रुपया, राजनीति और सत्ता की कसौटी
डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भारत में अब केवल आर्थिक विमर्श तक सीमित नहीं रही. समय के साथ यह एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है, जिसकी व्याख्या सत्ता के बदलते ही बदल जाती है. 2 जनवरी को नए वर्ष की शुरुआत के साथ जब देश आर्थिक दिशा की ओर देखता है, तब रुपये का सवाल नीति से अधिक राजनीतिक नैतिकता की कसौटी पर खड़ा नजर आता है.
जब मौजूदा सत्ताधारी दल विपक्ष में था, तब रुपये की कमजोरी को तत्कालीन सरकार की अक्षमता, नीतिगत विफलता और वैश्विक मंच पर भारत की गिरती साख से जोड़ा जाता था. कमजोर रुपया उस समय कमजोर नेतृत्व का प्रतीक बताया जाता था. आज परिस्थितियाँ बदली हैं, सत्ता बदली है, लेकिन रुपया फिर दबाव में है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब भाषा संयमित है और तर्क वैश्विक परिस्थितियों पर केंद्रित हैं.
विपक्ष का आरोप है कि रुपये की गिरावट सरकार की आर्थिक नीतियों और प्रबंधन की कमियों का परिणाम है. उनका सवाल सीधा है—अगर आज वैश्विक कारण ही सब कुछ तय कर रहे हैं, तो सत्ता में आने से पहले रुपये को लेकर आक्रामक राजनीति क्यों की गई थी? यही प्रश्न राजनीतिक विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा करता है.
सरकार का पक्ष भी पूरी तरह निराधार नहीं है. उसका तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था असाधारण दौर से गुजर रही है.महामारी के बाद की चुनौतियाँ, भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक महंगाई और डॉलर की मजबूती ने लगभग सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है. सरकार यह भी रेखांकित करती है कि इन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है.
सच्चाई संभवतः इन दोनों ध्रुवों के बीच स्थित है। यह मानना कठिन है कि रुपये पर वैश्विक कारकों का असर नहीं पड़ता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सत्ता और विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल अलग-अलग मानदंड अपनाते रहे हैं। यही दोहरापन सार्वजनिक विमर्श को कमजोर करता है.
अंततः सवाल रुपये की विनिमय दर से बड़ा है. सवाल यह है कि क्या राजनीति में स्मृति और जिम्मेदारी समान रूप से निभाई जा रही है? जब आर्थिक आंकड़े सत्ता के अनुसार अर्थ बदलने लगें, तब लोकतांत्रिक बहस का स्तर गिरता है. तब रुपया केवल मुद्रा नहीं रहता—वह सत्ता की नैतिक परीक्षा बन जाता है.
आलोक कुमार