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मार्च 27, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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 30 मार्च 2026 को उनका विधान परिषद से इस्तीफा  रिपोर्टः आलोक कुमार Nitish Kumar बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी और लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। उनका राजनीतिक करियर कई मायनों में अनोखा रहा है। उन्होंने लोकसभा और बिहार विधानसभा दोनों के चुनाव लड़े, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद कभी सीधे विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। वे वर्षों तक Bihar Legislative Council (विधान परिषद) के सदस्य के रूप में सत्ता का संचालन करते रहे। अब राज्यसभा चुनाव जीतने के बाद 30 मार्च 2026 को उनका विधान परिषद से इस्तीफा उनकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दे रहा है।   विधानसभा चुनावों का सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अनुभव   नीतीश कुमार ने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में बिहार विधानसभा के चार चुनाव लड़े—1977, 1980, 1985 और 1995। 1977 में उन्होंने हरनौत सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। 1980 में भी वे उसी सीट से पराजित हुए। 1985 में Lok Dal के टिकट पर उन्होंने पहली और एकमात्र जीत दर्ज की। यह जीत उनके राजनीतिक जीवन की एक अहम उपलब्धि रही।  हालांक...

“जान है तो जहान—सुरक्षित बचपन, मजबूत भारत”

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 “जान है तो जहान—सुरक्षित बचपन, मजबूत भारत” “टीकाकरण और जागरूकता से बदल रही है बच्चों की दुनिया” रिपोर्टः आलोक कुमार “जान है तो जहान” — तब जाकर भारत बनेगा महान “जान है तो जहान” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दर्शन है। जब तक देश के बच्चे सुरक्षित, स्वस्थ और जीवित नहीं रहेंगे, तब तक किसी भी विकास का दावा अधूरा ही रहेगा। यही कारण है कि आज भारत सरकार और अनेक गैर-सरकारी संस्थाएं बाल स्वास्थ्य, टीकाकरण और बाल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही हैं। पिछले तीन दशकों में भारत ने बाल मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। 1990 से 2024 के बीच 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) में लगभग 79% की गिरावट आई है—यह 127 से घटकर 27 प्रति 1000 जीवित जन्म हो गई है। इसी तरह नवजात मृत्यु दर (NMR) भी 57 से घटकर 17 तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि यूं ही नहीं मिली; इसके पीछे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, संस्थागत प्रसव, टीकाकरण अभियान और जन-जागरूकता की बड़ी भूमिका है। अगर बिहार की बात करें, तो यहां भी स्थिति में सुधार देखने को मिला है। 2009 में जहां शिशु मृत्यु दर (IMR) 52 थी, वही...

“ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: पहचान पर कानून या अधिकारों पर नियंत्रण?”

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 “ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: पहचान पर कानून या अधिकारों पर नियंत्रण?” “Self-Identification से Medical Verification तक—बदल गया नियम” रिपोर्टः आलोक कुमार ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: अधिकार, पहचान और विवाद का नया अध्याय मार्च 2026 में भारतीय संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने देश में जेंडर पहचान और मानवाधिकार के मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह विधेयक 2019 के मूल कानून में महत्वपूर्ण बदलाव करता है और खासकर “स्व-पहचान” (Self-identification) के अधिकार को सीमित करने के कारण व्यापक विवाद का विषय बन गया है। यह कानून एक ओर जहां सरकार के अनुसार पहचान की प्रक्रिया को “संगठित और प्रमाणिक” बनाने का प्रयास है, वहीं दूसरी ओर ट्रांसजेंडर समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे उनकी गरिमा और स्वतंत्रता के खिलाफ कदम मान रहे हैं। क्या है नया बदलाव? 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी पहचान स्वयं घोषित करने का अधिकार दिया गया था। यानी किसी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार था कि वह स्वयं को किस जेंडर के रूप में पहचानता ...

महावीर मंदिर का ‘नैवेद्यम’—प्रसाद नहीं, आस्था की पहचान”

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 महावीर मंदिर का ‘नैवेद्यम’—प्रसाद नहीं, आस्था की पहचान” “स्वाद, शुद्धता और सेवा का अद्भुत संगम” रिपोर्टः आलोक कुमार पटना स्थित महावीर मंदिर केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सेवा, श्रद्धा और गुणवत्ता का अद्भुत संगम भी है। यहां मिलने वाला “नैवेद्यम लड्डू” प्रसाद आज देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। यह प्रसाद केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपनी पवित्रता, निर्माण प्रक्रिया और सामाजिक उपयोगिता के कारण भी विशेष महत्व रखता है। मंदिर में चढ़ाया जाने वाला यह नैवेद्यम प्रसाद भक्तों के लिए किसी साधारण मिठाई से कहीं अधिक है। जब श्रद्धालु इसे भगवान को अर्पित कर घर ले जाते हैं, तो यह उनके लिए आशीर्वाद का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि लोग कहते हैं—“भगवान को भोग लगने के बाद इस प्रसाद के स्वाद का मुकाबला कोई मिठाई नहीं कर सकती।” कीमत और उपलब्धता अप्रैल 2025 से लागू दरों के अनुसार नैवेद्यम प्रसाद की कीमत इस प्रकार है— 1 किलो (प्लास्टिक पैक): ₹380 1 किलो (कार्टन बॉक्स): ₹360 500 ग्राम (कार्टन बॉक्स): ₹180 250 ग्राम (कार्टन बॉक्स): ₹90 मंदिर परिसर के बाहर 12 से अधिक काउंटरों ...

“संविधान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय—बदलते सवाल”

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 “संविधान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय—बदलते सवाल” “एंग्लो-इंडियन मनोनयन से आरक्षण बहस तक” रिपोर्टः आलोक कुमार भारतीय संविधान की रचना केवल एक कानूनी दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह विविधताओं से भरे समाज को न्याय, समानता और प्रतिनिधित्व देने का एक ऐतिहासिक प्रयास था। इसी दृष्टि से संविधान सभा में विभिन्न समुदायों की आवाज़ को सुनिश्चित करने के लिए कई विशेष प्रावधान किए गए। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रावधान एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए था, जिसकी पैरवी फ्रैंक एंथनी जैसे नेताओं ने प्रभावी ढंग से की थी। संविधान के अनुच्छेद 331 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया था कि यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय को लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो वह अधिकतम दो सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं। इसी प्रकार, राज्यों में भी राज्यपालों को विधानसभा में एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार था। यह व्यवस्था उस समय की सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, जब यह समुदाय संख्या में कम होने के कारण लोकतांत्रिक चुनावों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पा र...