जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं

 जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं

पटना जैसे शहर में, जहाँ हिंदी पत्रकारिता की एक मजबूत और संघर्षशील परंपरा रही है, वहाँ अख़बारों का बंद होना केवल एक कारोबारी घटना नहीं है—यह लोकतंत्र की आवाज़ के धीमे पड़ने जैसा है। पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रदीप, सर्चलाइट, आर्यावर्त, इंडियन नेशन, नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों का बंद होना पहले ही क्षेत्रीय मीडिया की ताक़त को कमजोर कर चुका था। अब राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर उस सिलसिले की एक और दुखद कड़ी बन गई है।

सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया।

दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हुई और न ही डिजिटल मंचों पर कोई खास हलचल दिखी। आज की मीडिया दुनिया क्लिक, ट्रेंड और एल्गोरिदम के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि स्थानीय और क्षेत्रीय प्रिंट पत्रकारिता की मौत चुपचाप हो रही है। शायद इसी कारण यह संकट “सामाजिक स्मृति से मिटते जाने” जैसा महसूस होता है।

यह हालात केवल पटना या बिहार तक सीमित नहीं हैं। देशभर में छोटे और मध्यम अख़बार डिजिटल विज्ञापन शिफ्ट, बढ़ती लागत और बदलती पाठक आदतों के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ जो ज़िम्मेदार, संदर्भयुक्त और ज़मीनी पत्रकारिता खत्म हो रही है, उसकी भरपाई कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं कर सकता।

आज ज़रूरत है कि इस ख़ामोशी को तोड़ा जाए। प्रभावित पत्रकारों के लिए संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास खड़े हों। क्योंकि अगर अख़बार यूँ ही बंद होते रहे, तो सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं रहेगा—लोकतंत्र की स्मृति बचाने का भी होगा

आलोक कुमार

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