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India: जंतर-मंतर की गूंज: क्या विपक्षी एकजुटता से बदलेगी देश की राजनीति?

जंतर-मंतर आंदोलन के बाद वाम दलों ने विपक्षी एकजुटता को नई दिशा देने का संकेत दिया है। सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक तालमेल शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों पर देशव्यापी जनआंदोलन का रूप ले पाएगा, या फिर यह केवल बैठकों और बयानों तक सीमित रह जाएगा?

नई दिल्ली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) [CPI(ML)] के शीर्ष नेताओं की बैठक केवल एक औपचारिक राजनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत भी है, जिसमें छात्र-युवा आंदोलन, रोजगार, शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं।

सीपीआई(एमएल) के केंद्रीय कार्यालय चारु भवन में आयोजित इस बैठक में तीनों दलों के नेताओं ने सबसे पहले कॉमरेड चारु मजूमदार की 54वीं शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्षी एकजुटता पर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जंतर-मंतर आंदोलन को मिली ऐतिहासिक सफलता को बताया गया। वाम दलों ने कहा कि छात्र-युवा संगठनों और CJP के नेतृत्व में चले आंदोलन ने जिस साहस, रचनात्मकता और दृढ़ता का परिचय दिया, उसने केंद्र सरकार को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक के लिए मजबूर कर दिया। नेताओं का मानना है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनदबाव की ताकत का उदाहरण है।

तीनों दलों ने सरकार से मांग की कि जंतर-मंतर समझौते का पूरी तरह सम्मान किया जाए और आंदोलन में शामिल छात्रों तथा युवाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई तुरंत बंद की जाए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता।

बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि जंतर-मंतर का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ है। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाना, युवाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना तथा भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता सुनिश्चित करना अब आगे की लड़ाई के प्रमुख मुद्दे होंगे।

वाम दलों ने केवल छात्र राजनीति तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ट्रेड यूनियन, किसान, खेत मजदूर और महिला संगठनों के बीच भी व्यापक समन्वय बढ़ाने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, निजीकरण और कॉरपोरेट प्रभाव के कारण आम जनता पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में संगठित जनआंदोलन की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।

बैठक में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग भी दोहराई गई। वाम नेताओं का कहना है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़े बिना लोकतंत्र को पूर्ण रूप से प्रतिनिधिक नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही तीनों दलों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों पर कथित हमलों के विरुद्ध साझा संघर्ष को और तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया।

हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी राजनीतिक बयान या आंदोलन का अंतिम मूल्यांकन जनता करती है। वाम दलों की यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह आने वाले समय में छात्र आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों और चुनावी राजनीति में उनके प्रदर्शन से तय होगा। केवल साझा बयान पर्याप्त नहीं होंगे; जमीनी स्तर पर व्यापक जनसंपर्क, वैकल्पिक नीतियां और सतत आंदोलन ही उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को मजबूत कर सकते हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन ने यह संकेत अवश्य दिया है कि यदि युवाओं के मुद्दे, शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर व्यापक सामाजिक समर्थन बनता है, तो उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब देखना यह है कि यह एकजुटता केवल बैठकों और प्रस्तावों तक सीमित रहती है या वास्तव में देशव्यापी जनआंदोलन का रूप लेती है।

लोकतंत्र में असहमति, संवाद और जनभागीदारी ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि राजनीतिक दल जनता के वास्तविक मुद्दों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ते हैं, तो लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनकर रह जाता है, तो जनता का विश्वास फिर से जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए आने वाले महीनों में वाम दलों की इस नई रणनीति की असली परीक्षा मैदान में होगी, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं में।

आलोक कुमार

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