मध्यम वर्ग: न आँकड़ों में गिना गया, न नीतियों में सुना गया
देश की आर्थिक बहस में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है—“आम आदमी”.
लेकिन जब नीतियों और फैसलों की बात आती है, तो यही आम आदमी सबसे ज़्यादा अनदेखा रह जाता है। इस अनदेखी का सबसे बड़ा शिकार बना है भारत का मध्यम वर्ग—जो न गरीबी रेखा में गिना जाता है और न ही समृद्धि की श्रेणी में आता है.
मेहनत, उम्मीद और समझौता
मध्यम वर्ग रोज़ मेहनत करता है, टैक्स देता है और भविष्य के सपने बुनता है। वह अपनी आय से घर चलाता है, बच्चों को पढ़ाता है और बुज़ुर्गों की देखभाल करता है—बिना किसी विशेष सहारे के.यह वही वर्ग है जिसे योजनाओं के लिए “ज़्यादा अमीर” और राहत के लिए “कमज़ोर नहीं” माना जाता है.
सब्सिडी से बाहर, राहत से दूर
सस्ती गैस, मुफ्त इलाज या शिक्षा में बड़ी राहत—अक्सर मध्यम वर्ग के हिस्से नहीं आती। बढ़ती महंगाई के बीच वह हर ज़रूरत बाज़ार कीमत पर पूरी करता है.
आय बनाम खर्च का असंतुलन
वेतन वृद्धि की रफ्तार महंगाई से पीछे है। किराया, स्कूल फीस, स्वास्थ्य बीमा और रोज़मर्रा की सेवाएँ—सब महंगी होती जा रही हैं। इसका सीधा असर जीवन स्तर पर पड़ता है.
सपनों पर कैंची
नई कार की जगह सेकंड-हैंड वाहन, विदेश यात्रा की जगह घरेलू ज़िम्मेदारियाँ—मध्यम वर्ग शिकायत नहीं करता, बस चुपचाप एडजस्ट करता है.
मानसिक दबाव, जो आँकड़ों में नहीं
हर महीने बजट बैठाना, हर खर्च से पहले दो बार सोचना—यह स्थायी तनाव किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होता, लेकिन हर घर में महसूस होता है.
नीतियों में क्यों गायब?
नीतियाँ अक्सर गरीबी उन्मूलन और विकास के दो छोरों पर केंद्रित रहती हैं. बीच में खड़ा मध्यम वर्ग नीति-निर्माण में जगह नहीं बना पाता.
आगे का रास्ता
आयकर ढांचे में वास्तविक सुधार
शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च पर नियंत्रण
शहरी मध्यम वर्ग के लिए लक्षित योजनाएँ
रोज़गार व कौशल-आधारित अवसर
निष्कर्ष:
मध्यम वर्ग न सिस्टम के खिलाफ खड़ा होता है, न सड़कों पर उतरता है। वह बस चाहता है कि उसकी मेहनत की क़ीमत समझी जाए—और उसकी चुप्पी को सहमति न माना जाए.
आलोक कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/