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India : अब जिम्बाब्वे के खिलाफ पहली द्विपक्षीय सीरीज

 


एशियाई खेलों के स्वर्ण से पहली द्विपक्षीय सीरीज तक, भारतीय महिला क्रिकेट का नया अध्याय

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने सितंबर 2026 में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर एक बार फिर अपनी क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया। नागोया में खेले गए फाइनल में भारत ने श्रीलंका को 147 रनों से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत के साथ भारतीय महिला टीम ने एशियाई खेलों में अपना खिताब भी बरकरार रखा।

अब इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय महिला क्रिकेट टीम के सामने एक नया अंतरराष्ट्रीय अभियान है। अक्टूबर में भारत और जिम्बाब्वे की महिला टीमों के बीच पहली बार द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सीरीज खेली जाएगी। इस दौरे में दोनों टीमें तीन टी20 अंतरराष्ट्रीय और तीन वनडे मुकाबलों में आमने-सामने होंगी। ICC ने भी इसे दोनों देशों के बीच पहली द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय भिड़ंत बताया है।

एशियाई खेलों में भारतीय टीम का शानदार प्रदर्शन

एशियाई खेलों में भारतीय महिला टीम ने शुरुआत से ही प्रभावशाली खेल दिखाया। जापान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में भारत ने आठ विकेट से जीत दर्ज की। इसके बाद सेमीफाइनल में बांग्लादेश को हराकर टीम फाइनल में पहुंची।

श्रीलंका के खिलाफ स्वर्ण पदक मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 217 रन बनाए। स्मृति मंधाना ने 79 रनों की शानदार पारी खेली। इसके बाद भारतीय गेंदबाजों ने श्रीलंका को केवल 69 रन पर समेट दिया और भारत ने 147 रनों से मुकाबला जीत लिया। इस प्रदर्शन के साथ भारत ने लगातार दूसरी बार महिला क्रिकेट का एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक हासिल किया।

यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि भारतीय टीम ने पूरे टूर्नामेंट में बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों विभागों में संतुलित प्रदर्शन किया।

अब जिम्बाब्वे के खिलाफ नई चुनौती

एशियाई खेलों की सफलता के बाद भारतीय महिला टीम के सामने जिम्बाब्वे की चुनौती होगी। BCCI की घोषित योजना के अनुसार अक्टूबर में जिम्बाब्वे महिला टीम भारत का दौरा करेगी। इस दौरान तीन टी20 अंतरराष्ट्रीय और तीन वनडे मुकाबले खेले जाएंगे।

यह दौरा केवल छह मैचों की एक सामान्य क्रिकेट सीरीज नहीं है। दोनों देशों की महिला टीमों के बीच पहली बार द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सीरीज होने के कारण इसका अपना ऐतिहासिक महत्व है।

जिम्बाब्वे के लिए भी भारत जैसी मजबूत टीम के खिलाफ उसकी घरेलू परिस्थितियों से बाहर खेलना अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने का महत्वपूर्ण अवसर होगा। वहीं भारत के लिए यह सीरीज अपने खिलाड़ियों की तैयारी और टीम संयोजन को परखने का मौका देगी।

रायपुर में होंगे तीन टी20 मुकाबले

सीरीज का पहला चरण टी20 क्रिकेट का होगा। तीनों टी20 मुकाबले रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में खेले जाएंगे।

कार्यक्रम के अनुसार:

  • पहला टी20: 16 अक्टूबर 2026

  • दूसरा टी20: 18 अक्टूबर 2026

  • तीसरा टी20: 20 अक्टूबर 2026

इन मुकाबलों के लिए शाम 7 बजे का समय निर्धारित बताया गया है।

लगातार तीन टी20 मैच भारतीय टीम को छोटे प्रारूप में अपने संयोजन को परखने का अवसर देंगे। खासकर युवा खिलाड़ियों को मौका मिलता है तो उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता दिखाने का यह महत्वपूर्ण मंच हो सकता है।

वडोदरा में वनडे मुकाबले

टी20 सीरीज के बाद दोनों टीमें वनडे प्रारूप में उतरेंगी। तीनों वनडे मुकाबले वडोदरा के कोटम्बी स्थित बीसीए स्टेडियम में खेले जाएंगे।

वनडे सीरीज का कार्यक्रम इस प्रकार है:

  • पहला वनडे: 23 अक्टूबर 2026

  • दूसरा वनडे: 25 अक्टूबर 2026

  • तीसरा वनडे: 28 अक्टूबर 2026

इन मुकाबलों के लिए दोपहर 2 बजे का समय निर्धारित बताया गया है। ICC ने भी अक्टूबर के इस दौरे में रायपुर में तीन टी20 और वडोदरा में तीन वनडे की पुष्टि की है।

इन तीन वनडे मुकाबलों का एक अलग महत्व है, क्योंकि वनडे क्रिकेट में निरंतर प्रदर्शन और लंबे समय तक पारी बनाने की क्षमता की परीक्षा होती है। साथ ही यह सीरीज ICC Women's Championship 2025-29 के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए बेंच स्ट्रेंथ आजमाने का अवसर

एशियाई खेलों के बाद इस सीरीज में भारतीय टीम के सामने एक अहम सवाल यह भी रहेगा कि युवा खिलाड़ियों को कितना अवसर दिया जाता है।

एक मजबूत टीम केवल अपने प्रमुख खिलाड़ियों पर निर्भर नहीं रहती। लंबे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के बीच दूसरी पंक्ति के खिलाड़ियों को अनुभव देना भी जरूरी होता है। ऐसी सीरीज में नए खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की परिस्थितियों को समझने और दबाव में प्रदर्शन करने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि अंतिम टीम संयोजन और खिलाड़ियों को आराम देने का निर्णय चयनकर्ताओं पर निर्भर करेगा।

जिम्बाब्वे के लिए भी महत्वपूर्ण दौरा

भारतीय महिला क्रिकेट के नजरिए से इस सीरीज की चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन जिम्बाब्वे के लिए इसका महत्व भी कम नहीं है।

महिला क्रिकेट के विकास के लिए केवल कुछ बड़ी टीमों के बीच मुकाबले होना पर्याप्त नहीं है। अलग-अलग क्रिकेट देशों को मजबूत टीमों के खिलाफ नियमित अंतरराष्ट्रीय अवसर मिलना जरूरी है। इससे खिलाड़ियों को उच्च स्तर के क्रिकेट का अनुभव मिलता है और घरेलू क्रिकेट व्यवस्था को भी प्रेरणा मिल सकती है।

भारत जैसे बड़े क्रिकेट बाजार में खेलने का अवसर जिम्बाब्वे की महिला खिलाड़ियों के लिए सीखने और अपनी क्षमता दिखाने का मंच बन सकता है।

महिला क्रिकेट के विस्तार की दिशा में कदम

भारतीय महिला क्रिकेट पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आगे बढ़ा है। एशियाई खेलों का स्वर्ण, बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में प्रदर्शन और घरेलू स्तर पर बढ़ती लोकप्रियता इसके संकेत हैं।

अब जिम्बाब्वे के खिलाफ पहली द्विपक्षीय सीरीज इस विकास की एक और कड़ी है। इसका महत्व केवल भारत की संभावित जीत या हार तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली महत्व इस बात में है कि महिला क्रिकेट को अधिक देशों और अधिक खिलाड़ियों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवसर मिल रहे हैं।

अक्टूबर की यह सीरीज इसलिए भारतीय महिला क्रिकेट के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखी जा सकती है। एशियाई खेलों के स्वर्ण से मिली आत्मविश्वास की ऊर्जा के बीच अब भारतीय टीम की नजर जिम्बाब्वे के खिलाफ अपने अगले अभियान पर होगी।

क्रिकेट में परिणाम हमेशा मैदान पर तय होते हैं, लेकिन इस सीरीज का ऐतिहासिक महत्व मुकाबले शुरू होने से पहले ही तय हो चुका है—भारत और जिम्बाब्वे की महिला टीमें पहली बार एक-दूसरे के खिलाफ द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सीरीज में उतरेंगी।

आलोक कुमार

Bihar : प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार के बीच की दूरी

 प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार के बीच की दूरी युवाओं के लिए चुनौती क्यों है?

किसी युवा के लिए ITI, Polytechnic या किसी अन्य तकनीकी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना रोजगार की दिशा में पहला कदम होता है। इसके बाद प्रशिक्षण पूरा होता है और कई युवाओं को अप्रेंटिसशिप या व्यावहारिक अनुभव का अवसर मिलता है। लेकिन इन दोनों चरणों के बाद भी एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रहता है—क्या प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप वास्तव में युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचा पाते हैं?

यही वह जगह है जहां कई युवाओं की उम्मीद और रोजगार की वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई देता है। प्रमाणपत्र मिल जाता है, कुछ व्यावहारिक अनुभव भी मिल जाता है, लेकिन स्थायी और सम्मानजनक नौकरी हासिल करना फिर भी आसान नहीं होता।

प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र नहीं होना चाहिए

तकनीकी प्रशिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य किसी युवा को काम के लिए तैयार करना है। लेकिन प्रशिक्षण की गुणवत्ता और उसकी उपयोगिता इस बात से तय होती है कि विद्यार्थी ने वास्तव में क्या सीखा।

कक्षा में किसी मशीन, उपकरण या तकनीकी प्रक्रिया के बारे में पढ़ना और उसी काम को वास्तविक कार्यस्थल पर करना अलग-अलग अनुभव हैं। इसलिए प्रशिक्षण में प्रैक्टिकल कार्य का पर्याप्त हिस्सा होना जरूरी है।

यदि विद्यार्थी प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक उपकरणों पर काम करने, समस्या पहचानने और उसका समाधान करने का अभ्यास करता है तो नौकरी मिलने के बाद उसे कार्यस्थल समझने में अपेक्षाकृत कम परेशानी हो सकती है।

अप्रेंटिसशिप क्यों महत्वपूर्ण है?

अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण और रोजगार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। इसमें युवा वास्तविक कार्यस्थल के वातावरण को समझता है और अपने तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल करना सीखता है।

कार्यस्थल पर समय की पाबंदी, सुरक्षा नियम, टीम के साथ काम करना, वरिष्ठों से संवाद, मशीनों का रखरखाव और काम की जिम्मेदारी जैसी बातें किताबों से पूरी तरह नहीं सीखी जा सकतीं।

इसीलिए अप्रेंटिसशिप को केवल प्रशिक्षण की औपचारिकता मानने के बजाय रोजगार की तैयारी का चरण समझना चाहिए।

लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है। यदि अप्रेंटिसशिप के अवसर सीमित हों, प्रशिक्षण केवल नाम के लिए हो या युवा को उसके ट्रेड से संबंधित काम न मिले तो उसका वास्तविक लाभ कम हो सकता है।

अप्रेंटिसशिप के बाद क्या?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि अप्रेंटिसशिप समाप्त होने के बाद युवा कहां जाता है।

हर अप्रेंटिस को उसी संस्था में स्थायी नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं है। किसी कंपनी की अपनी भर्ती नीति, जरूरत और उपलब्ध पदों की संख्या होती है। इसलिए अप्रेंटिसशिप को स्थायी नौकरी की गारंटी के रूप में देखना सही नहीं होगा।

लेकिन अप्रेंटिसशिप के बाद युवा के पास ऐसा कौशल और अनुभव जरूर होना चाहिए जिससे वह दूसरी कंपनियों में भी नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा कर सके।

यहीं पर रोजगार से जुड़ी जानकारी, करियर मार्गदर्शन और कंपनियों से संपर्क की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

प्रशिक्षण और उद्योग के बीच तालमेल जरूरी

किसी तकनीकी पाठ्यक्रम की उपयोगिता तभी बढ़ती है जब उसमें सिखाया जाने वाला कौशल रोजगार बाजार की जरूरतों से जुड़ा हो।

उद्योगों में तकनीक बदलती रहती है। मशीनों में बदलाव, डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल, ऑटोमेशन और नई उत्पादन प्रक्रियाएं लगातार विकसित हो रही हैं। ऐसे में प्रशिक्षण संस्थानों के लिए भी जरूरी है कि वे उद्योगों की बदलती जरूरतों को समझें।

यदि प्रशिक्षण पूरा करने वाला युवा ऐसी तकनीक से परिचित है जिसकी मांग रोजगार बाजार में है तो उसके अवसर बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर, प्रशिक्षण और उद्योग की जरूरतों के बीच अधिक अंतर होने पर प्रमाणपत्र होने के बावजूद नौकरी पाना कठिन हो सकता है।

ग्रामीण युवाओं के सामने अलग चुनौती

बिहार जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में युवा छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। उनके लिए समस्या केवल कौशल हासिल करने तक सीमित नहीं रहती।

प्रशिक्षण संस्थान उनके घर से दूर हो सकता है। अप्रेंटिसशिप किसी दूसरे शहर में मिल सकती है और नौकरी के लिए फिर किसी औद्योगिक क्षेत्र में जाना पड़ सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में यात्रा, रहने और भोजन का खर्च जुड़ता है। कम आय वाले परिवार से आने वाले युवा के लिए यह खर्च रोजगार की तलाश को कठिन बना सकता है।

इसलिए रोजगार नीति में केवल नौकरी की संख्या नहीं, बल्कि युवा की नौकरी तक पहुंचने की वास्तविक लागत को भी समझना जरूरी है।

छोटी शुरुआत को कम नहीं समझना चाहिए

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं में कुछ लोग पहली नौकरी से ही अच्छी आय की उम्मीद करते हैं। लेकिन करियर की शुरुआत में मिलने वाली नौकरी हमेशा अंतिम मंजिल नहीं होती।

पहली नौकरी में सीखने का अवसर, सुरक्षित कार्यस्थल, उचित व्यवहार और कौशल बढ़ाने की संभावना भी महत्वपूर्ण होती है। यदि युवा को शुरुआती चरण में काम सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है तो वह समय के साथ बेहतर रोजगार हासिल कर सकता है।

इसलिए युवाओं को नौकरी की तलाश में वेतन के साथ-साथ काम की प्रकृति, सीखने का अवसर और भविष्य की संभावना भी देखनी चाहिए।

संस्थानों की जिम्मेदारी क्या हो सकती है?

ITI और Polytechnic संस्थानों में प्रशिक्षण पूरा होने से पहले विद्यार्थियों को रोजगार की वास्तविक प्रक्रिया समझाना उपयोगी हो सकता है। रिज्यूमे बनाना, इंटरव्यू की तैयारी, नौकरी के लिए आवेदन करना, अप्रेंटिसशिप के अवसर तलाशना और संबंधित कंपनियों की जानकारी प्राप्त करना जैसे कौशल भी करियर का हिस्सा हैं।

संस्थान यदि अपने पूर्व विद्यार्थियों का रोजगार रिकॉर्ड रखें तो यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि कौन से पाठ्यक्रम और कौशल विद्यार्थियों को बेहतर अवसर दिला रहे हैं।

इसके अलावा स्थानीय उद्योगों के साथ नियमित संपर्क और रोजगार मेलों की व्यवस्था युवाओं को कंपनियों तक सीधे पहुंचने का अवसर दे सकती है।

सरकार और उद्योग की भूमिका

सरकार प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग को बढ़ावा दे सकती है। स्थानीय स्तर पर अधिक अप्रेंटिसशिप अवसर, रोजगार मेले, कौशल आधारित मार्गदर्शन और रोजगार की विश्वसनीय जानकारी युवाओं के लिए उपयोगी हो सकती है।

उद्योगों की भी जिम्मेदारी है कि वे प्रशिक्षित युवाओं को केवल अनुभवी उम्मीदवारों से तुलना करके बाहर न करें। शुरुआती स्तर पर प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं को सीखने का अवसर देना भविष्य के कुशल कर्मचारियों की तैयारी में निवेश हो सकता है।

रोजगार तक पहुंचने के लिए पूरी श्रृंखला मजबूत करनी होगी

युवा को केवल प्रशिक्षण देने से समस्या हल नहीं होगी। प्रशिक्षण के बाद अप्रेंटिसशिप, अप्रेंटिसशिप के बाद रोजगार की जानकारी और फिर नौकरी में आगे बढ़ने का अवसर—इन सभी चरणों को एक-दूसरे से जोड़ना जरूरी है।

अगर प्रशिक्षण एक जगह हो, अप्रेंटिसशिप की जानकारी दूसरी जगह मिले और नौकरी की सूचना तीसरी जगह खोजनी पड़े, तो कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाला युवा बीच में ही पीछे छूट सकता है।

इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें प्रशिक्षण से लेकर रोजगार तक की पूरी यात्रा युवा के लिए अधिक स्पष्ट और आसान हो।

आखिरकार तकनीकी शिक्षा की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने प्रमाणपत्र हासिल किया। यह भी देखना होगा कि उनमें से कितने युवा अपने सीखे हुए कौशल का इस्तेमाल करके वास्तविक रोजगार तक पहुंच पाए।

प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार तीन अलग-अलग पड़ाव नहीं, बल्कि एक ही रोजगार यात्रा की कड़ियां हैं। इन कड़ियों के बीच जितनी मजबूती होगी, युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा उतनी ही उपयोगी साबित होगी।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी

 


बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी तक पहुंचने में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?

बिहार में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और Polytechnic जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं। उनका उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र हासिल करना नहीं होता, बल्कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद किसी कंपनी, कारखाने, निर्माण क्षेत्र, सरकारी विभाग या निजी संस्थान में रोजगार पाना होता है। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई युवाओं के सामने नौकरी तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं होता।

समस्या यह नहीं है कि तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं में काम करने की इच्छा नहीं है। बड़ी चुनौती यह है कि प्रशिक्षण, उद्योग की जरूरत और रोजगार के अवसरों के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं बन पाता। यही अंतर कई युवाओं को प्रमाणपत्र मिलने के बाद भी लंबे समय तक नौकरी की तलाश में रखता है।

प्रशिक्षण के बाद नौकरी की जानकारी तक पहुंच भी एक चुनौती

कई युवाओं को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती कि उनके ट्रेड या डिप्लोमा से संबंधित नौकरियां कहां उपलब्ध हैं। सरकारी भर्ती की जानकारी के लिए अलग-अलग विभागों की वेबसाइट देखनी पड़ती है, जबकि निजी कंपनियों की भर्ती की सूचना अक्सर रोजगार पोर्टल, कंपनी की वेबसाइट या स्थानीय स्तर के माध्यम से मिलती है।

ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं के लिए यह समस्या और बढ़ जाती है। इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद सही भर्ती सूचना खोजने, आवेदन करने और समय पर प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई हो सकती है।

इसलिए तकनीकी शिक्षा के साथ रोजगार सूचना तक आसान पहुंच भी जरूरी है।

केवल प्रमाणपत्र से नौकरी मिलना आसान नहीं

ITI या Polytechnic की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को यह महसूस हो सकता है कि प्रमाणपत्र मिलने के साथ नौकरी का रास्ता खुल जाएगा। वास्तविकता में कई नियोक्ता तकनीकी ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव, मशीनों पर काम करने की क्षमता, सुरक्षा नियमों की जानकारी और कार्यस्थल के व्यवहार को भी महत्व देते हैं।

यही कारण है कि प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर संपर्क जरूरी है। यदि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान ही वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव, इंडस्ट्री विजिट, अप्रेंटिसशिप और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण मिले तो उन्हें नौकरी के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है।

अप्रेंटिसशिप और शुरुआती अनुभव की कमी

किसी तकनीकी नौकरी में पहली नौकरी हासिल करना कई बार सबसे कठिन चरण होता है। कंपनी अनुभव मांगती है और युवा पूछता है कि अनुभव मिलेगा कैसे, जब पहली नौकरी ही नहीं मिल रही।

इस स्थिति को अप्रेंटिसशिप और ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक उद्योग से जुड़ने का अवसर युवाओं को यह समझने में मदद करता है कि कक्षा में सीखी तकनीक का इस्तेमाल काम की जगह पर कैसे होता है।

लेकिन हर विद्यार्थी को अपनी पसंद और योग्यता के अनुरूप पर्याप्त अवसर मिलना अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्योग की कमी

बिहार के कई जिलों में तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनके आसपास पर्याप्त औद्योगिक रोजगार उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप नौकरी के लिए उन्हें पटना, दूसरे राज्यों या बड़े औद्योगिक शहरों की ओर जाना पड़ता है।

दूसरे शहर में जाने के साथ किराया, भोजन, यात्रा और रहने का खर्च जुड़ जाता है। कम शुरुआती वेतन वाले रोजगार में यह खर्च कई युवाओं के लिए बड़ी समस्या बन जाता है। कुछ युवा इसी कारण अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं या रोजगार की तलाश छोड़कर किसी दूसरे काम में चले जाते हैं।

इसलिए केवल प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय उद्योग, उत्पादन इकाइयां और तकनीकी रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे।

भर्ती प्रक्रिया की जानकारी और तैयारी का अभाव

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं का एक वर्ग सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देता है। लेकिन सरकारी तकनीकी पदों की भर्ती नियमित अंतराल पर ही आती है और उनमें पदों की संख्या भी सीमित हो सकती है।

इसके अलावा आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेज, परीक्षा पैटर्न, कौशल परीक्षा और प्रमाणपत्र सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को समझना भी जरूरी होता है। यदि विद्यार्थी को इन प्रक्रियाओं की जानकारी समय पर नहीं मिले तो योग्य होने के बावजूद वह अवसर से बाहर हो सकता है।

यहां ITI और Polytechnic संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। संस्थानों में केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने के बजाय करियर मार्गदर्शन और रोजगार सूचना केंद्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

कंपनियों की जरूरत और पाठ्यक्रम में तालमेल

तकनीक लगातार बदल रही है। उद्योगों में नई मशीनें, ऑटोमेशन, डिजिटल उपकरण और नई कार्यप्रणालियां आ रही हैं। ऐसे में तकनीकी पाठ्यक्रमों को भी समय-समय पर रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

यदि विद्यार्थी ने ऐसा कौशल सीखा है जिसकी स्थानीय उद्योग में मांग कम है, जबकि किसी दूसरे कौशल की मांग अधिक है, तो प्रमाणपत्र होने के बावजूद रोजगार पाना कठिन हो सकता है।

इसलिए पाठ्यक्रम तैयार करने में उद्योगों, प्रशिक्षण संस्थानों और रोजगार विशेषज्ञों के बीच नियमित संवाद होना चाहिए।

युवाओं के लिए क्या किया जा सकता है?

इस समस्या का समाधान केवल सरकार या केवल प्रशिक्षण संस्थान से नहीं होगा। इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं।

पहला, ITI और Polytechnic संस्थानों में नियमित रोजगार मेले और कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। दूसरा, विद्यार्थियों को अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण के अवसर अधिक मिलने चाहिए। तीसरा, प्रत्येक जिले में तकनीकी युवाओं के लिए रोजगार सूचना और करियर मार्गदर्शन की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

इसके साथ कंपनियों को भी स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को शुरुआती अवसर देने चाहिए। शुरुआती नौकरी में उचित प्रशिक्षण और सीखने का अवसर मिलने से युवा आगे बेहतर रोजगार के लिए तैयार हो सकते हैं।

असली सवाल नौकरी की संख्या से आगे का है

बिहार के ITI और Polytechnic युवाओं की समस्या केवल यह नहीं है कि नौकरियां कम हैं। असली सवाल यह भी है कि जो रोजगार उपलब्ध हैं, उनकी जानकारी युवा तक कितनी आसानी से पहुंचती है, उसकी योग्यता उन नौकरियों से कितनी मेल खाती है और पहली नौकरी तक पहुंचने के लिए उसे कितना व्यावहारिक अनुभव मिलता है।

यदि तकनीकी शिक्षा को रोजगार से जोड़ना है तो प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, उद्योग और भर्ती सूचना के बीच मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। तभी तकनीकी प्रमाणपत्र युवाओं के लिए केवल कागज का दस्तावेज नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार तक पहुंचने का वास्तविक माध्यम बन सकेगा।

Chingari Prime News के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीकी शिक्षा लेने वाला युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा है; वह अपने प्रशिक्षण का उपयोग करके आत्मनिर्भर बनने का अवसर चाहता है।

आलोक कुमार

India : अब जिम्बाब्वे के खिलाफ पहली द्विपक्षीय सीरीज

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