रविवार, 11 जनवरी 2026

आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में

 “आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में”

एनएसए अजीत डोभाल के बयान ने छेड़ा आज़ादी के इतिहास पर नया विमर्श


क्या भारत की आज़ादी की कहानी वह है, जो दशकों से हमें पढ़ाई और राजनीति में सुनाई जाती रही है—या फिर इसके कुछ अध्याय अब भी अधूरे हैं? राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के हालिया बयान ने इसी सवाल को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है.

डोभाल का कहना है कि भारत को आज़ादी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के दबाव के कारण मिली.यह बयान केवल एक ऐतिहासिक व्याख्या नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्राथमिकताओं को लेकर चली आ रही बहस को नए संदर्भ और नई धार देता है.

INA बनाम अहिंसा: पुराना विवाद, नया संदर्भ                                                                                            अजीत डोभाल के तर्क के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर चले मुकदमे, 1946 का नौसेना विद्रोह और ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर पनपता असंतोष अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए खतरे की घंटी बन गया था.ब्रिटिश सत्ता को यह साफ़ संकेत मिल गया था कि अब भारत पर शासन बनाए रखना न तो सैन्य रूप से संभव है और न ही नैतिक रूप से.                                                                                                                        इसके उलट, इतिहास का एक बड़ा वर्ग मानता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने देश की जनता को अभूतपूर्व रूप से एकजुट किया. अहिंसा की इस सामूहिक शक्ति ने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को भीतर से खोखला कर दिया.

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और वैचारिक टकराव                                                                                                    डोभाल के बयान के बाद सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. समर्थकों का कहना है कि यह बयान नेताजी सुभाष चंद्र बोस और INA के योगदान को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की कोशिश है, जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया.वहीं आलोचकों का आरोप है कि इस तरह के बयान महात्मा गांधी के ऐतिहासिक योगदान को कमतर आंकने की कोशिश करते हैं और आज़ादी के संघर्ष को एक वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाते हैं.

इतिहास: एक व्यक्ति नहीं, एक समग्र संघर्ष                                                                                            हकीकत शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं है. भारत की आज़ादी न तो केवल अहिंसा की देन थी, न ही सिर्फ़ सशस्त्र संघर्ष की। यह एक बहुआयामी आंदोलन था—

गांधी की नैतिक शक्ति,

नेताजी का सैन्य दबाव,

क्रांतिकारियों का बलिदान

और करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आकांक्षा—

इन सबका सम्मिलित परिणाम.

निष्कर्ष: सवाल असहज हैं, लेकिन ज़रूरी                                                                                                 अजीत डोभाल का बयान भले ही विवादास्पद हो, लेकिन उसने एक ज़रूरी सवाल फिर सामने रख दिया है—क्या हमने आज़ादी के इतिहास को एक ही चश्मे से देखा है?और क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम उसे बहुआयामी दृष्टि से समझें?इतिहास सिर्फ़ अतीत की कहानी नहीं होता, वह वर्तमान की सोच और भविष्य की दिशा भी तय करता है. शायद इसी कारण यह बहस आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आज़ादी के समय थी.

आलोक कुमार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/

The Configure Featured Post option in Blogger allows you to highlight a selected post prominently on

How to Configure Popular Posts in Blogger The Popular Posts widget highlights your most viewed post