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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस

                                          देश के विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने में योगदान 

 


29 अप्रैल का दिन इतिहास, संस्कृति, विज्ञान और वैश्विक जागरूकता के कई महत्वपूर्ण आयामों से जुड़ा हुआ है। यह दिन न केवल अतीत की घटनाओं को याद करने का अवसर देता है, बल्कि वर्तमान समाज को प्रेरित करने और भविष्य के लिए दिशा तय करने का भी माध्यम बनता है। आइए 29 अप्रैल के विशेष महत्व को विभिन्न पहलुओं में विस्तार से समझते हैं।

सबसे पहले, 29 अप्रैल को विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (International Dance Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत UNESCO से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य नृत्य कला को बढ़ावा देना, लोगों को इसके प्रति जागरूक करना और विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करना है। इस दिन दुनिया भर में नृत्य से जुड़े कार्यक्रम, कार्यशालाएं और प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं। यह दिन महान फ्रांसीसी नृत्यकार Jean-Georges Noverre की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्हें आधुनिक बैले का जनक माना जाता है।

भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन और विविधतापूर्ण है। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य और भांगड़ा, गरबा, झूमर जैसे लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में 29 अप्रैल का यह दिवस भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

इतिहास के पन्नों में भी 29 अप्रैल कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। 1945 में इसी दिन Adolf Hitler ने अपनी लंबे समय की साथी Eva Braun से विवाह किया था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों की एक चर्चित घटना है। यह घटना युद्ध के अंत और नाजी शासन के पतन का प्रतीक मानी जाती है। इसके अगले ही दिन हिटलर ने आत्महत्या कर ली थी, जिससे विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

भारत के संदर्भ में भी यह दिन कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और उसके बाद भी इस दिन विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां हुई हैं, जिन्होंने देश के विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने में योगदान दिया। हालांकि 29 अप्रैल से जुड़ी कोई एक बड़ी राष्ट्रीय घटना विशेष रूप से प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन यह दिन हमें उन अनगिनत प्रयासों की याद दिलाता है जो देश निर्माण में निरंतर जारी रहे।

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी 29 अप्रैल का महत्व कम नहीं है। इस दिन कई वैज्ञानिकों और नवाचारों से जुड़े घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने मानव जीवन को सरल और उन्नत बनाने में भूमिका निभाई। यह दिन हमें विज्ञान के महत्व को समझने और नई खोजों के प्रति उत्सुक रहने की प्रेरणा देता है।

इसके अलावा, 29 अप्रैल को कई प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्मदिन और पुण्यतिथि भी मनाई जाती है। ये महान लोग विभिन्न क्षेत्रों—जैसे साहित्य, कला, राजनीति और खेल—में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं। इनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ संकल्प और मेहनत से सफलता प्राप्त की जा सकती है।

सामाजिक दृष्टिकोण से भी 29 अप्रैल का महत्व है। यह दिन हमें कला, संस्कृति और इतिहास के प्रति संवेदनशील बनाता है। साथ ही यह हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम अपनी परंपराओं को कैसे सहेज सकते हैं और उन्हें नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचा सकते हैं। आज के आधुनिक और तकनीकी युग में जहां लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे दिवस हमें अपनी पहचान से जोड़ने का काम करते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी इस दिन का विशेष महत्व है। स्कूलों और कॉलेजों में नृत्य, कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर छात्रों को रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे न केवल उनकी प्रतिभा निखरती है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता की भावना भी विकसित होती है।

अंततः, 29 अप्रैल केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दिन है जो हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं—कला, इतिहास, विज्ञान और समाज—के प्रति जागरूक करता है। यह दिन हमें अतीत से सीख लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, 29 अप्रैल का महत्व बहुआयामी है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए कला, ज्ञान और इतिहास का समन्वय कितना आवश्यक है। इसलिए हमें इस दिन को केवल एक सामान्य दिन की तरह नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक अवसर के रूप में देखना चाहिए, जो हमें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आलोक कुमार

रविवार, 22 जून 2014

जब विदेश जाकर 2020 के बारे में राजगोपाल,पुष्पा और अनीस ने गहन मंथन किए


P. V. Rajgopal, Aneesh and Pushpa 
पटना। आजकल यूरोपीय भ्रमण में एकता परिषद के संस्थापक पी.व्ही.राजगोपाल, एकता महिला मंच की अध्यक्ष पुष्पा सिंह और एकता परिषद के राष्ट्रीय संचालन समिति के सदस्य अनीस हैं। इनके साथ फ्रांस के जुलियस उर्फ मामा जी भी हैं। मेहमान और मेजबान मिलकर ऐतिहासिक सत्याग्रह जनांदोलन को सफल बनाने की कवायद में जुट हुए हैं। हालांकि 6 साल सत्याग्रह होने को बाकी है। फिर भी तैयारी करना जरूरी है। साल 2020 में 10 मिलियन लोगों को सड़क पर उतारने का प्रयास है।
सर्वविदित है कि जन संगठन  एकता परिषद के संस्थापक और जाने-माने विख्यात गांधीवादी नेता पी.व्ही.राजगोपाल जी ने वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए गांवघर की ओर चलने का आह्वान किया है। सरकार महानगरों और शहरों के कथित विकास को ही विकास मानती हैं। जो गांवघर में ठहर गए हैं उनकी हालत सोचनीय और दर्दनीय है। आजादी के 66 साल के बाद भी दरकिनार रहकर ही पड़े हुए हैं। हालांकि सरकारी योजनाएं बनी है। मगर पहुंच के बाहर है। आज जरूरत है कि लोग गांवघर में जाकर ग्रामीण लोगों को संगठित करें और उनको योजनाओं के बारे में जानकारी दें और योजनाओं से लाभान्वित लेने के लिए आवाज बुलंद करवाएं। योजनाओं पर ग्रामीणों का अधिकार है। उसके लिए आवाज उठाने की जरूरत है।
गांधीवादी नेता राजगोपाल जी के आह्वान पर लोगचलो गांव की ओरकदम बढ़ाना शुरू कर दिए है। हालांकि लोग गांव जाते ही थे। मगर विशेष सोच लेकर चल पड़ रहे हैं। गांव की हो जमीन, गांव का भी हो लगान, गांव को सशक्त बनाना, गांव से पलायन बंद कर देना, गांव में रोजगार का सृजन करना, गांव के लोग खुद्दार बन सके, गांव के लोगों को छोटे-बड़े रोजगार उपलब्ध कराना आदि को लेकर व्यापक तैयारी की जा रही है।इसको लेकर देश-प्रदेश-विदेश में बैठकों की दौर शुरू है। इस समय स्वीट्जरलैंड में बैठक की जा रही हैं। वहां के लोगों से जनसर्म्पक करके 2020 को सफल बनाने में योगदान करने का आग्रह किया जा रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार बैठके सकारात्मक ढंग से हो रही है। वंचित समुदाय की जंग में शामिल होने का आश्वासन दे रहे हैं।
ज्ञातत्व है कि देश में भूमि अधिकार को लेकर जनांदोलन हुआ है। साल 2007 में 25 हजार की संख्या में और साल 2012 में 75 हजार लोग सत्याग्रह पदयात्रा किए। पांव-पांव चले। एक पहर भोजन किए। सड़क पर सो गए। सड़क ही आश्रय बन गया। इस बीच एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक प्रदीप प्रियदर्शी ने यूरोपीय भ्रमण पर निकले साथियों को शुभकामनाएं दी है। अपने मकसद में सफल होकर लौंटे।
आलोक कुमार

शनिवार, 21 जून 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पुतला फूंकने का सिलसिला शुरू




पटना। रेल किराये में वृद्धिदेश  हित में उठाया गया कठोर कदमहै। केंद्र सरकार ने रेल भाड़े में वृद्धि का ऐलान कर दिया है। रेल मंत्रालय के ऐलान के बाद मालभाड़े में करीब 6.4 फीसद की वृद्धि की गई है और रेल किराए को 14.2 फीसद बढ़ा दिया गया है। बढ़ा हुआ रेल किराया 25 जून से लागू हो जाएगा। इसकी घोषणा रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने की है।
आज रेलवे धन की कमी से जूझ रही है। पूंजी जुटाने के लिए यात्री किराए एवं मालभाड़े में बढ़ोतरी का प्रस्ताव लंबित था, सरकार के आज के इस कदम से रेलवे को तकरीबन 800 करोड़ का लाभ होगा,जो की देश की वर्तमान स्थिति को सुद्रिड बनाये रखने के लिए आवश्यक है।यूपीए सरकार ने यह वृद्धि करने की घोषणा की थी लेकिन चुनाव घोषित होने के बाद इसको लागू नहीं किया गया था।
देशवासियों को समय-समय पर नेताओं के द्वारा नारा दिया जाता है। उस नारा के मायावी जाल में लोग उलझकर रह जाते हैं। गरीबी दूर करना। संपूर्ण क्रांति।सामाजिक न्याय।फील गुड।  सुशासन सरकार।भारत नव निर्माण  के बाद बीजेपी ने अब अच्छे दिन आएंगे का नारा बुलंद किया। अब अच्छे दिन आएंगे की राह मजबूूती करने के संदर्भ में रेल किराये में भारी वृद्धि  के विरोध में स्वर मुखरित होने लगे। आज का दिन प्रधानमंत्री और बीजेपी के लिए ब्लैक फ्राइडे साबित हुआ। प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद पहली बार बिहार में पीएम नरेन्द्र मोदी जी का पुतला फूंका गया। यह कारनामा पटना के कारगिल चौक में किया गया। वहीं बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष कुमार आशीष ने कहा कि बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार के द्वारा अप्रत्याशित रेल किराये बढ़ाने के विरोध में कल शनिवार को पूरे प्रदेश में मोदी और रेल मंत्री का पुतला दहन करेगी और २३ जून को एक दिवसीय जिला स्तरीय रेलवे प्लेटफार्म के समक्ष धरना देगी। आम लोगों का आह्वान किया गया है कि इस आंदोलन में भाग लेकर आंदोलन को धारधार बनायं।
रेल किराये में बढ़ोतरी करने पर प्रतिक्रिया स्वरूप गणेश तिवारी कहते हैं कि दावे के मुताबिक चुनाव अभियान के दौरान उस समय के पीएम पद के दावेदार ने चार हजार से अधिक सभाओं को सम्बोधित किया तो कम कम बीस हजार बार महंगाई की चर्चा होगी। दावे ऐसे कि बस पीएम बना दो महंगाई ख़त्म। लेकिन पीएम बनते ही कहर ढाना शुरू हो गया है। रेल यात्री किराया,माल भाड़ा बढ़ा दिए। अब तो महंगाई को पंख लग जाएंगे। मोतियाबिंद के शिकार मोदी भक्तों को इसमें भी अच्छा ही नजर आएगा, रेलवे में शत-प्रतिशत एफडीआई भी शीघ्र ही हो जाएगा। रेल जब निजी हाथों में होगा तो किराए-भाड़े की स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अम्बानी को गैस की कीमत बढ़ाने की अनुमति कितनी जल्दी दी गई- सबको मालूम है। सीएजी नाटक करेगा तो पद और प्रक्रिया को ख़त्म कर देने में इनको कितना समय लगेगा। अच्छा हुआअच्छे दिन जल्दी-जल्दी रहे हैं
बिहार एथलेटिक एसोसिएशन के मीडिया प्रभारी ऋषिकेश नारायण सिंह ने कहा कि रेल किराया बढ़ाना जनविरोधी कदम नहीं है, जनविरोधी कदम सुविधा कम करना है। अगर रेवले का इतिहास देखा जाये तो रेलवे ने लगातार सुविधा में कटौती की है। रेलवे का असली गुनाह सुविधा कम करना है, किराया बढाना तो व्यावसायिक कदम है। मोदी सरकार को किराया बदहने के साथ-साथ सुविधा बढाने की भी घोषणा करनी चाहिए थी। सिर्फ किराया बढ़ाने की घोषणा उचित नहीं है।
आम लोगों का मत यह भी है कि नीतीश कुमार,लालू प्रसाद यादव ,ममता बनर्जी और  पवन बसंल ने भारतीय रेल को जर्जर बनाया है इनके कार्यकाल में रेलवे मंत्रालय को क्षेत्रीय बनाकर रख दिया गया। रेल मंत्री क्षेत्रवाद के जाल में फंसकर रह गए। अब कयास लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार और रेलमंत्री मिलकर रेलवे मंत्रालय में आवश्यक सुधार लाकर रेलवे टिकट सबके लिए हर वक्त उपलब्ध करवाएंगे। दो महीने पहले रिजर्वेशन कराने से मुक्ति देंगे। टिकट दलालों से देश की जनता को मुक्ति दिलवाएंगे।रेल गाड़ियों की संख्या में वृद्धि करवाएंगे।रेल टाइम पर चलवाएंगे। ट्रेन में मिलने वाले खाने को बेहतर से बेहतर उपलब्ध करवाएंगे। हमारी रेल यात्रा सुरक्षित करवाने में सफल होंगे। किसी हादसे के बाद रेल मंत्री जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देंगे और रेलवे स्टेशन पर कुलियों और दलालों से मुक्ति दिलवाएंगे।
महरूम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की रात में आपातकालीन स्थिति की घोषणा की थीं। नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेल भाड़ा में बढ़ोतरी कर लोगों के साथ अन्याय किया है। मोदी सरकार ने रेल किराए में 14.2 प्रतिशत और माल भाड़ा में 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी गयी है। इसे 25 जून 2014 से लागू किया जाएगा। तब सभी लोगों ने आपातकालीन स्थिति की आलोचना किए थे। इसी के साथ सत्ता परिवर्तन भी हुआ था। अभी मोदी सरकार ने कांग्रेस को पटकनी देकर सत्तासीन हुए हैं। फिर भी आवाज बुलंद कर ही सकते हैं। कि आने वाले दिन अच्छे नहीं होने वाले है।
आलोक कुमार