अपने राजनीतिक जीवन में लगभग 5–6 बार बड़े स्तर पर गठबंधन बदले
रिपोर्टः आलोक कुमार
नीतीश कुमार बिहार की राजनीति का ऐसा केंद्रीय चेहरा हैं, जिनके बिना राज्य की सत्ता की कहानी अधूरी मानी जाती है। पिछले ढाई दशकों में उन्होंने जितनी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और जितनी बार राजनीतिक गठबंधन बदले, वह उन्हें भारतीय राजनीति के सबसे अनोखे और चर्चित नेताओं में शामिल करता है। “पलटीमार” और “सुशासन बाबू” जैसे परस्पर विरोधी विशेषणों के बीच उनका राजनीतिक जीवन लगातार बहस और विश्लेषण का विषय बना रहा है।नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1970 के दशक के जेपी आंदोलन से शुरू हुआ, जिसने उन्हें समाजवादी विचारधारा से जोड़ा। शुरुआती दौर में वे लालू प्रसाद यादव के साथ जनता दल में सक्रिय रहे। लेकिन 1994 में उन्होंने लालू से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी का गठन किया। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली बड़ी “पलटी” मानी जाती है, जिसने उनके स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व की नींव रखी।
साल 2005 उनके राजनीतिक करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जनता दल (यूनाइटेड) और भाजपा के गठबंधन ने चुनाव जीता और वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार उन्होंने न केवल पूरा कार्यकाल पूरा किया, बल्कि “सुशासन” की छवि भी गढ़ी। 2010 में भारी बहुमत के साथ तीसरी बार सत्ता में वापसी ने इस छवि को और मजबूत किया। सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था में सुधार उनके शासन की पहचान बने।
हालांकि, 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध करते हुए उन्होंने एनडीए से अलग होने का फैसला किया—यह उनकी दूसरी बड़ी “पलटी” थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया, जो उनके करियर का कठिन दौर था।
2015 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा और बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 2017 में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्होंने अचानक महागठबंधन छोड़कर फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली—यह उनकी तीसरी बड़ी “पलटी” थी।
2020 में वे एनडीए के साथ फिर सत्ता में आए और सातवीं बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2022 में भाजपा से मतभेद के चलते उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया और एक बार फिर महागठबंधन में शामिल हो गए। इस बार उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई और आठवीं बार मुख्यमंत्री बने।
जनवरी 2024 में उन्होंने फिर राजनीतिक समीकरण बदला और महागठबंधन छोड़कर एनडीए में वापसी कर ली। इसके साथ ही वे नौवीं बार मुख्यमंत्री बने। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया।
अगर “पलटी” की बात करें, तो नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में लगभग 5–6 बार बड़े स्तर पर गठबंधन बदले हैं। हर बार इसके पीछे अलग-अलग कारण रहे—कभी वैचारिक मतभेद, कभी भ्रष्टाचार के आरोप, तो कभी राजनीतिक अस्तित्व बचाने की रणनीति। आलोचक इसे अवसरवाद कहते हैं, जबकि समर्थक इसे व्यावहारिक राजनीति और परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता मानते हैं।
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा अहम रहे हैं। कुर्मी-कोइरी, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलित समुदायों को साधने में नीतीश कुमार ने विशेष सफलता हासिल की। महिलाओं के लिए शराबबंदी, साइकिल योजना और “जीविका” जैसे कार्यक्रमों ने उनकी सामाजिक पकड़ को मजबूत किया।
हालांकि, उनके शासन पर सवाल भी उठते रहे हैं। बेरोजगारी, औद्योगिक विकास की कमी और युवाओं का पलायन आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। बार-बार गठबंधन बदलने से राजनीतिक अस्थिरता के आरोप भी लगते रहे हैं। इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि 2005 से पहले का बिहार और आज का बिहार कई मायनों में अलग दिखता है। कानून-व्यवस्था, सड़क और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार ने राज्य की छवि बदली है।
कुल मिलाकर, नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन रणनीति, अवसर और परिस्थितियों का एक अनोखा मिश्रण है। उन्होंने कई बार “पलटी” मारी, लेकिन हर बार सत्ता में वापसी की। 10 बार मुख्यमंत्री बनना महज संयोग नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक समझ, लचीलापन और अनुकूलन क्षमता का प्रमाण है। भविष्य चाहे जो भी हो, बिहार की राजनीति में उनका नाम एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में लंबे समय तक दर्ज रहेगा।
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