शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला

 

फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला: सवाल सिर्फ सूचना का नहीं, भरोसे का है

डिजिटल युग में सूचना जितनी तेज़ी से फैलती है, उतनी ही तेजी से भ्रम भी फैलता है. आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया जिस सबसे खतरनाक चुनौती से जूझ रही है, वह है फेक न्यूज़. यह सिर्फ झूठी खबरों का मामला नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और आम नागरिक के विवेक पर सीधा हमला बन चुका है.


एक समय था जब खबरें अख़बारों और टीवी चैनलों से छनकर आती थीं. संपादक की ज़िम्मेदारी, संस्थान की साख और पत्रकारिता के नियम खबरों की विश्वसनीयता तय करते थे. लेकिन सोशल मीडिया के दौर में हर हाथ में कैमरा है, हर अकाउंट एक “न्यूज़ चैनल” बन गया है और हर अफवाह “ब्रेकिंग न्यूज़”.

फेक न्यूज़: अफवाह से हथियार तक

फेक न्यूज़ अब सिर्फ गलत जानकारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है। चुनाव प्रभावित करने से लेकर धार्मिक तनाव भड़काने तक, भीड़ को उकसाने से लेकर किसी व्यक्ति की छवि तबाह करने तक—झूठी खबरें हर जगह इस्तेमाल हो रही हैं.

व्हाट्सऐप फॉरवर्ड, फेसबुक पोस्ट, एक्स (ट्विटर) ट्रेंड और यूट्यूब वीडियो—इन सबके जरिए झूठ को इस तरह पेश किया जाता है कि वह सच से ज़्यादा विश्वसनीय लगने लगता है. सबसे खतरनाक बात यह है कि फेक न्यूज़ अक्सर हमारी भावनाओं को निशाना बनाती है—धर्म, जाति, राष्ट्रवाद, डर और गुस्सा.

लोकतंत्र पर सीधा खतरा

लोकतंत्र की बुनियाद सही सूचना और जागरूक नागरिक पर टिकी होती है. जब नागरिक को ही ग़लत जानकारी दी जाए, तो उसका निर्णय भी ग़लत होगा. फेक न्यूज़ चुनावों को प्रभावित कर सकती है, जनमत को मोड़ सकती है और सरकारों पर अविश्वास पैदा कर सकती है.

आज राजनीतिक दलों से लेकर ट्रोल आर्मी तक, सब इस खेल में शामिल हैं। सवाल यह नहीं कि फेक न्यूज़ कौन फैला रहा है, सवाल यह है कि क्यों फैल रही है और किसके फायदे के लिए।

मीडिया की साख पर सवाल

फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसने मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता को भी कमजोर किया है. जब झूठ और सच एक ही स्क्रीन पर, एक ही फॉन्ट में दिखाई दें, तो आम दर्शक भ्रमित हो जाता है.

कुछ मीडिया संस्थान टीआरपी और क्लिक की दौड़ में बिना जांच-पड़ताल के खबरें चलाने लगे हैं। नतीजा यह कि असली पत्रकारिता और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

सरकार, कानून और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

सरकारें कानून बनाने की बात करती हैं, सोशल मीडिया कंपनियां गाइडलाइंस की. लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कानून से फेक न्यूज़ रुकेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के जरिए वही कंटेंट आगे बढ़ाते हैं, जो ज्यादा भावनात्मक और उत्तेजक हो. और फेक न्यूज़ इस पैमाने पर पूरी तरह फिट बैठती है.

असली जिम्मेदारी किसकी?

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी कानून बनाए.

मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यपरक पत्रकारिता करे.

सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे गलत सूचना पर लगाम लगाएं.

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की है.

हर फॉरवर्ड सच नहीं होता.

हर वायरल वीडियो सच्चाई नहीं होता.

हर हेडलाइन खबर नहीं होती.

समाधान क्या है?

फेक न्यूज़ के खिलाफ लड़ाई किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की लड़ाई है.

मीडिया साक्षरता को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए

खबर साझा करने से पहले स्रोत की जांच की जाए

भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया न दी जाए

जिम्मेदार पत्रकारिता को समर्थन दिया जाए

निष्कर्ष: सच की लड़ाई लंबी है, लेकिन ज़रूरी है

फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा हथियार हमारा डर और हमारी जल्दबाज़ी है। अगर हम रुककर सोचें, जांचें और समझें, तो आधी लड़ाई वहीं खत्म हो जाती है।

लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने से नहीं चलता,

वह सच जानने और सच बोलने से चलता है.

आज ज़रूरत है कि हम खबरों के उपभोक्ता नहीं,

जिम्मेदार नागरिक बनें

क्योंकि जब सच हारता है,

तो सिर्फ खबर नहीं मरती—

लोकतंत्र घायल होता है.

आलोक कुमार

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