Bihar : एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

 


एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

पटना। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चाय में एक चम्मच चीनी कम की जाए या ज्यादा। बचत जरूरी है, मितव्ययिता भी जरूरी है और संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब देश और समाज के सामने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति जैसे गंभीर सवाल खड़े हों, तब पत्रकारिता का दायरा केवल व्यक्तिगत बचत की सलाह तक सीमित नहीं रह सकता।

पत्रकार रूबिका लियाकत की ओर से एक चम्मच चीनी बचाने की बात कही गई है। इस सलाह को बचत के सामान्य संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के संदर्भ में इससे कहीं बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या मीडिया जनता की छोटी-छोटी बचत पर बात करने के साथ-साथ उन बड़ी नीतियों और व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जिनका सीधा असर करोड़ों परिवारों की आय और खर्च पर पड़ता है?

यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता की असली भूमिका सामने आती है।

पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है

पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है।

सरकार कोई योजना घोषित करती है तो पत्रकार का सवाल होना चाहिए कि योजना का लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा। बजट में शिक्षा के लिए राशि बढ़ती है तो सवाल होना चाहिए कि स्कूलों में उसका असर दिखाई क्यों नहीं देता। किसानों के लिए योजनाएं बनती हैं तो यह देखना जरूरी है कि किसान की लागत और आय में वास्तविक बदलाव कितना आया।

अगर बेरोजगारी पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं तो पत्रकार को रोजगार के आंकड़ों, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करनी चाहिए।

किसी नेता ने क्या कहा, यह खबर हो सकती है; लेकिन उसने जो कहा, वह सच कितना है—यह पत्रकारिता का बड़ा सवाल है।

स्टूडियो से बाहर निकलने की जरूरत

आज मीडिया का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो, डिजिटल स्क्रीन और सोशल मीडिया की तेज रफ्तार के बीच काम कर रहा है। कुछ मिनटों की बहस में कई बड़े मुद्दे उठते हैं और अगले दिन कोई नया मुद्दा उनकी जगह ले लेता है।

समस्या यह है कि जमीनी पत्रकारिता में समय लगता है।

किसी गांव में सरकारी योजना की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वहां जाना पड़ता है। लाभार्थियों से बात करनी पड़ती है। सरकारी दस्तावेज देखने पड़ते हैं। अधिकारियों से सवाल पूछने पड़ते हैं और कई बार अलग-अलग स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करनी पड़ती है।

यही मेहनत खबर को केवल बयान से रिपोर्ट में बदलती है।

कैमरे के सामने जोर से बोलना आसान हो सकता है, लेकिन दस्तावेज के आधार पर सत्ता से कठिन सवाल पूछना पत्रकारिता की असली परीक्षा है।

जनता की छोटी बचत और बड़ी आर्थिक परेशानी

एक परिवार अगर चीनी, बिजली, पानी या किसी अन्य घरेलू खर्च में थोड़ी बचत करता है तो निश्चित रूप से उसके बजट पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ऐसी बचत से परिवार की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो जाएगा?

यदि परिवार की आय सीमित है और खाद्य पदार्थ, शिक्षा, इलाज, किराया, परिवहन तथा खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो समस्या केवल खर्च कम करने की नहीं है।

यहां पत्रकारिता को व्यापक तस्वीर सामने रखनी चाहिए।

एक किसान को खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर कितना खर्च करना पड़ रहा है? उसकी फसल किस कीमत पर बिक रही है? एक बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कितना पैसा खर्च कर रहा है? एक गरीब परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज के बावजूद दवाओं पर कितना खर्च कर रहा है?

ये वे सवाल हैं जिनका जवाब जनता के घरेलू बजट से जुड़ा है।

सत्ता से सवाल पूछना सरकार विरोध नहीं

सरकार से सवाल पूछना अक्सर राजनीतिक विरोध के रूप में देखा जाने लगता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।

पत्रकार का काम सरकार का विरोध करना नहीं है। लेकिन उसका काम सरकार की घोषणाओं और नीतियों की स्वतंत्र जांच करना जरूर है।

अगर कोई सरकारी योजना सफल है तो पत्रकार को उसकी सफलता भी दिखानी चाहिए। अगर किसी योजना में कमी है तो उस कमी को भी सामने लाना चाहिए।

इसी तरह विपक्ष के दावों की भी जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खबर किस राजनीतिक पक्ष के पक्ष में जा रही है। पैमाना यह होना चाहिए कि तथ्य क्या कहते हैं।

आर्थिक और राजनीतिक दबाव की चुनौती

मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव की चर्चा नई नहीं है। विज्ञापन, कारोबारी हित, दर्शकों की संख्या, डिजिटल ट्रैफिक और राजनीतिक संबंधों का प्रभाव पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।

लेकिन इन चुनौतियों के बीच पत्रकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बनी रहती है।

हर खबर में सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता नहीं है। उसी तरह हर सरकारी दावे को बिना जांच स्वीकार कर लेना भी पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवाल तथ्य आधारित होना चाहिए। आलोचना करनी हो तो प्रमाण के साथ करनी चाहिए। आरोप लगाना हो तो संबंधित पक्ष का जवाब भी लेना चाहिए।

बेबाक पत्रकारिता और जिम्मेदार पत्रकारिता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

सोशल मीडिया के दौर में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी

आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल से वीडियो बनाकर सूचना साझा कर सकता है। सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना का खतरा भी बढ़ा है।

यही कारण है कि पेशेवर पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

पत्रकार को वायरल दावे को खबर बनाने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। तस्वीर पुरानी है या नई, बयान पूरा है या काटकर प्रस्तुत किया गया है, आंकड़ा किस स्रोत से आया है और सरकारी दावा जमीन पर कितना सही है—इन सबकी जांच जरूरी है।

तेज खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीय खबर है।

स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका

बड़ी राष्ट्रीय खबरों के बीच स्थानीय समस्याएं अक्सर दब जाती हैं। लेकिन आम नागरिक के जीवन पर सबसे सीधा असर स्थानीय प्रशासन, स्कूल, अस्पताल, सड़क, राशन, बिजली, पानी, रोजगार और कृषि व्यवस्था का होता है।

इसलिए स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की पहली पंक्ति है।

किसी गांव के स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, किसी अस्पताल में दवा नहीं है, किसी किसान को भुगतान नहीं मिला या किसी सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचा—ये खबरें छोटी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है।

पत्रकारिता को शोर नहीं, पड़ताल चाहिए

आज खबरों की दुनिया में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। क्लिक, व्यू और वायरल होने की होड़ में कभी-कभी गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, पड़ताल में है।

एक अच्छी रिपोर्ट किसी सरकारी फाइल और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच का अंतर दिखा सकती है। एक खोजी रिपोर्ट वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी सामने ला सकती है। एक स्थानीय रिपोर्ट किसी अधिकारी को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है।

यही पत्रकारिता की सामाजिक उपयोगिता है।

असली सवाल चीनी नहीं, पत्रकारिता की मिठास है

एक चम्मच चीनी बचाने की सलाह पर बहस अपनी जगह हो सकती है। बचत की आदत परिवार के बजट के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन पत्रकारिता के सामने इससे कहीं बड़ा सवाल है।

क्या हम जनता की आवाज को उतनी ही मजबूती से लिख रहे हैं, जितनी मजबूती से सत्ता के बयान प्रसारित करते हैं?

क्या हम किसान की लागत पूछ रहे हैं? क्या हम बेरोजगार युवा की बेचैनी समझ रहे हैं? क्या हम सरकारी स्कूल और अस्पताल की वास्तविक स्थिति देख रहे हैं? क्या हम योजनाओं के आंकड़ों के पीछे छिपी जमीनी सच्चाई तलाश रहे हैं?

पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाज को यह बताना नहीं कि उसे अपनी चाय कितनी मीठी रखनी चाहिए। पत्रकारिता को यह भी पूछना होगा कि उसके जीवन में महंगाई, बेरोजगारी और असमानता की कड़वाहट क्यों बढ़ रही है।

क्योंकि अगर पत्रकार सवाल पूछना छोड़ दे, अगर मीडिया सत्ता से जवाब मांगना बंद कर दे और अगर खबर केवल बयान दोहराने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

एक चम्मच चीनी बचाने से चाय की मिठास बदल सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मिठास तभी बचेगी जब पत्रकारिता सच बोलने और सत्ता से सवाल पूछने का साहस बचाए रखे।


आलोक कुमार


Bihar : छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

 

छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जमीन का आकार भले छोटा हो, लेकिन परिवार की आय, भोजन और रोजगार का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा होता है। ऐसे किसानों के लिए खेती की सफलता केवल अच्छे बीज और खाद पर निर्भर नहीं करती। सबसे जरूरी जरूरत है—समय पर, पर्याप्त और किफायती सिंचाई

बारिश सामान्य रही तो किसान की उम्मीद बढ़ती है, लेकिन मानसून में देरी, लंबे सूखे अंतराल या जरूरत से ज्यादा बारिश पूरी फसल की योजना बिगाड़ सकती है। बड़े किसान किसी हद तक निजी नलकूप, पंपसेट या अन्य साधनों से इस जोखिम को संभाल लेते हैं। छोटे किसान के पास ऐसे विकल्प सीमित होते हैं।

इसलिए सिंचाई का सवाल केवल खेत में पानी पहुंचाने का विषय नहीं है। यह किसान की लागत, फसल के चुनाव, उत्पादन, जोखिम और अंततः उसकी आय से सीधे जुड़ा हुआ है।

बारिश पर निर्भरता अब भी बड़ी मजबूरी

बिहार में मानसून कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। खरीफ मौसम में धान सहित कई फसलों के लिए बारिश की भूमिका बड़ी होती है। लेकिन बारिश कब होगी, कितनी होगी और कितने अंतराल पर होगी, इसका भरोसा किसान के पास नहीं होता।

कई बार लगातार बारिश से खेतों में जलभराव हो जाता है तो कभी बारिश रुकने से फसल को तत्काल पानी की जरूरत पड़ती है। ऐसी स्थिति में जिसके पास अपनी सिंचाई व्यवस्था नहीं है, उसे दूसरे किसान के नलकूप या पंपसेट पर निर्भर रहना पड़ता है।

यहीं से खेती की लागत बढ़ने लगती है। किसान को पानी खरीदना पड़ सकता है, पंप किराये पर लेना पड़ सकता है और खेत तक पानी पहुंचाने के लिए अतिरिक्त पाइप या मजदूरी का खर्च उठाना पड़ सकता है।

निजी नलकूप हर छोटे किसान की पहुंच में नहीं

ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूप और पंपसेट सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन हैं। लेकिन इन्हें स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी चाहिए। बोरिंग, पंप, पाइप, बिजली कनेक्शन और रखरखाव पर होने वाला खर्च छोटे किसान के लिए बड़ा निवेश हो सकता है।

जिस किसान के पास सीमित जमीन है, उसके सामने यह सवाल रहता है कि महंगे सिंचाई उपकरण पर पैसा लगाने से उसकी लागत कितनी बढ़ेगी और निवेश की भरपाई कब होगी।

यही कारण है कि कई छोटे किसान आसपास के किसानों की सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। इससे पानी की उपलब्धता और कीमत दोनों उनके नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

डीजल पंप खेती को महंगा बनाते हैं

जहां कृषि बिजली की पर्याप्त सुविधा नहीं है, वहां डीजल पंप किसानों के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनते हैं। लेकिन डीजल, मशीन किराया, ऑपरेटर की मजदूरी और खेत तक पानी पहुंचाने का खर्च मिलकर सिंचाई को महंगा बना सकता है।

समस्या तब और गंभीर होती है जब एक ही फसल में कई बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। हर बार किसान को अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। अगर उसी समय बाजार में फसल का भाव कमजोर हो जाए तो किसान की आय पर दोहरा दबाव पड़ता है।

इसलिए सिंचाई नीति में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि पानी उपलब्ध है या नहीं। यह भी देखना होगा कि किसान को वह पानी कितनी लागत पर मिल रहा है।

बिजली कनेक्शन से आगे की जरूरत

ग्रामीण इलाकों में बिजली का विस्तार हुआ है, लेकिन कृषि के लिए बिजली की उपलब्धता और उसकी नियमितता अलग विषय है। किसान को जिस समय खेत में पानी की जरूरत हो, उसी समय बिजली उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।

यदि बिजली अनियमित हो या सिंचाई के लिए सुविधाजनक समय पर उपलब्ध न हो तो किसान को वैकल्पिक रूप से डीजल पंप का सहारा लेना पड़ सकता है।

इसलिए कृषि बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल कनेक्शन की संख्या से नहीं होना चाहिए। विश्वसनीय आपूर्ति, उचित समय और कम लागत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

नहर बनी तो क्या अंतिम खेत तक पानी पहुंचा?

नहरें बिहार में सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। जहां नहरों से पर्याप्त पानी मिलता है, वहां किसान निजी पंप और डीजल पर निर्भरता कम कर सकता है।

लेकिन किसी नहर का निर्माण हो जाना और उसके अंतिम छोर तक नियमित पानी पहुंचना दो अलग बातें हैं। रखरखाव की कमी, गाद जमा होना, टूट-फूट या स्थानीय स्तर पर वितरण की समस्या के कारण कई बार उपलब्ध पानी का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।

इसलिए सरकारी सिंचाई परियोजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि कितने खेतों को नियमित और पर्याप्त पानी मिल रहा है।

सामुदायिक सिंचाई छोटे किसानों के लिए उपयोगी मॉडल

छोटे किसान अकेले महंगा नलकूप या सोलर पंप लगाने में सक्षम नहीं हो सकते। ऐसे में सामुदायिक सिंचाई व्यवस्था एक व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।

गांव के किसानों का समूह मिलकर सामुदायिक नलकूप, सोलर पंप या छोटी सिंचाई परियोजना चला सकता है। उपकरण का खर्च साझा किया जा सकता है और पानी के उपयोग के आधार पर शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।

इस मॉडल की सफलता के लिए पारदर्शिता जरूरी है। किस किसान को कब पानी मिलेगा, कितना शुल्क लगेगा और खराब उपकरण की मरम्मत कौन कराएगा—इन सभी सवालों के स्पष्ट नियम होने चाहिए।

सौर ऊर्जा से घट सकता है सिंचाई का खर्च

सौर ऊर्जा आधारित पंप ग्रामीण सिंचाई के लिए संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है या डीजल पर खर्च अधिक होता है, वहां सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

लेकिन छोटे किसानों के लिए शुरुआती निवेश अब भी चुनौती है। इसलिए केवल व्यक्तिगत सोलर पंप पर जोर देने के बजाय सामुदायिक सोलर सिंचाई मॉडल पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

साथ ही भूजल के अत्यधिक दोहन से बचना जरूरी है। सस्ता पानी उपलब्ध कराने की कोशिश ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में भूजल स्तर गंभीर रूप से प्रभावित हो।

पुराने जलस्रोतों का पुनर्जीवन क्यों जरूरी?

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब, आहर-पईन और अन्य पारंपरिक जलस्रोत कभी स्थानीय जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। इनके संरक्षण और पुनर्जीवन से बारिश के पानी को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और सिंचाई के लिए स्थानीय संसाधन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

वर्षा जल संचयन और खेतों में पानी रोकने की व्यवस्था भी छोटे किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे सिंचाई का दबाव कम करने के साथ-साथ पानी की बर्बादी रोकने में भी मदद मिलेगी।

सिंचाई बेहतर होगी तो फसल का विकल्प भी बढ़ेगा

सिंचाई की अनिश्चितता किसान के फसल चुनाव को भी प्रभावित करती है। जिस किसान को पानी की गारंटी नहीं है, वह अधिक जोखिम वाली या अधिक पानी मांगने वाली फसल लेने से बच सकता है।

अगर नियमित सिंचाई उपलब्ध हो तो किसान सब्जियों, दलहन, तेलहन और अन्य मूल्यवान फसलों की ओर भी बढ़ सकता है। इससे खेती से आय बढ़ाने की संभावना बन सकती है।

हालांकि फसल विविधीकरण के साथ बाजार, भंडारण और उचित कीमत की व्यवस्था भी जरूरी है। केवल पानी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा।

सिंचाई का मतलब किसान की आर्थिक सुरक्षा

छोटे किसान के लिए सिंचाई की समस्या इसलिए बड़ी है क्योंकि उसके पास पानी, पूंजी और बाजार—तीनों पर सीमित नियंत्रण होता है। बारिश पर अत्यधिक निर्भरता खेती को जोखिमपूर्ण बनाती है और निजी सिंचाई व्यवस्था कई बार उसकी लागत बढ़ा देती है।

इस चुनौती का समाधान केवल नए नलकूप लगाने में नहीं है। अंतिम खेत तक पानी पहुंचाना, कृषि बिजली को भरोसेमंद बनाना, नहरों का प्रभावी रखरखाव, पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण, सामुदायिक सिंचाई, सौर ऊर्जा और भूजल प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

किसान के खेत में सही समय पर पानी पहुंचना केवल कृषि सुविधा नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक सुरक्षा है। जब किसान को हर फसल के लिए आसमान की ओर देखने की मजबूरी कम होगी, तब खेती अधिक सुरक्षित होगी।

बिहार के कृषि भविष्य का असली सवाल यही है—क्या ऐसी सिंचाई व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें छोटे किसान भी बिना अत्यधिक कर्ज और अतिरिक्त लागत के समय पर अपने खेत तक पानी पहुंचा सकें?

अगर इसका जवाब हां में देना है, तो सिंचाई को केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि किसान की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत के रूप में देखना होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल

बिहार के किसानों की लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ती दूरी: खेत में मेहनत किसान की, कीमत तय करने की ताकत किसकी?

पटना। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल है। गांवों कीबड़ी आबादी खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी, मंडी कारोबार और उससे जुड़े छोटे व्यवसायों पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन, सब्जियां और फल जैसी फसलें किसानों की आय का प्रमुख साधन हैं। लेकिन कृषि की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फसल पैदा करने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसान को मिलने वाला बाजार भाव कई बार उसकी उम्मीद के अनुरूप नहीं होता।

यही अंतर बिहार के किसान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। खेती में जोखिम किसान का है, मौसम का असर किसान झेलता है, उत्पादन की लागत किसान उठाता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी कीमत तय करने की ताकत अक्सर उसके हाथ में नहीं रहती।

बीज से बाजार तक बढ़ता खर्च

आज खेती पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। खेत की जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, कृषि मशीनरी और फसल को बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। जिन किसानों के पास अपनी मशीन या सिंचाई का साधन नहीं है, उनके लिए लागत और बढ़ जाती है।

इसके अलावा प्राकृतिक जोखिम भी कम नहीं हुए हैं। कभी अत्यधिक बारिश, कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी फसल में रोग किसानों की पूरी गणित बिगाड़ देते हैं। किसान पहले से यह निश्चित नहीं कर सकता कि मौसम उसके साथ कितना सहयोग करेगा।

छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति और कठिन है। सीमित पूंजी के कारण उन्हें खेती के लिए कई बार उधार लेना पड़ता है। फसल तैयार होने के बाद कर्ज चुकाने, अगली फसल की तैयारी करने और परिवार का खर्च चलाने का दबाव सामने होता है। ऐसे में बाजार भाव कम होने के बावजूद किसान अपनी उपज रोककर रखने की स्थिति में नहीं होता।

फसल तैयार होते ही क्यों गिर जाता है किसान का विकल्प?

किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय वह होता है जब फसल बाजार में पहुंचती है। यदि उस समय कीमत अच्छी है तो उसकी पूरी साल की मेहनत कुछ हद तक सफल हो सकती है। लेकिन कीमत गिर गई तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।

इसका एक बड़ा कारण भंडारण की सीमित सुविधा है। जिसके पास पर्याप्त गोदाम या सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था नहीं है, वह लंबे समय तक फसल रोक नहीं सकता। उसे जल्दी बिक्री करनी पड़ती है।

यहीं किसान की मजबूरी उसकी सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करती है।

शहर में उपभोक्ता किसी कृषि उत्पाद के लिए अधिक कीमत चुका सकता है, लेकिन खेत से निकलने वाली वही उपज किसान को अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है। परिवहन, छंटाई, पैकेजिंग, थोक कारोबार और खुदरा बिक्री के अलग-अलग खर्च इसमें जुड़ते हैं। सवाल यह है कि इस पूरी मूल्य-श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी कैसे बढ़ाई जाए?

केवल बिचौलिये को दोष देना समाधान नहीं

किसानों को कम कीमत मिलने की चर्चा होते ही बिचौलियों का नाम सामने आता है। लेकिन समस्या को केवल बिचौलियों तक सीमित करना कृषि बाजार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

असल सवाल यह है कि किसान के पास विकल्प कितने हैं।

यदि किसान के आसपास कई खरीदार हों, उसे अलग-अलग बाजारों के भाव की जानकारी हो, उसकी उपज रखने के लिए गोदाम हो और परिवहन की सुविधा उपलब्ध हो, तो वह बेहतर कीमत के लिए बातचीत कर सकता है।

इसके विपरीत यदि गांव में एक-दो खरीदार ही उपलब्ध हैं और किसान के पास फसल रखने की सुविधा नहीं है, तो उसकी स्थिति कमजोर हो जाती है। इसलिए कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ किसान की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है।

एमएसपी की घोषणा और वास्तविक बिक्री में अंतर

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। लेकिन किसी फसल का एमएसपी घोषित होना और प्रत्येक किसान का अपनी पूरी उपज उस कीमत पर बेच पाना अलग-अलग बातें हैं।

किसान के लिए वास्तविक सुरक्षा तभी बनेगी जब खरीद व्यवस्था उसके नजदीक हो, खरीद प्रक्रिया स्पष्ट हो और भुगतान समय पर मिले। सरकारी खरीद केंद्रों की पहुंच, उनकी सक्रियता और खरीद की समयबद्धता इसलिए महत्वपूर्ण है।

बिहार में किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है जिसमें सरकारी खरीद का लाभ केवल कागज पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से खेत और गांव तक पहुंचे।

मक्का और सब्जी उत्पादकों की परेशानी अलग

मक्का जैसे उत्पादों के किसानों को बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। वहीं सब्जी उत्पादकों की समस्या और भी संवेदनशील है क्योंकि उनकी फसल जल्दी खराब हो सकती है।

टमाटर, फूलगोभी, भिंडी और हरी सब्जियों की कीमत किसी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने पर अचानक गिर सकती है। किसान के सामने ऐसी स्थिति में मुश्किल विकल्प होता है—कम कीमत पर बेच दे या फसल खराब होने का खतरा उठाए।

इस समस्या का समाधान केवल अधिक उत्पादन नहीं है। ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, ग्रेडिंग सेंटर, प्रसंस्करण इकाइयां और स्थानीय खाद्य उद्योग विकसित करने की जरूरत है। इससे किसान को अपनी उपज तुरंत बेचने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

एफपीओ से बढ़ सकती है किसानों की ताकत

एक छोटा किसान अकेले बाजार में बड़ी मात्रा में उपज बेचने वाले कारोबारी से बराबरी की बातचीत नहीं कर पाता। लेकिन कई किसान मिलकर किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ बनाएं तो स्थिति बदल सकती है।

सामूहिक खरीद से इनपुट की लागत कम करने, सामूहिक बिक्री से बेहतर कीमत प्राप्त करने और ग्रेडिंग-पैकेजिंग जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ती है।

हालांकि केवल एफपीओ बना देना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें बाजार की जानकारी, प्रशिक्षित प्रबंधन, कार्यशील पूंजी और बड़े खरीदारों से सीधे संपर्क की जरूरत है।

मोबाइल पर भाव की जानकारी से आगे बढ़ना होगा

आज किसान के हाथ में मोबाइल फोन है। अलग-अलग बाजारों की कीमतों की जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो सकती है। लेकिन सूचना तभी उपयोगी है जब किसान उसके आधार पर वास्तविक व्यापारिक निर्णय ले सके।

किसान को यह पता होना चाहिए कि उसकी उपज की कीमत अलग-अलग बाजारों में कितनी है, वहां तक परिवहन का खर्च कितना आएगा और किस खरीदार से बेहतर सौदा संभव है।

इसलिए भविष्य की कृषि व्यवस्था में डिजिटल जानकारी को डिजिटल बाजार और वास्तविक बिक्री व्यवस्था से जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

कृषि नीति का अंतिम पैमाना किसान की शुद्ध आय हो

कृषि विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सभी खर्च निकालने के बाद उसके पास कितना पैसा बचा।

यदि उत्पादन बढ़ता है लेकिन लागत भी उसी गति से बढ़ती है और किसान की शुद्ध आय नहीं बढ़ती, तो कृषि विकास अधूरा माना जाएगा।

बिहार में कृषि नीति को किसान की वास्तविक आय से जोड़ने की जरूरत है। सस्ती सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, सामूहिक खरीद, बेहतर ग्रामीण सड़क, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और पारदर्शी बाजार व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।

किसान को सिर्फ उत्पादक नहीं, बाजार का भागीदार बनाना होगा

बिहार के किसान की चुनौती केवल खेत तक सीमित नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि फसल बाजार तक पहुंचने के बाद उसके पास कितने विकल्प हैं।

किसान को केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसे लागत कम करने, जोखिम घटाने और बेहतर कीमत प्राप्त करने के साधन भी देने होंगे।

अगर किसान के पास भंडारण की सुविधा हो, बाजार की सही जानकारी हो, कई खरीदारों तक पहुंच हो और सामूहिक रूप से बिक्री करने की क्षमता हो तो उसकी सौदेबाजी मजबूत होगी।

आखिरकार कृषि की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खेत से कितनी फसल निकली। सवाल यह होना चाहिए कि उस फसल से किसान की शुद्ध आय कितनी बढ़ी

बिहार के कृषि भविष्य के लिए यही सबसे बड़ा सवाल है—क्या ऐसी बाजार व्यवस्था तैयार की जा सकती है जिसमें किसान अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर न हो, बल्कि सही समय और सही कीमत चुनने के लिए उसके पास पर्याप्त विकल्प हों?

कृषि तभी टिकाऊ बनेगी जब खेत की मेहनत का उचित हिस्सा किसान की जेब तक पहुंचे।


आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...