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India : गोदी मीडिया के दौर में क्या निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है?

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  गोदी मीडिया के दौर में क्या निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है? जब मीडिया पर सत्ता के करीब होने के आरोप लगते हों, विज्ञापन राजस्व पर निर्भरता बढ़ रही हो, टीआरपी और क्लिक की दौड़ तेज हो और सोशल मीडिया खबरों का बड़ा मंच बन चुका हो, तब सवाल किसी एक पत्रकार या चैनल का नहीं, बल्कि पूरी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता का है। “गोदी मीडिया” शब्द पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है। इसका इस्तेमाल आमतौर पर उन मीडिया संस्थानों या पत्रकारिता की शैली के लिए किया जाता है, जिन पर सत्ता के प्रति अत्यधिक नरम या पक्षधर होने का आरोप लगाया जाता है। दूसरी ओर, इस शब्द की आलोचना करने वाले इसे राजनीतिक लेबल मानते हैं और कहते हैं कि इससे पत्रकारिता पर गंभीर बहस व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन “गोदी मीडिया” है और कौन नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में पत्रकारिता सत्ता, बाजार और राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र रहकर जनता को सही और संतुलित सूचना दे सकती है? जवाब है— हां, लेकिन इसके लिए पत्रकारिता की संस्थागत स्वतंत्रता, संपादकीय जि...