एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत
पटना। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चाय में एक चम्मच चीनी कम की जाए या ज्यादा। बचत जरूरी है, मितव्ययिता भी जरूरी है और संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब देश और समाज के सामने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति जैसे गंभीर सवाल खड़े हों, तब पत्रकारिता का दायरा केवल व्यक्तिगत बचत की सलाह तक सीमित नहीं रह सकता।
पत्रकार रूबिका लियाकत की ओर से एक चम्मच चीनी बचाने की बात कही गई है। इस सलाह को बचत के सामान्य संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के संदर्भ में इससे कहीं बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या मीडिया जनता की छोटी-छोटी बचत पर बात करने के साथ-साथ उन बड़ी नीतियों और व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जिनका सीधा असर करोड़ों परिवारों की आय और खर्च पर पड़ता है?
यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता की असली भूमिका सामने आती है।
पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है
पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है।
सरकार कोई योजना घोषित करती है तो पत्रकार का सवाल होना चाहिए कि योजना का लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा। बजट में शिक्षा के लिए राशि बढ़ती है तो सवाल होना चाहिए कि स्कूलों में उसका असर दिखाई क्यों नहीं देता। किसानों के लिए योजनाएं बनती हैं तो यह देखना जरूरी है कि किसान की लागत और आय में वास्तविक बदलाव कितना आया।
अगर बेरोजगारी पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं तो पत्रकार को रोजगार के आंकड़ों, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करनी चाहिए।
किसी नेता ने क्या कहा, यह खबर हो सकती है; लेकिन उसने जो कहा, वह सच कितना है—यह पत्रकारिता का बड़ा सवाल है।
स्टूडियो से बाहर निकलने की जरूरत
आज मीडिया का बड़ा हिस्सा टीवी स्टूडियो, डिजिटल स्क्रीन और सोशल मीडिया की तेज रफ्तार के बीच काम कर रहा है। कुछ मिनटों की बहस में कई बड़े मुद्दे उठते हैं और अगले दिन कोई नया मुद्दा उनकी जगह ले लेता है।
समस्या यह है कि जमीनी पत्रकारिता में समय लगता है।
किसी गांव में सरकारी योजना की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वहां जाना पड़ता है। लाभार्थियों से बात करनी पड़ती है। सरकारी दस्तावेज देखने पड़ते हैं। अधिकारियों से सवाल पूछने पड़ते हैं और कई बार अलग-अलग स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करनी पड़ती है।
यही मेहनत खबर को केवल बयान से रिपोर्ट में बदलती है।
कैमरे के सामने जोर से बोलना आसान हो सकता है, लेकिन दस्तावेज के आधार पर सत्ता से कठिन सवाल पूछना पत्रकारिता की असली परीक्षा है।
जनता की छोटी बचत और बड़ी आर्थिक परेशानी
एक परिवार अगर चीनी, बिजली, पानी या किसी अन्य घरेलू खर्च में थोड़ी बचत करता है तो निश्चित रूप से उसके बजट पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल ऐसी बचत से परिवार की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो जाएगा?
यदि परिवार की आय सीमित है और खाद्य पदार्थ, शिक्षा, इलाज, किराया, परिवहन तथा खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो समस्या केवल खर्च कम करने की नहीं है।
यहां पत्रकारिता को व्यापक तस्वीर सामने रखनी चाहिए।
एक किसान को खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर कितना खर्च करना पड़ रहा है? उसकी फसल किस कीमत पर बिक रही है? एक बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कितना पैसा खर्च कर रहा है? एक गरीब परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज के बावजूद दवाओं पर कितना खर्च कर रहा है?
ये वे सवाल हैं जिनका जवाब जनता के घरेलू बजट से जुड़ा है।
सत्ता से सवाल पूछना सरकार विरोध नहीं
सरकार से सवाल पूछना अक्सर राजनीतिक विरोध के रूप में देखा जाने लगता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।
पत्रकार का काम सरकार का विरोध करना नहीं है। लेकिन उसका काम सरकार की घोषणाओं और नीतियों की स्वतंत्र जांच करना जरूर है।
अगर कोई सरकारी योजना सफल है तो पत्रकार को उसकी सफलता भी दिखानी चाहिए। अगर किसी योजना में कमी है तो उस कमी को भी सामने लाना चाहिए।
इसी तरह विपक्ष के दावों की भी जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खबर किस राजनीतिक पक्ष के पक्ष में जा रही है। पैमाना यह होना चाहिए कि तथ्य क्या कहते हैं।
आर्थिक और राजनीतिक दबाव की चुनौती
मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव की चर्चा नई नहीं है। विज्ञापन, कारोबारी हित, दर्शकों की संख्या, डिजिटल ट्रैफिक और राजनीतिक संबंधों का प्रभाव पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर सकता है।
लेकिन इन चुनौतियों के बीच पत्रकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बनी रहती है।
हर खबर में सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता नहीं है। उसी तरह हर सरकारी दावे को बिना जांच स्वीकार कर लेना भी पत्रकारिता नहीं है।
पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवाल तथ्य आधारित होना चाहिए। आलोचना करनी हो तो प्रमाण के साथ करनी चाहिए। आरोप लगाना हो तो संबंधित पक्ष का जवाब भी लेना चाहिए।
बेबाक पत्रकारिता और जिम्मेदार पत्रकारिता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
सोशल मीडिया के दौर में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी
आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल से वीडियो बनाकर सूचना साझा कर सकता है। सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना का खतरा भी बढ़ा है।
यही कारण है कि पेशेवर पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
पत्रकार को वायरल दावे को खबर बनाने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। तस्वीर पुरानी है या नई, बयान पूरा है या काटकर प्रस्तुत किया गया है, आंकड़ा किस स्रोत से आया है और सरकारी दावा जमीन पर कितना सही है—इन सबकी जांच जरूरी है।
तेज खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीय खबर है।
स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका
बड़ी राष्ट्रीय खबरों के बीच स्थानीय समस्याएं अक्सर दब जाती हैं। लेकिन आम नागरिक के जीवन पर सबसे सीधा असर स्थानीय प्रशासन, स्कूल, अस्पताल, सड़क, राशन, बिजली, पानी, रोजगार और कृषि व्यवस्था का होता है।
इसलिए स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की पहली पंक्ति है।
किसी गांव के स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, किसी अस्पताल में दवा नहीं है, किसी किसान को भुगतान नहीं मिला या किसी सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचा—ये खबरें छोटी दिखाई दे सकती हैं, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है।
पत्रकारिता को शोर नहीं, पड़ताल चाहिए
आज खबरों की दुनिया में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। क्लिक, व्यू और वायरल होने की होड़ में कभी-कभी गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, पड़ताल में है।
एक अच्छी रिपोर्ट किसी सरकारी फाइल और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच का अंतर दिखा सकती है। एक खोजी रिपोर्ट वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी सामने ला सकती है। एक स्थानीय रिपोर्ट किसी अधिकारी को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है।
यही पत्रकारिता की सामाजिक उपयोगिता है।
असली सवाल चीनी नहीं, पत्रकारिता की मिठास है
एक चम्मच चीनी बचाने की सलाह पर बहस अपनी जगह हो सकती है। बचत की आदत परिवार के बजट के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन पत्रकारिता के सामने इससे कहीं बड़ा सवाल है।
क्या हम जनता की आवाज को उतनी ही मजबूती से लिख रहे हैं, जितनी मजबूती से सत्ता के बयान प्रसारित करते हैं?
क्या हम किसान की लागत पूछ रहे हैं? क्या हम बेरोजगार युवा की बेचैनी समझ रहे हैं? क्या हम सरकारी स्कूल और अस्पताल की वास्तविक स्थिति देख रहे हैं? क्या हम योजनाओं के आंकड़ों के पीछे छिपी जमीनी सच्चाई तलाश रहे हैं?
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाज को यह बताना नहीं कि उसे अपनी चाय कितनी मीठी रखनी चाहिए। पत्रकारिता को यह भी पूछना होगा कि उसके जीवन में महंगाई, बेरोजगारी और असमानता की कड़वाहट क्यों बढ़ रही है।
क्योंकि अगर पत्रकार सवाल पूछना छोड़ दे, अगर मीडिया सत्ता से जवाब मांगना बंद कर दे और अगर खबर केवल बयान दोहराने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
एक चम्मच चीनी बचाने से चाय की मिठास बदल सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मिठास तभी बचेगी जब पत्रकारिता सच बोलने और सत्ता से सवाल पूछने का साहस बचाए रखे।
आलोक कुमार