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मंगलवार, 2 जून 2026

Bihar : बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

 बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित बेतिया केवल एक ऐतिहासिक नगर ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक मिशनरी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है। बेतिया का धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक इतिहास लगभग तीन शताब्दियों पुराना है। यहां स्थापित कैथोलिक मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इस गौरवशाली इतिहास के केंद्र में एक महान मिशनरी पादरी फादर जोसेफ मेरी बिरिनी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

फादर जोसेफ मेरी बिरिनी (1709-1761) उत्तर भारत के पहले कैपुचिन मिशन, बेतिया मिशन, के संस्थापक थे। वे इटली से भारत आए और अपने ज्ञान, सेवा तथा समर्पण के कारण शीघ्र ही स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय हो गए। वर्ष 1740 में उन्होंने बेतिया राज की महारानी की एक लंबी और गंभीर बीमारी को चमत्कारिक रूप से ठीक किया। इस घटना ने मिशन के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाया और बेतिया राज परिवार के साथ कैथोलिक मिशन के संबंध और मजबूत हुए।

फादर बिरिनी केवल धर्मप्रचारक ही नहीं, बल्कि एक विद्वान भाषाविद भी थे। उन्हें इतालवी, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, हिंदुस्तानी और संस्कृत भाषाओं का उत्कृष्ट ज्ञान था। उनकी विद्वता का प्रमाण यह है कि उन्होंने प्रसिद्ध "वाल्मीकि रामायण" का इतालवी भाषा में अनुवाद किया। उस समय किसी यूरोपीय मिशनरी द्वारा भारतीय धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन और अनुवाद करना एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी। इससे भारतीय संस्कृति के प्रति उनके सम्मान और गहन रुचि का भी पता चलता है।

वर्ष 1751 में फादर बिरिनी ने बेतिया में एक विशाल और सुंदर गिरजाघर का निर्माण कराया। उसी वर्ष क्रिसमस की पूर्व संध्या पर इस चर्च को विधिवत आशीष देकर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह चर्च उस समय उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण कैथोलिक उपासना केंद्रों में से एक था। फादर बिरिनी ने अपने जीवन का अधिकांश समय बेतिया में बिताया और यहीं 15 जनवरी 1761 को उनका निधन हुआ। उनका जीवन आज भी सेवा, त्याग और समर्पण की प्रेरणा देता है।

बेतिया मिशन ने शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक कार्य किए। वर्ष 1860 में फादर जॉन बैपटिस्ट ने मिशन मिडिल स्कूल की स्थापना की। यह कैपुचिन मिशन का तीसरा विद्यालय था। इस विद्यालय ने क्षेत्र के हजारों विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की और अनेक प्रतिभाओं को विकसित किया। शिक्षा के माध्यम से समाज में जागरूकता और प्रगति लाने का यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1874 में धन्य कुँवारी मरियम की बहनों (Sisters of the Blessed Virgin Mary) ने बेतिया में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में सेंट टेरेसा गर्ल्स हाई स्कूल नाम दिया गया। उस दौर में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना एक दूरदर्शी कदम था। वर्ष 1892 में इस विद्यालय का संचालन स्विट्जरलैंड की होली क्रॉस की सिस्टर्स ऑफ मर्सी को सौंप दिया गया। आज भी यह विद्यालय क्षेत्र की प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में गिना जाता है।

मुद्रण और प्रकाशन के क्षेत्र में भी बेतिया मिशन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1897 में कैथोलिक मिशन प्रेस, बेतिया की स्थापना हुई। इस प्रेस के माध्यम से धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक साहित्य का प्रकाशन किया जाने लगा। इससे शिक्षा और ज्ञान के प्रसार को नई गति मिली।

बेतिया मिशन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि फादर काजेतान सेसारी का पुरोहित बनना था। वे बेतिया में जन्मे पहले भारतीय कैथोलिक पादरी थे। उनकी नियुक्ति ने यह सिद्ध कर दिया कि मिशन केवल विदेशी धर्मप्रचारकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी नेतृत्व और सेवा के अवसर प्रदान किए गए।

समय के साथ बेतिया के कैथोलिक समुदाय का विस्तार हुआ। जब श्रद्धालुओं की संख्या एक हजार से अधिक हो गई, तब पुराने चर्च को हटाकर वर्ष 1833 में एक नया और अधिक भव्य चर्च बनाया गया। यह चर्च अपनी सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन जनवरी 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप ने इस ऐतिहासिक भवन को पूरी तरह नष्ट कर दिया। बाद में जेसुइट पादरियों ने वर्तमान बेतिया चर्च का निर्माण कराया, जो आज भी विश्वास और इतिहास का प्रतीक बना हुआ है।                                   

वर्ष 1919 में बिहार स्थित कैपुचिन मिशन का दायित्व अमेरिकी जेसुइट मिशनरियों को सौंप दिया गया। जेसुइटों ने शिक्षा, सामाजिक सेवा और धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाते हुए मिशन की गौरवशाली परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

आज बेतिया केवल एक नगर नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक इतिहास, शिक्षा और सामाजिक सेवा की जीवंत विरासत का प्रतीक है। फादर जोसेफ मेरी बिरिनी और उनके सहयोगियों द्वारा बोया गया सेवा और विश्वास का बीज आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। बेतिया का यह इतिहास न केवल स्थानीय ईसाई समुदाय बल्कि पूरे बिहार और भारत की सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक धरोहर का महत्वपूर्ण अध्याय है।


आलोक कुमार

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