बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?
पटना। बिहार में शिक्षा का विस्तार हुआ है। गांव-कस्बों तक कॉलेज पहुंचे हैं, हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। लेकिन शिक्षा के इस विस्तार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं है—डिग्री मिलने के बाद युवा जाएं तो जाएं कहां?
यह सवाल केवल नौकरी पाने की व्यक्तिगत चिंता नहीं है। यह बिहार की अर्थव्यवस्था, परिवारों की स्थिति, युवाओं के पलायन और राज्य के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। एक ओर माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई पर वर्षों तक खर्च करते हैं, दूसरी ओर डिग्री पूरी करने के बाद युवा सरकारी नौकरी की तैयारी, सीमित निजी रोजगार और दूसरे राज्यों में पलायन के बीच अपना रास्ता तलाशते हैं।
डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी
बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम, बीसीए और बीबीए जैसी डिग्रियां हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन हर डिग्री के बाद रोजगार का स्पष्ट रास्ता दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।
समस्या केवल रोजगार के अवसरों की संख्या की नहीं है। शिक्षा और रोजगार बाजार की जरूरतों के बीच तालमेल का अभाव भी बड़ी चुनौती है।
कई संस्थानों में पढ़ाई अभी भी परीक्षा और डिग्री हासिल करने के आसपास केंद्रित रहती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र को ऐसे युवाओं की जरूरत होती है जो संचार, कंप्यूटर, डेटा, डिजिटल तकनीक, अकाउंटिंग, ग्राहक सेवा, तकनीकी संचालन और अन्य व्यावहारिक काम कर सकें।
यही कारण है कि डिग्री होने के बावजूद युवा कई बार नौकरी के लिए तैयार महसूस नहीं करते।
सरकारी नौकरी ही पहली पसंद क्यों?
बिहार में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण को केवल मानसिकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। नियमित आय, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक स्थिरता इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।
इसी वजह से हजारों-लाखों युवा रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
मेहनत करने वाले युवाओं की इस आकांक्षा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन एक बड़ा सवाल भी सामने है—क्या बिहार की पूरी युवा पीढ़ी का भविष्य सीमित संख्या वाली सरकारी नौकरियों पर निर्भर रह सकता है?
यदि कोई युवा कई वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता रहता है और चयन नहीं हो पाता, तो कई बार उसके पास वैकल्पिक रोजगार के लिए आवश्यक अनुभव और कौशल भी नहीं बचता।
इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ युवाओं को दूसरे करियर विकल्पों के बारे में भी समय रहते जानकारी मिलनी चाहिए।
पलायन क्यों बन रहा है मजबूरी?
शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर का सबसे दिखाई देने वाला परिणाम युवाओं का पलायन है।
बिहार के गांवों और छोटे शहरों से पढ़े-लिखे युवा दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, सूरत और दूसरे औद्योगिक शहरों की ओर जाते हैं।
विडंबना यह है कि बिहार का युवा बाहर जाकर निर्माण, परिवहन, होटल, सुरक्षा, डिलीवरी, तकनीकी सेवाओं, निजी कंपनियों और छोटे कारोबारों में काम करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर युवा अपने राज्य में ही काम करना चाहता है, लेकिन यह जरूर सवाल उठाता है कि जिस श्रम और प्रतिभा की दूसरे राज्यों को जरूरत है, उसके लिए बिहार में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बन पा रहे हैं?
पलायन केवल व्यक्ति के शहर बदलने का मामला नहीं है। इसका असर परिवारों, गांवों की सामाजिक संरचना और स्थानीय बाजार पर भी पड़ता है।
शिक्षित युवतियों के सामने अलग चुनौती
शिक्षित युवतियों के लिए रोजगार की समस्या कई जगह और जटिल हो जाती है।
ग्रामीण और छोटे शहरों में सुरक्षित तथा सम्मानजनक स्थानीय रोजगार के विकल्प सीमित होने पर परिवार बेटियों को दूसरे शहर भेजने में संकोच कर सकते हैं। परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद अनेक युवतियां रोजगार बाजार से बाहर रह जाती हैं।
इसलिए रोजगार की चर्चा में केवल नौकरी की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के लिए सुरक्षित, स्थानीय और आवश्यकता के अनुसार लचीले रोजगार अवसर भी विकसित करने होंगे।
घर से डिजिटल काम, स्थानीय सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं, स्वयं सहायता समूहों से जुड़े कारोबार और छोटे उद्यम ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जिनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।
बिहार में उद्योग और स्थानीय रोजगार का सवाल
बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है। लेकिन बढ़ती युवा आबादी को रोजगार देने के लिए कृषि के साथ अन्य क्षेत्रों का विस्तार भी जरूरी है।
खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, टेक्सटाइल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, छोटे विनिर्माण, आईटी सेवाएं और कृषि आधारित उद्यम जिलों में रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
जरूरत इस बात की है कि रोजगार को केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित न रखा जाए। जिलों के स्तर पर रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था विकसित होने पर युवाओं को अपने घर से दूर जाने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।
डिग्री के साथ कौशल भी जरूरी
आज के रोजगार बाजार में डिग्री महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेली डिग्री पर्याप्त नहीं है।
कॉलेजों में पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगारपरक कौशल को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
उदाहरण के लिए वाणिज्य के विद्यार्थी को केवल किताबों में अकाउंटिंग पढ़ाने के बजाय अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर, जीएसटी से जुड़े व्यावहारिक काम और वित्तीय प्रबंधन का अनुभव दिया जा सकता है। विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला और उद्योग आधारित प्रशिक्षण से जोड़ा जा सकता है। कला के विद्यार्थियों के लिए संचार, डिजिटल मीडिया, शोध, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कौशल विकसित किए जा सकते हैं।
विश्वविद्यालयों की जवाबदेही भी तय हो
उच्च शिक्षा संस्थानों की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की।
यह भी महत्वपूर्ण है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद विद्यार्थी रोजगार, स्वरोजगार, उच्च शिक्षा या किसी व्यावसायिक क्षेत्र में कितनी प्रगति कर रहे हैं।
कॉलेजों में करियर काउंसिलिंग और प्लेसमेंट सेल केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से काम करने चाहिए। विद्यार्थियों को अंतिम वर्ष तक इंतजार कराने के बजाय पहले से रोजगार बाजार, प्रतियोगी परीक्षाओं, कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता के विकल्प समझाए जाने चाहिए।
स्वरोजगार को भी सम्मान मिले
हर युवा को सरकारी या निजी नौकरी मिलना संभव नहीं है। इसलिए स्वरोजगार और उद्यमिता को भी रोजगार नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।
खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, कृषि आधारित कारोबार, डिजिटल सेवाएं, मरम्मत सेवाएं, पर्यटन, हस्तशिल्प और ऑनलाइन कारोबार जैसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
लेकिन केवल ऋण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। युवा उद्यमियों को प्रशिक्षण, बाजार, तकनीक, मार्गदर्शन और शुरुआती दौर में संस्थागत सहयोग भी चाहिए।
सवाल सिर्फ डिग्री का नहीं, भविष्य का है
बिहार में शिक्षा की पहुंच बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन यदि शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार का रास्ता स्पष्ट नहीं है तो डिग्री युवाओं के लिए अवसर का प्रमाणपत्र बनने के बजाय निराशा का कारण बन सकती है।
अब चुनौती केवल अधिक कॉलेज और पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की नहीं है। असली चुनौती शिक्षा को रोजगार, कौशल और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की है।
बिहार के युवाओं को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में खड़े होने के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें इस तरह शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा कि वे नौकरी पाने के साथ-साथ रोजगार पैदा करने की क्षमता भी विकसित कर सकें।
डिग्री हाथ में हो और रोजगार का रास्ता बंद हो तो इसे केवल युवा की असफलता नहीं कहा जा सकता। यह शिक्षा व्यवस्था, रोजगार बाजार और अर्थव्यवस्था के बीच मौजूद उस खाई का संकेत है जिसे भरना सरकार, विश्वविद्यालय, उद्योग और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
आखिर सवाल यह नहीं है कि बिहार का युवा कितना पढ़ रहा है। असली सवाल यह है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके लिए बिहार में कितना भविष्य बचा है?
आलोक कुमार