चुल्लू से गिलास तक: क्या आज़ाद भारत में छुआछूत अब भी ज़िंदा है?
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है.हमारा संविधान समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात करता है.लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इन आदर्शों से टकराती नज़र आती है. आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी यदि किसी नागरिक को जाति के आधार पर गिलास में पानी न मिले, तो यह सिर्फ सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि संविधान पर सीधा प्रहार है.
डॉ. अंबेडकर और ‘चुल्लू’ की पीड़ा
यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने अपने बचपन और युवावस्था में गंभीर जातिगत भेदभाव झेला.1900 के दशक की शुरुआत में उन्हें और उनके भाई-बहनों को स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर पानी तक नहीं दिया जाता था. कई बार उन्हें अपने हाथों को कप की तरह बनाकर—जिसे आम भाषा में ‘चुल्लू’ कहा जाता है—पानी पीना पड़ता था, या फिर किसी ऊँची जाति के व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता था, जो ऊपर से उनके हाथों में पानी डालता था.यह अपमान केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि उस दौर की कठोर जाति व्यवस्था का प्रतीक था.
महाड़ सत्याग्रह: पानी नहीं, सम्मान की लड़ाई डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में 20 मार्च 1927 को हुआ महाड़ सत्याग्रह (चावदार तालाब आंदोलन) केवल पानी पीने का आंदोलन नहीं था.यह दलितों के मानवीय सम्मान और समान नागरिक अधिकार की लड़ाई थी.बाद में 1945 में बंबई हाई कोर्ट ने इस अधिकार को कानूनी मान्यता दी और दलितों को सार्वजनिक जल स्रोतों के उपयोग का अधिकार मिला.संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत को अपराध घोषित कर दिया गया.फिर सवाल उठता है—अगर कानून स्पष्ट है, तो ज़मीनी सच्चाई इतनी अलग क्यों है?
आज भी ज़िंदा है वही सोच चिंगारी प्राइम न्यूज़ के पत्रकार आलोक कुमार एक दिन जलेबी खरीदने एक दुकान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक डोम समुदाय के व्यक्ति को दुकानदार ने गिलास में पानी देने से इनकार कर दिया.पानी जग से गिराया जा रहा था और वह व्यक्ति ‘चुल्लू’ से पानी पीने को मजबूर था.जब आलोक कुमार ने इसका विरोध किया और गिलास में पानी देने को कहा, तो दुकानदार का जवाब चौंकाने वाला था—“यह डोम है। गिलास में पानी देंगे तो लोग भड़क जाएंगे। मेरा व्यवसाय चौपट हो जाएगा.”यह सोच बताती है कि समस्या कानून की नहीं, मानसिकता की है.
संविधान बनाम सामाजिक डर दुकानदार को जब बताया गया कि छुआछूत खत्म हो चुकी है और सभी को समान अधिकार हैं, तो उसने साफ कह दिया—“यह सब यहाँ नहीं चलेगा, और न चलने देंगे.”यह बयान इस सच्चाई को उजागर करता है कि आज भी कई जगह संविधान से ज़्यादा सामाजिक दबाव और जातिगत डर हावी है.
शांतिपूर्ण विरोध और बदलाव की शुरुआत इस घटना के बाद आलोक कुमार ने डोम राजा और उनके परिवार के साथ बैठक कर निर्णय लिया कि इस अन्याय के खिलाफ संगठित और शांतिपूर्ण तरीके से आवाज़ उठाई जाएगी.कार्यक्रम की जानकारी जिला प्रशासन, मुखिया और मीडिया को लिखित रूप में दी गई.3 दिसंबर, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती के दिन, इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया.डोम समाज के लोगों को फूलों की माला पहनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की गई.जहाँ पहले विरोध हुआ, वहीं प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप के बाद गिलास में पानी और चाय दी गई.बांसकोठी पहुँचने पर भी किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ। दुकानदार ने पूर्ववत व्यवहार नहीं किया और सम्मानजनक ढंग से सेवा दी.
यह जीत छोटी नहीं है यह घटना दिखाती है कि जब अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई जाती है, तो बदलाव संभव है.यह लड़ाई सिर्फ पानी या चाय के गिलास की नहीं थी—यह सम्मान, बराबरी और संविधान के सम्मान की लड़ाई थी.
निष्कर्ष डॉ. अंबेडकर ने जिस भारत का सपना देखा था, वह सिर्फ कागज़ों पर नहीं, व्यवहार में भी बराबरी चाहता है.जब तक किसी भी नागरिक को जाति के नाम पर ‘चुल्लू’ और ‘गिलास’ में फर्क झेलना पड़ेगा, तब तक यह मानना कठिन है कि सामाजिक न्याय पूरी तरह स्थापित हो चुका है.आज ज़रूरत है कानून से ज़्यादा संवेदनशीलता, जागरूकता और साहस की.क्योंकि सच्चा लोकतंत्र वही है, जहाँ हर इंसान बिना डर और भेदभाव के गिलास उठाकर पानी पी सके.
आलोक कुमार
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