डॉ. फादर पीटर लूर्डेस: एक महान दूरदर्शी, शिक्षाविद् और मनोवैज्ञानिक का जीवन सफर
एक प्रख्यात सेल्सियन पुरोहित, मनोवैज्ञानिक, असाधारण शिक्षाविद् और सेल्सियन कॉलेज सोनादा (Salesian College Sonada) के पूर्व प्राचार्य डॉ. फादर पीटर लूर्डेस का 28 मई 2026 को कोलकाता के पार्क क्लिनिक अस्पताल में निधन हो गया। वह 101 वर्ष के थे। उनके निधन से न केवल सेल्सियन समुदाय में बल्कि शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में भी एक युग का अंत हो गया है। उनका संपूर्ण जीवन ज्ञान की खोज, आध्यात्मिक साधना और मानवता की निःस्वार्थ सेवा को समर्पित रहा।
अंतिम विदाई और मानवता के लिए आखिरी उपहार
फादर लूर्डेस के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए कोलकाता के नीतिका चैपल (Nitika Chapel) में एक विदाई प्रार्थना सभा (Requiem Mass) का आयोजन किया गया। यह वही स्थान था जहाँ फादर लूर्डेस ने वर्ष 1989 से अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। इस प्रार्थना सभा की अध्यक्षता सेल्सियन प्रोविंशियल फादर सुनील केरकेट्टा ने की। इस भावुक क्षण में बड़ी संख्या में सेल्सियन बंधु, पादरी, धार्मिक नेता, उनके पूर्व छात्र और उनके प्रशंसक इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए।
चर्च के वरिष्ठ नेताओं और उनके सहयोगियों ने फादर लूर्डेस के जीवन के अंतिम और सबसे बड़े फैसले की सराहना की। फादर लूर्डेस ने चिकित्सा विज्ञान और अनुसंधान (Medical Education and Research) के विकास में योगदान देने के उद्देश्य से स्वेच्छा से एक वसीयत तैयार की थी, जिसमें उन्होंने अपने शरीर को चिकित्सा अध्ययन के लिए दान करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके जीवन का यह अंतिम कार्य उनके उस दर्शन को दर्शाता है जिसमें उन्होंने हमेशा पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर दूसरों की सेवा करने का संदेश दिया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, चैपल सेवा के तुरंत बाद उनके पार्थिव शरीर को कोलकाता के कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज (Calcutta National Medical College) को सौंप दिया गया।
ऐतिहासिक शैक्षणिक योगदान और नेतृत्व
फादर पीटर लूर्डेस ने भारत के शैक्षणिक इतिहास में कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए। वह दार्जिलिंग में स्थित प्रसिद्ध सेल्सियन कॉलेज सोनादा के पहले भारतीय मूल के प्राचार्य (First Indian-born Principal) बने। उन्होंने वर्ष 1967 से 1970 तक इस पद पर अपनी सेवाएं दीं। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने कॉलेज के शैक्षणिक स्तर को मजबूत करने के साथ-साथ उसकी देहाती (Pastoral) और सामाजिक भूमिका को भी नया विस्तार दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संस्थान की शिक्षा भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से गहराई से जुड़ी हो।
इसके बाद, उन्होंने पुणे स्थित नेशनल वोकेशन सर्विस सेंटर (National Vocation Service Centre) में कार्यक्रम निदेशक (Programme Director) और मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यहाँ काम करते हुए, वे पादरियों, धार्मिक नेताओं और आम लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण और आध्यात्मिक गठन (Psychological Formation and Training) के क्षेत्र में एक अग्रणी (Pioneer) बनकर उभरे। उन्होंने मनोविज्ञान को अध्यात्म के साथ जोड़कर देखने का एक नया दृष्टिकोण समाज के सामने रखा।
साहित्यिक योगदान और विचार
एक उत्कृष्ट लेखक और विचारक के रूप में, फादर लूर्डेस ने देहाती मनोविज्ञान (Pastoral Psychology) और आध्यात्मिक गठन के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया। उनके लेखन ने अनगिनत लोगों को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया। उनके द्वारा लिखी गई कुछ सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें निम्नलिखित हैं:
द ह्यूमन फेस ऑफ क्लर्जी (1989): इस पुस्तक में उन्होंने धार्मिक नेताओं के मानवीय और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर गहराई से प्रकाश डाला।
द हेम ऑफ हिज गारमेंट (1996): यह पुस्तक आध्यात्मिक चिकित्सा और आंतरिक शांति के विषयों पर आधारित है।
वाह जीसस (2014): आधुनिक संदर्भों में ईसा मसीह के संदेशों को सरल और प्रेरक तरीके से प्रस्तुत करने वाली एक अनूठी रचना।
द क्लैश (2016): मानव मन के अंतर्विरोधों और उनके समाधानों को उजागर करती एक वैचारिक पुस्तक।
कोरोना महामारी के दौरान प्रेरणादायक लचीलापन
फादर पीटर लूर्डेस न केवल बौद्धिक रूप से बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी बेहद जुझारू व्यक्ति थे। उनके इस अद्भुत लचीलेपन और जीवंतता का उदाहरण कोरोना महामारी (COVID-19 Pandemic) के दौरान देखने को मिला। वर्ष 2020 में, 94 वर्ष की आयु में वे इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हो गए थे। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने कोरोना को मात दी।
इस बीमारी से ठीक होने के तुरंत बाद, 15 अगस्त 2020 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने पूरे उत्साह के साथ भारतीय तिरंगा फहराया। उनकी इस तस्वीर और जज्बे ने देश के लाखों लोगों को कठिन समय में उम्मीद और साहस की प्रेरणा दी।
प्रारंभिक जीवन और उच्च शिक्षा
फादर पीटर लूर्डेस का जन्म 19 मार्च 1926 को हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। वर्ष 1937 में, वे लिलुआ स्थित डॉन बॉस्को स्कूल (Don Bosco School, Liluah) के छात्रों के पहले बैच का हिस्सा बने थे। यहीं से उनके भीतर सेल्सियन मूल्यों और मानव सेवा के बीज बोए गए।
अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने ज्ञान की खोज में देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों का रुख किया:
उन्होंने रोम के सेल्सियन विश्वविद्यालय (Salesian University, Rome) से मनोविज्ञान में उन्नत अध्ययन (Advanced Studies) किया।
इसके बाद, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रल स्टडीज (California Institute of Integral Studies) से 'सोमैटिक साइकोलॉजी' (Somatic Psychology) में मास्टर डिग्री प्राप्त की।
उन्होंने शिकागो के लोयोला विश्वविद्यालय (Loyola Chicago) से 'क्लिनिकल साइकोलॉजी' (Clinical Psychology) में पीएचडी (PhD) की मानद उपाधि प्राप्त की।
अपने निधन के समय तक, वे एक सेल्सियन के रूप में 82 वर्ष और एक समर्पित पुरोहित (Priest) के रूप में 72 वर्ष का एक लंबा और गौरवशाली सफर पूरा कर चुके थे।
एक अविस्मरणीय विरासत
फादर पीटर लूर्डेस को उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता, दूरदर्शी दृष्टिकोण, सौम्य स्वभाव और मानव विकास के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उनका व्यक्तित्व और उनके कार्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थे। उन्होंने शिक्षा, मनोविज्ञान और पास्टोरल मिनिस्ट्री की सीमाओं को पार करते हुए समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया।
चिकित्सा विज्ञान के लिए उनका देहदान का अंतिम निर्णय इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनका जीवन पूरी तरह से ईश्वर और मानवता की सेवा के लिए समर्पित था। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके विचार और उनकी शिक्षाएं आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। एक सच्चे कर्मयोगी के रूप में उनका नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।
आलोक कुमार
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