नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ
यह घटना इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहाँ केवल संपत्ति की चोरी नहीं हुई, बल्कि उस पवित्र उपस्थिति का अपमान हुआ, जिसे कैथोलिक विश्वास में ईश्वर की जीवित उपस्थिति माना जाता है.भले ही प्रत्यक्ष अपवित्रता के प्रमाण न मिले हों, किंतु परमपवित्र यूखारिस्त का जबरन हटाया जाना स्वयं में एक गंभीर धार्मिक अपराध है—ऐसा अपराध, जिसकी पीड़ा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती.
इस संदर्भ में महाधर्माध्यक्ष एलियास गोंसाल्वेस का तात्कालिक पास्तोरल संदेश घटना की गंभीरता को और गहराई देता है. उनका संदेश स्पष्ट है—प्रतिशोध नहीं, प्रायश्चित; आक्रोश नहीं, आत्ममंथन.23 जनवरी को ‘तपस्या और प्रायश्चित दिवस’ घोषित कर उन्होंने यह संकेत दिया कि आस्था पर हुए हमले का उत्तर शांति, प्रार्थना और नैतिक दृढ़ता से दिया जाना चाहिए.
आज प्रश्न यह नहीं है कि चोर कौन थे, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं. क्या धार्मिक स्थलों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी है, या समाज की सामूहिक चेतना भी इसके लिए उत्तरदायी है? यह घटना हमें याद दिलाती है कि आस्था की रक्षा तलवार से नहीं, सजगता, सम्मान और संवेदनशीलता से होती है.
नागपुर की यह पीड़ा केवल एक धर्मप्रांत की नहीं है. यह उस भारत की पीड़ा है, जो सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान की मिसाल रहा है. ऐसे समय में प्रार्थना केवल ईश्वर से संवाद नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य से प्रश्न करने की प्रक्रिया भी बन जानी चाहिए.
आलोक कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/