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परंपरागत ‘मुसीबत भजन’ विलुप्त होने के कगार पर

 

परंपरागत ‘मुसीबत भजन’ विलुप्त होने के कगार पर, फिर भी बेतिया के लोग बचाने में जुटे

परिचय

समय के साथ समाज में कई परंपराएं और सांस्कृतिक विरासतें धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। आधुनिकता और नए संगीत के दौर में कई पारंपरिक भजन और लोकधुनें अब सुनाई कम देने लगी हैं। ऐसी ही एक परंपरा है ‘मुसीबत भजन’, जो कभी ईसाई समाज में एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा हुआ करती थी।

आज यह परंपरा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। लेकिन इसके बावजूद बिहार के पश्चिम चंपारण जिले, विशेषकर बेतिया के क्रिश्चियन कॉलोनी के लोग इस परंपरा को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

क्या है ‘मुसीबत भजन’ की परंपरा

‘मुसीबत भजन’ को कई जगहों पर विपत्ति भजन या चेतावनी भजन भी कहा जाता है। यह ईसाई समाज की एक पारंपरिक धार्मिक गायन परंपरा है, जिसे विशेष अवसरों पर गाया जाता था।

इन भजनों के माध्यम से धार्मिक संदेश, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चेतावनी का संदेश दिया जाता है। पुराने समय में यह भजन विशेष रूप से लेंट अवधि के दौरान गाए जाते थे। इस अवधि में लोग आध्यात्मिक साधना, प्रार्थना और आत्मनिरीक्षण करते हैं।

आधुनिक गीतों के कारण कम हो रही परंपरा

समय के साथ संगीत और भजन शैली में काफी बदलाव आया है। आजकल चर्च और धार्मिक कार्यक्रमों में आधुनिक भजन और नए गानों का चलन बढ़ गया है।

इसके कारण पारंपरिक ‘मुसीबत भजन’ धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी के कई लोग इन भजनों से परिचित भी नहीं हैं। यही कारण है कि यह परंपरा अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है।

बेतिया के लोग कर रहे संरक्षण का प्रयास

पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया क्षेत्र में रहने वाले कुछ लोग इस परंपरा को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। खासकर क्रिश्चियन कॉलोनी के निवासी और पुराने गायक इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

वे समय-समय पर धार्मिक कार्यक्रमों में इन भजनों का गायन करते हैं और युवाओं को भी इसे सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

आल्फ्रेड पास्काल का महत्वपूर्ण योगदान

इस परंपरा को जीवित रखने में बांसकोठी क्रिश्चियन कॉलोनी के आल्फ्रेड पास्काल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

बताया जाता है कि उनके जीवनकाल में चालीस अवधि के दौरान नियमित रूप से ‘मुसीबत भजन’ का आयोजन किया जाता था। उस समय इस परंपरा को लेकर लोगों में काफी उत्साह रहता था और कई परिवार अपने घरों में भी इस भजन कार्यक्रम का आयोजन करवाते थे।

एस.के. लॉरेंस ने संभाली जिम्मेदारी

आल्फ्रेड पास्काल के निधन के बाद इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी एस.के. लॉरेंस ने अपने कंधों पर उठाई है।

पिछले लगभग डेढ़ दशक से वे लगातार इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि यह पारंपरिक भजन आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके और पूरी तरह समाप्त न हो।

सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी

आज के डिजिटल दौर में एस.के. लॉरेंस ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है।

हर साल लेंट अवधि शुरू होने से पहले वे फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से लोगों को जानकारी देते हैं। जिन परिवारों को अपने घर में ‘मुसीबत भजन’ करवाना होता है, वे अपना नाम भेजते हैं।

इसके बाद एक सूची तैयार की जाती है और उसी के आधार पर अलग-अलग घरों में जाकर भजन कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश

इस परंपरा को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि नई पीढ़ी भी इससे जुड़े। इसलिए स्थानीय गायक युवाओं को इस भजन शैली के बारे में बताते हैं और उन्हें इसे सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

उनका मानना है कि अगर युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो यह परंपरा लंबे समय तक जीवित रह सकेगी।

सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जरूरत

‘मुसीबत भजन’ केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक विरासत भी है। ऐसी परंपराएं समाज की पहचान और इतिहास को जीवित रखती हैं।

अगर इन परंपराओं को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं।

निष्कर्ष

आज के आधुनिक दौर में जहां नई-नई संगीत शैलियां लोकप्रिय हो रही हैं, वहीं कई पारंपरिक भजन और लोक परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं।


आलोक कुमार

लेकिन पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया के लोग इस परंपरा को बचाने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वह सराहनीय है। अगर समाज के अधिक लोग इस दिशा में आगे आएं तो ‘मुसीबत भजन’ जैसी परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती हैं।


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