🔴 ताजा खबर
खबरें लोड हो रही हैं...
पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

 


ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है।

पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश?

पलायन को केवल बेरोजगारी का परिणाम मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन कई कारणों का मिला-जुला परिणाम है। रोजगार की कमी निश्चित रूप से इसका बड़ा कारण है, लेकिन इसके साथ मजदूरी का स्तर, काम की निरंतरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जुड़ी हुई है।

खेती से पूरे परिवार का गुजारा क्यों मुश्किल हो रहा है?

ग्रामीण बिहार में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आजीविका का आधार है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खेती से पूरे परिवार का साल भर गुजारा करना कठिन होता जा रहा है। जमीन का आकार छोटा है, खेती की लागत बढ़ रही है और सिंचाई की सुविधा हर क्षेत्र में समान नहीं है। ऐसे में खेती से होने वाली आमदनी और परिवार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जाता है।

यही अंतर ग्रामीण युवाओं को दूसरे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है। गांव में यदि किसी युवक को महीने में कुछ दिनों का ही काम मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में उसे लगातार काम और अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिल सकती है, तो उसका बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए हर पलायन को केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा। कई युवा आज पलायन को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखते हैं।

मजबूरी का पलायन और अवसर की तलाश अलग है

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मजबूरी में किया गया पलायन और अवसर की तलाश में किया गया पलायन एक जैसा नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर दूसरे शहर में नौकरी करता है, बेहतर वेतन पाता है और परिवार का जीवन स्तर ऊपर उठाता है, तो इसे आर्थिक गतिशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि कोई मजदूर गांव में काम न मिलने के कारण असुरक्षित परिस्थितियों में दूसरे राज्य जाता है, अस्थायी जगह पर रहता है और मजदूरी या काम की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

ग्रामीण बिहार के सामने चुनौती यह है कि यहां लोगों के पास रोजगार चुनने के विकल्प कितने हैं। अगर विकल्प केवल बाहर जाने का है, तो यह विकास की कमजोरी को दिखाता है।

पढ़ाई के बाद भी गांव में रोजगार क्यों नहीं?

ग्रामीण युवाओं की एक बड़ी समस्या स्थानीय स्तर पर कौशल के अनुरूप रोजगार का अभाव है। शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच दूरी अब भी दिखाई देती है।

कई युवा डिग्री या तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन यदि उनके आसपास उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें पटना, दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद या अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता है।

इसका असर केवल उस युवक पर नहीं पड़ता। गांव की युवा श्रमशक्ति बाहर चली जाती है। इससे स्थानीय बाजार, छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होती है।

परिवार के लिए प्रवासी मजदूर की कमाई कितनी महत्वपूर्ण है?

पलायन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ता है। घर में अक्सर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं। खेती और घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बुजुर्गों के कंधों पर आ जाता है।

दूसरी तरफ बाहर कमाने गया व्यक्ति परिवार को पैसे भेजता है। इसी आय से बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का खर्च, खेती में निवेश और मकान जैसी जरूरतें पूरी होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी मजदूर केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लंबे समय तक परिवार से दूर रहने की कीमत भी होती है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जीवन में दूरी का असर दिखाई देता है। प्रवासी श्रमिकों को काम की असुरक्षा, दुर्घटना, बीमारी, मजदूरी में देरी और रहने की खराब परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

गांव में रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में ऐसे रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को केवल मजबूरी में बाहर न जाना पड़े?

इसका जवाब केवल सरकारी नौकरियों में नहीं है। गांवों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, छोटे विनिर्माण केंद्र, हस्तशिल्प और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

यदि किसान अपनी उपज को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय गांव या प्रखंड स्तर पर उसका प्रसंस्करण कर सके, तो स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय और रोजगार दोनों पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह ग्रामीण युवाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए, जिसके बाद बाजार में वास्तविक रोजगार उपलब्ध हो। इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, ड्राइविंग, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में मांग के अनुरूप कौशल विकास किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और इंटरनेट भी रोजगार से जुड़े हैं

ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते समय बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क, बिजली, इंटरनेट, बैंकिंग और बाजार तक आसान पहुंच किसी भी छोटे व्यवसाय के लिए जरूरी है।

जब किसी गांव तक बाजार पहुंचेगा, तभी वहां व्यवसाय खड़ा करने की संभावना बढ़ेगी। जब व्यवसाय बढ़ेगा, तभी स्थानीय रोजगार पैदा होगा। इसलिए ग्रामीण विकास को केवल सड़क बनाने या भवन तैयार करने तक सीमित करने के बजाय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पलायन रोकना नहीं, सुरक्षित विकल्प देना जरूरी

सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर व्यक्ति को अपने गांव में ही रोक दिया जाए। देश के भीतर रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आर्थिक विकास का हिस्सा भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी, शोषण और असुरक्षा का पर्याय बन जाता है।

इसलिए जरूरत ऐसे ग्रामीण आर्थिक मॉडल की है, जिसमें गांव का युवा चाहे तो गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कर सके और चाहे तो बाहर जाकर अपनी प्रतिभा और कौशल के अनुरूप बेहतर अवसर हासिल कर सके।

ग्रामीण बिहार के पलायन को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे एक परिवार की जरूरत, एक किसान की आर्थिक मजबूरी, एक युवा की महत्वाकांक्षा और बेहतर भविष्य का सपना छिपा है।

पलायन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है; मजबूरी वाले पलायन को अवसर में बदलना समाधान है। बिहार के गांवों को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जहां रोजगार के लिए घर छोड़ना मजबूरी न हो और बाहर जाना केवल बेहतर अवसर चुनने का फैसला हो। विकल्प होना ही वास्तविक विकास की निशानी है।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?

 


बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?

पटना। बिहार में शिक्षा का विस्तार हुआ है। गांव-कस्बों तक कॉलेज पहुंचे हैं, हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। लेकिन शिक्षा के इस विस्तार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं है—डिग्री मिलने के बाद युवा जाएं तो जाएं कहां?

यह सवाल केवल नौकरी पाने की व्यक्तिगत चिंता नहीं है। यह बिहार की अर्थव्यवस्था, परिवारों की स्थिति, युवाओं के पलायन और राज्य के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। एक ओर माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई पर वर्षों तक खर्च करते हैं, दूसरी ओर डिग्री पूरी करने के बाद युवा सरकारी नौकरी की तैयारी, सीमित निजी रोजगार और दूसरे राज्यों में पलायन के बीच अपना रास्ता तलाशते हैं।

डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी

बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम, बीसीए और बीबीए जैसी डिग्रियां हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन हर डिग्री के बाद रोजगार का स्पष्ट रास्ता दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।

समस्या केवल रोजगार के अवसरों की संख्या की नहीं है। शिक्षा और रोजगार बाजार की जरूरतों के बीच तालमेल का अभाव भी बड़ी चुनौती है।

कई संस्थानों में पढ़ाई अभी भी परीक्षा और डिग्री हासिल करने के आसपास केंद्रित रहती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र को ऐसे युवाओं की जरूरत होती है जो संचार, कंप्यूटर, डेटा, डिजिटल तकनीक, अकाउंटिंग, ग्राहक सेवा, तकनीकी संचालन और अन्य व्यावहारिक काम कर सकें।

यही कारण है कि डिग्री होने के बावजूद युवा कई बार नौकरी के लिए तैयार महसूस नहीं करते।

सरकारी नौकरी ही पहली पसंद क्यों?

बिहार में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण को केवल मानसिकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। नियमित आय, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक स्थिरता इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।

इसी वजह से हजारों-लाखों युवा रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।

मेहनत करने वाले युवाओं की इस आकांक्षा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन एक बड़ा सवाल भी सामने है—क्या बिहार की पूरी युवा पीढ़ी का भविष्य सीमित संख्या वाली सरकारी नौकरियों पर निर्भर रह सकता है?

यदि कोई युवा कई वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता रहता है और चयन नहीं हो पाता, तो कई बार उसके पास वैकल्पिक रोजगार के लिए आवश्यक अनुभव और कौशल भी नहीं बचता।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ युवाओं को दूसरे करियर विकल्पों के बारे में भी समय रहते जानकारी मिलनी चाहिए।

पलायन क्यों बन रहा है मजबूरी?

शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर का सबसे दिखाई देने वाला परिणाम युवाओं का पलायन है।

बिहार के गांवों और छोटे शहरों से पढ़े-लिखे युवा दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, सूरत और दूसरे औद्योगिक शहरों की ओर जाते हैं।

विडंबना यह है कि बिहार का युवा बाहर जाकर निर्माण, परिवहन, होटल, सुरक्षा, डिलीवरी, तकनीकी सेवाओं, निजी कंपनियों और छोटे कारोबारों में काम करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर युवा अपने राज्य में ही काम करना चाहता है, लेकिन यह जरूर सवाल उठाता है कि जिस श्रम और प्रतिभा की दूसरे राज्यों को जरूरत है, उसके लिए बिहार में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बन पा रहे हैं?

पलायन केवल व्यक्ति के शहर बदलने का मामला नहीं है। इसका असर परिवारों, गांवों की सामाजिक संरचना और स्थानीय बाजार पर भी पड़ता है।

शिक्षित युवतियों के सामने अलग चुनौती

शिक्षित युवतियों के लिए रोजगार की समस्या कई जगह और जटिल हो जाती है।

ग्रामीण और छोटे शहरों में सुरक्षित तथा सम्मानजनक स्थानीय रोजगार के विकल्प सीमित होने पर परिवार बेटियों को दूसरे शहर भेजने में संकोच कर सकते हैं। परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद अनेक युवतियां रोजगार बाजार से बाहर रह जाती हैं।

इसलिए रोजगार की चर्चा में केवल नौकरी की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के लिए सुरक्षित, स्थानीय और आवश्यकता के अनुसार लचीले रोजगार अवसर भी विकसित करने होंगे।

घर से डिजिटल काम, स्थानीय सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं, स्वयं सहायता समूहों से जुड़े कारोबार और छोटे उद्यम ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जिनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।

बिहार में उद्योग और स्थानीय रोजगार का सवाल

बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है। लेकिन बढ़ती युवा आबादी को रोजगार देने के लिए कृषि के साथ अन्य क्षेत्रों का विस्तार भी जरूरी है।

खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, टेक्सटाइल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, छोटे विनिर्माण, आईटी सेवाएं और कृषि आधारित उद्यम जिलों में रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

जरूरत इस बात की है कि रोजगार को केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित न रखा जाए। जिलों के स्तर पर रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था विकसित होने पर युवाओं को अपने घर से दूर जाने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

डिग्री के साथ कौशल भी जरूरी

आज के रोजगार बाजार में डिग्री महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेली डिग्री पर्याप्त नहीं है।

कॉलेजों में पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगारपरक कौशल को अधिक महत्व मिलना चाहिए।

उदाहरण के लिए वाणिज्य के विद्यार्थी को केवल किताबों में अकाउंटिंग पढ़ाने के बजाय अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर, जीएसटी से जुड़े व्यावहारिक काम और वित्तीय प्रबंधन का अनुभव दिया जा सकता है। विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला और उद्योग आधारित प्रशिक्षण से जोड़ा जा सकता है। कला के विद्यार्थियों के लिए संचार, डिजिटल मीडिया, शोध, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कौशल विकसित किए जा सकते हैं।

विश्वविद्यालयों की जवाबदेही भी तय हो

उच्च शिक्षा संस्थानों की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की।

यह भी महत्वपूर्ण है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद विद्यार्थी रोजगार, स्वरोजगार, उच्च शिक्षा या किसी व्यावसायिक क्षेत्र में कितनी प्रगति कर रहे हैं।

कॉलेजों में करियर काउंसिलिंग और प्लेसमेंट सेल केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से काम करने चाहिए। विद्यार्थियों को अंतिम वर्ष तक इंतजार कराने के बजाय पहले से रोजगार बाजार, प्रतियोगी परीक्षाओं, कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता के विकल्प समझाए जाने चाहिए।

स्वरोजगार को भी सम्मान मिले

हर युवा को सरकारी या निजी नौकरी मिलना संभव नहीं है। इसलिए स्वरोजगार और उद्यमिता को भी रोजगार नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, कृषि आधारित कारोबार, डिजिटल सेवाएं, मरम्मत सेवाएं, पर्यटन, हस्तशिल्प और ऑनलाइन कारोबार जैसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

लेकिन केवल ऋण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। युवा उद्यमियों को प्रशिक्षण, बाजार, तकनीक, मार्गदर्शन और शुरुआती दौर में संस्थागत सहयोग भी चाहिए।

सवाल सिर्फ डिग्री का नहीं, भविष्य का है

बिहार में शिक्षा की पहुंच बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन यदि शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार का रास्ता स्पष्ट नहीं है तो डिग्री युवाओं के लिए अवसर का प्रमाणपत्र बनने के बजाय निराशा का कारण बन सकती है।

अब चुनौती केवल अधिक कॉलेज और पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की नहीं है। असली चुनौती शिक्षा को रोजगार, कौशल और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की है।

बिहार के युवाओं को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में खड़े होने के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें इस तरह शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा कि वे नौकरी पाने के साथ-साथ रोजगार पैदा करने की क्षमता भी विकसित कर सकें।

डिग्री हाथ में हो और रोजगार का रास्ता बंद हो तो इसे केवल युवा की असफलता नहीं कहा जा सकता। यह शिक्षा व्यवस्था, रोजगार बाजार और अर्थव्यवस्था के बीच मौजूद उस खाई का संकेत है जिसे भरना सरकार, विश्वविद्यालय, उद्योग और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।

आखिर सवाल यह नहीं है कि बिहार का युवा कितना पढ़ रहा है। असली सवाल यह है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके लिए बिहार में कितना भविष्य बचा है?


आलोक कुमार

Bihar : नवरात्र में पूजा पंडालों के आसपास मेले-सा माहौल

  नवरात्र में पूजा पंडालों के आसपास मेले-सा माहौल, आस्था के साथ स्वाद और मनोरंजन का संगम  नवरात्र में मां दुर्गा के दर्शन के लिए उमड़ती श्रद...