मकर संक्रांति: जब सूर्य उत्तरायण होता है और जीवन में उजास उतरता है
सर्द हवाओं के बीच जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, तिल-गुड़ की मिठास हर रिश्ते में घुलने लगती है और सूर्य देव उत्तरायण की यात्रा शुरू करते हैं—तब आता है मकर संक्रांति, एक ऐसा पर्व जो केवल त्योहार नहीं, बल्कि परिवर्तन, सकारात्मकता और नई शुरुआत का प्रतीक है.
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव है, जो धर्म, विज्ञान और प्रकृति—तीनों को एक सूत्र में पिरोता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय दिन के बड़े होने और रातों के छोटे होने का संकेत है, जबकि सांस्कृतिक रूप से यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है.
तिल-गुड़ क्यों कहते हैं ‘मीठा बोलो’?
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है. तिल शरीर को गर्मी देता है और गुड़ ऊर्जा. लेकिन इन दोनों से जुड़ा संदेश केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं—यह सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है। “तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो” का अर्थ है कि पुराने गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों में मिठास घोलो.
पतंगों में उड़ते सपने
छतों पर उड़ती पतंगें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उम्मीदों और सपनों की उड़ान हैं. हर पतंग जैसे कहती है—हौसला बुलंद रखो, डोर थामे रखो और आसमान छूने की कोशिश करते रहो.
कृषि और श्रम का उत्सव
यह पर्व किसानों के लिए भी खास है.नई फसल के आगमन के साथ यह मेहनत के फल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है. इसलिए देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पोंगल, खिचड़ी, उत्तरायण और बिहू जैसे नामों से मनाया जाता है.
संदेश जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है
मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन स्थायी है. जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी नकारात्मकता छोड़कर सकारात्मक राह चुननी चाहिए.
इस मकर संक्रांति पर संकल्प लें—
बीती कड़वाहट को पीछे छोड़ें,
रिश्तों में मिठास भरें,
और अपने सपनों को पतंग की तरह खुली उड़ान दें
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!
आलोक कुमार
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