“सराय में जगह नहीं थी…” से “कब्रिस्तान में जगह नहीं है…” तक — एक करुण सामाजिक यथार्थ
ईसाई धर्मग्रंथों के अनुसार, येसु मसीह का जन्म बेथलहम में एक गोशाला (या गुफा) में हुआ था. कारण बेहद सरल और उतना ही मार्मिक था—जोसेफ और मरियम के ठहरने के लिए सराय में कोई स्थान उपलब्ध नहीं था. जन्म के बाद मरियम ने बालक येसु को कपड़ों में लपेटकर चरनी में सुला दिया, वही चरनी जहाँ पशुओं का चारा रखा जाता था.
यही घटना ईसाई समुदाय के लिए 25 दिसंबर को मनाए जाने वाले ‘क्रिसमस’ का आधार बनी. लेकिन क्रिसमस केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, यह ईश्वर के मनुष्य रूप में धरती पर अवतरण का प्रतीक है—त्याग, करुणा, विनम्रता और मानवता का संदेश.विडंबना यह है कि यही ऐतिहासिक सत्य आज हमारे समाज में एक नई और पीड़ादायक शक्ल में सामने खड़ा है.आज “सराय में जगह नहीं थी” की वही पीड़ा “कब्रिस्तान में जगह नहीं है” के रूप में कुर्जी पल्ली क्षेत्र में महसूस की जा रही है.
कब्रिस्तान में जगह, सम्मान का सवाल
कुर्जी पल्ली क्षेत्र में रहने वाले लोगों की मृत्यु के बाद उन्हें दफनाने के लिए कुर्जी कब्रिस्तान में स्थान की भारी कमी हो चुकी है.यह समस्या केवल जगह की नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने के अधिकार से जुड़ी हुई है.
इस कब्रिस्तान में वर्षों से आरक्षित कब्र (Reserved Grave) की व्यवस्था चली आ रही है. इस व्यवस्था के अंतर्गत कई परिवार अपने जीवनकाल में ही कब्र आरक्षित कर लेते हैं, ताकि भविष्य में परिजनों को दफनाने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो.लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था स्वयं संकट का कारण बनती जा रही है.
एक कड़वा सामाजिक विरोधाभास
एक विडंबनापूर्ण सच यह भी है कि जीवित अवस्था में ईसाई समुदाय को शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार या प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में कोई विशेष सामाजिक आरक्षण प्राप्त नहीं है, लेकिन मृत्यु के बाद कब्रिस्तान में आरक्षण सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है.
यह प्रश्न केवल ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं है—यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जो जीवन से अधिक मृत्यु की योजनाओं में उलझ गई है.
जब संवेदना ने व्यवस्था को आईना दिखाया
यह समस्या हाल ही में उस समय अत्यंत भावुक मोड़ पर पहुंच गई, जब संत जेवियर हाई स्कूल और संत माइकल हाई स्कूल के प्रख्यात खेल शिक्षक जेफ डिकोस्टा का निधन हुआ.
कुर्जी कब्रिस्तान में आरक्षित कब्र उपलब्ध न होने के कारण यह घोषणा की गई कि उन्हें राजधानी पटना के पीरमुहानी कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा.कुर्जी पल्ली में मिस्सा के बाद पार्थिव शरीर को पीरमुहानी ले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी.लेकिन तभी एक ऐसा क्षण सामने आया, जिसने इस पूरी व्यवस्था को मानवीय संवेदना के सामने छोटा कर दिया.
जब मानवता सबसे बड़ा समाधान बनी
एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक व्यक्ति ने अपनी आरक्षित कब्र जेफ डिकोस्टा के परिजनों को दान कर दी. यह निर्णय केवल एक परिवार की पीड़ा कम करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के लिए एक गहरा संदेश बन गया.इस मानवीय निर्णय के कारण जेफ डिकोस्टा को अंततः कुर्जी कब्रिस्तान में ही सम्मानपूर्वक दफनाया जा सका.जब व्यवस्थाएँ असफल होती हैं, तब मानवता ही अंतिम सहारा बनती है—यह घटना इसका जीवंत प्रमाण है.
संदेश साफ़ है
यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की अंतिम यात्रा की कहानी नहीं है.
यह एक व्यवस्था की विफलता की कहानी है.
यह समाज की संवेदनशीलता की परीक्षा है.
और अंततः, यह मानवता की जीत की कथा है.
जहाँ कभी येसु मसीह के जन्म के समय सराय में जगह नहीं थी,
आज उसी सभ्यता में लोगों के लिए कब्रिस्तान में जगह नहीं है.
और फिर भी—
जब एक इंसान, दूसरे इंसान के लिए जगह बना देता है,
तभी सच्चा धर्म जीवित रहता है.
आलोक कुमार
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