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चुल्लू से गिलास तक: क्या आज़ाद भारत में छुआछूत अब भी ज़िंदा है?

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  चुल्लू से गिलास तक: क्या आज़ाद भारत में छुआछूत अब भी ज़िंदा है? भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है.हमारा संविधान समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात करता है.लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इन आदर्शों से टकराती नज़र आती है. आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी यदि किसी नागरिक को जाति के आधार पर गिलास में पानी न मिले, तो यह सिर्फ सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि संविधान पर सीधा प्रहार है. डॉ. अंबेडकर और ‘चुल्लू’ की पीड़ा यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने अपने बचपन और युवावस्था में गंभीर जातिगत भेदभाव झेला.1900 के दशक की शुरुआत में उन्हें और उनके भाई-बहनों को स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर पानी तक नहीं दिया जाता था. कई बार उन्हें अपने हाथों को कप की तरह बनाकर—जिसे आम भाषा में ‘चुल्लू’ कहा जाता है—पानी पीना पड़ता था, या फिर किसी ऊँची जाति के व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता था, जो ऊपर से उनके हाथों में पानी डालता था.यह अपमान केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि उस दौर की कठोर जाति व्यवस्था का प्रतीक था. महाड़ सत्याग्रह: पानी नहीं, सम्मान की लड़ाई      ...