अंजना ओम कश्यप की भाषाई चूक और टीवी पत्रकारिता का बदलता स्वर
भारतीय राजनीति में भाषाई चूक, अतिशयोक्ति और तंज लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। चुनावी मंचों पर नेता कई बार जल्दबाजी, भावनात्मक आवेश या राजनीतिक आक्रामकता में ऐसे शब्द बोल जाते हैं जो बाद में सोशल मीडिया पर मजाक और बहस का कारण बनते हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह प्रवृत्ति केवल नेताओं तक सीमित नहीं रह गई है। टीवी चैनलों के एंकर और पत्रकार भी उसी शैली को अपनाते दिखाई दे रहे हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ टीवी एंकर Anjana Om Kashyap का एक चर्चित भाषाई प्रसंग अक्सर चर्चा में आता है, जब उन्होंने लाइव बहस के दौरान मानक मुहावरे की जगह उसका अशुद्ध रूप बोल दिया।
एक टीवी डिबेट के दौरान विपक्षी नेता पर टिप्पणी करते हुए अंजना ओम कश्यप ने “कौड़ी न जानना” की जगह “जानना न कौढ़ी” कह दिया। यह सुनते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लोगों ने इस कथन के वीडियो क्लिप साझा किए और भाषा प्रेमियों ने इसे हिंदी मुहावरों की अशुद्ध प्रस्तुति का उदाहरण बताया। कुछ लोगों ने इसे सामान्य मानवीय भूल कहा, जबकि कुछ ने इसे टीवी पत्रकारिता की गिरती भाषाई गुणवत्ता से जोड़कर देखा।
हिंदी भाषा में मुहावरे केवल शब्दों का समूह नहीं होते, बल्कि वे एक निश्चित संरचना और अर्थ के साथ स्थापित अभिव्यक्तियां हैं। “कौड़ी न जानना” एक प्रचलित मुहावरा है, जिसका अर्थ किसी विषय की बिल्कुल जानकारी न होना है। मुहावरों की विशेषता यह होती है कि उनमें शब्दों का क्रम बदलने पर उनका प्रभाव और शुद्धता समाप्त हो जाती है। इसलिए “जानना न कौढ़ी” भाषाई दृष्टि से गलत माना जाएगा। यह उसी तरह है जैसे कोई “नौ दो ग्यारह होना” की जगह “ग्यारह दो नौ होना” कह दे। अर्थ का संकेत भले मिल जाए, लेकिन भाषाई शुद्धता समाप्त हो जाती है।
हालांकि यह भी सच है कि लाइव टीवी पर काम करने वाले पत्रकारों पर असाधारण दबाव होता है। एंकर को एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। उसे बहस का संचालन करना होता है, मेहमानों के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, दर्शकों की रुचि बनाए रखनी होती है और साथ ही तथ्यों तथा भाषा पर भी नियंत्रण रखना होता है। ऐसे माहौल में कभी-कभी शब्दों की अदला-बदली हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। बड़े-बड़े राजनेता, अभिनेता, न्यायविद और लेखक भी सार्वजनिक मंचों पर ऐसी गलतियां कर चुके हैं।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया। क्या आज के टीवी चैनलों में भाषा की शुद्धता और संतुलन पहले जैसी प्राथमिकता नहीं रह गई है? पिछले कुछ वर्षों में समाचार चैनलों की बहसों का स्वर काफी आक्रामक हुआ है। एंकर केवल सवाल पूछने वाले मध्यस्थ नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार वे स्वयं बहस के प्रमुख पात्र बन जाते हैं। उनकी भाषा में भी राजनीतिक नेताओं जैसी तीखी टिप्पणी, व्यंग्य और नाटकीयता दिखाई देने लगी है।
यही कारण है कि जब कोई एंकर भाषाई गलती करता है तो उसकी चर्चा सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक होती है। दर्शक पत्रकारों से अपेक्षा करते हैं कि वे तथ्यों के साथ-साथ भाषा के भी मानक प्रस्तुत करें। पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह समाज में भाषा और अभिव्यक्ति की संस्कृति को भी प्रभावित करती है। करोड़ों लोग समाचार चैनल देखते हैं और अनजाने में वहां प्रयुक्त शब्दों तथा वाक्य संरचनाओं को अपनाते हैं।
सोशल मीडिया के दौर में ऐसी छोटी-सी चूक भी तुरंत वायरल हो जाती है। पहले यदि किसी एंकर या नेता से कोई गलती हो जाती थी तो वह सीमित दर्शकों तक ही रहती थी। आज हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और कुछ ही मिनटों में वीडियो क्लिप लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। इस कारण सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की भाषाई जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
हालांकि यह भी जरूरी है कि ऐसी घटनाओं को संतुलित दृष्टि से देखा जाए। एक भाषाई गलती के आधार पर किसी पत्रकार की पूरी क्षमता या योगदान का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। अंजना ओम कश्यप लंबे समय से टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों को कवर किया है। इसलिए किसी एक चूक को उनके पूरे पेशेवर जीवन का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
फिर भी यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। मीडिया संस्थानों को भाषा प्रशिक्षण और संपादकीय गुणवत्ता पर लगातार ध्यान देना चाहिए। पत्रकारों और एंकरों को भी यह समझना होगा कि उनकी हर बात लाखों लोगों तक पहुंचती है। इसलिए शब्दों के चयन और प्रयोग में सावधानी आवश्यक है।
आज जब राजनीति और मीडिया के बीच की रेखाएं कई बार धुंधली होती दिखाई देती हैं, तब पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भाषा की शुद्धता, तथ्यात्मकता और संयम पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। अंजना ओम कश्यप की यह चर्चित भाषाई चूक केवल एक व्यक्तिगत भूल नहीं थी, बल्कि उसने उस व्यापक प्रवृत्ति की ओर भी संकेत किया जिसमें टीवी एंकर धीरे-धीरे नेताओं जैसी शैली अपनाते दिखाई दे रहे हैं। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अलग और विशिष्ट होती है। इसलिए पत्रकारिता की ताकत केवल तेज आवाज में नहीं, बल्कि सटीक तथ्यों, संतुलित प्रस्तुति और शुद्ध भाषा में निहित है।
आलोक कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/