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गुरुवार, 4 जून 2026

Bihar : फादर सेराफिम जॉन लाल के परिवार पर दुखों का पहाड़

 बेतिया धर्मप्रांत के बेतिया पल्ली क्षेत्र में इन दिनों शोक और संवेदना का वातावरण व्याप्त


बेतिया
धर्मप्रांत के बेतिया पल्ली क्षेत्र में इन दिनों शोक और संवेदना का वातावरण व्याप्त है। चर्च रोड स्थित सेंट मैरी स्कूल के निकट, डॉ. ओसवाल्ड आनंद के घर के सामने स्थित फादर सेराफिम जॉन लाल के पैतृक निवास पर लगातार लोगों का आना-जाना लगा हुआ है। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, मित्र और परिचित इस कठिन समय में परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं। घर के वातावरण में गहरी उदासी और भावुकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है।

फादर सेराफिम जॉन लाल लंबे समय से धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन से जुड़े रहे हैं। उनके परिवार की पहचान न केवल बेतिया बल्कि व्यापक ईसाई समाज में भी सम्मान के साथ की जाती रही है। ऐसे प्रतिष्ठित परिवार पर जब दुखों का पहाड़ टूटता है तो स्वाभाविक रूप से पूरा समाज उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

परिवार के सदस्य आयुष गौरव रोड्रिगेज ने भावुक स्वर में अपने संबंधों को याद करते हुए बताया कि फादर सेराफिम जॉन लाल उनके मामा हैं। उन्होंने परिवार की वंशावली का उल्लेख करते हुए बताया कि फादर के पिता का नाम जॉन एंथनी लाल तथा माता का नाम लिली जॉन एंथनी लाल था। परिवार बड़ा और संयुक्त था, जिसमें पांच भाई और चार बहनें थीं। उन्हीं बहनों में से एक उनकी माता हैं, इसलिए फादर सेराफिम जॉन लाल उनके सगे मामा लगते हैं।

आयुष ने बताया कि फादर के एक भाई के पुत्र आलोक लाल उनके ममेरे भाई थे। परिवार में सभी के बीच गहरा प्रेम और आत्मीयता थी। आलोक लाल का असमय निधन पूरे परिवार के लिए अत्यंत पीड़ादायक घटना साबित हुआ। उन्होंने कहा कि आलोक केवल एक रिश्तेदार नहीं थे, बल्कि परिवार के ऐसे सदस्य थे जो सभी के सुख-दुख में बराबर सहभागी बनते थे। उनके जाने से परिवार में एक ऐसी रिक्तता उत्पन्न हुई है जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।

परिवार के लोग आलोक लाल को एक सरल, मिलनसार और संवेदनशील व्यक्ति के रूप में याद कर रहे हैं। उनके जीवन और व्यवहार ने परिवार तथा समाज में अपनी अलग पहचान बनाई थी। आज जब लोग सांत्वना देने पहुंच रहे हैं तो बातचीत के दौरान आलोक से जुड़ी अनेक स्मृतियां स्वतः सामने आ जाती हैं। कोई उनकी मुस्कान को याद करता है तो कोई उनके सहयोगी स्वभाव की चर्चा करता है।

ईसाई परंपरा में यह विश्वास किया जाता है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि प्रभु के साथ अनंत जीवन की ओर एक यात्रा है। इसी विश्वास के साथ परिवार और समाज आलोक लाल की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। चर्च समुदाय के लोग भी विशेष प्रार्थनाओं के माध्यम से दिवंगत आत्मा को प्रभु की शरण में सौंप रहे हैं।

दुख की इस घड़ी में बेतिया पल्ली का पूरा समुदाय फादर सेराफिम जॉन लाल और उनके परिवार के साथ खड़ा है। सभी की प्रार्थना है कि प्रभु दिवंगत आलोक लाल को अपने स्वर्गीय राज्य में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को यह असहनीय दुख सहन करने की शक्ति और सांत्वना प्रदान करें।

आलोक कुमार

Bihar : पटना जेसुइट प्रोविंस के वरिष्ठ और सम्मानित जेसुइट पुरोहित फादर सेराफिम जॉन लाल का निधन

 

फादर सेराफिम जॉन लाल एस.जे. का निधन : पटना जेसुइट समाज में शोक की लहर

पटना जेसुइट प्रोविंस के वरिष्ठ और सम्मानित जेसुइट पुरोहित फादर सेराफिम जॉन लाल एस.जे. का 4 जून 2026 को निधन हो गया। उनके निधन का समाचार मिलते ही जेसुइट समाज, कलीसिया तथा उनके परिचितों के बीच गहरा शोक व्याप्त हो गया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग पाँच दशकों को ईश्वर, कलीसिया और समाज की सेवा के लिए समर्पित किया। उनका जीवन समर्पण, सादगी, अनुशासन और आध्यात्मिक निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण था।

फादर सेराफिम जॉन लाल का जन्म 29 मई 1957 को ऐतिहासिक नगरी बेतिया में हुआ था। बचपन से ही उनमें धार्मिक जीवन के प्रति विशेष आकर्षण था। इसी प्रेरणा के साथ उन्होंने 2 जुलाई 1978 को जेसुइट धर्मसंघ में प्रवेश किया। वर्षों की आध्यात्मिक और शैक्षणिक तैयारी के बाद उनका पुरोहिताभिषेक 27 दिसंबर 1992 को संपन्न हुआ। इसके पश्चात उन्होंने 22 अप्रैल 1996 को अंतिम जेसुइट मन्नत लेकर अपने जीवन को पूर्ण रूप से प्रभु और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

अपने 48 वर्षों के जेसुइट जीवन और 34 वर्षों के पुरोहितीय सेवाकाल में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। उन्हें जो भी जिम्मेदारी सौंपी गई, उसे उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभाया। वे सेंट माइकल हाई स्कूल तथा उसके निकट स्थित जेसुइट समुदाय के फादर सुपीरियर भी रहे। प्रशासनिक कुशलता, मानवीय संवेदनशीलता और आध्यात्मिक नेतृत्व के कारण वे अपने सहयोगियों और विश्वासियों के बीच अत्यंत प्रिय थे।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे दीघा स्थित एक्सटीटीआई परिसर के जेवियर भवन में रह रहे थे। यह भवन पटना जेसुइट प्रोविंस के वरिष्ठ और वृद्ध जेसुइट पुरोहितों के लिए विशेष रूप से बनाया गया है। यहां वर्तमान में 20 से 25 जेसुइट निवास करते हैं। इसी भवन में मुजफ्फरपुर धर्मप्रांत के एमेरिटस बिशप जे.बी. ठाकुर भी रहते हैं। फादर सेराफिम जॉन लाल ने अपने अंतिम दिन भी प्रार्थना, चिंतन और शांत सेवा के वातावरण में बिताए।

एक्सटीटीआई के सुपीरियर फादर राजेश जैकब ने जानकारी दी कि फादर सेराफिम जॉन लाल का अंतिम संस्कार 5 जून 2026 को शाम 4 बजे एक्सटीटीआई परिसर में संपन्न होगा। अंतिम मिस्सा के बाद उनके पार्थिव शरीर को परिसर स्थित कब्रिस्तान में पूरे धार्मिक सम्मान के साथ दफनाया जाएगा। उनके परिजन और रिश्तेदार बेतिया से अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए आ रहे हैं। वर्तमान में उनका पार्थिव शरीर कुर्जी होली फैमिली अस्पताल के शीतल गृह में रखा गया है।

फादर सेराफिम जॉन लाल का जीवन इस सत्य का प्रमाण था कि ईश्वर की सेवा में बिताया गया जीवन कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने शिक्षा, आध्यात्मिक मार्गदर्शन और समुदाय निर्माण के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। आज जब वे इस संसार से विदा हो गए हैं, तब भी उनकी स्मृतियां, उनके कार्य और उनका प्रेरणादायी जीवन लोगों के हृदयों में जीवित रहेगा।

इस अवसर पर प्रभु यीशु के ये शब्द विशेष सांत्वना प्रदान करते हैं—“मैं पुनरुत्थान और जीवन हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है, वह यदि मर भी जाए तो जीवित रहेगा; और जो जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरेगा।” (यूहन्ना 11:25-26)

ईश्वर दिवंगत फादर सेराफिम जॉन लाल एस.जे. की आत्मा को शाश्वत शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार, जेसुइट समाज तथा सभी विश्वासियों को यह दुःख सहने की शक्ति दें। श्रद्धांजलि।

आलोक कुमार

बुधवार, 3 जून 2026

World : ईसाई धर्म में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है

ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं


ईसाई धर्म
में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं। इनमें बपतिस्मा (Baptism) और परमप्रसाद (Holy Communion या Eucharist) विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। किसी भी ईसाई बच्चे के धार्मिक जीवन की शुरुआत बपतिस्मा से होती है, जबकि परमप्रसाद उसे मसीह के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध में प्रवेश कराने वाला संस्कार माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न ईसाई परंपराओं में बच्चों को परमप्रसाद देने की आयु, प्रक्रिया और नियमों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं विकसित हुई हैं।

बपतिस्मा संस्कार को ईसाई जीवन का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को पापों से शुद्ध माना जाता है और उसे कलीसिया का सदस्य स्वीकार किया जाता है। अधिकांश ईसाई संप्रदायों में बपतिस्मा के बाद ही व्यक्ति अन्य संस्कारों को ग्रहण करने का अधिकारी बनता है। हालांकि, परमप्रसाद प्राप्त करने के लिए केवल बपतिस्मा पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बच्चे की धार्मिक समझ, तैयारी और विश्वास की परिपक्वता को भी महत्व दिया जाता है।

कैथोलिक चर्च में प्रथम परमप्रसाद (First Holy Communion) एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर होता है। सामान्यतः सात या आठ वर्ष की आयु को "विवेक की आयु" माना जाता है। इस उम्र में यह माना जाता है कि बच्चा सही और गलत के बीच अंतर समझने लगता है तथा यूखारिस्ट के महत्व को ग्रहण करने में सक्षम हो जाता है। प्रथम परमप्रसाद से पहले बच्चों को विशेष धार्मिक शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें यीशु मसीह, अंतिम भोज, पवित्र मिस्सा और परमप्रसाद के महत्व के बारे में बताया जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश स्थानों पर बच्चों को पहली बार स्वीकारोक्ति या पापस्वीकार (Confession) का संस्कार भी ग्रहण कराना आवश्यक माना जाता है। इसके बाद एक विशेष समारोह में बच्चे पहली बार प्रभु के शरीर और रक्त के प्रतीक स्वरूप पवित्र प्रसाद ग्रहण करते हैं। 


एंग्लिकन परंपरा, जो कई मामलों में कैथोलिक परंपरा से मिलती-जुलती है, में भी बच्चों को धार्मिक शिक्षा और तैयारी के बाद प्रथम परमप्रसाद दिया जाता है। हालांकि विभिन्न देशों और चर्च प्रांतों में नियमों में कुछ भिन्नता देखने को मिल सकती है। कई एंग्लिकन चर्चों में पुष्टिकरण (Confirmation) के बाद ही नियमित रूप से परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है, जबकि कुछ स्थानों पर बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को पहले ही परमप्रसाद दिया जाने लगा है।

रूढ़िवादी या ऑर्थोडॉक्स ईसाई परंपरा इस विषय में एक अलग दृष्टिकोण रखती है। यहाँ यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर की कृपा आयु या बौद्धिक समझ पर निर्भर नहीं करती। इसलिए शिशु के बपतिस्मा के तुरंत बाद ही दृढ़ीकरण (Chrismation) और परमप्रसाद के संस्कार भी प्रदान कर दिए जाते हैं। इस प्रकार एक नवजात शिशु भी कलीसिया के पूर्ण सदस्य के रूप में सभी प्रमुख संस्कारों में सहभागी बन जाता है। ऑर्थोडॉक्स चर्चों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी अधिकांश रूढ़िवादी समुदायों में इसका पालन किया जाता है।

प्रोटेस्टेंट परंपराओं में इस विषय पर अधिक विविधता देखने को मिलती है। कई प्रोटेस्टेंट चर्च यह मानते हैं कि परमप्रसाद ग्रहण करने से पहले व्यक्ति को अपने विश्वास की व्यक्तिगत और सचेत घोषणा करनी चाहिए। इसलिए बच्चों को तब तक परमप्रसाद नहीं दिया जाता जब तक वे स्वयं यीशु मसीह में अपने विश्वास को समझकर स्वीकार न कर लें। कुछ चर्चों में किशोरावस्था के दौरान विशेष कक्षाओं और प्रशिक्षण के बाद बच्चों को परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है। वहीं कुछ अन्य प्रोटेस्टेंट समुदायों में बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को उनके माता-पिता और पादरी के मार्गदर्शन में अपेक्षाकृत कम आयु में भी परमप्रसाद दिया जा सकता है।

बैपटिस्ट और स्वतंत्र इंजीलवादी कलीसियाओं में तो और भी अधिक व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाया जाता है। यहाँ परमप्रसाद को विश्वासियों की स्मृति और प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए जब कोई बच्चा या युवा अपने विश्वास को समझकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता है, तभी उसे प्रभुभोज में भाग लेने योग्य माना जाता है। इस कारण कोई निश्चित आयु सीमा निर्धारित नहीं होती।

भारतीय ईसाई समाज में भी प्रथम परमप्रसाद एक महत्वपूर्ण धार्मिक और पारिवारिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बच्चे विशेष सफेद वस्त्र पहनते हैं, चर्च में सामूहिक प्रार्थना होती है और परिवारजन इस अवसर को खुशी और आशीर्वाद के साथ मनाते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बच्चे के आध्यात्मिक जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जाता है।


इस प्रकार देखा जाए तो ईसाई धर्म की विभिन्न परंपराओं में परमप्रसाद ग्रहण करने की आयु और प्रक्रिया भिन्न हो सकती है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—विश्वासी को प्रभु यीशु मसीह के और अधिक निकट लाना तथा उसके विश्वास को मजबूत बनाना। चाहे वह शिशु अवस्था में दिया जाए, बचपन में या फिर युवावस्था में, परमप्रसाद ईसाई जीवन का एक पवित्र और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार बना रहता है।

आलोक कुमार

मंगलवार, 2 जून 2026

Kolkata: दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं

 दिलीप एंथनी रोजारियो : एक समर्पित संगीतकार और चर्च सेवक को श्रद्धांजलि

कोलकाता
महाधर्मप्रांत (आर्चडायोसिस ऑफ कलकत्ता) के लिए 2 जून 2026 का दिन अत्यंत दुखद रहा। चर्च, संगीत और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन का समाचार मिलते ही शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक प्रतिभाशाली संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि एक समर्पित ले-विश्वासी (Lay Faithful) और चर्च के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। उनके निधन से चर्च समुदाय ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसने अपना जीवन सेवा, संगीत और सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।

दिलीप एंथनी रोजारियो का जन्म 17 जून 1962 को हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत के प्रति विशेष लगाव था। उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर चर्च संगीत के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई। उनके नेतृत्व और योगदान से अनेक धार्मिक कार्यक्रमों तथा प्रार्थना सभाओं को नई ऊँचाइयाँ मिलीं। वे कोलकाता क्रिश्चियन कॉयर से भी जुड़े रहे और अपनी मधुर प्रस्तुति तथा संगीत निर्देशन के लिए व्यापक रूप से सम्मानित किए जाते थे।

चर्च के प्रति उनकी निष्ठा केवल संगीत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महाधर्मप्रांत के लेटी आयोग (Laity Commission) के प्रमुख के रूप में भी कार्य किया। इस जिम्मेदारी के दौरान उन्होंने आम विश्वासियों को चर्च की गतिविधियों से जोड़ने, युवाओं को प्रेरित करने और समाज में ईसाई मूल्यों के प्रसार के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। उनका व्यक्तित्व सरल, विनम्र और प्रेरणादायक था, जिसके कारण वे सभी आयु वर्ग के लोगों के प्रिय बने रहे।

उनके निधन की सूचना मिलने के बाद सोशल मीडिया पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। अनेक लोगों ने उन्हें एक दयालु, सहृदय और समर्पित व्यक्ति बताया। जिन्होंने उनके साथ कार्य किया था, वे उनकी सादगी और सेवा भावना को याद कर रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि वे चर्च और समाज के लिए सदैव उपलब्ध रहने वाले व्यक्ति थे। दूसरों की सहायता करना और समुदाय को जोड़कर रखना उनकी विशेष पहचान थी।

उनके एक परिचित ने लिखा कि यह समाचार सुनकर उन्हें गहरा आघात लगा है। उन्होंने कहा कि दिलीप रोजारियो एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सुसमाचार के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया। वहीं अन्य श्रद्धांजलि संदेशों में उन्हें एक उत्कृष्ट संगीतकार, संवेदनशील इंसान और प्रेरणास्रोत बताया गया। लोगों ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

दिलीप रोजारियो का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा और सेवा भावना जब एक साथ आती हैं, तो समाज पर गहरा सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं। उन्होंने संगीत को केवल कला के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे ईश्वर की महिमा और लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया। उनके गीत, उनकी प्रस्तुतियाँ और उनका मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

आज जब चर्च समुदाय उन्हें याद कर रहा है, तब उनके जीवन की सबसे बड़ी विरासत उनकी सेवा, समर्पण और प्रेम की भावना है। उन्होंने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए निस्वार्थ कार्यों में होती है। उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी, लेकिन उनके द्वारा छोड़े गए आदर्श और मूल्य सदैव जीवित रहेंगे।                                                         

दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं होगा। फिर भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर चर्च और समाज के लोग उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। उनकी स्मृतियाँ, उनका संगीत और उनकी सेवा भावना सदैव लोगों के हृदय में जीवित रहेगी।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अनंत शांति प्रदान करें तथा उनके परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को इस कठिन समय में धैर्य और शक्ति दें। दिलीप एंथनी रोजारियो को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी आत्मा चिरशांति में विश्राम करे। (RIP)

आलोक कुमार

Bihar : बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

 बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित बेतिया केवल एक ऐतिहासिक नगर ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक मिशनरी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है। बेतिया का धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक इतिहास लगभग तीन शताब्दियों पुराना है। यहां स्थापित कैथोलिक मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इस गौरवशाली इतिहास के केंद्र में एक महान मिशनरी पादरी फादर जोसेफ मेरी बिरिनी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

फादर जोसेफ मेरी बिरिनी (1709-1761) उत्तर भारत के पहले कैपुचिन मिशन, बेतिया मिशन, के संस्थापक थे। वे इटली से भारत आए और अपने ज्ञान, सेवा तथा समर्पण के कारण शीघ्र ही स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय हो गए। वर्ष 1740 में उन्होंने बेतिया राज की महारानी की एक लंबी और गंभीर बीमारी को चमत्कारिक रूप से ठीक किया। इस घटना ने मिशन के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाया और बेतिया राज परिवार के साथ कैथोलिक मिशन के संबंध और मजबूत हुए।

फादर बिरिनी केवल धर्मप्रचारक ही नहीं, बल्कि एक विद्वान भाषाविद भी थे। उन्हें इतालवी, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, हिंदुस्तानी और संस्कृत भाषाओं का उत्कृष्ट ज्ञान था। उनकी विद्वता का प्रमाण यह है कि उन्होंने प्रसिद्ध "वाल्मीकि रामायण" का इतालवी भाषा में अनुवाद किया। उस समय किसी यूरोपीय मिशनरी द्वारा भारतीय धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन और अनुवाद करना एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी। इससे भारतीय संस्कृति के प्रति उनके सम्मान और गहन रुचि का भी पता चलता है।

वर्ष 1751 में फादर बिरिनी ने बेतिया में एक विशाल और सुंदर गिरजाघर का निर्माण कराया। उसी वर्ष क्रिसमस की पूर्व संध्या पर इस चर्च को विधिवत आशीष देकर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह चर्च उस समय उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण कैथोलिक उपासना केंद्रों में से एक था। फादर बिरिनी ने अपने जीवन का अधिकांश समय बेतिया में बिताया और यहीं 15 जनवरी 1761 को उनका निधन हुआ। उनका जीवन आज भी सेवा, त्याग और समर्पण की प्रेरणा देता है।

बेतिया मिशन ने शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक कार्य किए। वर्ष 1860 में फादर जॉन बैपटिस्ट ने मिशन मिडिल स्कूल की स्थापना की। यह कैपुचिन मिशन का तीसरा विद्यालय था। इस विद्यालय ने क्षेत्र के हजारों विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की और अनेक प्रतिभाओं को विकसित किया। शिक्षा के माध्यम से समाज में जागरूकता और प्रगति लाने का यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1874 में धन्य कुँवारी मरियम की बहनों (Sisters of the Blessed Virgin Mary) ने बेतिया में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में सेंट टेरेसा गर्ल्स हाई स्कूल नाम दिया गया। उस दौर में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना एक दूरदर्शी कदम था। वर्ष 1892 में इस विद्यालय का संचालन स्विट्जरलैंड की होली क्रॉस की सिस्टर्स ऑफ मर्सी को सौंप दिया गया। आज भी यह विद्यालय क्षेत्र की प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में गिना जाता है।

मुद्रण और प्रकाशन के क्षेत्र में भी बेतिया मिशन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1897 में कैथोलिक मिशन प्रेस, बेतिया की स्थापना हुई। इस प्रेस के माध्यम से धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक साहित्य का प्रकाशन किया जाने लगा। इससे शिक्षा और ज्ञान के प्रसार को नई गति मिली।

बेतिया मिशन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि फादर काजेतान सेसारी का पुरोहित बनना था। वे बेतिया में जन्मे पहले भारतीय कैथोलिक पादरी थे। उनकी नियुक्ति ने यह सिद्ध कर दिया कि मिशन केवल विदेशी धर्मप्रचारकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी नेतृत्व और सेवा के अवसर प्रदान किए गए।

समय के साथ बेतिया के कैथोलिक समुदाय का विस्तार हुआ। जब श्रद्धालुओं की संख्या एक हजार से अधिक हो गई, तब पुराने चर्च को हटाकर वर्ष 1833 में एक नया और अधिक भव्य चर्च बनाया गया। यह चर्च अपनी सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन जनवरी 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप ने इस ऐतिहासिक भवन को पूरी तरह नष्ट कर दिया। बाद में जेसुइट पादरियों ने वर्तमान बेतिया चर्च का निर्माण कराया, जो आज भी विश्वास और इतिहास का प्रतीक बना हुआ है।                                   

वर्ष 1919 में बिहार स्थित कैपुचिन मिशन का दायित्व अमेरिकी जेसुइट मिशनरियों को सौंप दिया गया। जेसुइटों ने शिक्षा, सामाजिक सेवा और धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाते हुए मिशन की गौरवशाली परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

आज बेतिया केवल एक नगर नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक इतिहास, शिक्षा और सामाजिक सेवा की जीवंत विरासत का प्रतीक है। फादर जोसेफ मेरी बिरिनी और उनके सहयोगियों द्वारा बोया गया सेवा और विश्वास का बीज आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। बेतिया का यह इतिहास न केवल स्थानीय ईसाई समुदाय बल्कि पूरे बिहार और भारत की सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक धरोहर का महत्वपूर्ण अध्याय है।


आलोक कुमार

सोमवार, 1 जून 2026

Bihar : मई माह के अंतिम दिन माता मरियम की आराधना से गूंज उठा बेतिया महागिरजाघर परिसर

 मई माह के अंतिम दिन माता मरियम की आराधना से गूंज उठा बेतिया महागिरजाघर परिसर

बेतिया धर्मप्रांत में मई माह का अंतिम दिन श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिक उल्लास का एक अद्भुत संगम लेकर आया। Nativity of the Blessed Virgin Mary Cathedral महागिरजाघर परिसर स्थित विश्व की मां मरियम के ग्रोटो (प्रतिमा स्थल) पर आयोजित विशेष प्रार्थना एवं यात्रा समारोह ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को भक्ति से भर दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विश्वास, सामुदायिक एकता और प्रकृति के साथ ईश्वरीय सामंजस्य का भी सुंदर उदाहरण बन गया।

मई माह को कैथोलिक परंपरा में विशेष रूप से माता मरियम को समर्पित माना जाता है। पूरे महीने श्रद्धालु रोज़री (माला बिनती), प्रार्थना और विशेष आराधना के माध्यम से माता मरियम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इस माह के अंतिम दिन आयोजित समारोह का महत्व और भी अधिक था, क्योंकि यह पूरे महीने की भक्ति का समापन समारोह था।

महागिरजाघर परिसर में स्थित माता मरियम के ग्रोटो को इस अवसर पर अत्यंत आकर्षक ढंग से सजाया गया था। ग्रोटो के चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियों, फूलों और सजावटी वस्तुओं से ऐसी मनोहारी सजावट की गई थी कि पूरा परिसर किसी आध्यात्मिक उद्यान की तरह दिखाई दे रहा था। प्रवेश द्वार अर्थात तोरण द्वार को गुब्बारों और ताजे फूलों से विशेष रूप से सजाया गया था। दूर से ही आने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत यह भव्य तोरण द्वार कर रहा था।

ग्रोटो के सामने बैठने की समुचित व्यवस्था की गई थी। सैकड़ों कुर्सियां लगाई गई थीं ताकि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालु आराम से प्रार्थना में शामिल हो सकें। शाम ढलते ही पूरा परिसर रोशनी से जगमगा उठा और वातावरण में भक्ति गीतों की मधुर ध्वनि गूंजने लगी।

इस आयोजन की सुंदरता को बढ़ाने में प्रकृति ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि मौसम इस कार्यक्रम में बाधा उत्पन्न कर सकता है। ग्रोटो की सजावट लगभग पूरी हो चुकी थी और श्रद्धालु धीरे-धीरे परिसर में पहुंच रहे थे। तभी अचानक आसमान में बादल घिर आए और तेज बारिश शुरू हो गई।

बारिश के कारण लोगों के बीच असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। कई श्रद्धालु यह सोचने लगे कि शायद इस बार मई माह की अंतिम माला बिनती और प्रार्थना सभा महागिरजाघर के भीतर ही आयोजित करनी पड़ेगी। कुछ लोग कुर्सियों से उठकर सुरक्षित स्थानों की ओर जाने लगे, जबकि आयोजन समिति भी मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए थी।

लेकिन कुछ ही समय बाद मौसम ने अप्रत्याशित रूप से करवट ली। श्रद्धालुओं ने इसे माता मरियम के विशेष आशीर्वाद के रूप में देखा। धीरे-धीरे बारिश रुक गई, बादल छंटने लगे और वातावरण अत्यंत सुहावना हो गया। हल्की ठंडी हवा चलने लगी, जिससे पूरे परिसर का माहौल और भी मनमोहक बन गया। लोगों के चेहरों पर फिर से प्रसन्नता लौट आई और सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठकर कार्यक्रम शुरू होने की प्रतीक्षा करने लगे।

जब मौसम पूरी तरह अनुकूल हो गया, तब धार्मिक समारोह का शुभारंभ हुआ। बेतिया धर्मप्रांत के विकार जनरल फादर  Finton Sah द्वारा पवित्र मिस्सा (धर्मविधि) की शुरुआत की गई। उन्होंने अपने संदेश में माता मरियम के जीवन, उनकी विनम्रता, समर्पण और विश्वास की चर्चा करते हुए श्रद्धालुओं को उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया।

मिस्सा के दौरान उपस्थित लोगों ने पूरे मनोयोग और श्रद्धा के साथ प्रार्थनाओं में भाग लिया। वातावरण में आध्यात्मिक गंभीरता और भक्ति का अद्भुत समावेश दिखाई दे रहा था। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी श्रद्धालु प्रार्थना में लीन थे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि आज भी धार्मिक आस्था लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

इस विशेष मिस्सा में कुल पांच पुरोहितों ने सहभागिता की। सभी फादरों ने मिलकर धर्मविधि का संचालन किया। उनकी सामूहिक उपस्थिति ने समारोह की गरिमा और महत्व को और बढ़ा दिया। मिस्सा के दौरान भजनों और स्तुतिगानों ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया।

मिस्सा समाप्त होने के बाद माता मरियम के सम्मान में विशेष यात्रा (प्रोसेशन) का आयोजन किया गया। इस यात्रा का नेतृत्व पाल पुरोहित ने किया। माता मरियम की प्रतिमा को अत्यंत सुंदर ढंग से सजाकर यात्रा में शामिल किया गया। श्रद्धालु हाथों में मोमबत्तियां और माला लिए हुए भक्ति गीत गाते हुए यात्रा में आगे बढ़ रहे थे।

यात्रा के दौरान पूरा परिसर "जय माता मरियम" और प्रार्थना गीतों से गूंज उठा। महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे सभी उत्साहपूर्वक इसमें शामिल हुए। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और संतोष का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। यह यात्रा केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन नहीं थी, बल्कि समुदाय की एकता और सामूहिक विश्वास का भी प्रतीक थी।

रात्रि लगभग आठ बजे यह भव्य यात्रा समारोह संपन्न हुआ। कार्यक्रम के समापन के साथ ही श्रद्धालुओं ने माता मरियम के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की और उनके आशीर्वाद की कामना की। पूरे आयोजन ने उपस्थित लोगों के मन में गहरी आध्यात्मिक छाप छोड़ी।

मई माह के अंतिम दिन आयोजित यह समारोह बेतिया धर्मप्रांत के लिए एक यादगार अवसर बन गया। सजावट की भव्यता, श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति, पुरोहितों का मार्गदर्शन और प्रकृति का सहयोग—इन सभी ने मिलकर इस आयोजन को विशेष बना दिया। यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण था कि आस्था और विश्वास के सामने हर बाधा छोटी पड़ जाती है। बारिश की क्षणिक चुनौती के बाद जिस प्रकार मौसम सुहावना हुआ, उसे श्रद्धालुओं ने माता मरियम की कृपा के रूप में अनुभव किया और पूरे उत्साह के साथ इस आध्यात्मिक उत्सव को सफल बनाया।

आलोक कुमार


शनिवार, 30 मई 2026

World :"पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया "

 विश्व शांति के लिए रोजरी माला विनती : सन्त पापा लियो 14वें की विशेष पहल

कैथोलिक कलीसिया में मई का महीना माता मरियम को समर्पित माना जाता है। इस पूरे महीने में विश्व भर के श्रद्धालु माता मरियम के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए रोजरी माला का पाठ करते हैं। इस वर्ष मई माह के समापन पर सन्त पापा लियो 14वें ने विश्व शांति के लिए एक विशेष पहल की है। उन्होंने युद्धों, हिंसा और संघर्षों से पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया है तथा स्वयं 30 मई को वाटिकन गार्डन्स में पवित्र रोजरी माला विनती की अध्यक्षता करने का निर्णय लिया है।

सन्त पापा लियो 14वें अपने परमाध्यक्षीय कार्यकाल के आरम्भ से ही विश्व में शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर युद्धरत देशों और संघर्षों से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए प्रार्थना की अपील की है। उनका मानना है कि प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव हृदय को बदलने और शांति का मार्ग प्रशस्त करने का एक प्रभावशाली साधन है। इसी सोच के साथ वे मई माह के अंतिम दिनों में विश्व के सभी लोगों को एकजुट होकर शांति के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। 

30 मई की शाम रोम समयानुसार 7 बजे, वाटिकन गार्डन्स में स्थित लूर्द की रानी माता मरियम को समर्पित गुफा के सामने यह विशेष रोजरी माला विनती आयोजित की जाएगी। इस प्रार्थना में सन्त पापा स्वयं नेतृत्व करेंगे और विश्व भर के श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से इसमें सहभागी बनने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन केवल वाटिकन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल भी इसमें सहभागी होंगे।

विशेष बात यह है कि इस रोजरी विनती के प्रत्येक भेद को युद्ध और हिंसा से प्रभावित लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। सामान्यतः रोजरी माला के भेद प्रभु यीशु और माता मरियम के जीवन की विभिन्न घटनाओं पर आधारित होते हैं, किन्तु इस अवसर पर प्रत्येक भेद के साथ युद्ध पीड़ित परिवारों, विस्थापित लोगों, घायल नागरिकों, चिकित्सकों, राहत कर्मियों और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाएंगी। इस प्रकार यह परंपरागत रोजरी पाठ के साथ-साथ समकालीन मानवीय पीड़ा को भी अपने भीतर समाहित करेगा।

कलीसिया में ऐसी परंपरा पहले भी देखी गई है। विशेषकर लेंट काल के दौरान कई चर्चों में पारंपरिक प्रार्थनाओं के साथ वर्तमान समाज के दुख-दर्द और चुनौतियों को जोड़कर विशेष पाठ किए जाते हैं। जिस प्रकार क्रूस मार्ग की चौदह मंजिलों के चिंतन में मानव जीवन की कठिनाइयों को शामिल किया जाता है, उसी प्रकार इस रोजरी विनती में भी विश्व की पीड़ाओं को ईश्वर और माता मरियम के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

इस आयोजन में विश्व के अनेक प्रसिद्ध मरियम तीर्थस्थलों और धार्मिक केंद्रों को भी आमंत्रित किया गया है। जिन प्रमुख तीर्थस्थलों ने अपनी सहभागिता की पुष्टि की है, उनमें यूक्रेन का मरियम तीर्थस्थल, फिलीपींस में शांति की रानी माता मरियम का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ, पुर्तगाल का प्रसिद्ध फातिमा तीर्थस्थल, बोस्निया और हर्जेगोविना का मेज्जुगोर्ये तीर्थ, फ्रांस का लूर्द तीर्थस्थल, लेबनान का संत चारबेल अन्नाया तीर्थ और इटली का लॉरेटो स्थित परमधर्मपीठीय हाउस ऑफ लॉरेटो शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर श्रद्धालु उसी समय प्रार्थना में सहभागी होंगे और इस प्रकार विश्वभर के लाखों लोग एक आध्यात्मिक सूत्र में बंध जाएंगे।

आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, आतंकवाद, राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता बनी हुई है, तब यह पहल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। युद्ध केवल सैनिकों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि असंख्य परिवारों को बिखेर देता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, माता-पिता अपने प्रियजनों को खो देते हैं और लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हो जाते हैं। अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात घायलों की सेवा करते हैं, जबकि राहतकर्मी और स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों में मानवता की सेवा में लगे रहते हैं। सन्त पापा लियो 14वें ने विशेष रूप से इन सभी लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करने का निर्णय लिया है।

रोजरी माला विनती में सुख के पाँच भेदों का पाठ किया जाएगा। प्रत्येक भेद के माध्यम से विश्व के विभिन्न संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए ईश्वर से शांति, न्याय और मेल-मिलाप की याचना की जाएगी। साथ ही माता मरियम, जिन्हें “शांति की रानी” कहा जाता है, के संरक्षण और मध्यस्थता की प्रार्थना की जाएगी। विश्वासियों का मानना है कि माता मरियम की मध्यस्थता मानवता को ईश्वर के और निकट लाती है तथा कठिन समय में आशा प्रदान करती है।

रोम में उपस्थित तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। वे सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में स्थापित विशाल स्क्रीन के माध्यम से इस प्रार्थना में सहभागी बन सकेंगे। इससे हजारों लोग एक साथ इस आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे और विश्व शांति के लिए अपनी प्रार्थनाएं अर्पित करेंगे।

यह कार्यक्रम सुसमाचार प्रचार संबंधी परमधर्मपीठीय परिषद के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल एक धार्मिक समारोह आयोजित करना नहीं, बल्कि विश्व भर के लोगों को शांति, करुणा और भाईचारे के संदेश से जोड़ना है। आज की विभाजित दुनिया में यह पहल हमें याद दिलाती है कि प्रार्थना और एकता के माध्यम से मानवता बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है।

सन्त पापा लियो 14वें की यह पहल इस बात का प्रतीक है कि शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानव हृदयों के परिवर्तन से भी आती है। जब लाखों लोग एक साथ शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, तब आशा की एक नई किरण जन्म लेती है। यही संदेश इस विशेष रोजरी माला विनती का भी है—विश्व में शांति स्थापित हो, युद्ध समाप्त हों और समस्त मानवता प्रेम, न्याय तथा भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़े।


आलोक कुमार


शुक्रवार, 29 मई 2026

India : एक संपूर्ण पुरोहित का दायित्व निभाकर प्रभु के घर जाने वाले पुरोहित बन गए

 

डॉ. फादर पीटर लूर्डेस: एक महान दूरदर्शी, शिक्षाविद् और मनोवैज्ञानिक का जीवन सफर

एक प्रख्यात सेल्सियन पुरोहित, मनोवैज्ञानिक, असाधारण शिक्षाविद् और सेल्सियन कॉलेज सोनादा (Salesian College Sonada) के पूर्व प्राचार्य डॉ. फादर पीटर लूर्डेस का 28 मई 2026 को कोलकाता के पार्क क्लिनिक अस्पताल में निधन हो गया। वह 101 वर्ष के थे। उनके निधन से न केवल सेल्सियन समुदाय में बल्कि शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में भी एक युग का अंत हो गया है। उनका संपूर्ण जीवन ज्ञान की खोज, आध्यात्मिक साधना और मानवता की निःस्वार्थ सेवा को समर्पित रहा।

अंतिम विदाई और मानवता के लिए आखिरी उपहार

फादर लूर्डेस के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए कोलकाता के नीतिका चैपल (Nitika Chapel) में एक विदाई प्रार्थना सभा (Requiem Mass) का आयोजन किया गया। यह वही स्थान था जहाँ फादर लूर्डेस ने वर्ष 1989 से अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। इस प्रार्थना सभा की अध्यक्षता सेल्सियन प्रोविंशियल फादर सुनील केरकेट्टा ने की। इस भावुक क्षण में बड़ी संख्या में सेल्सियन बंधु, पादरी, धार्मिक नेता, उनके पूर्व छात्र और उनके प्रशंसक इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए।

चर्च के वरिष्ठ नेताओं और उनके सहयोगियों ने फादर लूर्डेस के जीवन के अंतिम और सबसे बड़े फैसले की सराहना की। फादर लूर्डेस ने चिकित्सा विज्ञान और अनुसंधान (Medical Education and Research) के विकास में योगदान देने के उद्देश्य से स्वेच्छा से एक वसीयत तैयार की थी, जिसमें उन्होंने अपने शरीर को चिकित्सा अध्ययन के लिए दान करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके जीवन का यह अंतिम कार्य उनके उस दर्शन को दर्शाता है जिसमें उन्होंने हमेशा पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर दूसरों की सेवा करने का संदेश दिया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, चैपल सेवा के तुरंत बाद उनके पार्थिव शरीर को कोलकाता के कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज (Calcutta National Medical College) को सौंप दिया गया।

ऐतिहासिक शैक्षणिक योगदान और नेतृत्व

फादर पीटर लूर्डेस ने भारत के शैक्षणिक इतिहास में कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए। वह दार्जिलिंग में स्थित प्रसिद्ध सेल्सियन कॉलेज सोनादा के पहले भारतीय मूल के प्राचार्य (First Indian-born Principal) बने। उन्होंने वर्ष 1967 से 1970 तक इस पद पर अपनी सेवाएं दीं। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने कॉलेज के शैक्षणिक स्तर को मजबूत करने के साथ-साथ उसकी देहाती (Pastoral) और सामाजिक भूमिका को भी नया विस्तार दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संस्थान की शिक्षा भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से गहराई से जुड़ी हो।

इसके बाद, उन्होंने पुणे स्थित नेशनल वोकेशन सर्विस सेंटर (National Vocation Service Centre) में कार्यक्रम निदेशक (Programme Director) और मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यहाँ काम करते हुए, वे पादरियों, धार्मिक नेताओं और आम लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण और आध्यात्मिक गठन (Psychological Formation and Training) के क्षेत्र में एक अग्रणी (Pioneer) बनकर उभरे। उन्होंने मनोविज्ञान को अध्यात्म के साथ जोड़कर देखने का एक नया दृष्टिकोण समाज के सामने रखा।

साहित्यिक योगदान और विचार

एक उत्कृष्ट लेखक और विचारक के रूप में, फादर लूर्डेस ने देहाती मनोविज्ञान (Pastoral Psychology) और आध्यात्मिक गठन के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया। उनके लेखन ने अनगिनत लोगों को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया। उनके द्वारा लिखी गई कुछ सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें निम्नलिखित हैं:

द ह्यूमन फेस ऑफ क्लर्जी (1989): इस पुस्तक में उन्होंने धार्मिक नेताओं के मानवीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर गहराई से प्रकाश डाला।

द हेम ऑफ हिज गारमेंट (1996): यह पुस्तक आध्यात्मिक चिकित्सा और आंतरिक शांति के विषयों पर आधारित है।

वाह जीसस (2014): आधुनिक संदर्भों में ईसा मसीह के संदेशों को सरल और प्रेरक तरीके से प्रस्तुत करने वाली एक अनूठी रचना।

द क्लैश (2016): मानव मन के अंतर्विरोधों और उनके समाधानों को उजागर करती एक वैचारिक पुस्तक।

कोरोना महामारी के दौरान प्रेरणादायक लचीलापन

फादर पीटर लूर्डेस न केवल बौद्धिक रूप से बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी बेहद जुझारू व्यक्ति थे। उनके इस अद्भुत लचीलेपन और जीवंतता का उदाहरण कोरोना महामारी (COVID-19 Pandemic) के दौरान देखने को मिला। वर्ष 2020 में, 94 वर्ष की आयु में वे इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हो गए थे। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने कोरोना को मात दी।

इस बीमारी से ठीक होने के तुरंत बाद, 15 अगस्त 2020 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने पूरे उत्साह के साथ भारतीय तिरंगा फहराया। उनकी इस तस्वीर और जज्बे ने देश के लाखों लोगों को कठिन समय में उम्मीद और साहस की प्रेरणा दी।

प्रारंभिक जीवन और उच्च शिक्षा

फादर पीटर लूर्डेस का जन्म 19 मार्च 1926 को हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। वर्ष 1937 में, वे लिलुआ स्थित डॉन बॉस्को स्कूल (Don Bosco School, Liluah) के छात्रों के पहले बैच का हिस्सा बने थे। यहीं से उनके भीतर सेल्सियन मूल्यों और मानव सेवा के बीज बोए गए।

अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने ज्ञान की खोज में देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों का रुख किया:

उन्होंने रोम के सेल्सियन विश्वविद्यालय (Salesian University, Rome) से मनोविज्ञान में उन्नत अध्ययन (Advanced Studies) किया।

इसके बाद, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रल स्टडीज (California Institute of Integral Studies) से 'सोमैटिक साइकोलॉजी' (Somatic Psychology) में मास्टर डिग्री प्राप्त की।

उन्होंने शिकागो के लोयोला विश्वविद्यालय (Loyola Chicago) से 'क्लिनिकल साइकोलॉजी' (Clinical Psychology) में पीएचडी (PhD) की मानद उपाधि प्राप्त की।

अपने निधन के समय तक, वे एक सेल्सियन के रूप में 82 वर्ष और एक समर्पित पुरोहित (Priest) के रूप में 72 वर्ष का एक लंबा और गौरवशाली सफर पूरा कर चुके थे।

एक अविस्मरणीय विरासत

फादर पीटर लूर्डेस को उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता, दूरदर्शी दृष्टिकोण, सौम्य स्वभाव और मानव विकास के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उनका व्यक्तित्व और उनके कार्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थे। उन्होंने शिक्षा, मनोविज्ञान और पास्टोरल मिनिस्ट्री की सीमाओं को पार करते हुए समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया।

चिकित्सा विज्ञान के लिए उनका देहदान का अंतिम निर्णय इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनका जीवन पूरी तरह से ईश्वर और मानवता की सेवा के लिए समर्पित था। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके विचार और उनकी शिक्षाएं आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। एक सच्चे कर्मयोगी के रूप में उनका नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।

आलोक कुमार


World : मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

 मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

ईसाई माता कलीसिया अर्थात कैथोलिक चर्च में मई का महीना अत्यंत पवित्र और विशेष माना जाता है, क्योंकि यह महीना पूर्ण रूप से धन्य कुँवारी माता मरियम को समर्पित होता है। संसार भर के कैथोलिक विश्वासी इस महीने को “मरियम माह” के रूप में मनाते हैं। इस दौरान गिरजाघरों, परिवारों और प्रार्थना समूहों में माता मरियम के सम्मान में विशेष प्रार्थनाएँ, भजन, जुलूस और रोज़री माला की विनतियाँ की जाती हैं। मई माह विश्वासियों को यह याद दिलाता है कि जैसे माता मरियम ने अपने जीवन को पूर्ण रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार समर्पित किया, वैसे ही प्रत्येक विश्वासी को भी विश्वास, प्रेम, आज्ञाकारिता और शांति के मार्ग पर चलना चाहिए।

माता मरियम को शांति की रानी कहा जाता है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण परमेश्वर के प्रति विश्वास और समर्पण से भरा हुआ था। यही कारण है कि कलीसिया मई महीने में विशेष रूप से रोज़री माला के माध्यम से माता मरियम के जीवन की घटनाओं पर मनन करने के लिए प्रेरित करती है। रोज़री केवल शब्दों की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह येसु और मरियम के जीवन के रहस्यों पर ध्यान लगाने की आध्यात्मिक यात्रा है।

रोज़री माला में कुल चार प्रकार के भेद होते हैं—आनंद के भेद, ज्योतिर्मय भेद, दुःख के भेद और महिमा के भेद। प्रत्येक समूह में पाँच-पाँच रहस्य होते हैं। इनमें “आनंद के भेद” विशेष रूप से प्रभु येसु के बाल्यकाल और माता मरियम के आनंदमय अनुभवों से जुड़े हुए हैं। मई महीने में इन भेदों पर मनन करना परिवारों में शांति, प्रेम और एकता को बढ़ाता है।

आनंद के पाँच भेद

पहला भेद – देवदूत गब्रिएल का शुभ संदेश

आनंद के प्रथम भेद में देवदूत गब्रिएल माता मरियम के पास आते हैं और उन्हें यह शुभ समाचार देते हैं कि वे परमेश्वर के पुत्र येसु की माता बनने वाली हैं। यह घटना केवल मरियम के जीवन की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार की शुरुआत थी। मरियम ने विनम्रता से उत्तर दिया—“देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ; आपके वचन के अनुसार मेरे साथ हो।” इस उत्तर में पूर्ण विश्वास, शांति और समर्पण दिखाई देता है।

यह भेद हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यदि हम परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करें तो हमारे भीतर सच्ची शांति उत्पन्न होती है।

दूसरा भेद – माता मरियम की एलिज़बेथ से भेंट

दूसरे आनंद के भेद में माता मरियम अपनी संबंधी एलिज़बेथ से मिलने जाती हैं। एलिज़बेथ भी ईश्वर की विशेष कृपा से गर्भवती थीं। जैसे ही मरियम वहाँ पहुँचीं, एलिज़बेथ के गर्भ में पल रहा बालक यूहन्ना आनंद से उछल पड़ा। एलिज़बेथ ने कहा—“स्त्रियों में तुम धन्य हो।”

यह घटना प्रेम, सेवा और आध्यात्मिक आनंद का सुंदर उदाहरण है। माता मरियम अपने सुख में ही नहीं रहीं, बल्कि दूसरों की सहायता करने के लिए तुरंत निकल पड़ीं। आज के समय में यह भेद हमें सिखाता है कि परिवारों और समाज में प्रेम तथा सेवा की भावना से ही शांति आती है।

तीसरा भेद – प्रभु येसु का जन्म

तीसरे आनंद के भेद में बेतलेहेम की चरनी में प्रभु येसु का जन्म होता है। संसार के उद्धारकर्ता का जन्म किसी महल में नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण परिस्थिति में हुआ। यह घटना विनम्रता और सादगी का महान संदेश देती है।

स्वर्गदूतों ने गड़ेरियों को यह शुभ समाचार सुनाया—“पृथ्वी पर शांति हो।” प्रभु येसु का जन्म वास्तव में शांति और प्रेम का आगमन था। मई महीने में इस भेद पर मनन करते हुए विश्वासी अपने हृदय में येसु के लिए स्थान बनाने का प्रयास करते हैं।

चौथा भेद – बालक येसु को मंदिर में चढ़ाना

यहूदी परंपरा के अनुसार माता मरियम और संत योसेफ बालक येसु को मंदिर में परमेश्वर को अर्पित करने ले जाते हैं। वहाँ धर्मी सिमेओन और भविष्यद्वक्ता अन्ना बालक येसु को देखकर आनंदित होते हैं। सिमेओन उन्हें संसार का प्रकाश बताते हैं।

यह भेद हमें सिखाता है कि माता-पिता को अपने बच्चों को परमेश्वर के मार्ग में बढ़ाना चाहिए। परिवार जब ईश्वर को प्राथमिकता देता है, तब घर में सच्ची शांति और आशीष बनी रहती है।            


पाँचवाँ भेद – मंदिर में बालक येसु का मिलना

जब येसु बारह वर्ष के थे, तब वे यरूशलेम के मंदिर में शिक्षकों के बीच पाए गए। तीन दिनों तक मरियम और योसेफ उन्हें खोजते रहे। अंततः जब वे मंदिर में मिले, तब माता मरियम को अत्यंत आनंद हुआ।

यह भेद हमें बताता है कि कभी-कभी जीवन में हम आध्यात्मिक रूप से येसु से दूर हो जाते हैं, लेकिन यदि हम उन्हें खोजें, तो वे अवश्य मिलते हैं। परमेश्वर की उपस्थिति ही मनुष्य को सच्ची शांति देती है।

माता मरियम के सात आनंद

कैथोलिक कलीसिया की फ्रांसिस्कन परंपरा में “माता मरियम के सात आनंद” की विशेष माला भी प्रचलित है। इसमें मरियम के जीवन की सात महान आनंदमयी घटनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। इनमें गब्रिएल का शुभ संदेश, एलिज़बेथ से भेंट, येसु का जन्म, ज्योतिषियों की आराधना, मंदिर में येसु का मिलना, पुनरुत्थान के बाद प्रभु का दर्शन, तथा मरियम का स्वर्गारोहण और स्वर्ग की रानी के रूप में मुकुट धारण करना शामिल है।

इन सात आनंदों का उद्देश्य यह याद दिलाना है कि दुःख और संघर्ष के बीच भी परमेश्वर अपने भक्तों को अंततः आनंद और महिमा प्रदान करते हैं।

मई माह का आध्यात्मिक महत्व

मई महीने में प्रतिदिन रोज़री माला पढ़ना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को शांति देने वाला आध्यात्मिक अभ्यास है। जब परिवार एक साथ बैठकर माता मरियम की विनती करते हैं, तब घरों में प्रेम, क्षमा और एकता बढ़ती है। आज के तनावपूर्ण और अशांत वातावरण में मरियम की प्रार्थना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है।

माता मरियम का जीवन हमें यह सिखाता है कि विनम्रता, सेवा, विश्वास और प्रार्थना के द्वारा ही सच्ची शांति प्राप्त होती है। इसलिए कलीसिया मई महीने में प्रत्येक विश्वासी को प्रेरित करती है कि वे माता मरियम के निकट आएँ, रोज़री माला पढ़ें और येसु मसीह के प्रेममय जीवन का अनुसरण करें।

अंततः, मई का यह पवित्र महीना केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक नवीनीकरण का अवसर है। माता मरियम के आनंदमय भेदों पर मनन करते हुए हम अपने जीवन में परमेश्वर की शांति, प्रेम और कृपा का अनुभव कर सकते हैं।

आलोक कुमार