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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

Bihar : आठवें दिन भी ठप नगर सेवाएं: हड़ताल, कूड़े के ढेर और आम जनता की बढ़ती परेशानी

 आठवें दिन भी ठप नगर सेवाएं: हड़ताल, कूड़े के ढेर और आम जनता की बढ़ती परेशानी

बिहार के शहरी इलाकों में इन दिनों नगर निकाय सेवाएं गंभीर संकट से गुजर रही हैं। पटना नगर निगम सहित राज्य के सभी नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के कर्मचारियों की बेमियादी हड़ताल गुरुवार को आठवें दिन भी जारी रही। इस हड़ताल का सबसे अधिक असर आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर दिखाई दे रहा है। शहरों में सफाई व्यवस्था चरमरा गई है, कई जगह कचरे के ढेर लग गए हैं, जलापूर्ति प्रभावित हुई है और अन्य आवश्यक नगर सेवाएं भी बाधित हैं। ऐसे में लोगों को न केवल असुविधा का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा, बिहारशरीफ और अन्य नगर निकाय क्षेत्रों में सड़कों के किनारे कचरा जमा होने लगा है। नियमित सफाई नहीं होने के कारण कई इलाकों में दुर्गंध फैल रही है। बारिश के मौसम में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि गीला कचरा तेजी से सड़ता है और मच्छरों, मक्खियों तथा अन्य कीटों के पनपने का खतरा बढ़ जाता है। चिकित्सकों का भी मानना है कि लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहने पर डेंगू, मलेरिया, दस्त और अन्य संक्रामक बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।

कर्मचारियों की तीन प्रमुख मांगें

हड़ताल पर बैठे कर्मचारी संगठनों का कहना है कि उनकी मांगें नई नहीं हैं, बल्कि वर्षों से लंबित हैं। उनकी पहली मांग यह है कि लंबे समय से कार्यरत निगमकर्मियों की सेवाएं स्थायी की जाएं। अनेक कर्मचारी वर्षों से अस्थायी या संविदा व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।

दूसरी प्रमुख मांग आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा को समाप्त करने की है। कर्मचारियों का आरोप है कि ठेका प्रणाली के कारण न केवल रोजगार की सुरक्षा समाप्त हो गई है, बल्कि वेतन और अन्य सुविधाओं में भी भारी असमानता बनी हुई है। उनका कहना है कि नियमित नियुक्तियों के माध्यम से ही नगर निकाय सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण मांग "समान काम के लिए समान वेतन" के सिद्धांत को लागू करने की है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि एक ही प्रकार का कार्य करने वाले स्थायी और संविदा कर्मचारियों के वेतन में बड़ा अंतर है, जो न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

सरकार ने शुरू की बातचीत की पहल

लगातार जारी हड़ताल के बीच समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। नगर विकास एवं आवास मंत्री नीतीश मिश्रा ने कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों से वार्ता की पहल की है। इस कदम को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

हड़ताली नेताओं का कहना है कि सरकार की ओर से बातचीत शुरू होना स्वागत योग्य है। उनका मानना है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करे और व्यावहारिक समाधान निकाले, तो हड़ताल समाप्त हो सकती है। दूसरी ओर सरकार भी चाहती है कि नगर सेवाएं जल्द सामान्य हों, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।

हालांकि अभी तक किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में राज्यभर के लाखों लोगों की निगाहें इस वार्ता के परिणाम पर टिकी हुई हैं।

कुर्जी मोड़ पर बदहाल सफाई व्यवस्था

हड़ताल का असर राजधानी पटना में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। शहर के कुर्जी मोड़ के पास सड़क किनारे कूड़े का बड़ा ढेर जमा हो गया है। नियमित कचरा उठाव नहीं होने के कारण यह स्थान गंदगी का केंद्र बन चुका है।

इस कूड़े के ढेर के बीच दो कबाड़ बीनने वाले अपनी रोजी-रोटी की तलाश करते दिखाई देते हैं। उनके लिए यही कचरा आजीविका का साधन है। वे प्लास्टिक, बोतलें, लोहे के टुकड़े और अन्य कबाड़ इकट्ठा कर बेचते हैं, जिससे उनके परिवार का गुजारा चलता है।

यह दृश्य शहर की दो अलग-अलग सच्चाइयों को एक साथ सामने लाता है। एक तरफ नगर निकाय व्यवस्था की कमजोरी है, जिसके कारण सार्वजनिक स्थानों पर कचरे के ढेर लग रहे हैं। दूसरी ओर गरीबी से जूझते वे लोग हैं, जिनकी जिंदगी दूसरों द्वारा फेंकी गई वस्तुओं पर निर्भर है।

स्थानीय लोगों की बढ़ती चिंता

कुर्जी मोड़ और आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि नियमित सफाई नहीं होने से दुर्गंध लगातार बढ़ रही है। खुले में पड़े कचरे के कारण सड़क से गुजरना भी मुश्किल हो गया है। कई लोगों ने आशंका जताई कि यदि जल्द सफाई नहीं हुई तो बरसात के मौसम में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है।

स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि गंदगी के कारण ग्राहकों की संख्या भी प्रभावित हो रही है। सड़क किनारे जमा कचरे से न केवल शहर की छवि खराब हो रही है, बल्कि यातायात भी बाधित हो रहा है। कई जगह आवारा पशु भी कचरे में भोजन तलाशते दिखाई देते हैं, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।

नागरिकों की परेशानी और प्रशासन की चुनौती

नगर निकायों की हड़ताल केवल कर्मचारियों और सरकार के बीच का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। घरों से कचरा नहीं उठ रहा, सार्वजनिक स्थानों की सफाई प्रभावित है और कई इलाकों में जलापूर्ति संबंधी शिकायतें भी सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नगर निकाय जैसी आवश्यक सेवाओं में लंबे समय तक गतिरोध किसी भी शहर के लिए उचित नहीं है। इसलिए सरकार और कर्मचारी संगठनों को बातचीत के माध्यम से जल्द समाधान निकालना चाहिए। कर्मचारियों की जायज मांगों पर संवेदनशीलता से विचार करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी शहरों की मूलभूत सेवाओं को लगातार जारी रखना भी है।

समाधान की ओर उम्मीद

फिलहाल सभी की नजरें सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच होने वाली वार्ता पर टिकी हैं। यदि दोनों पक्ष सहमति पर पहुंचते हैं, तो कई दिनों से प्रभावित नगर सेवाएं फिर से सामान्य हो सकती हैं। इससे शहरों में सफाई अभियान दोबारा शुरू होगा, कचरे का उठाव नियमित होगा और नागरिकों को राहत मिलेगी।

लेकिन यदि बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती, तो हड़ताल और लंबी खिंच सकती है। ऐसी स्थिति में शहरी जीवन और अधिक प्रभावित होगा तथा स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।

बिहार के शहरों को स्वच्छ, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सरकार, कर्मचारी संगठन और नगर निकाय मिलकर ऐसा स्थायी समाधान निकालें, जिससे कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा भी हो और आम नागरिकों को निर्बाध नगर सेवाएं भी मिलती रहें। यही किसी भी आधुनिक और जिम्मेदार शहरी प्रशासन की सबसे बड़ी पहचान होगी।

आलोक कुमार