आज की सबसे बड़ी सच्चाई: महंगाई नहीं बढ़ी, आम आदमी की सांसें छोटी हुई हैं
आज जब सुबह एक आम नागरिक घर से निकलता है, तो उसके हाथ में सिर्फ चाबी और मोबाइल नहीं होता—उसके कंधों पर महंगाई का बोझ भी लदा होता है। दूध, सब्ज़ी, दाल, गैस, दवा, शिक्षा—ऐसा शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो, जहां दाम चुपचाप न बढ़े हों. सवाल यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है या नहीं, सवाल यह है कि क्या आम आदमी की आमदनी भी उसी रफ्तार से बढ़ी है?यही आज का सबसे बड़ा मुद्दा है। यही आज की सबसे कड़वी सच्चाई है.
आंकड़े कहते हैं “कंट्रोल में”, ज़िंदगी कहती है “मुश्किल में”
सरकारी आंकड़े अक्सर बताते हैं कि महंगाई दर “काबू में” हैलेकिन किचन का बजट कुछ और कहानी कहता है. सब्ज़ी मंडी, मेडिकल स्टोर और स्कूल की फीस—इन तीन जगहों पर खड़े होकर कोई भी समझ सकता है कि महंगाई सिर्फ प्रतिशत नहीं, अनुभव है.आज की महंगाई सबसे ज्यादा असर डाल रही है उस वर्ग पर, जो न गरीब है और न अमीर—मिडिल क्लास. न उसे सब्सिडी पूरी मिलती है, न उसकी आय इतनी है कि बढ़ते खर्च को नज़रअंदाज़ कर सके.
वेतन वहीं का वहीं, खर्च आसमान पर
नौकरीपेशा वर्ग की सैलरी साल में एक बार बढ़ती है—वो भी अगर किस्मत साथ दे.लेकिन महंगाई रोज़ बढ़ती है. बिजली का बिल, घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, और बुज़ुर्गों की दवाइयाँ—इन सबमें हर महीने “छोटी-छोटी” बढ़ोतरी होती है, जो साल के अंत तक बड़ा झटका बन जाती है.नतीजा यह है कि लोग बचत नहीं कर पा रहे,और जो कर रहे हैं, वह आपातकाल के डर से.
युवा वर्ग: सपनों और EMI के बीच फंसा
आज का युवा सिर्फ करियर नहीं बना रहा, वह EMI, क्रेडिट कार्ड और बढ़ते खर्चों से भी जूझ रहा है.घर खरीदना सपना बन गया है, शादी कर्ज़ बन गई है, और नौकरी की सुरक्षा सवाल बन गई है.महंगाई ने युवा वर्ग से सिर्फ पैसा नहीं छीना, भरोसा भी छीना है—भविष्य पर भरोसा.
ग्रामीण भारत की अलग लड़ाई
शहरों में महंगाई जेब पर असर डालती है, लेकिन गांवों में यह जीविका पर हमला करती है.किसान को फसल का सही दाम नहीं मिलता,लेकिन बीज, खाद और डीज़ल महंगे होते जा रहे हैं. ग्रामीण मज़दूरी बढ़ी है,लेकिन महंगाई उससे कहीं तेज़.इस असंतुलन का असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
सरकार की चुनौती और ज़िम्मेदारी
सरकार के लिए महंगाई सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, यह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी है.नीतियां बनती हैं, योजनाएं घोषित होती हैं, लेकिन ज़मीनी असर समय लेता है.सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ आमदनी के स्रोत भी मजबूत किए जाएं. केवल दाम रोकना काफी नहीं, कमाई बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है.बाजार, मुनाफा और नैतिकता एक कड़वा सच यह भी है कि कुछ जगहों पर महंगाई मजबूरी नहीं,मुनाफाखोरी का नतीजा है. त्योहार आते ही दाम बढ़ जाते हैं.संकट आते ही जमाखोरी शुरू हो जाती है.यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक संकट भी है.
आम आदमी क्या करे?
आम आदमी के पास विकल्प सीमित हैं, लेकिन विवेक अब भी है.खर्च की प्राथमिकता तय करना,अनावश्यक दिखावे से दूरी, और वित्तीय समझ—आज के दौर में यही बचाव के हथियार हैं.साथ ही, सवाल पूछना भी ज़रूरी है. लोकतंत्र में चुप्पी समाधान नहीं होती.
निष्कर्ष: महंगाई से बड़ी चुनौती है असमानता
आज की समस्या सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि यह है कि इसका बोझ बराबर नहीं बंट रहा.जो पहले से मजबूत हैं, वे संभल जाते हैं.जो कमजोर हैं, वे और पीछे छूट जाते हैं.आज ज़रूरत है ऐसी नीतियों की, जो सिर्फ आंकड़ों में नहीं,रसोई और जेब में राहत दें.क्योंकि जब आम आदमी थकता है, तो देश की रफ्तार भी धीमी पड़ती है.
आलोक कुमार
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