्होंने रोम के सेल्सियन विश्वविद्यालय (Salesian University, Rome) से मनोविज्ञान में उन्नत अध्ययन (Advanced Studies) किया।

इसके बाद, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रल स्टडीज (California Institute of Integral Studies) से 'सोमैटिक साइकोलॉजी' (Somatic Psychology) में मास्टर डिग्री प्राप्त की।

उन्होंने शिकागो के लोयोला विश्वविद्यालय (Loyola Chicago) से 'क्लिनिकल साइकोलॉजी' (Clinical Psychology) में पीएचडी (PhD) की मानद उपाधि प्राप्त की।

अपने निधन के समय तक, वे एक सेल्सियन के रूप में 82 वर्ष और एक समर्पित पुरोहित (Priest) के रूप में 72 वर्ष का एक लंबा और गौरवशाली सफर पूरा कर चुके थे।

एक अविस्मरणीय विरासत

फादर पीटर लूर्डेस को उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता, दूरदर्शी दृष्टिकोण, सौम्य स्वभाव और मानव विकास के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उनका व्यक्तित्व और उनके कार्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थे। उन्होंने शिक्षा, मनोविज्ञान और पास्टोरल मिनिस्ट्री की सीमाओं को पार करते हुए समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया।

चिकित्सा विज्ञान के लिए उनका देहदान का अंतिम निर्णय इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनका जीवन पूरी तरह से ईश्वर और मानवता की सेवा के लिए समर्पित था। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके विचार और उनकी शिक्षाएं आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। एक सच्चे कर्मयोगी के रूप में उनका नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।

आलोक कुमार


World : मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

 मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

ईसाई माता कलीसिया अर्थात कैथोलिक चर्च में मई का महीना अत्यंत पवित्र और विशेष माना जाता है, क्योंकि यह महीना पूर्ण रूप से धन्य कुँवारी माता मरियम को समर्पित होता है। संसार भर के कैथोलिक विश्वासी इस महीने को “मरियम माह” के रूप में मनाते हैं। इस दौरान गिरजाघरों, परिवारों और प्रार्थना समूहों में माता मरियम के सम्मान में विशेष प्रार्थनाएँ, भजन, जुलूस और रोज़री माला की विनतियाँ की जाती हैं। मई माह विश्वासियों को यह याद दिलाता है कि जैसे माता मरियम ने अपने जीवन को पूर्ण रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार समर्पित किया, वैसे ही प्रत्येक विश्वासी को भी विश्वास, प्रेम, आज्ञाकारिता और शांति के मार्ग पर चलना चाहिए।

माता मरियम को शांति की रानी कहा जाता है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण परमेश्वर के प्रति विश्वास और समर्पण से भरा हुआ था। यही कारण है कि कलीसिया मई महीने में विशेष रूप से रोज़री माला के माध्यम से माता मरियम के जीवन की घटनाओं पर मनन करने के लिए प्रेरित करती है। रोज़री केवल शब्दों की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह येसु और मरियम के जीवन के रहस्यों पर ध्यान लगाने की आध्यात्मिक यात्रा है।

रोज़री माला में कुल चार प्रकार के भेद होते हैं—आनंद के भेद, ज्योतिर्मय भेद, दुःख के भेद और महिमा के भेद। प्रत्येक समूह में पाँच-पाँच रहस्य होते हैं। इनमें “आनंद के भेद” विशेष रूप से प्रभु येसु के बाल्यकाल और माता मरियम के आनंदमय अनुभवों से जुड़े हुए हैं। मई महीने में इन भेदों पर मनन करना परिवारों में शांति, प्रेम और एकता को बढ़ाता है।

आनंद के पाँच भेद

पहला भेद – देवदूत गब्रिएल का शुभ संदेश

आनंद के प्रथम भेद में देवदूत गब्रिएल माता मरियम के पास आते हैं और उन्हें यह शुभ समाचार देते हैं कि वे परमेश्वर के पुत्र येसु की माता बनने वाली हैं। यह घटना केवल मरियम के जीवन की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार की शुरुआत थी। मरियम ने विनम्रता से उत्तर दिया—“देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ; आपके वचन के अनुसार मेरे साथ हो।” इस उत्तर में पूर्ण विश्वास, शांति और समर्पण दिखाई देता है।

यह भेद हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यदि हम परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करें तो हमारे भीतर सच्ची शांति उत्पन्न होती है।

दूसरा भेद – माता मरियम की एलिज़बेथ से भेंट

दूसरे आनंद के भेद में माता मरियम अपनी संबंधी एलिज़बेथ से मिलने जाती हैं। एलिज़बेथ भी ईश्वर की विशेष कृपा से गर्भवती थीं। जैसे ही मरियम वहाँ पहुँचीं, एलिज़बेथ के गर्भ में पल रहा बालक यूहन्ना आनंद से उछल पड़ा। एलिज़बेथ ने कहा—“स्त्रियों में तुम धन्य हो।”

यह घटना प्रेम, सेवा और आध्यात्मिक आनंद का सुंदर उदाहरण है। माता मरियम अपने सुख में ही नहीं रहीं, बल्कि दूसरों की सहायता करने के लिए तुरंत निकल पड़ीं। आज के समय में यह भेद हमें सिखाता है कि परिवारों और समाज में प्रेम तथा सेवा की भावना से ही शांति आती है।

तीसरा भेद – प्रभु येसु का जन्म

तीसरे आनंद के भेद में बेतलेहेम की चरनी में प्रभु येसु का जन्म होता है। संसार के उद्धारकर्ता का जन्म किसी महल में नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण परिस्थिति में हुआ। यह घटना विनम्रता और सादगी का महान संदेश देती है।

स्वर्गदूतों ने गड़ेरियों को यह शुभ समाचार सुनाया—“पृथ्वी पर शांति हो।” प्रभु येसु का जन्म वास्तव में शांति और प्रेम का आगमन था। मई महीने में इस भेद पर मनन करते हुए विश्वासी अपने हृदय में येसु के लिए स्थान बनाने का प्रयास करते हैं।

चौथा भेद – बालक येसु को मंदिर में चढ़ाना

यहूदी परंपरा के अनुसार माता मरियम और संत योसेफ बालक येसु को मंदिर में परमेश्वर को अर्पित करने ले जाते हैं। वहाँ धर्मी सिमेओन और भविष्यद्वक्ता अन्ना बालक येसु को देखकर आनंदित होते हैं। सिमेओन उन्हें संसार का प्रकाश बताते हैं।

यह भेद हमें सिखाता है कि माता-पिता को अपने बच्चों को परमेश्वर के मार्ग में बढ़ाना चाहिए। परिवार जब ईश्वर को प्राथमिकता देता है, तब घर में सच्ची शांति और आशीष बनी रहती है।            


पाँचवाँ भेद – मंदिर में बालक येसु का मिलना

जब येसु बारह वर्ष के थे, तब वे यरूशलेम के मंदिर में शिक्षकों के बीच पाए गए। तीन दिनों तक मरियम और योसेफ उन्हें खोजते रहे। अंततः जब वे मंदिर में मिले, तब माता मरियम को अत्यंत आनंद हुआ।

यह भेद हमें बताता है कि कभी-कभी जीवन में हम आध्यात्मिक रूप से येसु से दूर हो जाते हैं, लेकिन यदि हम उन्हें खोजें, तो वे अवश्य मिलते हैं। परमेश्वर की उपस्थिति ही मनुष्य को सच्ची शांति देती है।

माता मरियम के सात आनंद

कैथोलिक कलीसिया की फ्रांसिस्कन परंपरा में “माता मरियम के सात आनंद” की विशेष माला भी प्रचलित है। इसमें मरियम के जीवन की सात महान आनंदमयी घटनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। इनमें गब्रिएल का शुभ संदेश, एलिज़बेथ से भेंट, येसु का जन्म, ज्योतिषियों की आराधना, मंदिर में येसु का मिलना, पुनरुत्थान के बाद प्रभु का दर्शन, तथा मरियम का स्वर्गारोहण और स्वर्ग की रानी के रूप में मुकुट धारण करना शामिल है।

इन सात आनंदों का उद्देश्य यह याद दिलाना है कि दुःख और संघर्ष के बीच भी परमेश्वर अपने भक्तों को अंततः आनंद और महिमा प्रदान करते हैं।

मई माह का आध्यात्मिक महत्व

मई महीने में प्रतिदिन रोज़री माला पढ़ना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को शांति देने वाला आध्यात्मिक अभ्यास है। जब परिवार एक साथ बैठकर माता मरियम की विनती करते हैं, तब घरों में प्रेम, क्षमा और एकता बढ़ती है। आज के तनावपूर्ण और अशांत वातावरण में मरियम की प्रार्थना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है।

माता मरियम का जीवन हमें यह सिखाता है कि विनम्रता, सेवा, विश्वास और प्रार्थना के द्वारा ही सच्ची शांति प्राप्त होती है। इसलिए कलीसिया मई महीने में प्रत्येक विश्वासी को प्रेरित करती है कि वे माता मरियम के निकट आएँ, रोज़री माला पढ़ें और येसु मसीह के प्रेममय जीवन का अनुसरण करें।

अंततः, मई का यह पवित्र महीना केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक नवीनीकरण का अवसर है। माता मरियम के आनंदमय भेदों पर मनन करते हुए हम अपने जीवन में परमेश्वर की शांति, प्रेम और कृपा का अनुभव कर सकते हैं।

आलोक कुमार