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Bihar : दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन

  


किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को आवाज देते हैं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना में आयोजित इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट प्रतियोगिता ने विद्यार्थियों को इसी आवाज को मजबूत करने का मंच दिया।

पटना। आज शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना और परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करना नहीं रह गया है। बदलती दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन और समसामयिक मुद्दों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने पेरेंट-टीचर एसोसिएशन (PTA) के सहयोग से इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट इंग्लिश प्रतियोगिता का आयोजन किया।

प्रतियोगिता में 14 प्रमुख विद्यालयों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। अलग-अलग विद्यालयों से आए प्रतिभागियों ने अपने विचारों को अंग्रेजी भाषा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया और यह दिखाया कि नई पीढ़ी केवल विषयों को पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर विचार करने और तर्क के साथ अपनी बात रखने की क्षमता भी विकसित कर रही है।

प्रतियोगिता को जूनियर और सीनियर—दो श्रेणियों में बांटा गया था। दोनों वर्गों के विषय विद्यार्थियों की उम्र और बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखते हुए चुने गए थे। खास बात यह रही कि विषय ऐसे थे जिन पर केवल पक्ष या विपक्ष में बोलना पर्याप्त नहीं था। प्रतिभागियों को अपने तर्क के पीछे कारण, उदाहरण और विचार प्रस्तुत करने पड़े।

एआई के इस्तेमाल पर जूनियर वर्ग में जोरदार बहस

जूनियर वर्ग का विषय था—“स्कूल के असाइनमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।”

आज जब एआई शिक्षा का हिस्सा तेजी से बनता जा रहा है, तब इस विषय ने विद्यार्थियों को तकनीक के लाभ और उसकी सीमाओं पर सोचने का अवसर दिया। सवाल यह था कि क्या एआई विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता को बढ़ाने वाला उपकरण है या इसके अत्यधिक इस्तेमाल से मौलिक सोच प्रभावित हो सकती है।

विद्यार्थियों ने अपने-अपने पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए और यह साबित किया कि कम उम्र में भी वे तकनीक से जुड़े जटिल प्रश्नों पर गंभीरता से सोच सकते हैं।

जूनियर वर्ग में नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की अक्षिता सागर को प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता चुना गया। सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की कनिष्का मित्तल ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

वहीं नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ की आद्या श्री को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट माइकल्स हाई स्कूल के ऑडिटिक एडेन को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर चुना गया।

सीनियर वर्ग ने उठाया जीवन कौशल का सवाल

सीनियर वर्ग का विषय था—“जीवन कौशल अकादमिक सफलता से अधिक महत्वपूर्ण हैं।”

यह विषय सीधे विद्यार्थियों के भविष्य और सफलता की पारंपरिक धारणा से जुड़ा था। अच्छे अंक और शैक्षणिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन क्या केवल परीक्षा में सफलता ही जीवन में सफलता की गारंटी दे सकती है? निर्णय लेने की क्षमता, संवाद-कौशल, समस्या का समाधान, समय प्रबंधन और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने जैसे जीवन कौशल की भूमिका कितनी बड़ी है?

प्रतिभागियों ने इसी विषय के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा। किसी ने अकादमिक उपलब्धियों के महत्व को रेखांकित किया तो किसी ने जीवन में व्यवहारिक कौशल और मानवीय गुणों को अधिक महत्वपूर्ण बताया।

सीनियर वर्ग में सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता रहीं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की स्नेहा घोष ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ के हर्ष राज ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की हर्षिता सिन्हा को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट कैरेंस हाई स्कूल की प्रतीक्षा राज को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर का पुरस्कार दिया गया।

नोट्रे डेम एकेडमी ने जीती रनिंग ट्रॉफी

प्रतियोगिता की रनिंग ट्रॉफी नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने नाम की। मेजबान विद्यालय के लिए यह उपलब्धि विशेष गौरव का अवसर रही।

विद्यालय की प्राचार्य सिस्टर मैरी नेहा SND ने सभी प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों, निर्णायकों, मुख्य अतिथि और कार्यक्रम समन्वयक श्री देवव्रत के प्रयासों की सराहना की।

उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद-कौशल और आलोचनात्मक चिंतन को लगातार विकसित करने का आह्वान किया। उनके अनुसार, ऐसी प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा सामने रखने के साथ-साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती हैं।

निर्णायकों ने परखी प्रतिभा

प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में पटना वीमेंस कॉलेज के सांख्यिकी विभाग की प्रमुख डॉ. मून, पटना साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. सोवन चक्रवर्ती तथा मनेर हाई स्कूल की पूर्व प्राचार्य डॉ. शगुफ्ता यासमीन शामिल थीं।

मुख्य अतिथि के रूप में रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल के एमडी डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने प्रतियोगिता की सराहना की और आयोजन के लिए सहयोग भी प्रदान किया।

प्रतियोगिता का समन्वय PTA कोषाध्यक्ष श्री देवव्रत ने किया। PTA की पूरी टीम ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग दिया। PTA अध्यक्ष श्रीमती संचिता घोष के साथ श्री संभव गुप्ता, श्रीमती खुशबू चौधरी, श्रीमती श्वेता, श्रीमती सुभुही, श्रीमती चित्रा, मोहम्मद तनवीर, श्री आर.के. झा, मोहम्मद नायर और मोहम्मद मुशीर सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।

ट्रॉफी से आगे की कहानी

किसी डिबेट प्रतियोगिता को केवल पुरस्कारों और ट्रॉफी के नजरिए से देखना उसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना होगा। मंच पर खड़ा विद्यार्थी जब किसी कठिन विषय पर बोलता है, सामने बैठे लोगों के सवालों और तर्कों का सामना करता है तथा अपने विचारों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करता है, तब उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

डिबेट विद्यार्थियों को केवल बोलना नहीं सिखाती। यह उन्हें सुनना, असहमति को समझना और दूसरे पक्ष के तर्क का सम्मान करना भी सिखाती है।

आज सोशल मीडिया के दौर में किसी मुद्दे पर तुरंत राय बना लेना आसान है, लेकिन तथ्य समझकर तर्कपूर्ण राय बनाना कठिन। ऐसे समय में स्कूल स्तर की डिबेट प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों में विचारों की परिपक्वता विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।

नोट्रे डेम एकेडमी की यह पहल इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। जूनियर वर्ग में एआई जैसे आधुनिक विषय पर बहस और सीनियर वर्ग में जीवन कौशल जैसे व्यापक विषय पर विचार-विमर्श ने विद्यार्थियों को किताबों से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया के प्रश्नों से जोड़ने का काम किया।

कक्षा की किताबें ज्ञान का आधार बनाती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को जीवन से जोड़ते हैं।

यही कारण है कि ऐसी प्रतियोगिताएं केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होतीं। मंच पर बोले गए कुछ मिनट किसी विद्यार्थी के भीतर वर्षों तक आत्मविश्वास पैदा कर सकते हैं।

और जब शिक्षा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि सवाल पूछने, तर्क करने, असहमति समझने और अपनी बात जिम्मेदारी से रखने के लिए तैयार करती है, तभी शिक्षा वास्तव में जीवन की तैयारी बनती है।


आलोक कुमार

Bihar : सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना

 


यहां भी होता है... यह जगह होती है... मौका मिलना चाहिए। लेकिन जब मौका मिला तो नतीजा सामने है—पटना प्रेस क्लब!

पत्रकारिता का काम सिर्फ खबर लिखना नहीं है। पत्रकारिता का असली अर्थ है—सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना। लेकिन जब सवाल अपने ही पेशे की किसी संस्था से जुड़ा हो, तब पत्रकार के सामने सबसे कठिन परीक्षा होती है। पटना प्रेस क्लब का मामला इसी परीक्षा की तरह सामने आता है।

पत्रकार मित्र प्रशांत झा ने मुझे भी पटना प्रेस क्लब की सदस्यता दिलाई थी। उस दौर में बड़ी संख्या में पत्रकारों को सदस्य बनाया गया। सदस्यता के नाम पर पत्रकारों से राशि ली गई। उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक छह सौ से अधिक सदस्य बनाए गए थे और सदस्यता शुल्क के रूप में करीब छह लाख रुपये जमा होने की बात सामने आई है।

यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—उस पैसे का हिसाब कहां है?

जिस प्रेस क्लब की कल्पना पत्रकारों के लिए एक साझा मंच के रूप में की गई थी, वह पत्रकारों को संवाद, बैठक, कार्यक्रम और पेशेवर गतिविधियों के लिए एक स्थायी जगह उपलब्ध करा सकता था। लेकिन क्लब की औपचारिक शुरुआत से पहले ही विवाद, अंदरूनी खींचतान और पद-प्रतिष्ठा की राजनीति ने पूरे प्रयास को कमजोर कर दिया।

एक संस्था का निर्माण केवल भवन, कमरे या फर्नीचर से नहीं होता। संस्था विश्वास से बनती है। और पत्रकारों ने सदस्यता शुल्क देकर उसी विश्वास में अपना योगदान दिया था।

अगर क्लब नहीं चल सका तो सवाल यह नहीं है कि राजनीति किसने की और किसे पद मिला। सबसे पहले सवाल यह है कि सदस्यों से लिया गया पैसा कहां गया?

किस बैंक खाते में रकम जमा हुई?

कुल कितनी राशि जमा हुई?

किसके पास उस राशि की जिम्मेदारी थी?

उसमें से कितना पैसा खर्च हुआ?

किस मद में खर्च हुआ?

किसने खर्च की अनुमति दी?

आज उस खाते में कितनी राशि उपलब्ध है?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी आरोप या प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों से मिलना चाहिए।

पत्रकारों की रकम कोई मामूली बात नहीं

एक पत्रकार की कमाई अक्सर बहुत बड़ी नहीं होती। फिर भी जब पत्रकार किसी संस्था के लिए सदस्यता शुल्क देता है तो वह उम्मीद करता है कि उसका पैसा उसी संस्था के उद्देश्य पर खर्च होगा।

अगर छह सौ से अधिक पत्रकारों से लगभग छह लाख रुपये जमा हुए थे, तो प्रत्येक रुपये का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। रकम कम हो या ज्यादा, सवाल पारदर्शिता का है।

अगर तत्कालीन पदाधिकारी यह कहते हैं कि पैसा नियमों के अनुसार खर्च हुआ, तो खर्च का विवरण सामने रखा जाना चाहिए। अगर राशि अभी भी सुरक्षित है, तो खाते और वर्तमान स्थिति की जानकारी दी जानी चाहिए। और यदि क्लब उस उद्देश्य से संचालित नहीं हो सका जिसके लिए सदस्यता ली गई थी, तो सदस्यों की राशि वापसी पर भी विचार होना चाहिए।

सवाल उठाना आरोप लगाना नहीं है। सवाल का जवाब मांगना जवाबदेही मांगना है।

भवन किसके लिए था?

सरकार की ओर से पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब जैसी व्यवस्था खड़ी करने का उद्देश्य यही होना चाहिए कि पत्रकारों को अपनी गतिविधियों के लिए एक स्वतंत्र और सुविधाजनक मंच मिले।

लेकिन अगर भवन या जमीन उपलब्ध होने के बावजूद संस्था सक्रिय नहीं हो पाती, तो यह केवल पत्रकारों की विफलता नहीं है। यह संस्थागत व्यवस्था की भी विफलता है।

बिहार के दूसरे हिस्सों में भी प्रेस क्लब भवनों के निर्माण और उनके उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बिहारशरीफ के प्रेस क्लब भवन के लंबे समय तक बंद रहने की खबरें इसी बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं—भवन बनाना आसान है, संस्था चलाना कठिन।

पटना में तो सवाल और भी गंभीर है।

भवन किसके लिए था—पत्रकारों के लिए या पद और प्रभाव की राजनीति के लिए?

सदस्यता किसलिए ली गई थी—पत्रकारों को सुविधा देने के लिए या सिर्फ सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए?

और सबसे बड़ा सवाल—

पत्रकारों के पैसे का हिसाब कौन देगा?

सरकार भी अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करे

मामला केवल क्लब के तत्कालीन पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि पत्रकारों के लिए उपलब्ध कराई गई जमीन, भवन या अन्य संसाधनों की वर्तमान स्थिति क्या है।

क्या वह संपत्ति अभी भी पत्रकारों के हित में उपयोग हो रही है?

अगर नहीं, तो उसके उपयोग में क्या बाधा है?

क्या क्लब का कोई वैधानिक या पंजीकृत ढांचा था?

सदस्यता राशि का लेखा-जोखा किस संस्था या व्यक्ति के पास था?

क्या कभी इसका ऑडिट हुआ?

अगर नहीं हुआ तो क्यों नहीं?

इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।

यह भी जरूरी है कि इस पूरे मामले को व्यक्तिगत आरोपों की लड़ाई न बनाया जाए। किसी व्यक्ति पर बिना दस्तावेज आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक संस्था, पत्रकारों की सदस्यता और उनसे ली गई रकम के मामले में पारदर्शिता की मांग पूरी तरह जायज है।

पत्रकार दूसरों से सवाल पूछता है

पत्रकार हर दिन नेताओं से पूछता है—पैसा कहां खर्च हुआ?

सरकार से पूछता है—योजना का लाभ किसे मिला?

अधिकारी से पूछता है—फाइल क्यों रुकी?

संस्था से पूछता है—चंदे का हिसाब कहां है?

तो फिर जब सवाल पत्रकारों की अपनी संस्था से जुड़ता है, तब वही कसौटी क्यों नहीं लागू होनी चाहिए?

पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल दूसरों की जवाबदेही से नहीं, अपनी जवाबदेही से भी बनती है।

अगर पटना प्रेस क्लब का सपना टूट गया तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। अगर आपसी राजनीति के कारण संस्था आगे नहीं बढ़ सकी तो उस अनुभव से सीखना चाहिए। लेकिन पत्रकारों से जमा की गई रकम का हिसाब उससे अलग और प्राथमिक सवाल है।

क्लब नहीं चला—कोई बात नहीं।

क्लब की राजनीति नहीं चली—यह भी मान लिया।

व्यवस्था विफल हुई—उसकी भी समीक्षा हो सकती है।

लेकिन पत्रकारों की जमा पूंजी का क्या हुआ?

यही वह सवाल है जिसे किसी शटर के पीछे बंद नहीं किया जा सकता।

जरूरत है कि सदस्यता राशि, बैंक खाते, खर्च और वर्तमान वित्तीय स्थिति का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। यदि रकम लौटाने योग्य है तो सदस्यों को लौटाने की प्रक्रिया तय हो। यदि किसी वैध खर्च का दावा है तो उसका दस्तावेज सामने आए।

क्योंकि प्रेस क्लब किसी व्यक्ति, पद या गुट की संपत्ति नहीं होता। वह पत्रकार समुदाय के भरोसे से बनता है।

और भरोसे की सबसे पहली शर्त है—हिसाब।

इसलिए मांग सीधी है—

क्लब का हिसाब दीजिए।

सदस्यता राशि का हिसाब दीजिए।

भवन और संसाधनों की वर्तमान स्थिति बताइए।

और अगर दस्तावेज यह साबित करते हैं कि पत्रकारों की रकम वापस की जानी चाहिए, तो—

पत्रकारों की रकम लौटाइए।

क्योंकि प्रेस क्लब का शटर बंद हो सकता है, लेकिन पत्रकारों के सवालों पर शटर नहीं लगाया जा सकता।


आलोक कुमार

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