दो हफ्ते की खांसी को न करें नजरअंदाज, यह टीबी का संकेत हो सकता है; 14 अगस्त तक बिहार में चलेगा विशेष अभियान
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अभियान के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान कर रहे हैं। जिन लोगों में टीबी के शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं, उन्हें तुरंत जांच के लिए निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र भेजा जा रहा है। सरकार का मानना है कि जितनी जल्दी मरीज की पहचान होगी, उतनी ही जल्दी उसका इलाज शुरू होगा और संक्रमण के फैलाव को रोका जा सकेगा।
टीबी मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करने वाली संक्रामक बीमारी है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने के दौरान हवा में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि यदि एक मरीज की समय पर पहचान नहीं हो पाती, तो वह अपने परिवार और आसपास के लोगों के लिए भी संक्रमण का कारण बन सकता है। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक रहने वाली खांसी को सामान्य मौसमी बीमारी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
बिहार में चल रहे विशेष अभियान के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों, शहरी बस्तियों, घनी आबादी वाले इलाकों और ऐसे समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अपेक्षाकृत कम है। आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सेविकाएं, एएनएम, जीविका समूह और अन्य स्वास्थ्यकर्मी लोगों से सीधे संपर्क कर टीबी के लक्षणों की जानकारी दे रहे हैं तथा संदिग्ध मरीजों को जांच के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि आर्थिक कारण किसी व्यक्ति के इलाज में बाधा न बनें। राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर टीबी की जांच पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध है। आवश्यकता पड़ने पर बलगम की जांच, छाती का एक्स-रे और आधुनिक मॉलिक्यूलर परीक्षण भी किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति में टीबी की पुष्टि होती है, तो उसे पूरा उपचार और आवश्यक दवाएं भी बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराई जाती हैं।
टीबी के उपचार में दवाओं के साथ पौष्टिक भोजन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत टीबी मरीजों को इलाज की अवधि के दौरान प्रतिमाह 1,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज संतुलित एवं पौष्टिक भोजन ले सके और उपचार के दौरान शारीरिक कमजोरी से उबर सके।
स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक खांसी रहती है, बलगम में खून आता है, सीने में दर्द होता है, बिना कारण वजन तेजी से कम हो रहा है, लगातार बुखार बना रहता है या रात में अत्यधिक पसीना आता है, तो उसे तुरंत निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाकर जांच करानी चाहिए। शुरुआती अवस्था में बीमारी की पहचान होने पर इलाज अधिक प्रभावी होता है और मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी को लेकर समाज में आज भी कई भ्रांतियां मौजूद हैं। कई लोग सामाजिक संकोच या बदनामी के डर से बीमारी छिपाते हैं, जबकि कुछ मरीज बीच में ही दवा लेना बंद कर देते हैं। यह स्थिति न केवल मरीज के लिए खतरनाक होती है, बल्कि संक्रमण के प्रसार और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी विकसित होने का खतरा भी बढ़ा देती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा का पूरा कोर्स पूरा करना अत्यंत आवश्यक है।
प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित स्वास्थ्य आंदोलन है। पंचायत प्रतिनिधि, स्थानीय जनप्रतिनिधि, स्वयंसेवी संस्थाएं, सामाजिक संगठन और आम नागरिक यदि अपने आसपास लंबे समय से खांसी से पीड़ित लोगों को जांच कराने के लिए प्रेरित करें, तो बड़ी संख्या में छिपे हुए मरीजों की पहचान संभव हो सकती है। इससे न केवल मरीजों का जीवन सुरक्षित होगा, बल्कि समुदाय में संक्रमण की श्रृंखला भी टूटेगी।
बिहार में 14 अगस्त तक चलने वाला यह विशेष स्क्रीनिंग अभियान लोगों को एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है—**टीबी छिपाने की नहीं, समय पर इलाज कराने की बीमारी है।** जागरूकता, समय पर जांच, नियमित दवा, पौष्टिक भोजन और समाज के सहयोग से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यदि प्रत्येक नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाए और शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से ले, तो टीबी मुक्त बिहार और टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य निश्चित रूप से अधिक मजबूत आधार प्राप्त करेगा।
आलोक कुमार